हाल ही में, एक क्रांतिकारी अध्ययन में, शोधकर्ताओं ने अंटार्कटिका के रहस्यमय आधार शैल, जिस पर ट्रांसअंटार्कटिक पर्वत श्रृंखला फैली हुई है, के बारे में महत्वपूर्ण तथ्यों की खोज की है। नए तथ्य अंटार्कटिका के गतिशील भूवैज्ञानिक अतीत को प्रकट करते हैं। शोधकर्ताओं का मानना है कि पर्वत उत्थान, अपरदन और हिमाच्छादन की प्रक्रियाओं जैसे विशेष गत्यात्मक बल लगातार इस आधार शैल को प्रभावित करते रहे, जो अंटार्कटिका में बर्फ की मोटी चादरों के नीचे दुनिया की दृष्टि से छिपा हुआ है।
शोधकर्ताओं के अनुसार महाद्वीप का भूवैज्ञानिक अतीत लाखों वर्षों से इन गतिशील बलों से प्रभावित होता रहा है। इन प्रक्रियाओं को उजागर करके, यह अध्ययन अंटार्कटिका की बर्फ की परतों और उनके क्रमिक विकास के बारे में महत्वपूर्ण अंतर्दृष्टि प्रदान करता है।
अंटार्कटिका और उसका महत्व
'श्वेत महाद्वीप' के नाम से प्रसिद्ध, अंटार्कटिका पृथ्वी पर एक पृथक, हिमाच्छादित भूभाग है। इसकी अधिकांश सतह वर्ष भर चार किलोमीटर से भी अधिक मोटी बर्फ की परत से ढकी रहती है। इसमें दुनिया की लगभग 90 प्रतिशत बर्फ और 70 प्रतिशत मीठा जल संग्रहित है। इस विशाल बर्फीली परत के नीचे एक विविधतापूर्ण, अद्भुत और रहस्यमयी भू-दृश्य मौजूद है, विशेष रूप से ट्रांसअंटार्कटिक पर्वतों के आधार शैल के नीचे, जो दशकों से विश्व के वैज्ञानिकों और अन्वेषकों को आकर्षित करता रहा है।
भूवैज्ञानिक टिमोथी पॉलसन के अनुसार, प्रारंभिक खोजकर्ताओं ने अंटार्कटिका के विशाल हिम आवरण के नीचे छिपे और असमतल एक प्रागैतिहासिक भू-दृश्य की खोज की थी। उन्होंने एक विशाल पर्वत श्रृंखला की खोज की जो इसके आंतरिक भाग में 3,500 किलोमीटर से भी अधिक क्षेत्र में फैली हुई थी, जिसकी कुछ चोटियां 4,500 मीटर से भी ऊंची थीं। मूल रूप से इसे ‘द ग्रेट अंटार्कटिक हॉर्स्ट’ नाम दिया गया था, जबकि अब इसे ट्रांसअंटार्कटिक पर्वत श्रृंखला के नाम से जाना जाता है। ये पर्वत पूर्वी और पश्चिमी अंटार्कटिका के बीच एक भौतिक और भूवैज्ञानिक सीमा के रूप में कार्य करते हैं। पूर्वी अंटार्कटिका एक कठोर, प्राचीन क्रेटन (पृथ्वी की पर्पटी का एक अत्यंत प्राचीन और स्थिर भाग जो लंबे समय से स्थिर बना हुआ है और जिसमें भूवैज्ञानिक गतिविधियां बहुत कम हुई हैं) है, जबकि पश्चिमी अंटार्कटिका एक गतिशील दरार प्रणाली (Rift System—पृथ्वी के स्थलमंडल की एक रैखिक विशेषता, जो वहां निर्मित होती है जहां विवर्ततनिक पट्टिकाएं अलग हो रही होती हैं जिससे बल विस्तरण के कारण एक लंबा गर्त बन जाता है।) का उदाहरण है।
यद्यपि अंटार्कटिका एक दूरस्थ और प्रतिकूल भू-क्षेत्र है, तथापि यह हमारे ग्रह पृथ्वी के अन्य हिस्सों से घनिष्ठता से जुड़ा हुआ है। इसका भूवैज्ञानिक अतीत पृथ्वी के वृहद् इतिहास पर प्रकाश डालता है। यह स्पष्ट करता है कि पर्वत कैसे बने, बर्फ की परतें कैसे फैलीं, और लाखों वर्षों की अवधि में जलवायु परिवर्तन कैसे हुए। ट्रांसअंटार्कटिक पर्वतों के माध्यम से, हम प्रकृति की शक्ति और जीवन के लचीलेपन को समझ पाते हैं।
अंटार्कटिका में कठोर और नीरस परिस्थितियों के बावजूद, दृश्य/अदृश्य शक्तियों के कारण निरंतर परिवर्तन होते रहते हैं। हालिया अध्ययन हमें न केवल शैलों और बर्फ के बारे में जानकारी प्रदान करता है, बल्कि हमारे ग्रह के बारे में हमारी समझ को भी विस्तृत बनाता है और इसमें मानवता की स्थिति को स्पष्ट बनाता है।
अध्ययन के बारे में
जून 2025 में, यूनिवर्सिटी ऑफ विस्कॉन्सिन-ओशकोश के भूविज्ञानी पॉलसन और यूनिवर्सिटी ऑफ कोलोराडो बोल्डर के थर्मोक्रोनोलॉजिस्ट जेफ बेनोवित्ज ने अंटार्कटिका के ट्रांसअंटार्कटिक पर्वतों पर एक अध्ययन किया। प्रसिद्ध जर्नल Earth and Planetary Science Letters में प्रकाशित इस अध्ययन में अंटार्कटिका की बर्फ की मोटी परत के नीचे छिपे प्राचीन भू-दृश्यों के विकासक्रम को स्पष्ट किया गया है। उनका अध्ययन इन पर्वतों के गठन और विकास के बारे में मौलिक रूप से हमारी समझ को बदल देता है। विशेष रूप से, पर्वतों के गठन (orogeny), उत्थान और अपरदन की लगातार होती प्रक्रिया के बारे में, न कि किसी एक विशेष घटना के बारे में। ये भूवैज्ञानिक घटनाएं पृथ्वी की विवर्तनिक प्लेटों के विस्थापन और हिमनदों के निर्माण के कारण हुई थीं।
मोटी बर्फीली परतों के नीचे रहस्यमय दुनिया का अनावरण
अब, कुछ प्रश्न उठते हैं, जैसे कि ट्रांसअंटार्कटिक पर्वत ऊपर कैसे उठे और बर्फ की मोटी परत के नीचे अंटार्कटिका की स्थलाकृति असमान क्यों है। माना जाता है कि इन प्रश्नों के उत्तर समय के साथ निर्मित हुई बर्फ की परतों और उनकी प्रवृत्ति को प्रभावित कर सकते हैं। वैज्ञानिक उन बलों को समझने का प्रयास कर रहे थे, जो दशकों से पृथ्वी के इस हिस्से को प्रभावित कर रहे हैं। हालांकि, अब शोधकर्ता आग्नेय शैलों, जैसे पर्वतों से प्राप्त ग्रेनाइट, में खनिज कणों की रासायनिक संरचना का अध्ययन करके उसी तापमान और दाब की स्थितियों को पुनः निर्मित करने में लगे हैं, जैसे कि वे लाखों वर्ष पहले थीं। इसका अर्थ है कि समय-तापमान में क्रमिक रूप से वृद्धि हुई है। अतः, यह स्पष्ट है कि इन पर्वतों में बार-बार उत्थान और अपरदन चक्र घटित हुए, और प्रत्येक चक्र ने अंटार्कटिका की सीमाओं में महत्वपूर्ण विवर्तनिक परिवर्तनों में वृद्धि की।
पूर्वोक्त खोजें महत्वपूर्ण हैं, क्योंकि वे हिमनदीय चक्रों के प्रति हमारी समझ को प्रभावित करती हैं। बर्फ की चादरों में वृद्धि और अपने स्थान से खिसकने की प्रवृत्ति व्यापक रूप से छिपे हुए प्राचीन भू-दृश्यों से प्रभावित होती है।
एक पर्वत श्रृंखला का निर्माण
ट्रांसअंटार्कटिक पर्वतों का निर्माण और अंटार्कटिका का विवर्तनिक इतिहास एक-दूसरे से संबद्ध हैं। प्राचीन क्रेटन की मौजूदगी के कारण पूर्वी अंटार्कटिका क्षेत्र में आश्चर्यजनक स्थिरता दिखाई देती है। हालांकि, अंटार्कटिका की सीमाएं हमेशा अस्थिर रही हैं। ट्रांसअंटार्कटिक पर्वत गोंडवाना, यानी एक बड़े महाद्वीप के विखंडन के साथ ही, प्लेट में हुए अन्य महत्वपूर्ण विवर्तनिक परिवर्तनों से अत्यधिक प्रभावित हुए थे।
विवर्तनिक पट्टिकाओं के आपस में टकराने से चट्टानें प्रबल रूप से ऊपर की ओर उठ सकती हैं, जिससे ऊंचे पर्वतों का निर्माण होता है। किंतु जहां तक ट्रांसअंटार्कटिक पर्वतों का संबंध है, ये किसी एक घटना के कारण गठित नहीं हुए, बल्कि इनका गठन अनियमित अंतरालों पर हुई पर्वत निर्माण की अनेक घटनाओं की श्रृंखला के कारण हुआ है। प्रत्येक घटना के साथ चट्टानों के स्वरूप भिन्न रूप से परिवर्तित होते गए, जिसके फलस्वरूप उन पर उत्थान और अपरदन दोनों के स्पष्ट चिह्न दृष्टिगोचर होते हैं।
नवीनतम शोध से यह भी ज्ञात होता है कि चट्टान की कुछ प्राचीनतम परतें “लुप्त” हो चुकी हैं, जो अब तक की सबसे महत्वपूर्ण और चौंकाने वाली खोजों में से एक है। पर्वतीय उत्थान और अपरदन की निरंतर प्रक्रियाओं के कारण चट्टानों की अनेक परतें क्षतिग्रस्त होकर विलुप्त हो गई हैं। फलस्वरूप, इन चट्टानों के भूवैज्ञानिक अभिलेख नष्ट हो गए हैं। परिणामस्वरूप, प्राचीन और नवीन चट्टानें भू-खंडों के रूप में साथ-साथ (सन्निकट) दिखाई देती हैं। इन लुप्त शैलों के कारण यह प्रमाणित हो गया है कि पृथ्वी की पर्पटी (क्रस्ट) एक गतिशील संरचना है।
वर्तमान बर्फ पर प्राचीन आधार शैल का प्रभाव
ट्रांसअंटार्कटिक पर्वत न केवल चट्टानी शिखरों को प्रभावित करते हैं, बल्कि अंटार्कटिका की हिम परतों पर भी गहरा प्रभाव डालते हैं। ये पर्वत पूर्वी अंटार्कटिका से रॉस सागर के निम्न क्षेत्रों की ओर बढ़ने वाली बर्फ की गति को अवरुद्ध करते हैं। फलस्वरूप, अंटार्कटिका की बर्फ की चादरों की स्थिरता और उनका संचलन उल्लेखनीय रूप से प्रभावित होता है।
अध्ययनों से ज्ञात होता है कि अंटार्कटिका की बर्फ के नीचे स्थित असमान आधार शैल ने हिमनदीय चक्रों में व्यापक बदलाव किए हैं। प्राचीन आधार शैल की घाटियां, पठार और पर्वत श्रेणियां बर्फ की गति के लिए मार्ग तथा उसके संचयन के लिए बेसिन का निर्माण करती हैं। तापमान में गिरावट के साथ बर्फ की चादरों में उल्लेखनीय वृद्धि होती है, जो पर्वतों पर फैल जाती हैं। किंतु, तापमान बढ़ने के साथ ही बर्फ पिघलने लगती है और आधार शैल का अधिक भाग प्रकट हो जाता है।
आग्नेय शैलों का रासायनिक विश्लेषण करके प्राचीन हिमयुगों के प्रमाण प्राप्त किए जा सकते हैं। यह स्पष्ट हो गया है कि लगभग 300 मिलियन वर्ष पूर्व एक महत्वपूर्ण हिमयुग घटित हुआ था। संभवतः वही काल आज देखी जाने वाली बर्फ की गतिशीलता के लिए उत्तरदायी है। यद्यपि यह भू-दृश्य संसार से ओझल है, तथापि इसका विकास निरंतर जारी है, जिसके कारण पर्वतीय उत्थान, अपरदन और हिमनदन (ग्लेशिएशन) के बीच होने वाली पारस्परिक क्रियाएं होती रहती हैं, जो इस भू-दृश्य की रचना करती हैं।
पूर्वी अंटार्कटिका के गर्भ में नदी द्वारा निर्मित गुप्त संसार
जून 2024 में नेचर कम्युनिकेशंस जर्नल में प्रकाशित एक महत्वपूर्ण अध्ययन में, डरहम यूनिवर्सिटी के स्टीवर्ट जैमीसन के नेतृत्व में शोधकर्ताओं ने पूर्वी अंटार्कटिका में लगभग दो किलोमीटर मोटी बर्फ की परत के नीचे एक प्राचीन नदी द्वारा निर्मित एक विशाल भू-दृश्य का पता लगाया।
कनाडा के RADARSAT से प्राप्त उन्नत रडार इमेजरी, रडार-इको साउंडिंग और लैंडस्केप मॉडलिंग का प्रयोग करके, शोधकर्ताओं की टीम ने लगभग वेल्स के बराबर आकार के एक भू-भाग का पता लगाया, जो लगभग 34 मिलियन वर्षों से संरक्षित है।
यह भू-दृश्य उस काल का है जब अंटार्कटिका हरे-भरे गोंडवाना महाद्वीप का हिस्सा था, जो नदियों, वनों और विभिन्न जीवों से भरा था। इओसीन-ओलिगोसीन संक्रमण के दौरान, वायुमंडलीय कार्बन डाइऑक्साइड (CO2) में आई तीव्र गिरावट ने वैश्विक शीतलन को उत्प्रेरित किया, जिसके परिणामस्वरूप पूर्वी अंटार्कटिका की बर्फ की चादर का निर्माण हुआ, जिसने इस प्राचीन संसार को अपने नीचे दफन कर दिया।
नवीनतम शोध के लाभ
ट्रांसअंटार्कटिक पर्वतों से जुड़े ये निष्कर्ष केवल अकादमिक जिज्ञासा का विषय नहीं हैं, बल्कि शोध के क्षेत्र को भी विस्तृत करते हैं। यह अध्ययन हमारे ग्रह के अतीत और उसकी सतह पर घटित विभिन्न घटनाओं के कारण हुए परिवर्तनों को समझने के लिए अनिवार्य है। अब जब वैज्ञानिकों को आज की हिम-गतिशीलता पर प्राचीन भू-दृश्यों के प्रभाव का ज्ञान हो चुका है, तो आगामी जलवायु परिवर्तन के प्रति अंटार्कटिका की हिम चादरों की प्रतिक्रिया का पूर्वानुमान लगाना और अधिक सरल हो गया है।
यह शोध लंबे समय से प्रचलित उस धारणा को चुनौती देता है कि अंटार्कटिका का आंतरिक भाग स्थिर है। जैसा कि अब तक अंटार्कटिका के आंतरिक क्षेत्र को शांत और स्थिर माना जाता था, किंतु अध्ययन से स्पष्ट होता है कि जिन क्षेत्रों को सबसे अधिक स्थिर समझा जाता था, अतीत में वहां भी एक गतिशीलता विद्यमान थी। इस जटिल और परिवर्तनशील इतिहास का कारण विवर्तनिक विक्षोभ और तीव्र जलवायु परिवर्तन माने जा सकते हैं।
नवीन रासायनिक विश्लेषण और सैटेलाइट इमेजिंग जैसी तकनीकी प्रगति के साथ अब शोधकर्ताओं के पास अंटार्कटिका के आंतरिक भाग की खोज के लिए अभूतपूर्व साधन उपलब्ध हैं। इन तकनीकों की सहायता से, ट्रांसअंटार्कटिक पर्वतों की आग्नेय शैलों से संबंधित व्यापक मात्रा में प्राप्त आंकड़ों का गहन विश्लेषण किया गया है। यह विश्लेषण दर्शाता है कि अंटार्कटिका के भू-दृश्य का अतीत पूर्ववर्ती खोजों की तुलना में कहीं अधिक गतिशील और जटिल रहा है।
निष्कर्ष
निष्कर्षतः, अंटार्कटिका के ट्रांसअंटार्कटिक पर्वतों के गतिशील भूगर्भीय अतीत को उजागर करने वाला यह अध्ययन दर्शाता है कि वर्तमान समय में वैज्ञानिक खोजें कितनी महत्वपूर्ण हैं। ये पर्वत पृथ्वी के भूवैज्ञानिक और जलवायवीय विकास के जीवंत अभिलेख के रूप में कार्य करते हैं और ग्रह के अतीत और भविष्य के बारे में महत्वपूर्ण सबक देते हैं। ये न केवल उन बलों को प्रकट करते हैं जो हमारी पृथ्वी को प्रभावित करते हैं, बल्कि आधुनिक समय की समस्याओं के मूल कारणों को भी स्पष्ट करते हैं।
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