books

भारत में बदलती मौसम प्रवृत्ति

भारत पर जलवायु परिवर्तन का जबरदस्त प्रभाव पड़ा है। तिब्बत के पठार पर बढ़ते तापमान के परिणामस्वरूप हिमालय के हिमनद अपने स्थान से खिसक रहे हैं, जो गंगा, ब्रह्मपुत्र, यमुना और अन्य प्रमुख नदियों के प्रवाह के लिए खतरा है। जलवायु परिवर्तन के कारण भारत में उष्णता लहरों (हीट वेव्स) की आवृत्ति भी बढ़ रही है।

भारत में चरम मौसम की अवस्था

चरम मौसम की अवस्थाओं की आवृत्ति और तीव्रता में वृद्धि को भारत के साथ-साथ विश्व भर में बदलते जलवायु पैटर्न का प्रभाव माना जाता है। चरम मौसम के प्रभाव के कारण तापमान में हो रही वृद्धि से न केवल भू-पृष्ठ अधिक गर्म हो रहा है, बल्कि क्षोभमंडल (पृथ्वों के चारों और स्थित वायुमंडल की पांच परतों में से पृथ्वी की सतह की ओर से पहली परत) की जलधारण क्षमता में भी वृद्धि हो रही है। जब वायुमंडल में अधिक नमी धारण करने की क्षमता होती है, तो यह अधिक वर्षा का कारण बनता है।

गृह मंत्रालय के अनुसार, 2023 में भारत के सभी राज्यों और संघ राज्यक्षेत्रों में चरम मौसम की घटनाएं हुई।

जुलाई 2021 में, महाराष्ट्र में भारी वर्षा हुई, जिसके कारण लगभग 200 लोगों की जान चली गई। अक्टूबर 2021 में जब दक्षिण-पश्चिम मानसून उपमहाद्वीप से पीछे हटने लगा, तो केरल और उत्तराखंड में भारी वर्षा हुई। इसी प्रकार, देश के अन्य भागों में भी वर्षा के पैटर्न और तीव्रता में भिन्नता देखी गई है। चरम मौसम की घटनाओं की अभूतपूर्व स्थितियों ने भारत के पश्चिमी तट को बुरी तरह प्रभावित किया है। 2018 के बाद से, चक्रवात पश्चिमी तट के बहुत करीब आ गए हैं, और केरल में बाढ़ की व्यापकता एवं बारंबारता का अनुभव किया जा रहा है।

केरल के मामले में, सितंबर 2021 में हुई भारी वर्षा में अरब सागर और बंगाल की खाड़ी में सक्रिय दो वर्षा-धारी ‘अल्पदाब तंत्र’ (लो प्रेशर सिस्टम—के केंद्र में इसके आसपास के क्षेत्रों की तुलना में निम्न दाब होता है। हवाएं निम्न दाब की ओर चलती हैं, और उस वातावरण में उठती हैं जहां वे मिलती हैं। जैसे ही हवाएं ऊपर उठती हैं, उनके भीतर जलवाष्प संघनित हो जाता है, जिससे बादल बनते हैं और अकसर वर्षण होता है।) ने योगदान दिया। इसके अलावा, पश्चिमी विक्षोभ (ऐसे तूफान, जो भूमध्य सागर से उत्पन्न होते हैं, और पश्चिमी एशिया तथा अफगानिस्तान से होते हुए भारत पहुंचते हैं, पश्चिमी विक्षोभ कहलाते हैं। इन विक्षोभों से भारत के उत्तर एवं उत्तर-पश्चिमी क्षेत्र प्रभावित होते हैं।) अर्थात भूमध्यसागर की ओर से नमी से भरे बादलों के आवधिक प्रवाह के कारण उत्तर भारत में वर्षा हुई। बंगाल की खाड़ी की उष्णता आमतौर पर पूर्वोत्तर भारत के कई हिस्सों में भारी वर्षा का कारण बनती है।

हिंद महासागर में ऊष्मण सबसे तीव्र दर से हो रहा है। अरब सागर सहित पश्चिमी हिंद महासागर जैसे कुछ क्षेत्रों में दीर्घावधि में औसत तापमान में 1.2 डिग्री सेल्सियस से अधिक की वृद्धि दर्ज की गई है, जो हिंद महासागर के तटीय देशों में तूफान और अत्यधिक वर्षा की घटनाओं में वृद्धि का कारण बन रहा है। बंगाल की खाड़ी की तरह अरब सागर में भी तापमान में वृद्धि के कारण ऊष्मण हो रहा है, और यह महत्वपूर्ण चक्रवाती गतिविधि की ओर बढ़ रहा है। आर्कटिक महासागर भी गर्म हो रहा है, और ध्रुवों से अधिक तीव्रता से अत्यधिक ठंडी हवा खींच रहा है। यह वायुमंडल में पहले से ही बढ़ी हुई नमी को और अधिक बढ़ा रहा है, जिससे उत्तर भारत में पश्चिमी विक्षोभ की गतिविधि हो रही है।

1950 और 2017 के बीच, भारत में बाढ़ की 285 घटनाएं हुईं, जिन्होंने अत्यधिक क्षति पहुंचाने के अलावा लाखों लोगों को प्रभावित किया, लाखों लोग बेघर हो गए और हजारों लोग मारे गए। पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय के हालिया अध्ययन के अनुसार, पिछले पांच दशकों में बाढ़, चक्रवात, उष्णता और शीत लहरों, तथा आकाशीय विद्युत (बिजली गिरना) संबंधी घटनाओं के कारण लगभग 1.4 लाख लोगों की अकाल मृत्यु हो चुकी है।

चरम मौसम की कई घटनाओं ने चक्रवातों के प्रभावों का भी अतिच्छादन किया और उनमें वृद्धि की। भूमंडलीय ऊष्मण या वैश्विक तापन के कारण हवा में अधिक नमी होती है, जिसे चक्रवात अवशोषित कर लेते हैं और भूमि पर बरसा देते हैं। 2020 और 2021 में लगातार आए चक्रवातों ने उच्च ज्वार के साथ तूफानी लहरों को उत्पन्न किया और समुद्री जल धरती पर आ गया। भारी वर्षा के साथ, तूफान ने तटीय क्षेत्रों को जलमग्न कर दिया।

भारत के प्रायद्वीपीय क्षेत्रों की तुलना में उत्तरी, मध्य और पूर्वी भारत के क्षेत्रों के तापमान में अधिक वृद्धि हुई है।

हल्की और मध्यम वर्षा वाले दिनों में कमी आई है, जबकि अत्यधिक वर्षा की घटनाओं में वृद्धि हुई है। यह प्रवृत्ति भारत के मध्य क्षेत्र में देखी जा सकती है। केरल, झारखंड और आसपास के क्षेत्रों में वर्षा में कमी देखी गई है, लेकिन पश्चिम बंगाल, पश्चिमी उत्तर प्रदेश और कर्नाटक के कुछ हिस्सों में इसमें वृद्धि हुई है। भारत के मध्य और उत्तरी हिस्सों में उष्ण लहर या लू चलती है। हालांकि, तापमान बढ़ने से शीत लहर की स्थिति में गिरावट आ सकती है। तड़ित झंझा और बिजली गिरने की घटनाएं बढ़ रही हैं।

प्राकृतिक वातावरण पर तापमान का प्रभाव

1901 से 2018 के बीच भारत में तापमान में 0.7 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि हुई। 2018 में किए गए एक अध्ययन में निकट भविष्य में उत्तर और पश्चिमोत्तर भारत में सूखे में वृद्धि होने का अनुमान लगाया गया है। सदी के अंत तक, भारत के अधिकांश हिस्सों को अधिक भीषण सूखे का सामना करना पड़ सकता है। इसी प्रकार, असम आदि जैसे राज्यों में गंभीर भूस्खलन और बाढ़ की घटनाओं के उत्तरोत्तर सामान्य होने का अनुमान लगाया गया है। तापमान में पहले से अधिक वृद्धि ने फसलों को प्रतिकूल रूप से प्रभावित किया है, जिसके परिणामस्वरूप कृषि को अत्यधिक नुकसान उठाना पड़ा है।

पारिस्थितिक तंत्र पर बढ़ते समुद्री जलस्तर का प्रभाव

मेघालय और अन्य पूर्वोत्तर राज्यों में चिंता का विषय है कि समुद्र में बढ़ते जलस्तर के कारण बांग्लादेश का अधिकांश भाग जलमग्न हो जाएगा और यह पूर्वोत्तर राज्यों के लिए शरणार्थी संकट में परिणत हो जाएगा। यदि गंभीर जलवायु परिवर्तन हुए, तो बांग्लादेश और भारत के आपस में सटे सीमा क्षेत्रों का तटीय भू-भाग नष्ट हो सकता है। समुद्र के स्तर में लगातार वृद्धि के कारण सुंदरबन में निचले द्वीप जलमग्न हो गए हैं, जिससे हजारों लोग विस्थापित हो गए।

बढ़ते तापमान ने पारिस्थितिक आपदाओं को भी जन्म दिया है, जैसेकि 1998 का कोरल ब्लीचिंग इवेंट [महासागरीय जल के तापमान में वृद्धि होने के कारण प्रवालों (मूंगों) को रंग और चमक प्रदान करने वाले सूक्ष्म शैवाल (जोक्सांथेला) मर जाते हैं, और फलस्वरूप प्रवाल अपना रंग खो देते हैं और श्वेत हो जाते हैं। इस प्रक्रिया को प्रवाल विरंजन कहते हैं।], जिसने लक्षद्वीप और अंडमान के प्रवाल पारितंत्र [यह छिछले उष्णकटिबंधीय जल के चारों और द्वीपों तथा महाद्वीपों के साथ स्थित होता है।] के 70 प्रतिशत से अधिक मूंगों को नष्ट कर दिया।

जलवायु परिवर्तन के कारण आवर्ती पैटर्न

विश्व मौसम विज्ञान संगठन (डब्ल्यूएमओ) के अनुसार, वार्षिक औसत तापमान में वृद्धि के परिणामस्वरूप अगले पांच वर्षों में वैश्विक औसत तापमान 1.5 डिग्री सेल्सियस से अधिक होगा। हालांकि, चरम मौसम की घटनाओं से वैश्विक जलवायु प्रणाली का पतन नहीं होगा, भले ही तापमान में 1.5 डिग्री सेल्सियस से अधिक की वृद्धि हो, लेकिन तापन की अपनी सीमाएं हैं। इसके अलावा, 1.5 डिग्री सेल्सियस की सीमा केवल वैश्विक सतह के तापमान में बदलाव के लिए जिम्मेदार है। महासागर भी वैश्विक तापन की अतिरिक्त ऊष्मा का 93 प्रतिशत से अधिक अवशोषण करते हैं।

भारत मौसम विज्ञान विभाग (आईएमडी) के अनुसार, 1980 के दशक से अरब सागर में चक्रवातों की बारंबारता और तीव्रता में वृद्धि हुई है, जो भारत के घनी आबादी वाले पश्चिमी तट के लिए खतरा है। मई 2021 में आया चक्रवात ताउते लगातार तीसरे वर्ष अरब सागर में बहुत करीब आया और इसने पश्चिमी तट पर केरल, कर्नाटक, गोवा, महाराष्ट्र, गुजरात, और लक्षद्वीप के द्वीपों तथा क्षेत्रों आदि को नुकसान पहुंचाया।

उग्र उष्णता लहरें

भारत में मई-जून 2024 में पहली बार उग्र उष्णता लहरें (हीटवेव्स) देखी गई, जब देश के कई हिस्सों में तापमान 50 डिग्री सेल्सियस से अधिक हो गया था। इंटरगवर्नमेंटल पैनल ऑन क्लाइमेट चेंज (आईपीसीसी) के अनुसार, प्राकृतिक मौसमी घटना के रूप में जो उष्णता लहरें लगभग 10 वर्षों के अंतराल पर आती थीं, वे अब हर 3.6 वर्षों में एक बार आने की संभावना है तथा ये तरंगें जीवाश्म ईंधनों के जलने और मानवीय गतिविधियों के कारण होने वाले जलवायु परिवर्तन के कारण लगभग 1.5 डिग्री सेल्सियस अधिक गर्म हो जाती हैं।

मानसून के बदलते प्रतिरूप

आईएमडी द्वारा 30 मार्च, 2020 को जारी की गई ऑब्जर्व्ड रेनफॉल वेरिएबिलिटी एंड चेंजिज ओवर डिफरेंट स्टेट नामक रिपोर्ट में मानसून की वर्षा की विषमता और परिवर्तनों का अवलोकन प्रस्तुत किया गया। विगत 30 वर्षों (1989-2018) में दक्षिण-पश्चिम मानसून (जून से सितंबर) के दौरान आईएमडी द्वारा अवलोकित डेटा पर आधारित यह रिपोर्ट राज्य और जिला स्तर पर 29 राज्यों और केंद्र-शासित प्रदेशों में मानसूनी वर्षा की विषम स्थिति और उससे संबंधित परिवर्तनों का उल्लेख करती है।


‘मानसून’ शब्द अरबी शब्द ‘मौसिम’ (mausim) से लिया गया है, जिसका अर्थ है ‘ऋतुएं’, जो मौसमी पवन के उलटफेर की अनूठी विशेषता को उजागर करता है। इस मानसूनी बेल्ट के केंद्र में स्थित भारतीय उपमहाद्वीप और इसके आसपास के महासागर, पवन की दिशा में होने वाले महत्वपूर्ण ऋतुनिष्ठ परिवर्तन के साक्षी होते हैं। भारतीय ग्रीष्मकालीन मानसून केरल में दैनिक वर्षा में तेज वृद्धि के साथ शुरू होता है, जो शुष्क मौसम से संक्रमण को दर्शाता है। मानसून के शुरुआत की औसत तिथि 1 जून के आसपास की होती है, और जुलाई की शुरुआत तक, यह पूरे उपमहाद्वीप पर आ चुका होता है। उत्तर-पश्चिम भारत से इसकी वापसी सितंबर में शुरू होती है। भारत की वार्षिक वर्षा का मुख्य रूप से, दक्षिण-पूर्वी प्रायद्वीपीय भारत को छोड़कर जहां वर्षा छाया-प्रभाव (यह पहाड़ों से संबद्ध होता है और भूवैज्ञानिक संरचना से संबद्ध इस प्रकार की वर्षा को पर्वतीय वर्षा [Orographic rainfall] के रूप में जाना जाता है) होता है, दक्षिण-पश्चिम/ग्रीष्मकालीन मानसून (जून से सितंबर) के दौरान होती है। पूर्वोत्तर मानसून (अक्टूबर से दिसंबर) के दौरान, प्रचलित उत्तर-पूर्वी पवनों के साथ वर्षा दक्षिणी भारत में स्थानांतरित हो जाती है।


रिपोर्ट के अनुसार, 1989 और 2018 के बीच दक्षिण-पश्चिम मानसून के मौसम में, पांच राज्यों, जिसमें उत्तर प्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल, मेघालय और नागालैंड शामिल हैं, में दक्षिण-पश्चिम मानसून की वर्षा में महत्वपूर्ण कमी देखी गई, जबकि अरुणाचल प्रदेश और हिमाचल प्रदेश में भी वार्षिक वर्षा में उल्लेखनीय कमी दर्ज की गई। हालांकि, इसी अवधि में सौराष्ट्र तथा कच्छ, दक्षिण-पूर्वी राजस्थान, उत्तरी तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, और दक्षिण-पश्चिमी ओडिशा के आसपास के क्षेत्रों में भारी वर्षा (6.5 सेमी. या उससे अधिक) के दिनों की आवृत्ति में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई।

वर्ष 2021 में सभी राज्यों और केंद्र-शासित प्रदेशों में से 23 में सामान्य वर्षा हुई, जो दीर्घावधिक औसत—एलपीए (यह जून से सितंबर के महीनों के दौरान किसी क्षेत्र विशेष में दर्ज की गई औसत वर्षा होती है, जिसकी गणना 50 वर्ष की अवधि के दौरान की जाती है, और इसका प्रयोग हर साल मानसून में होने वाली मात्रात्मक वर्षा का पूर्वानुमान जारी करने हेतु एक मानदंड के रूप में किया जाता है।) से 19 प्रतिशत अधिक और 19 प्रतिशत कम के बीच थी। इनमें से आठ राज्यों में एलपीए से 20 प्रतिशत से 59 प्रतिशत के बीच कम वर्षा हुई, जबकि छह राज्यों में एलपीए से 20 प्रतिशत से 59 प्रतिशत के बीच अधिक वर्षा हुई। अरुणाचल प्रदेश, असम, मेघालय, नागालैंड, मणिपुर, मिजोरम, त्रिपुरा और चंडीगढ़ में सामान्य से कम वर्षा हुई। हालांकि, इसी अवधि में अंडमान और निकोबार, हरियाणा, दिल्ली, दादरा और नगर हवेली, तेलंगाना और तमिलनाडु में सामान्य से अधिक वर्षा दर्ज की गई।

संपूर्ण भारत में, मानसून में हुई वर्षा 956.5 मिमी. के एलपीए से दो प्रतिशत अधिक या ‘सामान्य’ होती है।

मौसम पूर्वानुमान की सटीकता

मानसून, विशेष रूप से अत्यधिक वर्षा की घटनाओं, के पूर्वानुमानों की सटीकता 10 वर्ष पहले के लगभग 60 प्रतिशत से बढ़कर अब 80 प्रतिशत से अधिक हो गई है। यद्यपि चक्रवात के पूर्वानुमानों में सुधार हुआ है जिससे लोगों की जिंदगियां बचाई जा रही हैं, तथापि चक्रवातों की तीव्र उत्कटता, 24 घंटे से भी कम समय में 55 किमी/घंटा की गति से वायु की गति में परिवर्तन पूर्वानुमानकर्ताओं और आपदा प्रबंधन प्राधिकरणों दोनों के लिए एक चुनौती बन गई है। चक्रवात ताउते के तुरंत बाद पूर्वी तट पर चक्रवात यास आया, जिसके कारण ओडिशा और बंगाल में कई दिनों तक बाढ़ की स्थिति बनी रही।

चक्रवात, मानसून और तड़ित झंझा (थंडरस्टॉर्म) उष्णकटिबंधीय मौसम प्रणालियों के विशिष्ट लक्षण हैं। उष्णकटिबंधीय मौसम का संबंध वायुमंडल के संवहनीय बलों से जुड़ा हुआ है। पृथ्वी की सतह का प्रचंड ताप भारत में मौसम की उत्पत्ति, परिवर्तन प्रक्रिया, लक्षणों, प्रसार और गति में एक प्रमुख भूमिका निभाता है। उष्णकटिबंधीय क्षेत्र में मौसम का पूर्वानुमान लगाना थोड़ा मुश्किल होता है।

वर्तमान में आईएमडी, उन संभावित क्षेत्रों के लिए पांच दिन पूर्व पूर्वानुमान प्रदान करने में सक्षम हैं, जहां तड़ित झंझा होने वाली हो। तड़ित झंझा का पूर्वानुमान सरल नहीं है, क्योंकि वे लगभग 1-10 किमी. क्षेत्र में सीमित होते हैं, और उनका मुश्किल से आधे घंटे से तीन घंटे तक घटित होना अपेक्षित होता है। आईएमडी कम से कम तीन घंटे पहले तड़ित झंझा का सामना करने वाले विशिष्ट क्षेत्र के बारे में पूर्वानुमान करने में सक्षम है। आईएमडी द्वारा किए जाने वाले पूर्वानुमान और उनकी सटीकता विश्व में किए जाने वाले मौसम संबंधी बेहतरीन पूर्वानुमानों में से एक है।

विश्व में बहुत कम देश हैं जो बिजली गिरने का पूर्वानुमान प्रदान करते हैं, और भारत उनमें से एक है। आईएमडी करीब दो सप्ताह पूर्व, संभावित हॉटस्पॉट का पूर्वानुमान करने में सफल रहा है। बिजली गिरने की घटना के दिन हर तीन घंटे के अंतराल पर देश के 1,000 से अधिक स्टेशनों से बिजली गिरने से संबंधित चेतावनी जारी की जाती है। आईएमडी ने ‘दामिनी’ नामक एक ऐप भी विकसित किया है, जो बिजली गिरने से पूर्व 5, 10 और 15 मिनट में उससे प्रभावित होने वाले क्षेत्र विशेष की सूचना और अगले 45 मिनट तक बिजली गिरने के पूर्वानुमान प्रदान करता है।

इसके अलावा, आईएमडी उष्णता लहर के अत्यंत सटीक पूर्वानुमान भी प्रदान करता है। उष्णता लहरों के कारण कुछ वर्ष पहले तक बड़ी संख्या में लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ती थी। हालांकि, अब सटीक पूर्वानुमान, और प्रभावी संचार एवं सूचना के प्रसार के कारण इन लहरों से होने वाली मौतों में काफी कमी आई है। आईएमडी, शीत लहरों के पूर्वानुमान पर भी काम कर रहा है।

आईएमडी गंभीर मौसम की चार महत्वपूर्ण घटनाओं— उष्णकटिबंधीय चक्रवात, भारी वर्षा, तड़ित झंझा और उष्णता लहर—के लिए खतरों, भेद्यता और जोखिम विश्लेषण को शामिल करके प्रभाव-आधारित पूर्वानुमानों में सुधार करने की ओर अग्रसर है। आईएमडी, अवलोकन और संचार प्रणालियों में सुधार करके, मोबाइल ऐप आदि के माध्यम से सबको मौसम की अद्यतित जानकारी उपलब्ध कराने की तैयारी कर रहा है।

© Spectrum Books Pvt. Ltd.

 

spectrum-books-logo

  

Spectrum Books Pvt. Ltd.
Janak Puri,
New Delhi-110058

  

Ph. : 91-11-25623501
Mob : 9958327924
Email : info@spectrumbooks.in