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राष्ट्रीय कार्य योजना संहिता 2023: कतिपय पहलू

पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (एमओईएफसीसी) द्वारा 17 जून, 2023 को भारतीय वानिकी अनुसंधान एवं शिक्षा परिषद (आईसीएफआरई) द्वारा आयोजित ‘वर्ल्ड डे टू कॉम्बैट डेजर्टिफिकेशन एण्ड ड्रॉट’ (World Day to Combat-Desertification and Drought) के अवसर पर द नेशनल वर्किंग प्लान कोड-2023 (राष्ट्रीय कार्य योजना संहिता, 2023) जारी किया गया। इस संहिता का उद्देश्य वनों के वैज्ञानिक प्रबंधन तथा नए दृष्टिकोणों को विकसित करना है, जिससे वन संसाधनों का प्रयोग इस प्रकार से किया जाए कि देश के नागरिक उनसे आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक लाभ जैसे विभिन्न लाभ प्राप्त कर सकें।

अतः, भारत सरकार के लिए मृदा अपरदन को रोकने; टिब्बों (साधारणतया मरु प्रदेशों में अथवा झीलों तथा महासागरों के निम्नस्थ तटों पर पवन द्वारा वाहित बालू की पहाड़ी अथवा कटक [रिज]) के गठन को नियंत्रित करने; प्राकृतिक धरोहर को संरक्षित करने; जलग्रहण क्षेत्रों (वह क्षेत्र, जहां वर्षा का जल नालों और नदियों से होकर अंततः जलाशय या समुद्र में पहुंचता है।) के अपरदन/क्षरण को रोकने; पर्यावरण को स्थिर बनाए रखने; लोगों की सहायता से वन एवं वृक्ष आवरण में वृद्धि करने; और वनों को अधिक उत्पादक बनाने की आवश्यक है।

यह संहिता सतत रूप से वनों का प्रबंधन करने के लिए अंतरराष्ट्रीय मानदंडों और संकेतकों के अनुरूप है।

राष्ट्रीय कार्य योजना संहिता

राष्ट्रीय कार्य योजना संहिता (एनडब्ल्यूपीसी) दिशानिर्देशों के उस समुच्चय को संदर्भित करती है जो देश में वैज्ञानिक रूप से वनों के प्रबंधन की सुविधा प्रदान करता है। भारत सरकार द्वारा 2004 में पहली बार इस संहिता का पालन किया गया था। 2014 में, इसे आवश्यकतानुसार संशोधित किया गया। संगतता लाने और मानक निर्धारित करने के माध्यम से, संहिता इस देश में विभिन्न वन प्रभागों के लिए वैज्ञानिक रूप से वनों का प्रबंधन करने हेतु कार्य योजना बनाने में अत्यंत सहायक है।

राष्ट्रीय कार्य योजना संहिता भारतीय वन प्रबंधन मानक (आईएफएमएस—इंडियन फॉरेस्ट मैनेजमेंट स्टैंडर्ड), जो भारत में भिन्न वन पारिस्थितिक तंत्रों पर विचार करते हुए प्रबंधन में संगतता को बढ़ावा देता है, को शामिल करती है। आईएफएमएस में आठ व्यापक दिशानिर्देश शामिल हैं, जो सभी भारतीय राज्यों तथा संघ राज्यक्षेत्रों पर लागू होते हैं। इन दिशानिर्देशों का भारत में वन प्रबंधन की प्रथाओं में मूल्यांकन किया जा सकता है तथा एक महत्वपूर्ण परिवर्तन के रूप में इनके अनुसार कार्रवाई की जा सकती है। ये दिशानिर्देश भोपाल-इंडिया प्रोसेस (1998), जो कि वन्य प्रदेशों को सतत रूप से प्रबंधित करने के लिए मानदंड और संकेतक उपागम पद्धति पर आधारित नौ वैश्विक पहलों में से एक है, से लिए गए हैं।

ये दिशानिर्देश निम्नलिखित बिंदुओं पर जोर देते हैं:

  • मृदा और जल संरक्षण;
  • वनों से सामाजिक-आर्थिक तथा सांस्कृतिक लाभों में वृद्धि;
  • वनों की उत्पादन क्षमता और वन संसाधनों का उपयोग;
  • नीति की प्रभावशीलता; और
  • वन आवरण की स्थिति तथा उसका विस्तार

वनों का वैज्ञानिक और सतत प्रबंधन

भारत में वन प्रबंधन एक वैज्ञानिक पद्धति, जिसका अनुपालन विश्व के कुछ अन्य देशों में भी किया जाता है, का प्रयोग कर किया जाता है।

वन का वैज्ञानिक प्रबंधन एक ऐसी पद्धति को संदर्भित करता है, जिसमें सतत रूप से वनों का प्रबंधन करने के लिए वैज्ञानिक सिद्धांतों और तकनीकों का प्रयोग किया जाता है। इस पद्धति में, अभीष्ट डेटा का संग्रहण; अनुसंधान; और साक्ष्य-आधारित पद्धतियों का अनुपालन किया जाता है ताकि वन उत्पादक बने रहे तथा उन्हें अधिक लंबे समय तक संधृत किया जा सके।

सतत वन प्रबंधन की विशेषताएं: सतत वन प्रबंधन की कुछ प्रमुख विशेषताएं निम्नलिखित हैं:

  • सतत वन प्रबंधन में, वन वर्तमान और भावी पीढ़ियों दोनों के लिए वस्तुएं और रोजगार प्रदान करने में सक्षम होते हैं। यह समुदायों के सतत विकास में भी सहायता करता है।
  • यह वनों के संरक्षण और उपयोग के विभिन्न पहलुओं, जैसे कानूनी, प्रशासनिक, पर्यावरणीय, सामाजिक, आर्थिक और तकनीकी पहलू, को शामिल करता है।
  • इसमें विभिन्न रूपों में मानवीय हस्तक्षेप शामिल है, जैसे वन पारिस्थितिक तंत्र और उनकी भूमिकाओं का अनुरक्षण करना और संरक्षित करना, तथा वनों की उत्पादकता बढ़ाने के लिए आर्थिक या सामाजिक रूप से मूल्यवान जीव-जाति (या जीव-जाति समूह) के विकास को बढ़ावा देना।

सतत वन प्रबंधन के मानकः सतत वन प्रबंधन निम्नलिखित आठ मानकों को समाविष्ट करता है:

  • जैवविविधता का संरक्षण: सतत वन प्रबंधन के प्रमुख उद्देश्यों में से एक देश में जैव विविधता, विशिष्ट रूप से वन्यजीव संरक्षण, की देखभाल, संरक्षण तथा वृद्धि करना है।
  • वनों की उत्पादकता में वृद्धि: यह वन संसाधनों के संवर्धन को भी लक्षित करता है जिससे उनका उपयोग सतत रूप से किया जा सके।
  • मृदा और जल संसाधनों का संरक्षण: यह वन पारिस्थितिकी तंत्र में उपलब्ध मृदा और जल संसाधनों को संरक्षित करने पर ध्यान केंद्रित करता है।
  • वृक्ष एवं वन आवरण का अनुरक्षण और संवर्धन: यह वृक्ष एवं वन आवरण के अनुरक्षण तथा विस्तारण, जिससे की सीमा बढ़ सके।
  • वन संसाधनों का इष्टतम उपयोग: यह वन संसाधनों के कुशलतापूर्वक तथा जिम्मेदारी से उपयोग को प्रोत्साहित करता है, जिससे उनका इष्टतम उपयोग किया जा सके।
  • वन स्वास्थ्य, जीवन शक्ति, और संपोषण में सुधार: यह पर्याप्त एवं उपयुक्त उपायों के माध्यम से वन स्वास्थ्य, जीवन शक्ति तथा संपोषण के अनुरक्षण और सुधार को चिह्नांकित करता है।
  • सामाजिक-आर्थिक तथा सांस्कृतिक लाभों में वृद्धि: यह वनों से प्राप्त होने वाले सामाजिक-आर्थिक सांस्कृतिक लाभों के अनुरक्षण और वृद्धि पर भी बल देता है।
  • संस्थागत ढांचे की प्रभावोत्पादकता सुनिश्चित करनाः यह सुनिश्चित करता है कि वन प्रबंधन से संबद्ध संस्थागत ढांचा, कानून और नीतियां प्रभावी तथा आदर्शानुरूप हैं।

संहिता के मुख्य प्रावधान

(i) यह देश के विभिन्न वन क्षेत्रों के लिए कार्य योजना तैयार करते समय राज्य के वन विभागों के लिए एक मानक के रूप में कार्य करती है।

(ii) यह वन प्रबंधन की योजना बनाते समय मूलभूत तत्वों को अंगीकृत तथा सतत वन प्रबंधन के सिद्धांत शामिल करती है।

(iii) राष्ट्रीय कार्य योजना संहिता 2023 के अनुसार, राज्यों के वन विभागों के लिए नियमित रूप से डेटा संग्रहण करना तथा केंद्रीय डेटाबेस को अद्यतित करना आवश्यक है। फलस्वरूप, देश में सभी वन नियमित रूप से प्रबंधित किए जाएंगे।

(iv) इसके अलावा, वन विभाग उनके द्वारा अनुसरण की जा रही प्रबंधन पद्धतियों के साथ कार्य योजनाओं में निर्दिष्ट प्रबंधन पद्धतियों की तुलना करने में सक्षम होंगे।

वनों के वैज्ञानिक प्रबंधन के लाभ

इस संहिता के कतिपय लाभ निम्न प्रकार हैं:

  • लोगों की भोजन, ईंधन तथा वनोत्पाद जैसी आवश्यकताओं को पूरा करने और देश के लिए लाभदायक होने के अलावा, यह पद्धति दीर्घकाल में वनों का अनुरक्षण सुनिश्चित करती है।
  • वन का वैज्ञानिक प्रबंधन हमें सतत वन प्रबंधन, जो इस प्रकार से वनों के उपयोग एवं अनुरक्षण को शामिल करता है जिससे भावी पीढ़ियों के लिए उनके पर्यावरणीय, सामाजिक और आर्थिक महत्व संरक्षित होते हैं, को प्राप्त करने में सक्षम बनाता है। इसका उद्देश्य वन संसाधनों को संरक्षित करने तथा वनोत्पाद के लिए बढ़ती मांग को पूरा करने के बीच एक संतुलन बनाए रखना है।
  • इस पद्धति में, उत्काष्ठन (लॉगिंग—लकड़ी बेचने के लिए वृक्षों को काटने की गतिविधि) का प्रभाव कम हो जाता है। यह प्रभाव चुनिंदा वृक्षों के उत्काष्ठन, काष्ठीय अपशिष्ट, सुरक्षित जीव आवास प्रदान करना, वनोत्पाद की समय पर कटाई करना आदि हो सकते हैं। इसके परिणामस्वरूप, वनों और मृदा पर भी पर्यावरणीय प्रभाव कम होता है।

निष्कर्ष

भारत और विश्व में वन के वैज्ञानिक प्रबंधन के क्षेत्र में निरंतर विकास हुआ है। नवीन पद्धतियां तथा उन्नत प्रौद्योगिकियां विकसित की जा रही हैं, और इस क्षेत्र में निरंतर नवोन्मेषों का पदार्पण हो रहा है। समय की मांग है कि राज्य वन विभागों को भी प्रबंधन की भिन्न आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए विकसित होना चाहिए। राष्ट्रीय कार्य योजना संहिता 2023 से संपूर्ण देश में नियमित और सर्वसमावेशी वन प्रबंधन की पद्धतियों को प्रोत्साहित करना अपेक्षित है।

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