अक्टूबर 2024 में साइंस एडवांसेज में प्रकाशित एक शोध के अनुसार, वैज्ञानिकों ने पता लगाया है कि पिछले चालीस वर्षों में वायुमंडलीय प्रवाह लगभग 6°-10° तक ध्रुवों की ओर स्थानांतरित हो गए हैं। इस आमूल-चूल परिवर्तन के कारण वर्षा वितरण, वर्षा की तीव्रता, बर्फबारी और तूफानी घटनाओं में आए बदलावों, विशेषकर विश्व भर के मध्य और उच्च अक्षांशीय क्षेत्रों में, का मौसम की स्थिति पर व्यापक प्रभाव पड़ा है।
शोध के बारे में
यह शोध सेंटा बारबरा में स्थित यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया के वैज्ञानिकों की एक टीम, जे ली और किंगहुआ डिंग के नेतृत्व में, द्वारा किया गया था। शोध के दौरान, उन्होंने उपग्रह-आधारित पुनर्विश्लेषण डेटा और कई जलवायु मॉडलों का विश्लेषण किया, और उत्तर एवं दक्षिण दोनों गोलार्धों में वायुमंडलीय प्रवाहों की बदलती अक्षांशीय स्थिति की जांच की। उनके निष्कर्षों से ज्ञात होता है कि 1979 से बोरियल शीत ऋतु (उत्तरी क्षेत्रों या उच्च अक्षांशों में लगातार पड़ने वाली सर्दियां) के दौरान ये प्रवाह औसतन लगभग छह से दस डिग्री तक ध्रुवों की ओर खिसक गए हैं।
इस खोज के गहन निहितार्थ हैं। इस बदलाव के कारण निम्न अक्षांशों (लगभग 30° उत्तर और 30° दक्षिण), जिसमें कैलिफोर्निया एवं दक्षिणी ब्राजील जैसे क्षेत्र शामिल हैं, में वायुमंडलीय प्रवाह (एआर) गतिविधि में उल्लेखनीय गिरावट आई है, तथा इसके विपरीत लगभग 50° उत्तर और 50° दक्षिण में, जैसे कि ब्रिटिश कोलंबिया, अलास्का और उत्तरी यूरोप में, इसी अनुपात में वृद्धि हुई है। यह परिवर्तन आर्द्रता के परिसंचरण को परिवर्तित कर वैश्विक जलवायु पर प्रभाव डालता है, जिससे कुछ क्षेत्रों में बाढ़ और अन्य क्षेत्रों में सूखा जैसी चरम मौसम की घटनाएं बारंबार होती हैं।
वैज्ञानिकों ने पाया कि ध्रुवों की ओर यह स्थानांतरण न केवल तापमान वृद्धि की दीर्घकालिक प्रवृत्ति का परिणाम है, बल्कि प्रशांत महासागर के पृष्ठीय तापमान के स्वरूप में आए बदलाव, विशेष रूप से पिछले दो दशकों में ला नीना घटनाओं की बढ़ती आवृत्ति और निरंतरता का भी परिणाम है। महासागर-वायुमंडल की ये अंतःक्रियाएं बड़े पैमाने पर परिसंचरण स्वरूप को प्रभावित करती हैं, जिससे वायुमंडलीय प्रवाह उच्च अक्षांशों की ओर मुड़ जाते हैं।
इसके अलावा, शोधकर्ताओं ने उल्लेख किया कि पिछले कुछ दशकों में विश्व भर में ग्लोबल वॉर्मिंग के स्तर में भारी वृद्धि हुई है। परिणामस्वरूप, चरम मौसम संबंधी घटनाएं, जैसे कि ऊष्णता लहरें, अत्यधिक वर्षा, आकस्मिक सूखा, आकस्मिक बाढ़ और शीतकालीन झंझावात, विश्व भर में लगातार और गंभीर होती जा रही हैं।
वायुमंडलीय प्रवाह (Atmospheric Rivers)
वायुमंडलीय प्रवाह, सांद्रित जलवाष्प की लंबी, संकरी धाराएं होते हैं जो वायुमंडल में पवन की दिशा में बहते हैं। इन प्रवाहों की तीव्रता और परिमाण अत्यधिक भिन्न होते है। सामान्यतया ये प्रवाह 1,000 मील से अधिक लंबे और लगभग 375 मील तक विस्तृत होते हैं जो उष्णकटिबंधीय एवं उपोष्णकटिबंधीय महासागरों से मध्य-अक्षांशीय भू-भागों की ओर भारी मात्रा में नमी पहुंचाते हैं। ये प्रवाह बर्फबारी और वर्षण को प्रभावित करते हैं, जिससे उत्तरी अमेरिका, दक्षिण अमेरिका और यूरोप जैसे महाद्वीपों के पश्चिमी तटों पर भारी वर्षा और तूफान आते हैं।
क्या आप जानते हैं?
एक औसत वायुमंडलीय प्रवाह, जलवाष्प की उतनी ही मात्रा (7.5 से 15 गुना) का वहन करता है, जितनी मिसिसिपी नदी से अपवाहित जल की मात्रा होती है।
वायुमंडलीय प्रवाहों की उत्पत्ति एवं रूपः उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में होने वाली पर्याप्त नमी वायुमंडलीय प्रवाहों की उत्पत्ति का कारण बनती है। किंतु ये वायुमंडलीय प्रवाह एक-दूसरे से भिन्न होते हैं। जैसा कि जेट धाराएं तापमान प्रवणता के प्रति अत्यधिक गतिशील और संवेदनशील होती हैं, इसलिए ये वायुमंडलीय प्रवाह (एआर) विभिन्न रूपों में ध्रुवों की ओर गति करते हैं। कुछ वायुमंडलीय प्रवाह महासागरों और महाद्वीपों में फैले होते हैं, और पहाड़ों या दाब प्रणालियों से टकराने पर मुड़ते तथा टूटते हैं। उनके बदलते आकार न केवल वर्षा के समय को, बल्कि वर्षा की तीव्रता को भी प्रभावित करते हैं। अर्थात ध्रुवों की ओर गति के दौरान उनका आकार बदलता रहता है।
वायुमंडलीय प्रवाहों की सामान्य प्रवृत्तिः अधिकांश वायुमंडलीय प्रवाह आर्कटिक क्षेत्र के दोनों गोलार्धों में, 30° से 50° अक्षांशों के बीच स्थित, विशेष उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में संकेंद्रित हैं। इन क्षेत्रों में पश्चिमी संयुक्त राज्य अमेरिका, दक्षिणी ऑस्ट्रेलिया, दक्षिणी चिली, चीन के कुछ हिस्से और दक्षिणी यूरोप जैसे क्षेत्र शामिल हैं।
जैसा कि एक स्पष्ट प्रवृत्ति का अवलोकन किया गया है कि—वायुमंडलीय प्रवाह की तीव्रता 30° उत्तर/दक्षिण के आसपास कम और 50° उत्तर/दक्षिण के निकट इसकी तीव्रता अधिक होती है। अलास्का, ब्रिटिश कोलंबिया और स्कैंडिनेविया जैसे देश अब अधिक चरम वर्षा का सामना कर रहे हैं, जबकि कैलिफोर्निया और दक्षिणी ब्राजील जैसे उपोष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में शुष्कता में वृद्धि हो रही है।
क्या आप जानते हैं?
‘पाइनएप्पल एक्सप्रेस’ एक विशेष वायुमंडलीय प्रवाह है जो उत्तरी अमेरिका के पश्चिमी तट पर जलवाष्प लाती है, इस एआर का उद्गम हवाई द्वीप के निकट उष्णकटिबंधीय प्रशांत महासागर से होता है और यह ओरेगन, ब्रिटिश कोलंबिया, कैलिफोर्निया के कुछ हिस्सों और वाशिंगटन में भारी वर्षा का कारण बनती है।
वायुमंडलीय प्रवाहों के ध्रुव की ओर स्थानांतरण के कारण
पूर्वी उष्णकटिबंधीय प्रशांत महासागर में, समुद्र की सतह के तापमान में परिवर्तन हुआ है, जो वायुमंडलीय प्रवाहों के ध्रुव की ओर स्थानांतरण का प्रमुख कारण है। प्रशांत महासागर के इस क्षेत्र में, विशेष रूप से वर्ष 2000 के बाद से, जल में शीतलन की दीर्घकालिक प्रवृत्ति देखी गई है। परिणामस्वरूप, विश्व भर में वायुमंडलीय परिसंचरण प्रभावित होता है। शीतलन इस प्रवृत्ति का कारण ला नीना स्थितियां हैं, जो इन प्रवाहों को ध्रुवों की ओर ले जाती हैं।
वायुमंडलीय प्रवाह एक-दूसरे से संबद्ध प्रक्रियाओं की श्रृंखला के कारण ध्रुवों की ओर बढ़ रहे हैं।
ला नीना स्थितियां: ला नीना चरणों के दौरान, पूर्वी उष्णकटिबंधीय प्रशांत महासागर में समुद्र की सतह का तापमान कम हो जाता है, जिससे वॉकर परिसंचरण (वॉकर सर्कुलेशन), एक वायुमंडलीय तीव्र चक्र, जो पश्चिमी प्रशांत महासागर में संवहन में वृद्धि करता है। इस तीव्र परिसंचरण के परिणामस्वरूप, उष्णकटिबंधीय वर्षा क्षेत्र का विस्तार होने के साथ ही वायुमंडलीय प्रवाहों के स्वरूप में भी परिवर्तन होता है, जिससे पवन के स्वरूप और उच्च दाब की विसंगतियां उत्पन्न होती हैं जो वायुमंडलीय प्रवाहों को भूमध्य रेखा से दूर ले जाती हैं।
[वॉकर परिसंचरण, पवन की अत्यधिक पुनरावृत्तियों को संदर्भित करता है जो उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में कभी-कभी ऊपर उठते हैं और कभी-कभी नीचे गिरते हैं, जिससे वर्षा या बर्फबारी प्रभावित होती है।]
अल नीनो स्थितियां: इसके विपरीत, अल नीनो घटनाओं के दौरान, मध्य और पूर्वी प्रशांत महासागर ऊष्ण हो जाते हैं, जिससे वॉकर परिसंचरण कमजोर हो जाता है, और वायुमंडलीय प्रवाह भूमध्य रेखा के निकट बने रहते हैं। हालांकि, पिछले दो दशकों में ला नीना जैसी स्थितियों के सापेक्ष प्रभाव ने इस संतुलन को ध्रुवाभिमुख वायुमंडलीय प्रवाह के प्रक्षेपवक्र की ओर झुका दिया है।
जलवायु परिवर्तन के लिए अंतर-सरकारी पैनल (आईपीसीसी) के दीर्घकालिक आकलन के अनुसार, पूर्व-औद्योगिक काल की तुलना में वैश्विक औसत तापमान में लगभग 1.1 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि हुई है। इस ऊष्णता ने वायुमंडलीय परिसंचरण, विशेष रूप से जेट धाराओं को प्रभावित किया है, जिससे वे ध्रुवों की ओर स्थानांतरित हो रही हैं। परिणामस्वरूप, वायुमंडलीय प्रवाह भी ध्रुवों की ओर बढ़ रहे हैं।
वायुमंडलीय प्रवाहों के ध्रुवाभिमुखीय स्थानांतरण के परिणाम
वायुमंडलीय प्रवाहों की अवस्थिति में परिवर्तन के कारण जलवायु संबंधी कई प्रभाव सामने आ रहे हैं:
- उपोष्णकटिबंधीय क्षेत्रों (30° उत्तर/दक्षिण) में, कैलिफोर्निया, दक्षिणी ब्राजील और उत्तरी अफ्रीका जैसे क्षेत्रों में वायुमंडलीय प्रवाह कम पहुंच रहे हैं। इससे वार्षिक वर्षण में कमी, जल संकट, वनाग्नि और कृषि संकट में वृद्धि हो रही है।
- मध्य और उच्च अक्षांशीय क्षेत्रों (50° उत्तर/दक्षिण और इससे अधिक) में अब भारी वर्षा, बाढ़, भूस्खलन और तूफानी लहरें देखने को मिल रही हैं, जिससे अलास्का, उत्तरी यूरोप और पूर्वी रूस के कुछ हिस्से जैसे स्थान प्रभावित हो रहे हैं।
- ध्रुवीय क्षेत्रों में, आर्कटिक तक पहुंचने वाले वायुमंडलीय प्रवाह तीव्रता से समुद्री बर्फ के पिघलने, स्थायी तुषार भूमि (पर्माफ्रॉस्ट) को ऊष्ण करने और ध्रुवीय प्रजातियों के आवास का विनाश करने में योगदान दे रहे हैं। ये प्रतिक्रियात्मक आवृत्तियां वैश्विक तापन वृद्धि को और भी तीव्र कर देती हैं।
न्यूजीलैंड, पुर्तगाल, ब्रिटेन, दक्षिण-पूर्वी अमेरिका और चिली जैसे कई क्षेत्र जो अपनी वार्षिक जल आपूर्ति के आधे से अधिक भाग के लिए वायुमंडलीय प्रवाहों पर निर्भर हैं, उन्हें पेयजल, कृषि और ऊर्जा उत्पादन के संबंध में अनियमित जल उपलब्धता का सामना करना पड़ सकता है।
कम्युनिकेशंस अर्थ एंड एनवायरनमेंट जर्नल के मई 2023 के अंक में प्रकाशित एक अध्ययन से पता चला है कि 1985 और 2020 के बीच भारत में आई 70 प्रतिशत बड़ी बाढ़ वायुमंडलीय प्रवाह से संबद्ध थीं, जिनमें 2013 में उत्तराखंड और 2018 में केरल में आई बाढ़ भी शामिल है। भारत में वायुमंडलीय प्रवाह की 596 बड़ी घटनाएं दर्ज हुईं, जिनमें से 95 प्रतिशत से अधिक घटनाएं जून और सितंबर के बीच हुईं। हाल के दशकों में वैश्विक तापन के कारण इनकी आवृत्ति और तीव्रता में वृद्धि हुई है।
भविष्य में वायुमंडलीय प्रवाहों के प्रभाव
अब तक, वायुमंडलीय प्रवाहों में आए बदलाव प्राकृतिक प्रक्रियाओं का परिणाम रहे हैं। हालांकि, असावधान मानवीय गतिविधियों के कारण वैश्विक तापन भी इन बदलावों के लिए जिम्मेदार कारकों में से एक हो सकता है। वैश्विक तापन के कारण, भविष्य में वायुमंडलीय प्रवाहों की आवृत्ति तथा तीव्रता और भी अधिक होगी। ऐसा इसलिए होगा क्योंकि ऊष्ण वायुमंडल अधिक मात्रा में नमी को रोक सकता है। वायुमंडलीय प्रवाहों का निरंतर और तीव्र प्रवाह बाढ़ के जोखिम को बढ़ा सकता है, जिससे उन स्थानों पर कृषि, बुनियादी ढांचे और आपदा प्रबंधन के लिए नई चुनौतियां उत्पन्न हो सकती हैं जहां भारी वर्षा नहीं होती।
हालांकि, भविष्य में होने वाले परिवर्तनों का पूर्वानुमान लगाना मुश्किल है, जैसा कि ला नीना एवं अल नीनो के बीच प्राकृतिक उतार-चढ़ाव का सही पूर्वानुमान नहीं लगाया जा सकता। जेट धाराओं की गतिशीलता में अनिश्चितताओं और प्राकृतिक तथा मानवजनित कारकों के बीच अंतःक्रिया के कारण यह जटिल बना हुआ है। इसके अतिरिक्त, जलवायु मॉडल अकसर आंतरिक परिवर्तनशीलता को कम आंकते हैं, जो दीर्घकालिक वायुमंडलीय प्रवाहों के पूर्वानुमानों की सटीकता सीमित कर देते हैं।
निष्कर्ष
वायुमंडलीय प्रवाहों का ध्रुवों की ओर स्थानांतरण, ऐसे उन्नत जलवायु मॉडलों और जल प्रबंधन के लिए लचीली रणनीतियों की तत्काल आवश्यकता को रेखांकित करता है जो संपूर्ण विश्व में लागू हो सकें। मौसम पूर्वानुमानों में सुधार की आवश्यकता है ताकि जलवायु परिवर्तनों के प्रति अनुकूल बनने के लिए वायुमंडलीय प्रवाहों की आवृत्ति, तीव्रता और दिशा का पहले से पता लगाया जा सके। इसके अलावा, इन परिवर्तनों के प्रभावों को व्यापक रूप से निर्धारित करने के लिए और अधिक शोध किए जाने की आवश्यकता है। इससे लोगों को वर्षा के विभिन्न पैटर्न और मौसम संबंधी घटनाओं से निपटने के उपाय खोजने में मदद मिलेगी।
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