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राष्ट्रीय स्वास्थ्य प्रोफाइल (NHP) 2023

राष्ट्रीय स्वास्थ्य प्रोफाइल (NHP) 2023 को केंद्रीय स्वास्थ्य आसूचना ब्यूरो (सीबीएचआई) द्वारा जून 2024 में प्रकाशित किया गया। इस आधिकारिक दस्तावेज, जो भारत की स्वास्थ्य स्थिति को दर्शाता है, को 2005 से प्रत्येक वर्ष जारी किया जाता है। यह 18वां संस्करण विभिन्न स्रोतों, जिनमें सभी राज्यों और केंद्र-शासित प्रदेशों के सार्वजनिक स्वास्थ्य और परिवार कल्याण निदेशालय, राष्ट्रीय स्वास्थ्य कार्यक्रम, केंद्रीय सरकार के संगठन और कई अन्य संबंधित राष्ट्रीय एजेंसियां शामिल हैं, से प्राप्त व्यापक आंकड़ों के गहन विश्लेषण के बाद तैयार किया गया है। यह एनएचपी नीति-निर्माताओं, योजनाकारों और शोधकर्ताओं के लिए एक व्यापक संसाधन के रूप में कार्य करता है, जिससे स्वास्थ्य परिणामों में सुधार हेतु साक्ष्य-आधारित निर्णय लेने में सहायता मिलती है।

राष्ट्रीय स्वास्थ्य प्रोफाइल का महत्व

एनएचपी भारत में वर्तमान स्वास्थ्य स्थिति और स्वास्थ्य सेवा प्रणालियों का विस्तृत विश्लेषण प्रस्तुत करता है। इसमें छह अलग-अलग संकेतकों के अंतर्गत स्वास्थ्य संबंधी महत्वपूर्ण प्रणालीगत जानकारी शामिल है, जो प्रदर्शन और उपलब्धियों के संकेतक के रूप में कार्य करती है। ये संकेतक किसी भी स्वास्थ्य सेवा कार्यक्रम के कुशल संचालन और लक्षित हस्तक्षेपों का आधार हैं।

एनएचपी 2023 के संकेतक

एनएचपी 2023 के छह प्रमुख संकेतक इस प्रकार हैं:

1. जनसांख्यिकीय संकेतक: जनसांख्यिकी किसी क्षेत्र विशेष के लोगों के वैज्ञानिक अध्ययन को संदर्भित करती है। इस अध्ययन का उद्देश्य पुरुषों, महिलाओं, विवाह, जन्म, मृत्यु आदि की संख्या में होने वाले परिवर्तनों का अवलोकन और अभिलेखन (रिकॉर्ड) करना है। साथ ही, इसका उद्देश्य उन लोगों की संख्या को भी अभिलेखित करना है जिनमें कुछ विशेष लक्षण या विशेषताएं पाई जाती हैं।

सार्वजनिक स्वास्थ्य कार्यक्रमों और नीतियों की योजना बनाना और उनका क्रियान्वयन केवल जनसंख्या की संरचना की व्याख्या करने के बाद ही किया जा सकता है। इसका कारण यह है कि व्यक्तियों और समुदायों का स्वास्थ्य विभिन्न कारकों से प्रभावित होता है, जैसे कि—लोगों की संख्या, उनका निवास क्षेत्र, उनके पास मौजूद कौशल, तथा उनके बीच के मजबूत पारस्परिक संबंध।

जनसांख्यिकीय संकेतकों का प्रयोग करके, किसी क्षेत्र विशेष में जनसंख्या के आकार, संरचना, भौगोलिक वितरण और वृद्धि के अलावा जनसंख्या को प्रभावित करने वाले सामाजिक, आर्थिक और व्यावहारिक कारकों का भी निर्धारण किया जा सकता है।

कुछ मुख्य अंश

  • राष्ट्रीय स्वास्थ्य प्रोफाइल 2023 के अनुसार, भारत की जनसंख्या में अगले 25 वर्षों में 25 प्रतिशत की वृद्धि होना अपेक्षित है, अर्थात प्रति वर्ष 1 प्रतिशत की वृद्धि। अनुमान है कि 2011 से 2036 के बीच भारत की जनसंख्या 121.1 करोड़ से बढ़कर 152.2 करोड़ हो जाएगी।
  • कुल जनसंख्या का लिंगानुपात (प्रति 1000 पुरुषों पर महिलाओं की संख्या) 2011 के 943 से बढ़कर 2036 में 952 हो जाएगी।
  • इसके अलावा, कामकाजी आयु वर्ग (15–59 वर्ष) की जनसंख्या के अनुपात में 4.2 प्रतिशत की वृद्धि होना अपेक्षित है। 2011 में यह 60.7 प्रतिशत था, जबकि 2036 तक यह 64.9 प्रतिशत हो जाएगा।
  • 2011 में भारतीयों की मध्य आयु (Median age) 24.9 वर्ष थी, जो 2036 में बढ़कर 34.5 वर्ष होना अपेक्षित है।
  • देश में शिशु मृत्यु दर (आईएमआर) में गिरावट आई है। 2009 में यह 50 थी, जबकि 2020 में यह घटकर 28 हो गई।
  • जन्म के समय जीवन प्रत्याशा 1997-2001 के 62.3 वर्ष की तुलना में 2016-20 में बढ़कर 70 वर्ष हो गई।
  • जनसंख्या में बुजुर्गों (60 वर्ष से अधिक आयु) का अनुपात 2011 के 8.4 प्रतिशत से बढ़कर 2036 में 14.9 प्रतिशत होना अपेक्षित है।
  • कुल प्रजनन दर (टीएफआर) 2020 में घटकर 2.0 हो गई, जो जनसंख्या स्थिरीकरण की दिशा में प्रगति दर्शाती है।

मध्य आयु, वह आयु है जो जनसंख्या को संख्यात्मक रूप से दो समान समूहों में विभाजित करती है, अर्थात जितने लोग मध्य आयु से अधिक आयु के होते हैं, उतने ही लोग मध्य आयु से कम आयु के होते हैं।

शिशु मृत्यु दर, एक वर्ष से कम आयु के शिशुओं की प्रति 1,000 जीवित जन्मों पर होने वाली मृत्यु की संख्या है।

जन्म के समय जीवन प्रत्याशा, वर्तमान मृत्यु दर के आधार पर, एक नवजात शिशु के जीवित रहने की अपेक्षित औसत वर्षों की संख्या है।

कुल प्रजनन दर, वर्तमान जन्म दर के आधार पर एक महिला के जीवनकाल में अपेक्षित बच्चों की औसत संख्या है। यह जनसंख्या वृद्धि या गिरावट का एक महत्वपूर्ण संकेतक है।


2. सामाजिक-आर्थिक संकेतक: सामाजिक-आर्थिक विकास किसी समुदाय या राष्ट्र की आर्थिक और सामाजिक स्थितियों को बेहतर बनाने की प्रक्रिया है। इसमें देश के भीतर सामाजिक और आर्थिक आवश्यकताओं की पहचान करना तथा ऐसी नीतियां और कार्यक्रम बनाना, जो उन आवश्यकताओं को पूरा करेंगे, शामिल हैं। समाज और आर्थिक पहलों से संबंधित नीतियों और कार्यक्रमों को विकसित करते समय सार्वजनिक मुद्दों को ध्यान में रखा जाता है।

‘सामाजिक-आर्थिक संकेतक’ विषय के अंतर्गत पर्यावरण, भौतिक संसाधन तथा अन्य बहुआयामी परिस्थितियों का वर्णन किया गया है। इसके अतिरिक्त, गहन रूप से अंतःक्रिया करने वाली वैयक्तिक विशेषताओं का भी उल्लेख किया गया है। इन बिंदुओं को ध्यान में रखते हुए, इस खंड में राज्यवार और केंद्र-शासित प्रदेशवार सामाजिक-आर्थिक स्थिति से संबंधित नवीनतम जानकारी शामिल की गई है।

इस विषय के अंतर्गत उल्लिखित कुछ महत्वपूर्ण सामाजिक-आर्थिक कारकों में साक्षरता और विद्यालय में नामांकन, विवाह की प्रभावी आयु, रोजगार की दर, घरेलू सुविधाएं, प्रति व्यक्ति अनाज और दालों की उपलब्धता और आर्थिक कारक शामिल हैं।

कुछ मुख्य अंश

  • वर्ष 2021–22 में प्राथमिक कक्षाओं में बालिकाओं का सकल नामांकन अनुपात 104.8, जबकि बालकों का 102.1 था। हालांकि, उच्चतर माध्यमिक स्तर पर पहुंचने तक यह अनुपात बालिकाओं के लिए घटकर 58 प्रतिशत और बालकों के लिए 57 प्रतिशत रह गया।
  • वर्ष 2018–20 के दौरान, देश भर में बालिकाओं की विवाह की प्रभावी औसत आयु 22 वर्ष पर स्थिर रही।
  • वर्ष 2022–23 में प्रति व्यक्ति निवल घरेलू उत्पाद सबसे अधिक कर्नाटक और तेलंगाना में दर्ज किया गया। अन्य घनी आबादी वाले राज्य, जिनका प्रति व्यक्ति निवल राज्य घरेलू उत्पाद 1,50,000 रुपये से अधिक था, में आंध्र प्रदेश, ओडिशा, तमिलनाडु, राजस्थान, पंजाब, हरियाणा और उत्तराखंड शामिल थे।
  • 2022 में प्रति व्यक्ति अनाज की उपलब्धता 460.8 ग्राम प्रतिदिन तथा दालों की उपलब्धता 53.7 ग्राम प्रतिदिन थी।
  • अप्रैल 2023 तक, 46 जिलों की 431 बस्तियों में पेयजल में अत्यधिक फ्लोराइड संदूषण पाया गया, और 22 जिलों की 612 बस्तियां आर्सेनिक संदूषण से प्रभावित थीं, ये सभी शमन उपायों के अंतर्गत शामिल थीं।

3. स्वास्थ्य स्थिति संकेतक और रुग्णता भार: 'स्वास्थ्य स्थिति संकेतक' विषय के अंतर्गत एचआईवी/एड्स, संक्रामक और गैर-संक्रामक रोगों (अर्थात रुग्णता) की समस्या तथा इन रुग्णताओं से होने वाली मृत्यु का विवरण राज्यवार, केंद्र-शासित प्रदेशवार और राष्ट्रीय स्तर पर प्रस्तुत किया गया है। किसी विशेष क्षेत्र में रुग्णता नियंत्रण कार्यक्रम लागू करने के लिए एक सशक्त दीर्घकालिक निगरानी प्रणाली अनिवार्य है।

इस खंड में, भारत में सार्वजनिक स्वास्थ्य सुविधाओं का प्रयोग करने वाली बड़ी आबादी से प्राप्त निगरानी आंकड़ों के आधार पर मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य परिदृश्य की प्रवृत्तियां और स्थिति भी सम्मिलित हैं।

कुछ मुख्य अंश

  • 2021 में, लगभग 21,43,867 रोगियों के क्षय रोग (टीबी) का निदान किया गया। इनमें से, उसी वर्ष क्षय रोग के सूक्ष्मजीव विज्ञान (Microbiologically) द्वारा पुष्ट कुल मामलों की संख्या 11,37,328 थी, जिनके उपचार की सफलता दर 82.10 प्रतिशत थी।
  • भारत के विभिन्न राज्यों में उतार-चढ़ाव के बावजूद, एचआईवी महामारी से निपटने में हमने उल्लेखनीय सफलता प्राप्त की है। इसकी व्यापकता (प्रसार) 2010–11 के 0.40 प्रतिशत से घटकर 2020–21 में 0.22 प्रतिशत हो गई; 2022 में 3.13 करोड़ से अधिक व्यक्तियों का परीक्षण किया गया।
  • 2022 में, कैंसर, मधुमेह, हृदयरोग और स्ट्रोक की रोकथाम और नियंत्रण के लिए राष्ट्रीय कार्यक्रम (National Programme for Prevention & Control of Cancer, Diabetes, Cardiovascular Diseases & Stroke-NPCDCS) के अंतर्गत 9.91 करोड़ लोगों का परीक्षण किया गया; इनमें से लगभग 75 लाख लोग अतिरक्तदाब (हाइपरटेंशन), 61 लाख लोग मधुमेह, 29 लाख लोग अतिरक्तदाब (हाइपरटेंशन) और मधुमेह दोनों, 2 लाख हृदयरोग, 1 लाख लोग स्ट्रोक और 3 लाख लोग सामान्य कैंसर से पीड़ित पाए गए।

2022 में अत्यधिक अतिसार के 5.6 मिलियन, आंत्र ज्वर के 1.23 मिलियन तथा चेचक (चिकन पॉक्स) के 27,279 मामले सामने आए।

राष्ट्रीय वेक्टर जनित रोग नियंत्रण केंद्र के अनुसार, 2022 में मलेरिया के कुल मामले घटकर 1.74 लाख रह गए, जिनमें से 64 मौतें हुईं; डेंगू के 2.8 लाख मामले दर्ज हुए, जिनमें से 485 मौतें हुईं।

मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य संकेतकों में सुधार: केरल ने 99.8 प्रतिशत की उच्चतम संस्थागत जन्म दर हासिल की, और दादरा एवं नगर हवेली में 12-23 महीने की आयु के बच्चों के लिए पूर्ण टीकाकरण की दर 94.9 प्रतिशत दर्ज की गई।


4. स्वास्थ्य वित्त संकेतक और व्यय: स्वास्थ्य प्रणालियों के सबसे महत्वपूर्ण कार्यों में से एक स्वास्थ्य देखभाल का वित्तपोषण है। यह सार्वभौमिक स्वास्थ्य कवरेज (Universal health coverage-UHC) को सक्षम बनाता है, जिससे वित्तीय सुरक्षा और प्रभावी सेवा की पहुंच में वृद्धि होती है। स्वास्थ्य वित्त संकेतकों की सहायता से चिकित्सा व्यय और स्वास्थ्य पर सार्वजनिक व्यय से संबंधित व्यापक जानकारी प्राप्त की जा सकती है। प्रभावी वित्तपोषण पर्याप्त धनराशि सुनिश्चित करने, बाधाओं को दूर करने और न्यायसंगत सेवाएं उपलब्ध कराने में सहायक होता है।

कुछ मुख्य अंश

  • यह प्राक्कलित किया गया था कि 2023-24 के लिए स्वास्थ्य पर कुल सार्वजनिक व्यय 95,719 करोड़ रुपये होगा। इसमें राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन–एनएचएम (47,347 करोड़ रुपये), स्वास्थ्य (38,828 करोड़ रुपये, और राष्ट्रीय एड्स नियंत्रण संगठन–NACO 2,917 करोड़ रुपये), स्वास्थ्य अनुसंधान विभाग (2,980 करोड़ रुपये) और आयुष (3,648 करोड़ रुपये) शामिल होंगे।
  • केंद्रीय सरकार स्वास्थ्य योजना (Central Government Health Scheme-CGHS) पर प्रति व्यक्ति व्यय में वृद्धि हुई है। 2010-11 में यह 4,050 रुपये था, जबकि 2022-23 में यह 15,260 रुपये हो गया।
  • 2009 में, कर्मचारी राज्य बीमा योजना (ESIS) पर प्रति व्यक्ति व्यय 254 रुपये था। जबकि 2022 में इसे बढ़ाकर 908 रुपये कर दिया गया, जिससे 12.04 करोड़ लाभार्थियों को शामिल किया गया।
  • 2019-20 में सकल घरेलू उत्पाद (GDP) के अनुपात में कुल स्वास्थ्य व्यय 3.27 प्रतिशत था, जिसमें कुल स्वास्थ्य व्यय में सरकारी स्वास्थ्य व्यय का हिस्सा बढ़कर 41.4 प्रतिशत हो गया।

5. स्वास्थ्य के लिए मानव संसाधन: स्वास्थ्य के लिए मानव संसाधन (Human resource for health-एचआरएच) में नियोजन, सूचना, प्रबंधन, प्रदर्शन, प्रतिधारण और मानव संसाधन पर अनुसंधान एवं विकास जैसे विभिन्न पहलू शामिल हैं। एचआरएच को सक्षम, अनुशासित और पर्याप्त संख्या में होना चाहिए ताकि वे सार्वजनिक और निजी दोनों क्षेत्रों में प्राथमिक, माध्यमिक और तृतीयक स्तर पर अपने दायित्वों का निर्वहन प्रभावी रूप से कर सकें, जैसा कि सार्वभौमिक स्वास्थ्य कवरेज प्राप्त करने के लिए यह आवश्यक है। भारत में, पिछले कुछ वर्षों में स्वास्थ्य के लिए मानव संसाधन के आकार और संरचना में उल्लेखनीय बदलाव आया है। राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन और स्वास्थ्य क्षेत्र में ऐसे अन्य सुधारों का कार्यान्वयन सार्वजनिक क्षेत्र की प्रणाली में एचआरएच को सुदृढ़ करने पर केंद्रित है।

कुछ मुख्य अंश

  • 2022 तक, महाराष्ट्र में पंजीकृत चिकित्सकों की संख्या सबसे अधिक (2,11,046) थी, उसके बाद तमिलनाडु (1,49,397), कर्नाटक (1,34,448) और आंध्र प्रदेश (1,05,804) का स्थान था।
  • 25,56,416 पंजीकृत उपचारिकाएं (Nurses) और धात्री (Midwives), 1,3,49,679 कुल पंजीकृत चिकित्सक, 2,94,102 दंत चिकित्सक, 7,55,780 आयुष चिकित्सक और 17,13,730 फार्मासिस्ट थे।
  • जून 2023 तक चिकित्सा पाठ्यक्रमों के लिए कुल 1,51,064 सीटें थीं, जिनमें से 1,04,163 सीटें एमबीबीएस के लिए थीं।

6. स्वास्थ्य अवसंरचना और सेवा वितरण: एक अन्य महत्वपूर्ण संकेतक स्वास्थ्य अवसंरचना है। इस संकेतक की मदद से, किसी देश में स्वास्थ्य सेवा वितरण के प्रावधानों और कल्याणकारी तंत्रों का विश्लेषण किया जा सकता है। पर्याप्त और सुव्यवस्थित अवसंरचना, सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं के प्रभावी वितरण के लिए अनिवार्य है और इसे 'सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली का मुख्य केंद्र' माना जाता है।

कुछ मुख्य अंश

  • हाल के दिनों में, चिकित्सा शिक्षा के बुनियादी ढांचे में तेजी से वृद्धि हुई है। 30 जून, 2023 तक, भारत में 679 मेडिकल कॉलेज थे, जिनमें से 380 कॉलेज सरकारी और 299 कॉलेज निजी क्षेत्र में थे।
  • एएनएम प्रशिक्षण के लिए 10,137 संस्थान (50,388 सीटें) और 43,735 नर्सिंग संस्थान (3,20,928 सीटें) हैं।
  • 31 मार्च, 2021 तक 1,61,829 उप-केंद्र, 31,053 प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र और 6,064 सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र थे, साथ ही 1,275 उप-मंडल अस्पताल और 767 जिला अस्पताल थे।
  • भारत में 41 सरकारी मानसिक अस्पताल और 378 नेत्र बैंक/नेत्रदान केंद्र (122 सरकारी और 256 निजी) हैं।

निष्कर्ष

राष्ट्रीय स्वास्थ्य प्रोफाइल (NHP) 2023 हमारे समाज को अधिक स्वस्थ और लचीला बनाने की दिशा में एक मार्गदर्शक के रूप में कार्य करेगा। इसमें देश के वर्तमान स्वास्थ्य सेवा परिदृश्य से संबंधित महत्वपूर्ण स्वास्थ्य आंकड़े, विश्लेषण और अंतर्दृष्टि शामिल हैं। यह रिपोर्ट साक्ष्य-आधारित नीति-निर्माण में सहायता करती है तथा सभी के लिए समान एवं सुलभ स्वास्थ्य देखभाल सुनिश्चित करने के लिए व्यापक रणनीति बनाने में सहायक है।

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