भारतीय राष्ट्रीय महासागर सूचना सेवा केन्द्र (INCOIS) ने मई 2024 में पूर्वानुमान लगाया था कि उच्च समुद्री तरंगें, जिन्हें महातरंग (Swell Waves) भी कहा जाता है, गोवा, महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल, ओडिशा, तमिलनाडु, केरल, लक्षद्वीप, कर्नाटक, गुजरात और अंडमान और निकोबार द्वीप समूह के तटीय क्षेत्रों में आ सकती हैं। महातरंगें, एक प्रकार की सतही गुरुत्व तरंगें हैं जो उन्मुक्त महासागर और समुद्रों में दूरस्थ तूफानों, जैसे कि हरिकेन (प्रभंजन), या स्थानीय पवनों के बजाय 34-47 समुद्री मील की गति से चलने वाली तीव्र झंझा पवनों के कारण भी उत्पन्न होती हैं। ये तरंगें एक महासागरीय या समुद्री उफान (Ocean or Sea Swell—महासागर या समुद्र में सैकड़ों मील दूर चलने वाली झंझा पवनों द्वारा उत्पन्न तरंगों का समुच्चय) से बनती हैं; इसलिए, इन्हें महातरंग महोर्मि कहा जाता है। इन्हें सतही गुरुत्व तरंगें भी कहा जाता है। दूसरी ओर, तरंगें स्थानीय रूप से चलने वाली पवनों से उठती हैं; पवन जितनी तेज होती है, तरंगें उतनी ही ऊंची होती हैं। पवन के रुकने पर ये समाप्त हो जाती हैं। इसका एक सामान्य उदाहरण दूरस्थ उष्णकटिबंधीय चक्रवात की पवनों से उत्पन्न तटीय जल पर प्रेक्षित महातरंग है। उष्णकटिबंधीय चक्रवात की गति से भी अधिक तीव्र गति से बहने वाली महातरंगों को ऐतिहासिक रूप से आने वाले टाइफून का संकेत माना जाता है।
कल्लाक्कडल
कल्लाक्कडल केरल में मार्च 2024 में महातरंगों के कारण आई बाढ़ जैसी ही घटनाएं हैं, जिसमें अलपुझा, कोल्लम और तिरुवनंथपुरम जिले सबसे अधिक प्रभावित हुए थे। कल्लाक्कडल तटीय आकस्मिक बाढ़ की घटनाएं हैं जो स्थानीय पवनों या अन्य पर्यावरणीय संकेतों में किसी भी महत्वपूर्ण बदलाव के आए बिना होती हैं। ‘कल्लाक्कडल’ शब्द दो मलयालम शब्दों, कल्लन जिसका अर्थ है चोर और कडल जिसका अर्थ है समुद्र, से बना है। संयुक्त रूप से इन शब्दों का तात्पर्य एक ऐसे महासागर से है जो चोर की भांति बिना शोर मचाए आता है। इस शब्द को संयुक्त राष्ट्र शैक्षिक, वैज्ञानिक और सांस्कृतिक संगठन (यूनेस्को) ने 2012 में आधिकारिक तौर पर मंजूरी दी थी। सामान्यतया, कल्लाक्कडल दक्षिणी हिंद महासागर में उत्पन्न होता है, जो एक महासागरीय उफान उत्पन्न करता है जो दो से तीन दिनों के भीतर तट तक पहुंचने के लिए उत्तर की ओर यात्रा करता है। इस प्रकार की बाढ़ की घटना के लिए अन्य स्थानीय शब्द रिसागा (Rissaga) है जिसका प्रयोग बेलिएरिक द्वीपों में किया जाता है।
कल्लाक्कडल की महत्वपूर्ण विशेषताओं में तीव्र तरंग-गतिविधि शामिल है जो कुछ दिनों तक जारी रहती है; यह निचले तटों को जलमग्न कर देती है; यह घटना मुख्य रूप से मानसून-पूर्व और कभी-कभी मानसून-पश्चात के मौसम में देखी जाती है; और उच्च ज्वार के दौरान जल स्तर, अधिकतम जल स्तर (एमडब्ल्यूएल) से 3-4 मीटर ऊपर पहुंच सकता है।
महातरंगों की उत्पत्ति
पवन तरंगों, जो समुद्र की सतह पर बहने वाली पवन द्वारा निर्मित होती हैं, से महातरंगों की उत्पत्ति होती है। वायु से जल में स्थानांतरित होने वाली ऊर्जा तरंगों को उत्पन्न करती है। यदि पवन लगातार लंबी दूरी तक और पर्याप्त अवधि तक चलती रहे तो ये तरंगें विशाल हो सकती हैं। जैसे-जैसे ये तरंगें पवन से प्रभावित क्षेत्र से परिक्षेपित होती हैं, वे अधिक शांत और अधिक समान तरंगें उत्पन्न करना शुरू कर देती हैं। परिक्षेपण (किसी चीज का एक स्थान से दूसरे स्थान पर पहुंचना या प्रसार होना) की प्रक्रिया तरंगों को उनकी गति और तरंगदैर्घ्य के आधार पर वर्गीकृत करने में सहायता करती है, जिसमें बड़ी तरंगें अधिक तीव्र होने के कारण लघु तरंगों से आगे निकल जाती हैं। संगठित और दीर्घावधि वाली शेष तरंगों, जो अपने उत्पति क्षेत्र से बाहर निकल जाती हैं, को महातरंग कहा जाता है। ये अपने उद्गम स्थान से दूरस्थ तटों तक पूरे महासागर बेसिन की यात्रा करने की क्षमता रखती हैं। महातरंगों को सामान्यतया सुनामी समझ लिया जाता है।
सुनामी वृहद या विशाल तरंगों की एक शृंखला है, जो महासागर के नीचे या उसके निकट भूकंपों के कारण बनती है और यह महातरंगों की तुलना में लगभग 10 गुना तीव्र होती है। सुनामी और महातरंग दोनों की गति तट के पास धीमी हो जाती है, परंतु सुनामी भूमि पर 30-50 किमी/घंटा की गति से आती है।
महातरंगों की विशेषताएं
पवन तरंगों की तुलना में महातरंगों की तरंगदैर्घ्य लंबी होती है, जो अकसर 100 से 200 मीटर तक होती है, और कभी-कभी इससे भी अधिक। वे अपनी उल्लेखनीय गति के कारण पूरे महासागर बेसिन को पार कर सकती हैं। अपनी यात्रा के दौरान कुछ ऊर्जा खो देने के बावजूद, वे अपने उद्गम स्थान से दूर समुद्र तटों को प्रभावित कर सकती हैं, जिससे तट की महत्वपूर्ण विशेषताओं/अभिलक्षणों को अत्यधिक नुकसान होता है। वे अधिक गोल शृंगों (जल पृष्ठ पर चलने वाली अनुप्रस्थ तरंग का वह बिंदु जिस पर जल कणों का विस्थापन ऊपर की ओर महत्तम हो) के साथ अधिक शांत नजर आती हैं। चूंकि महातरंगें सामान्य समुद्री तरंगों के साथ मिल जाती हैं, इसलिए उन्हें नग्न आंखों से, विशेषकर तट से दूर, पहचानना मुश्किल हो सकता है, विशिष्टतः यदि वे सामान्य तरंगों से बहुत बड़ी न हों।
महातरंग/महोर्मि का पूर्वानुमान
संख्यात्मक महासागर मॉडल पर आधारित बहु-मॉडल पूर्वानुमान प्रणाली जिसमें तटीय जल, उन्मुक्त महासागर और दक्षिणी हिंद महासागर में दूर तक दक्षिण में प्रसारित उत्प्लवों (buoy—खतरनाक स्थानों के बारे में नावों को चेतावनी देने वाली तैरती हुई वस्तु जो समुद्र या नदी के तल पर बंधी होती है।) से वास्तविक समय के डेटा को शामिल किया जाता है, का उपयोग कर पूर्वानुमान तैयार किए जाते हैं। पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय के अधीन INCOIS महातरंग/महोर्मि की चेतावनी जारी करता है। INCOIS के पूर्वानुमान के अनुसार अंडमान और निकोबार तथा लक्षद्वीप के द्वीपों सहित पूर्वी एवं पश्चिमी तट पर 3 मीटर तक की ऊंची तरंगे हो सकती हैं।
महातरंगों का प्रभाव
भारतीय तट से लगभग 10,000 किमी दूर दक्षिणी अटलांटिक महासागर से उठने वाली महातरंगें, दक्षिणी अटलांटिक महासागर के ऊपर एक कम दबाव प्रणाली बनने के बाद बनती हैं, तथा तीव्र पवनों और 11 मीटर ऊंची महातरंगों का कारण बनती हैं, जो इसके बाद दक्षिणी हिंद महासागर की ओर बढ़ती हैं।
इनमें महत्वपूर्ण तटीय संरचनाओं (भवनों आदि) को अत्यधिक क्षति पहुंचाने और परिवारों के विस्थापन की संभावना होती है। जल भू-भाग पर प्रवाहित हो सकता है और तटीय क्षेत्रों में बाढ़ आ सकती है। महातरंगें, विशिष्टतः तूफानों के दौरान, अपनी प्रवर्धित ऊर्जा के कारण तटीय अपरदन (समुद्र या झील के तटवर्ती भू-भाग से जल के लगातार जोर से टकराने से हुआ भूक्षरण) में उल्लेखनीय योगदान दे सकती हैं।
निष्कर्ष
समुद्री नौवहन के लिए महातरंगों की समझ होना महत्वपूर्ण है, जिससे पोत परिवहन और छोटे जहाजों के परिचालन में सुरक्षा एवं दक्षता सुनिश्चित होती है। विद्युत उत्पादन के लिए अक्षय ऊर्जा स्रोत के रूप में महातरंगों की अनुकूल शक्ति का प्रयोग करने की संभावना पर भी शोध किया जाना चाहिए। इनका अध्ययन महासागर की गतिशीलता में भी महत्वपूर्ण है और तटीय पर्यावरण (एक गतिशील क्षेत्र, जहां भौतिक, रासायनिक और जैविक शक्तियां और प्रक्रियाएं तट पर कार्य करती हैं) एवं मानवीय गतिविधियों पर इसका बहुत व्यापक प्रभाव पड़ता है। समुद्री नियोजन, तटीय प्रबंधन और समुद्र विज्ञान के क्षेत्रों में भी महातरंगों का अध्ययन महत्वपूर्ण है। महातरंगों की गतिशीलता का अध्ययन तत्परता, शमन रणनीतियों तथा क्षति को कम करने के मामले में बहुत सहायक होगा।
© Spectrum Books Pvt. Ltd.
