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नीली अर्थव्यवस्था: अवधारणा, अपरिहार्यता एवं चुनौतियां

वर्ष 2024-25 के अंतरिम बजट ने भारत की नीली अर्थव्यवस्था (ब्लू इकोनॉमी) 2.0 में रूपांतरण के लिए मंच तैयार कर दिया। पुनःस्थापन, तटीय जलकृषि और समुद्री शस्य को लक्षित करने वाली यह योजना भारत की 7,500 किलोमीटर लंबी तटरेखा की व्यापक क्षमता का लाभ उठाने और तटरेखा के किनारे रहने वाले लोगों की आजीविका को बढ़ाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। इसी प्रकार से, 23 जुलाई, 2024 को प्रस्तुत केंद्रीय बजट 2024-25 में निर्यात को बढ़ावा देने के लिए झींगा और फिश फीड (वाणिज्यिक और वैयक्तिक जलकृषि का एक अभिन्न अंग, जो पाली गई मछलियों के लिए संतुलित आहार और पोषण प्रदान करता है।) पर मूल सीमा शुल्क कम कर दिया गया, तथा भारत की नीली अर्थव्यवस्था के निर्माण में सहायता के लिए प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना, और मत्स्य पालन और जलीय कृषि अवसंरचना कोष के लिए आवंटित राशि में और वृद्धि की गई।

बजट के जलीय कृषि पर ध्यान केंद्रित करने से इसे एक स्पष्ट स्वीकृति मिली है। यह इस क्षेत्र के विशेषज्ञों द्वारा उन स्थायी प्रथाओं, जो पर्यावरणीय प्रबंधन को आर्थिक समृद्धि के साथ संतुलित करते हैं, को अपनाने के आह्वान का अनुकरण करता है। जैसा कि भारत जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को कम करने और समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र को संपोषित करने की ओर पहल कर रहा है, और एक लचीली एवं समावेशी नीली अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देने हेतु हितधारकों से एक संधारणीय भविष्य के निर्माण के लिए साथ मिलकर कार्य करने हेतु आह्वान कर रहा है।

तथापि, आईपीसी की छठी आकलन रिपोर्ट में जारी किए गए विवरण के अनुसार, असावधानी तथा समायोजन में विफलता के कारण जलवायु परिवर्तन के प्रति तटीय समुदायों की अरक्षितता के और अधिक खराब होने संबंधी चिंताएं बनी हुई हैं। पूर्ववर्ती अनकूलन उपायों पर विचार करने पर मिश्रित परिणाम दिखाई देते हैं, जो रणनीतिक पुनर्संयोजन की आवश्यकता पर बल देते हैं। देशज समुद्री शैवाल खरपतवार की कृषि और तटीय स्थिरीकरण की उन्नत प्रणालियों जैसे प्रभावी उपायों की ओर परिवर्तन भरोसा देते हैं।

नीली अर्थव्यवस्था

विश्व बैंक नीली अर्थव्यवस्था को ‘‘महासागर के पारितंत्र के स्वास्थ्य को सुरक्षित रखते हुए आर्थिक संवृद्धि, बेहतर आजीविका और रोजगार के लिए महासागरीय संसाधनों के संधारणीय उपयोग” के रूप में परिभाषित करता है। नीली अर्थव्यवस्था आर्थिक विकास, सामाजिक समावेशन और आजीविका के संरक्षण या सुधार को बढ़ावा देने का प्रयास करने के साथ ही महासागरों एवं तटीय क्षेत्रों की पर्यावरणीय संधारणीयता सुनिश्चित करती है। यह नीतियों, आर्थिक विकास, आजीविका और परिवहन का प्रतिनिधित्व करती है जो जल और समुद्री संसाधनों के संधारणीय उपयोग के माध्यम से होती है। यह विकास प्राप्त करने के साथ-साथ समुद्री पारितंत्र को संरक्षित कर रही है। इसे एसडीजी 14 (सतत विकास लक्ष्य) में भी शामिल किया गया है।

भारत नौवहन, पर्यटन, मत्स्यपालन और अपतटीय अन्वेषणों के लिए व्यापक स्तर पर जल पर निर्भर रहने वाले देशों में से एक है। नीली अर्थव्यवस्था समग्र अर्थव्यवस्था का एक महत्वपूर्ण पहलू है। भारत की तटरेखा लगभग 7,500 किमी है और इसका ईईजेड (अनन्य आर्थिक क्षेत्र) लगभग 22 लाख वर्ग किमी में फैला हुआ है।

नीली अर्थव्यवस्था के घटक

नीली अर्थव्यवस्था में पारंपरिक और उभरती हुई, दोनों तरह की गतिविधियों की एक विस्तृत  शृंखला शामिल है, जो समुद्री संसाधनों और पारिस्थितिक तंत्रों का उपयोग कर उसका लाभ उठाती हैं। इन घटकों को कई प्रमुख क्षेत्रों में वर्गीकृत किया जा सकता हैः

  • मत्स्य संग्रहण और जीवित समुद्री संसाधनों का व्यापारः इसमें पारंपरिक मत्स्यपालन के साथ-साथ जलकृषि भी शामिल है, जिसमें भोजन, फार्मास्यूटिकल्स (भैषजिक), सौंदर्य प्रसाधन और अन्य उत्पादों के लिए मत्स्यपालन, और शेलफिश (कवचप्राणी) एवं अन्य समुद्री जीवों का संग्रहण शामिल है। इसमें समुद्री खाद्य उत्पादों और अखाद्य समुद्री उत्पादों का व्यापार भी शामिल है।
  • समुद्री निर्जीव (गैर-नवीकरणीय) संसाधनों का निष्कर्षण और उपयोगः इसमें समुद्र तल से खनिजों और ऊर्जा स्रोतों जैसे तेल, गैस एवं खनिजों का निष्कर्षण शामिल है। इसमें अलवणजल के उत्पादन हेतु विलवणीकरण जैसी गतिविधियां भी शामिल हैं।
  • नवीकरणीय अक्षय प्राकृतिक ऊर्जा का उपयोगः यह क्षेत्र विद्युत एवं ऊर्जा उत्पन्न करने के लिए समुद्र से नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों जैसे अपतटीय पवन, तरंग और ज्वारीय ऊर्जा का दोहन करने पर ध्यान केंद्रित करता है।
  • महासागरों में और उसके आस-पास वाणिज्य एवं व्यापारः इसमें समुद्री परिवहन, नौवहन, जहाज निर्माण तथा बंदरगाह परिचालन शामिल हैं, जो वैश्विक व्यापार एवं वस्तुओं के परिवहन की सुविधा प्रदान करते हैं। इसमें तटीय विकास, पर्यटन तथा मनोरंजन की गतिविधियां भी शामिल हैं।
  • आर्थिक गतिविधियों एवं पर्यावरण में अप्रत्यक्ष योगदानः इस श्रेणी में महासागर पारिस्थितिक तंत्र द्वारा प्रदान की जाने वाली ऐसी सेवाएं शामिल हैं जिनका कोई प्रत्यक्ष बाजार नहीं है, लेकिन वे आर्थिक तथा पर्यावरणीय गतिविधियों में महत्वपूर्ण योगदान देती हैं। इसके उदाहरणों में कार्बन पृथक्करण (नीला कार्बन), तटीय संरक्षण, अपशिष्ट निपटान, अपशिष्ट जल प्रबंधन और जैव विविधिता की मौजूदगी शामिल हैं।

किसी गतिविधि को नीली अर्थव्यवस्था का हिस्सा मानने के लिए, उसे कुछ मानदंडों को पूरा करना होता है, जिसमें वर्तमान एवं भावी पीढ़ियों के लिए सामाजिक तथा आर्थिक लाभ प्रदान करना, समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र की रक्षा करना और अपशिष्ट को कम करने तथा पुनर्चक्रण को बढ़ावा देने के लिए स्वच्छ प्रौद्योगिकियों एवं नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों को बढ़ावा देना शामिल है।

नीली अर्थव्यवस्था 2.0

नीली अर्थव्यवस्था 2.0, नीली अर्थव्यवस्था की अवधारणा एक उन्नत तथा विकसित दृष्टिकोण को संदर्भित करती है, जो महासागरों, समुद्रों एवं तटीय क्षेत्रों से संबंधित आर्थिक गतिविधियों में संधारणीयता और पर्यावरणीय लचीलेपन पर जोर देती है। संक्षेप में, नीली अर्थव्यवस्था 2.0 संरक्षण, पुनर्नवीकरण और अनुकूली प्रबंधन के सिद्धांतों को शामिल कर नीली अर्थव्यवस्था की पारंपरिक समझ पर आधारित है। नीली अर्थव्यवस्था 2.0 महासागर पारिस्थितिक तंत्र के स्वास्थ्य को संरक्षित करते हुए महासागर संसाधनों के संधारणीय उपयोग को बढ़ावा देकर इस सीमा-निर्धारण को संबोधित करना चाहती है।

सरकार का जोर जलवायु-लचीली गतिविधियों को बढ़ावा देने और पुनर्नवीकरण, अनुकूलन उपायों, तटीय जलकृषि एवं समुद्री शस्य के लिए योजनाओं को शुरू करने पर है जो नीली अर्थव्यवस्था 2.0 के सिद्धांतों को आगे बढ़ाने की उसकी प्रतिबद्धता को दर्शाता है।

नीली अर्थव्यवस्था 2.0 के महत्वपूर्ण तत्व

  • संधारणीय संसाधन प्रबंधन: समुद्री पारिस्थितिक तंत्र के स्वास्थ्य को जोखिम में डाले बिना दीर्घकालिक आर्थिक व्यवहार्यता सुनिश्चित करने के लिए महासागर संसाधनों के संधारणीय प्रबंधन एवं उपयोग को प्राथमिकता देना।
  • पर्यावरणीय लचीलापनः तटीय एवं समुद्री पारिस्थितिक तंत्र की जलवायु परिवर्तन और अन्य पर्यावरणीय दबावों जैसे कि प्रदूषण तथा आवास निम्नीकरण के प्रति लचीलापन बढ़ाने के उपायों को लागू करना।
  • एकीकृत और बहु-क्षेत्रीय दृष्टिकोण: एक एकीकृत दृष्टिकोण अपनाना जो नकारात्मक पर्यावरणीय प्रभावों को कम करते हुए आर्थिक लाभ को अधिकतम करने के लिए मत्स्यपालन, पर्यटन, ऊर्जा और आधारभूत अवसंरचना जैसे विभिन्न क्षेत्रों की परस्पर संबद्धता पर विचार करता है।
  • समावेशी विकासः यह सुनिश्चित करना कि नीली अर्थव्यवस्था से संबद्ध आर्थिक गतिविधियां समावेशी विकास, आजीविका वृद्धि और रोजगार सृजन में योगदान दें, विशेष रूप से तटीय समुदायों तथा वंचित समूहों के लिए।
  • नीति रूपरेखा और शासनः नीली अर्थव्यवस्था के विकास का मार्गदर्शन करने के लिए राष्ट्रीय लेखांकन ढांचे, महासागर शासन संरचनाओं और महासागर का जिम्मेदारी से उपयोग करने हेतु विनियमों सहित संधारणीय व्यापक नीति रूपरेखा और शासन तंत्र विकसित करना।

बजट में नीली अर्थव्यवस्था

अंतरिम बजट

अंतरिम बजट 2024-25 में नीली अर्थव्यवस्था 2.0 को इसकी प्राथमिकताओं में से एक के रूप में रखा गया। इसे जुलाई 2022 में जारी नीति रूपरेखा के आधार पर तैयार किया गया था। जलकृषि और समुद्री शस्य के संवर्धन और महासागरों के स्वास्थ्य को संरक्षित करने के लिए, ‘नीली अर्थव्यवस्था’ के विकास के माध्यम से एक एकीकृत एवं बहु-क्षेत्रीय दृष्टिकोण का उपयोग किया जाएगा। जलवायु-लचीली गतिविधियों को बढ़ावा देने के उद्देश्य से किए गए उपायों को ‘नीली अर्थव्यवस्था 2.0’ कहा जाता है।

वित्त मंत्री के अनुसार, ‘‘नीली अर्थव्यवस्था 2.0 के लिए जलवायु-लचीली गतिविधियों को बढ़ावा देने हेतु, पुनर्नवीकरण और अनुकूलन उपायों के लिए एक योजना, और एकीकृत एवं बहु-क्षेत्रीय दृष्टिकोण के साथ तटीय जलकृषि और समुद्री कृषि शुरू की जाएगी।’’ यह उन पहलों को शुरू करने की प्रतिबद्धता को दर्शाता है जो न केवल महासागर से संबंधित आर्थिक विकास पर ध्यान केंद्रित करती हैं बल्कि संधारणीयता और जलवायु के प्रति लचीलेपन को भी प्राथमिकता देती हैं।

बजट भाषण में ‘नीली अर्थव्यवस्था 2.0’ का उल्लेख महासागर की आर्थिक क्षमता का दोहन करने के लिए अधिक संधारणीय और समावेशी दृष्टिकोण की ओर एक रणनीतिक बदलाव को दर्शाता है। यह तटीय और समुद्री क्षेत्रों में संधारणीय विकास को बढ़ावा देने की दिशा में व्यापक वैश्विक प्रवृत्ति के अनुरूप है। नीली अर्थव्यवस्था के संबंध में अंतरिम बजट 2024-25 में किए गए प्रस्ताव निम्न प्रकार हैं:

  • मुख्य रूप से पुनर्नवीकरण और अनुकूलन के उपायों पर जोर दिया जाएगा। जलवायु अनुकूल गतिविधियां, पुनर्नवीकरण, अनुकूलन उपाय, एकीकृत जलकृषि और समुद्री कृषि को शामिल किया जाएगा। संधारणीय जलकृषि और समुद्री कृषि खाद्य क्षेत्र, मत्स्यन, पर्यटन और नवीकरणीय ऊर्जा की बेहतर गुणवत्ता में योगदान देंगे।
  • प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना (पीएमएसएसवाई) को और अधिक विस्तार दिया जाएगा। इसका लक्ष्य निर्यात को दोगुना कर 1 लाख करोड़ तक पहुंचाना और लगभग 55 लाख लोगों के लिए रोजगार सृजन करना है।
  • अंतरिम बजट में जलकृषि उत्पादन और उत्पादकता में सुधार के लिए पांच एकीकृत एक्वा पार्क स्थापित करने की योजना है। एकीकृत दृष्टिकोण में सरकारी विभागों, उद्योगों और नागरिक समाज के बीच सहयोग की आवश्यकता की पहचान की गई है।

बजट 2024-25

जून 2024 में नई सरकार के गठन के साथ वित्त मंत्री द्वारा जुलाई 2024 में पूर्ण बजट पेश किया गया। वित्त मंत्री के भाषण में नीली अर्थव्यवस्था का अलग से उल्लेख नहीं है। हालांकि, प्राथमिकता 1 अर्थात कृषि में उत्पादकता और लचीलापन पर चर्चा करते हुए, उन्होंने झींगा ब्रूडस्टॉक्स (परिक्व मछलियों का एक समूह, जिसका उपयोग प्रजनन प्रयोजनों के लिए जलीय कृषि में किया जाता है।) के लिए न्यूक्लियस ब्रीडिंग सेंटर का एक नेटवर्क स्थापित करने हेतु वित्तीय सहायता का उल्लेख किया। झींगा कृषि, प्रसंस्करण और निर्यात के लिए वित्तपोषण राष्ट्रीय कृषि और ग्रामीण विकास बैंक (नाबार्ड) के माध्यम से सुगम बनाया जाएगा। इसके अतिरिक्त, समुद्री निर्यात में प्रतिस्पर्धात्मकता बढ़ाने के लिए झींगा और फिश फीड पर मूल सीमा शुल्क (बीसीडी) को घटाकर 5 प्रतिशत कर दिया गया। प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना (पीएमएमएसवाई) के लिए बजट आवंटन (संशोधित बजट) में 1,500 करोड़ रुपये से बढ़ाकार 2024-25 के बजट में 2,352 करोड़ रुपये कर दिया गया है, तथा मत्स्य पालन और जलीय कृषि अवसंरचना विकास निधि के लिए बजट आवंटन 2023-24 (संशोधित बजट) में 25 करोड़ रुपये से बढ़ाकर 2024-25 के बजट में 30 करोड़ रुपये कर दिया गया है।

नीली अर्थव्यवस्था के लिए चुनौतियां

नीली अर्थव्यवस्था को कई चुनौतियों का सामना करना पड़ता है जो इसके विकास में बाधा और समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र के स्वास्थ्य को जोखिम में डालती हैं। ऐतिहासिक रूप से, जलीय पर्यावरण को संसाधनों के असीम स्रोतों और अपशिष्ट के डंपिंग ग्राउंड (पाटन स्थल) के रूप में जाना जाता रहा है। यद्यपि, यह दृष्टिकोण इन संसाधनों की सीमित प्रकृति और अतिदोहन के हानिकारक प्रभावों को नजरअंदाज करता है।

नीली अर्थव्यवस्था के समक्ष कुछ प्रमुख चुनौतियां निम्नलिखित हैं:

  • बढ़ती मांग और अप्रभावी शासन की व्यवस्था के कारण समुद्री संसाधनों का असंवहनीय दोहन हुआ है। अपर्याप्त नियमन और प्रवर्तन अत्यधिक मत्स्यन और आवास के विनाश में योगदान देते हैं।
  • तकनीकी प्रगति ने यद्यपि संसाधन निष्कर्षण की दक्षता में सुधार किया है, तथापि उन्होंने अत्यधिक दोहन को भी बढ़ावा दिया है। मत्स्यन की आधुनिक तकनीक और उपकरण मत्स्य भंडार की पुनःप्राप्ति करने की तुलना में उसे तेजी से कम कर सकते हैं।
  • जलवायु परिवर्तन के प्रभाव, जैसे समुद्र का बढ़ता स्तर और महासागर का अम्लीकरण, समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र के लिए महत्वपूर्ण जोखिम उत्पन्न करते हैं। ये परिवर्तन आवासों को बाधित करते हैं, समुद्री धाराओं को बदलते हैं और समुद्री जीवन को प्रभावित करते हैं, जिससे जैव विविधता और तटीय समुदायों की आजीविका दोनों प्रभावित होती है।
  • अनियमित विकास जैसे कि तटीय विकास, वनोन्मूलन और खनन ने आवास के विनाश और तटीय कटाव में योगदान दिया है। अनियोजित विकास से महत्वपूर्ण आवास नष्ट हो जाते हैं और सीमित तटीय क्षेत्र के लिए प्रतिस्पर्धा करने वाले विभिन्न क्षेत्रों के बीच संघर्ष बढ़ जाता है।
  • समुद्री प्रदूषण अनुपचारित सीवेज (मलप्रवाह पद्धति), कृषि अपवाह और प्लास्टिक अपशिष्ट से होने वाला प्रदूषण समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र को जोखिम में डालता है। प्रदूषकों का संचय वाणिज्यिक मत्स्यपालन और तटीय पर्यटन दोनों को प्रभावित करते हुए, समुद्री जीवन और पारिस्थितिकी तंत्र को नुकसान पहुंचाता है।
  • अवैध, असूचित और अनियमित (आईयूयू) मत्स्यन से संरक्षण के प्रयासों को नुकसान पहुंचता है और वैध हितधारकों को राजस्व से वंचित होना पड़ता है। यह अत्यधिक मत्स्यन में योगदान देता है तथा मत्स्य भंडार की संधारणीयता को जोखिम में डालता है, विशेषकर उन क्षेत्रों में जहां शासन एवं प्रवर्तन कमजोर हैं।
  • अनुचित व्यापार प्रथाओं के कारण छोटे द्वीप वाले विकासशील देश, जो आर्थिक विकास के लिए अपने अनन्य आर्थिक क्षेत्रों (ईईजेड) पर अत्यधिक निर्भर हैं, अकसर मत्स्यन के न्यायसंगत समझौतों पर बातचीत करने में चुनौतियों का सामना करते हैं। सीमित प्रशासनिक क्षमता और असमान सौदेबाजी की शक्ति के परिणामस्वरूप मत्स्यन करने वाली विदेशी कंपनियों से अपर्याप्त राजस्व प्राप्ति और तकनीक का हस्तांतरण होता है।

निष्कर्ष

कुल मिलाकर, नीली अर्थव्यवस्था न केवल जल के संधारणीय उपयोग के संरक्षण और संवर्धन से संबंधित है, बल्कि रोजगार सृजन करने, अवैध/अति मत्स्यन के विरुद्ध कार्रवाई करने, समुद्री प्रदूषण से निपटने, नवीकरणीय ऊर्जा के दोहन और शून्य भूख को भी लक्षित करती है। यह सरकारी विभागों, उद्योगों और अन्य लोगों द्वारा समन्वित कार्रवाई के माध्यम से संभव है। सहयोग और सामूहिक प्रयासों से तटीय क्षेत्रों में संधारणीय विकास लक्ष्यों को प्राप्त किया जा सकता है।

नीली अर्थव्यवस्था से संबंधित कुछ अन्य पहलों में सागरमाला परियोजना, डीप-ओशन मिशन, राष्ट्रीय मात्स्यिकी नीति, नाविक (NavIC), एकीकृत तटीय क्षेत्र प्रबंधन, ओ-स्मार्ट आदि शामिल हैं। यह महत्वपूर्ण है कि ये योजनाएं लंबे समय तक जारी रहें और निवल-शून्य (नेट-जीरो) उत्सर्जन लक्ष्य, संधारणीय विकास और बेहतर आजीविका में योगदान दें।

भारत का लक्ष्य 2070 तक निवल-शून्य उत्सर्जन प्राप्त करना है और नीली अर्थव्यवस्था 2.0 भी इस लक्ष्य के अनुरूप है। इस नीति के साथ, सरकार का उद्देश्य प्रदूषण को कम करना, मछली की आबादी में सुधार करना और वाइल्ड फिश (प्राकृतिक पारिस्थितिकी की मछली) के भंडार पर बोझ को कम करना, महासागरों का संधारणीय उपयोग करना और नवीकरणीय संसाधनों से ऊर्जा प्राप्त करना है जो उत्सर्जन को कम करने में योगदान देगा।

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