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इंटरकनेक्टेड डिजास्टर रिस्क्स रिपोर्ट 2023

परिचय

यूनाइटेड नेशंस यूनिवर्सिटी इंस्टिट्यूट ऑफ इन्वायर्मेंट एंड ह्यूमन सिक्योरिटी (यूएनयू-ईएचएस) ने नवंबर 2023 में द इंटरकनेक्टेड डिजास्टर रिस्क्स रिपोर्ट 2023 नामक शीर्षक से अपनी प्रमुख वार्षिक रिपोर्ट प्रकाशित की। वैज्ञानिक तथ्यों पर आधारित, यह रिपोर्ट विश्व की परस्पर-निर्भरता पर प्रकाश डालती है। यह न केवल वैश्विक टिपिंग प्वाइंट (किसी स्थिति, प्रक्रिया या प्रणाली में वह अति महत्वपूर्ण बिंदु, जिसके बाद कोई महत्वपूर्ण और प्रायः अबाध प्रभाव या परिवर्तन घटित होता है) के बारे में जागरूकता पैदा करती है, बल्कि त्वरित कार्रवाई की आवश्यकता पर भी बल देती है ताकि संभावित विनाशकारी परिणामों को रोका जा सके।

इस रिपोर्ट में प्रतिवर्ष घटित होने वाली कुछ आपदाओं का विश्लेषण किया गया है। इसके अलावा, इसमें विस्तृत ब्यौरा दिया गया है कि ये एक-दूसरे से किस प्रकार संबद्ध हैं और मानवीय गतिविधियों से किस प्रकार प्रभावित होती हैं। इसके अलावा, यह उन तरीकों को दर्शाती है, जिसमें स्पष्ट रूप से स्थिर प्रणालियां किसी निश्चित सीमा पर पहुंचने तक लगातार क्षीण होती रहती हैं, अंततः जिसके विनाशकारी परिणाम होते हैं।


यूनाइटेड नेशंस यूनिवर्सिटी संयुक्त राष्ट्र के शैक्षणिक संगठन को संदर्भित करता है। बॉन (जर्मनी) में स्थित, यह एक अंतरराष्ट्रीय थिंक टैंक (अर्थात प्रबुद्ध मंडल, जिसमें विशेषज्ञों का एक समूह विशिष्ट राष्ट्रीय और वाणिज्यिक मुद्दों पर विशेषज्ञता और सलाह प्रदान करता है) के रूप में कार्य करता है। यूएनयू-ईएचएस की स्थापना पर्यावरणीय संकटों, सम्मिलित जोखिमों तथा वैश्विक प्रभाव के साथ ही संभावित अनुकूलन पर अग्रणी अन्वेषण करने के उद्देश्य से की गई थी। यूएनयू-ईएचएस, बॉन विश्वविद्यालय के साथ संयुक्त मास्टर ऑफ साइंस डिग्री कार्यक्रम—ज्योग्रेफी ऑफ इन्वायर्मेंटल रिस्क्स एंड सिक्योरिटी प्रदान करता है, और पर्यावरणीय जोखिमों के वैश्विक मुद्दों पर कई अंतरराष्ट्रीय पीएचडी परियोजनाओं के साथ-साथ क्षमता-विकास पाठ्यक्रम भी उपलब्ध कराता है।


जोखिम और उनके टिपिंग प्वॉइंट

इस रिपोर्ट में छह जोखिम टिपिंग प्वाइंट, अर्थात, वह समय जब हमारे अस्तित्व के लिए आवश्यक प्रणालियां जोखिमों के विरुद्ध अवरोध नहीं बन पातीं और ठीक से काम नहीं कर पातीं, का उल्लेख किया गया है, जिनके विनाशकारी परिणाम हो सकते हैं:

1. त्वरक विलोपन (Accelerating extinctions): पृथ्वी पर जीवन की शुरुआत के साथ ही बहुत-सी जीव-जातियां विलुप्त हो गईं। विलोपन पृथ्वी पर क्रमिक विकास का महत्वपूर्ण भाग है। हालांकि, यह एक धीमी प्रक्रिया है जिसे होने में लाखों वर्ष लगते हैं। दुर्भाग्य से, लापरवाह मानवीय गतिविधियों के कारण यह प्रक्रिया अत्यधिक तीव्र हो गई है, जिनमें संसाधनों का अत्यधिक दोहन, पर्यावरण प्रदूषण, जलवायु परिवर्तन आदि शामिल हैं। अनियंत्रित मानवीय कृत्यों के कारण जीव-जातियों के विलुप्त होने की दर सामान्य दर से बहुत अधिक है (अर्थात, सामान्य से सौ गुना अधिक)। इसका पृथ्वी पर पाए जाने वाले सभी प्रकार के जीवों पर विनाशकारी प्रभाव होगा।

एक पारिस्थितिकी तंत्र में, विभिन्न जीव-जातियां जटिल तंत्र में एक-दूसरे से जुड़ी होती हैं। ऐसी कई जीव-जातियां हैं जो अन्य जीव-जातियों के साथ विशिष्ट संबंध साझा करती हैं। ये बड़ी संख्या में अन्य जीव-जातियों के साथ अन्योन्याश्रित हो सकती हैं। यदि ऐसा कोई जीव विलुप्त हो जाता है, तो उस पर आश्रित अन्य जीव-जातियां भी विलुप्त हो सकती हैं, जिससे सहविलोपन (co-extinction—अन्य जीव-जातियों के विलोपन से उत्पन्न प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष प्रभावों के कारण जीव-जातियों का विलोपन) हो सकता है। इसका पूरे पारिस्थितिकी तंत्र पर प्रभाव पड़ सकता है।

इसलिए, विलोपन हमारी सोच से कहीं अधिक बड़ा जोखिम उत्पन्न कर सकता है, जैसा कि केवल एक जीव-जाति ही विलुप्त नहीं होती, बल्कि उस पर आश्रित कई अन्य जीव-जातियां भी विलुप्त होती हैं।

टिपिंग प्वॉइंट: एक जीव-जाति, जो कई अन्य जीव-जातियों से जुड़ी हुई है, के विलोपन से अन्य जीव-जातियां भी विलुप्त हो सकती हैं, जिसके परिणामस्वरूप पारिस्थितिकी तंत्र ध्वस्त हो सकता है।

अंतर्संयोजनात्मकता (Interconnectedness): यह जोखिम भूजल अवक्षय से परस्पर संबंधित है। कृषि गतिविधियों को तीव्र करने और कृषि के लिए अधिक भूमि का उपयोग करने से भूजल संसाधन कम हो सकते हैं, तथा असुरक्षित जीव-जातियों के लिए जोखिम पैदा हो सकता है।

2. भूजल अवक्षय: एक महत्वपूर्ण अलवणजल का साधन, भूजल भूमिगत जलाशयों में संग्रहीत जल को संदर्भित करता है जिसे ‘जलभृत’ के रूप में जाना जाता है। इन जलभृतों में जल संचित होने और उन्हें पूरी तरह से भरने में हजारों वर्षों से अधिक का समय लगता है। इस प्रकार, भूजल एक अनवीकरणीय संसाधन है। ये जलभृत उन पर निर्भर रहने वाले लोगों के जीवन और आजीविका को जोखिम में डालते हैं, जैसा कि इन जलभृतों में पानी का अवक्षय हो रहा है।

इन जलभृतों के माध्यम से दो अरब से अधिक लोगों को पेयजल की आपूर्ति होती है। जलभृतों से निकाले गए पानी का उपयोग लगभग 70 प्रतिशत कृषि उद्देश्यों के लिए किया जाता है। विश्व के 37 प्रमुख जलभृतों में से 21 तेजी से खत्म हो रहे हैं।

विश्व के कुछ स्थानों पर पहले से ही काफी मात्रा में भूजल का निष्कर्षण चुका है। उदाहरण के लिए, 1970 के दशक में, सऊदी अरब के पास विश्व के सबसे बड़े भूजल संसाधनों में से एक था। इस पानी का उपयोग उसने एक मरुद्यान (मरुस्थल में स्थित उपजाऊ भूमि का टुकड़ा) बनाने के लिए किया। कुछ दशकों के बाद, किसानों द्वारा गेहूं की पैदावार के लिए प्रतिवर्ष लगभग 19 ट्रिलियन लीटर भूजल निष्कर्षित किया गया। परिणामस्वरूप, सऊदी अरब कुछ समय के लिए दुनिया का छठा सबसे बड़ा गेहूं उत्पादक बन गया। हालांकि, भूजल संसाधनों के इस अत्यधिक दोहन के परिणामस्वरूप इसके 80 प्रतिशत हिस्से का अवक्षय हो गया। अब, यह गेहूं और अन्य फसलों का आयात करता है।

जैस-जैसे नई तकनीकें किसानों के लिए सरलता से भूजल उपलब्ध कराती गई, वैसे-वैसे निष्कर्षण दर भी बढ़ती गई। परिणामस्वरूप, जलभृतों का चिंताजनक रूप से क्षय हो रहा है। वैश्विक कृषि प्रणाली में सुधार की आवश्यकता है ताकि भूजल संसाधनों का सतत उपयोग (पर्यावरण को हानि पहुंचाए बिना प्राकृतिक पदार्थों और ऊर्जा का उपयोग करते हुए) और आने वाली पीढ़ियों के लिए इन्हें संरक्षित किया जा सके।

टिपिंग प्वॉइंट: भूजल स्तर में निरंतर गिरावट से किसानों के लिए भूजल तक पहुंच बहुत कठिन हो जाएगी और सिंचाई के संबंध में गंभीर चुनौती उत्पन्न हो जाएगी।

अंतर्संयोजनात्मकता: यह जोखिम परस्पर त्वरक विलोपन से संबंधित है। कृषि गतिविधियों में वृद्धि से भूजल संसाधन कम हो सकते हैं और असुरक्षित जीव-जातियों को खतरा हो सकता है। सिंचाई की साधन-सुविधा पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।

3. पर्वतीय हिमनदों का पिघलना: हिमनद पर्वतों पर पाए जाने वाले अलवणजल का एक महत्वपूर्ण स्रोत हैं। जब हिमनद पिघलते हैं, तो उनके जल का उपयोग पेयजल, जल विद्युत, सिंचाई और घरेलू उपयोग जैसे विभिन्न उद्देश्यों के लिए किया जाता है। इस जल का उपयोग संबद्ध क्षेत्र के सभी पारिस्थितिकी तंत्रों द्वारा किया जाता है। हिमनदों का आकार तब छोटा हो जाता है जब तुहिन (snow) हिमनद की पिघली हुई बर्फ या हिम को उतनी तेजी से प्रतिस्थापित नहीं कर पाती, जितनी तीव्रता से हिमनद पिघलते हैं। पिछले कुछ दशकों में हिमनदों का आकार छोटा हो रहा है, जैसा कि भूमंडलीय ऊष्मण या वैश्विक तापन के कारण वे सामान्य से दोगुनी दर से पिघल रहे हैं। वर्ष 2000 से 2019 तक हर वर्ष हिमनदों से लगभग 267 गीगाटन बर्फ पिघली है। यह अनुमान लगाया गया है कि वैश्विक तापन 1.5 डिग्री सेल्सियस तक सीमित रहने के बावजूद 21वीं सदी के अंत तक लगभग 50 प्रतिशत हिमनद (ग्रीनलैंड और अंटार्कटिका को छोड़कर) लुप्त हो जाएंगे।

हिमनदों के पिघलने से पिघली हुई बर्फ का जल बड़ी मात्रा में नदी में आ जाता है, जो ऊंचे पर्वतों से अपवाहित होकर नदी के बेसिन (नदी घाटी) में आ जाता है। यह तटीय क्षेत्रों में बाढ़ के खतरे को अधिक गंभीर बना देता है। कभी-कभी, इसके परिणामस्वरूप ‘ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड’ (हिमनदीय झील प्रस्फोट जनित बाढ़ अर्थात जीओएलएफ) आते हैं। इस प्रकार की बाढ़ में, एक प्राकृतिक बांध लंबे समय तक पिघले हुए जल को रोक नहीं पाता और वह किसी भी समय जल को निर्मुक्त कर देता है, जिससे विनाश होता है। अंततः, हिमनद में सर्वाधिक मात्रा में विगलन होता है, जिसके कारण बड़े पैमाने पर जल प्रवाहित होता है, जिसे ‘पीक वॉटर’ कहा जाता है। इसके बाद, पर्याप्त मात्रा में अलवणजल उपलब्ध नहीं होता। यह अपेक्षित है कि अगले 10 वर्षों के दौरान बेसिन में पीक वॉटर पाया जाएगा। विश्व भर के वैज्ञानिकों ने यह पूर्वानुमान लगाया है कि एशिया में पाए जाने वाले पर्वतों जैसे सबसे ऊंचे पर्वतों पर पाए जाने वाले हिमनदों में 21वीं सदी के मध्य तक जल की मात्रा चरम पर होगी। परिणामस्वरूप, हिमालय, हिंदुकुश और कराकोरम पर्वतमाला पर पाए जाने वाले 90,000 से अधिक हिमनद खतरे में होंगे और साथ ही उन पर निर्भर लगभग 870 मिलियन लोग असुरक्षित हो जाएंगे।


जीओएलएफ—हिमनदीय झील में टूटन के कारण उत्पन्न बाढ़ है। इसमें हिमनद या मोराइन [हिमनद की सतह पर गाद एवं मिट्टी का जमाव] से अचानक हिमद्रवण होने लगता है। हिमनद के पिघलने से जल रेत, अवसाद और हिमावशेषों से निर्मित प्राकृतिक बांध जैसी संरचना [मोराइन] में एकत्रित हो जाता है। इनकी कमजोर संरचना के कारण ये प्रायः सरलता से ढह जाते हैं जिससे निचले क्षेत्रों में भयानक बाढ़ आती हैं।


शुष्क ऋतु के दौरान, जब कम वर्षा होने के कारण जल की कमी होती है, तो हिमनदों के पिघले हुए जल का उपयोग लोग अपनी जल की दैनिक आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए करते हैं। हालांकि, हिमनदों के निवर्तन (खिसकने) के साथ, जल की कमी को पूरा करने हेतु इसका उपयोग आकस्मिक व्यवस्था के रूप में नहीं किया जा सकता। इस प्रकार, पर्वतीय समुदायों को जल संसाधनों के प्रबंधन के अन्य तरीकों के बारे में अधिक विवेकपूर्ण ढंग से सोचना होगा।

टिपिंग प्वॉइंट: हिमनदों के सिकुड़ने के साथ ही उनमें लंबे समय तक संचित बर्फ पिघल जाती है। शुरुआत में, जल की बड़ी मात्रा तब तक निर्मुक्त होती है जब तक पीक वॉटर की स्थिति नहीं आती। हिमनद के आकार के लगातार सिकुड़ने से मनुष्यों और अन्य जीवों के लिए अलवणजल की उपलब्धता भी प्रभावित होती है।

अंतर्संयोजनात्मकता: यह जोखिम असहनीय ऊष्मण, परस्पर अज्ञात (बीमा-अयोग्य) भविष्य और तीव्र विलोपन के जोखिमों से संबंधित है। चूंकि ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन लगातार बढ़ रहा है, इसलिए इससे वैश्विक तापमान में वृद्धि होगी। फलस्वरूप प्रतिकूल पर्यावरणीय परिस्थितियों में वृद्धि होगी, जिससे जीवित जीवों के अस्तित्व के लिए जोखिम उत्पन्न होगा।

4. असहनीय ऊष्मण: मानवीय गतिविधियों के कारण विश्व भर में लगातार तापमान बढ़ रहा है। परिणामस्वरूप, तीव्र उष्णता लहरें (हीटवेव) चल रही हैं अर्थात भीषण गर्मी पड़ रही है, जिसका मानव और अन्य जीवों के जीवन पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है। पिछले कुछ दशकों में, अत्यधिक ऊष्मण ने समाज के सबसे अरक्षित वर्ग के लिए स्थिति को और भी बदतर बना दिया है। इसके अलावा, उच्च आर्द्रता की स्थिति है, जो पसीने को वाष्पित होने से रोकती है। गर्मी के मौसम में शरीर को ठंडा रखने के लिए पसीना आना जरूरी है।


उच्च ऊष्मा प्रतिबल या दाब की स्थिति (हीट स्ट्रेस—आसपास के पर्यावरण से शरीर पर पड़ने वाला ऊष्मीय प्रतिबल जिसमें ऊष्माघात ताप उद्‍वेष्‍टन तथा ताप जनित थकान, आदि शामिल हैं और जिनके कारण शरीर अत्यधिक गर्मी से मुक्‍ति पाने में अक्षम होता है।) को आर्द्र-बल्ब तापमापी या वेट-बल्ब थर्मोमीटर की सहायता से मापा जाता है, जो तापमान को आर्द्रता के साथ मापता है। यदि ऐसा तापमान 35 डिग्री सेल्सियस से अधिक हो जाता है और छह घंटे से अधिक समय तक ऐसा ही रहता है, तो सामान्य मानव शरीर पसीने को वाष्पित करके खुद को ठंडा नहीं कर पाता है। स्थिर कोर शरीर ताप (core body temperature) की अनुपस्थिति स्वास्थ्य को गंभीर रूप से प्रभावित कर सकती है।

ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन को विनियमित करना बहुत महत्वपूर्ण है, लेकिन यह पर्याप्त नहीं है। लोगों को असहनीय गर्म क्षेत्रों से स्थानांतरित होना पड़ सकता है। जो लोग काम या अन्य दायित्वों के कारण स्थानांतरित नहीं हो सकते हैं, उन्हें ऐसी अत्यधिक कठोर जलवायविक परिस्थितियों के अनुकूल होने के लिए अपनी जीवनशैली, अर्थात अपने घर, अपने वातावरण और व्यवहार को बदलना पड़ सकता है। इसलिए, सरकारों को अनिवास्य वातावरण में रहने वाले लोगों की सुरक्षा के लिए आवश्यक कदम उठाने की आवश्यकता है।


टिपिंग प्वॉइंट: जो लोग छह घंटे से अधिक समय तक 35 डिग्री सेल्सियस से अधिक वेट-बल्व तापमान में रहते हैं, उन्हें गंभीर स्वास्थ्य समस्याएं होने का जोखिम होता है। हालांकि, उम्र, शारीरिक गतिविधि, चिकित्सा स्थिति आदि सहित अन्य कारकों पर विचार करते हुए, यह प्रभाव सीमा बहुत कम हो सकती है।

अंतर्संयोजनात्मकता: यह जोखिम परस्पर अज्ञात भविष्य से संबंधित है, जैसा कि लोगों को अलग-अलग स्थानों पर, अर्थात नए और खतरनाक स्थानों पर जाना पड़ता है। इसलिए, वे विस्थापित हो जाते हैं और उन्हें इसके परिणाम भुगतने पड़ते हैं। या, उन्हें अनिवास्य परिस्थितियों में रहना पड़ सकता है, तथा सामाजिक और आर्थिक कारकों के कारण अधिक जोखिम में पड़ सकते हैं।

5. अंतरिक्षीय मलबा: अंतरिक्ष में हजारों उपग्रह भेजे गए हैं, जो अब पृथ्वी की कक्षा में उसकी परिक्रमा करते हैं। ये उपग्रह मौसम, संचार और आपदा के आरंभिक चेतावनी संकेतों के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी एकत्र करते हैं। इसलिए, हम अपना जीवन अधिक आराम से, सुविधाजनक और सुरक्षित रूप से जीते हैं। उपग्रहों के कारण, हम एक-दूसरे से जुड़े हुए महसूस करते हैं। उपग्रह उस आधुनिक समाज का एक अभिन्न अंग हैं जिसमें हम रहते हैं। हालांकि, उपग्रहों की बढ़ती संख्या अंतरिक्षीय मलबे का जोखिम उत्पन्न करती है, जो क्रियाशील उपग्रहों के साथ-साथ हमारी कक्षा की सुरक्षा को भी जोखिम में डाल सकती है।


अंतरिक्षीय मलबे में बहुत-सी वस्तुएं शामिल हैं, जिनमें पेंट के सूक्ष्म कण, टूटे हुए उपग्रहों के टुकड़े, छोड़े गए रॉकेट के हिस्से, धातु के बड़े-बड़े टुकड़े आदि शामिल हैं। हाल ही में हुए एक शोध के अनुसार, अंतरिक्ष में 34,000 से अधिक वस्तुएं घूम रही हैं। इसमें से केवल 25 प्रतिशत उपग्रह ही परिचालन में हैं, जबकि शेष अंतरिक्षीय मलबा है। यह भी पाया गया कि अंतरिक्ष में छोटे मलबों के लगभग 130 मिलियन टुकड़े हैं। ये 1 सेंटीमीटर से अधिक लंबे नहीं होते। फिर भी, ये कार्यरत उपग्रहों को सार्थक रूप से नुकसान पहुंचा सकते हैं, क्योंकि इनकी यात्रा की गति 25,000 किलोमीटर प्रति घंटा है।


अंतरिक्षीय मलबे के कारण कक्षीय ‘महामार्ग’ (highway) पर उपग्रहों के टकराने का खतरा बहुत बढ़ जाता है। अंतरिक्ष में अधिक से अधिक उपग्रहों के होने से, इन टकरावों के परिणामस्वरूप शृंखला अभिक्रिया (चेन रिएक्शन—आण्विक या नाभिकीय कोई भी ऐसा प्रक्रम जो एक बार प्रारंभ हो जाने पर उसी से उत्पन्न ऊर्जा अथवा कणों द्वारा स्वतः चालू रहता है।) हो सकती है, जिससे पृथ्वी की कक्षा में और भी अधिक मात्रा में मलबा जमा हो सकता है। मलबे का यह विशाल संग्रह हमारी कक्षा को अनुपयोगी बना देगा, जिससे अंतरिक्ष अवसंरचना नष्ट हो जाएगी। फिर, हम भविष्य में अंतरिक्ष में कोई भी गतिविधि संचालित नहीं कर पाएंगे।

टिपिंग प्वॉइंट: पृथ्वी की कक्षा में वस्तुओं का उच्च घनत्व, अनेक टकरावों को जन्म दे सकता है। परिणामस्वरूप, असीमित संख्या में मलबा होगा, जिससे कक्षा अनुपयोगी हो जाएगी। अतः, मौसम पूर्वानुमान, जलवायु परिवर्तन, आपदा की पूर्व चेतावनी देना आदि संभव नहीं होंगे।

अंतर्संयोजनात्मकता: यह जोखिम त्वरक विलोपन जोखिम से संबद्ध है। यदि पर्यावरण में प्रदूषक बढ़ेंगे, तो वे अंततः जीव-जातियों के आवासों के साथ-साथ उपग्रह अवसंरचना को भी नष्ट कर देंगे। यह जोखिम अज्ञात भविष्य के जोखिम से भी संबद्ध है, जैसा कि निगरानी उपकरण और जोखिम प्रबंधन तकनीकें भी ध्वस्त हो जाएंगी और अंततः जीवित जीव असुरक्षित और अस्थिर हो जाएंगे।

6. बीमा-अयोग्य भविष्य (uninsurable future): बीमा का उद्देश्य लोगों को आपदाओं के कारण होने वाले नुकसान के जोखिम से बचाना है। ऐसे बीमा की लागत ऐसे नुकसानों की संभावना के आधार पर निर्धारित की जाती है। जलवायु परिवर्तन के कारण इस जोखिम परिदृश्य में भारी बदलाव आ रहा है। यह अनुमान लगाया गया है कि 2040 तक आपदाओं की संख्या दोगुनी हो जाएगी, जिससे बीमा की कीमतें बढ़ जाएंगी। उदाहरण के लिए, 2015 से, प्राकृतिक आपदाओं से ग्रस्त स्थानों पर रहने वाले लोगों के लिए बीमा की कीमतों में 57 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। इसके अलावा, कुछ बीमा कंपनियों ने शामिल किए जा सकने वाले नुकसान के प्रकारों को सीमित कर दिया है, जबकि अन्य ने अपना व्यवसाय पूरी तरह से बंद कर दिया है। फिर भी, सामाजिक और आर्थिक दबावों के कारण लोग इन क्षेत्रों में निवास करना जारी रखते हैं। इस प्रकार, ये लोग एक गंभीर स्थिति में हैं।


वे क्षेत्र जिनमें कुछ जोखिम बीमा में सम्मिलित नहीं किए जाते हैं, या वे क्षेत्र जहां बीमा प्रदान नहीं किया जाता है, या वे क्षेत्र जहां बीमा कवरेज (बीमाकृत राशि) की कीमत बहुत अधिक है, उन्हें ‘बीमा-अयोग्य’ माना जाता है।


उल्लेखनीय रूप से, बीमा खतरनाक स्थानों पर रहने का उचित कारण नहीं है। इसका बेहतर उपयोग तभी किया जा सकता है जब इसका उपयोग अन्य जोखिम घटाने वाले उपायों के साथ किया जाए। विश्व भर की सरकारों को क्रांतिकारी दृष्टिकोण अपनाने की आवश्यकता है ताकि बीमा सुरक्षा अप्राप्य होने से पहले जोखिम के छिपे हुए सामाजिक और पर्यावरणीय कारणों से निपटा जा सके।

टिपिंग प्वॉइंट: उच्च जोखिम वाले क्षेत्रों में, गंभीर खतरों के बढ़ने के कारण बीमा की लागत बढ़ जाती है। अंततः यह बीमा यहां अप्राप्य हो जाता है। इस बिंदु के बाद, लोगों के पास आपदाओं के समय कोई सुरक्षा तंत्र नहीं होता है, जिससे सामाजिक-आर्थिक प्रभावों की शृंखलाबद्ध प्रतिक्रिया होती है।

अंतर्संयोजनात्मकता: यह जोखिम परस्पर असहनीय गर्मी के जोखिम से संबंधित है, जैसा कि सामाजिक और आर्थिक कारणों से लोग उच्च जोखिम वाले स्थानों पर ही रहते हैं।

निष्कर्ष

जैसा कि हमने देखा है कि हमारे ऊपर खतरा मंडरा रहा है, हमें एक स्थायी और सुरक्षित भविष्य का आनंद लेने के लिए उचित और समय पर उपाय अपनाने चाहिए। उष्णता लहरों के भयावह प्रभावों को देखते हुए, जल्द से जल्द गंभीर और तत्काल कार्रवाई की जानी चाहिए। वर्तमान परिदृश्य को सभी के लिए और भी कठिन जीवन स्थितियों के पूर्ण लक्षण के रूप में देखा जाना चाहिए।

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