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मसौदा विधिक माप विज्ञान (भारतीय मानक समय) नियम, 2025

2025 के आरंभ में, केंद्र सरकार ने 'एक राष्ट्र, एक समय' (One Nation, One Time) की नीति के संबंध में एक महत्वपूर्ण कदम उठाया। भारत सरकार के उपभोक्ता मामले विभाग के विधिक माप विज्ञान प्रभाग (Legal Metrology Division) ने भारतीय मानक समय (आईएसटी) का मानकीकरण सुनिश्चित करने और पूरे देश में इसके अनिवार्य कार्यान्वयन के उद्देश्य से, विधिक माप विज्ञान (भारतीय मानक समय) नियम, 2025 का मसौदा अधिसूचित किया। इस व्यापक नियमावली का उद्देश्य भारतीय मानक समय (आईएसटी) को पूरे देश में एक समान रूप से अपनाए जाने वाले मानक समय के रूप में मान्यता प्रदान करना है। इस पहल के पीछे सरकार का मुख्य लक्ष्य प्रशासनिक, विधिक, वित्तीय और प्रौद्योगिकी जैसे विभिन्न क्षेत्रों में समय का सामंजस्य स्थापित करना है, ताकि संपूर्ण देश में समय का सटीक पालन और प्रभावी समन्वय सुनिश्चित किया जा सके।


माप विज्ञान (Metrology) विज्ञान की वह शाखा है जो मापन से संबंधित है। इसका मुख्य उद्देश्य मानकीकृत इकाइयों की स्थापना, अनुरक्षण और अनुप्रयोग के माध्यम से माप से संबंधित उपकरणों एवं प्रणालियों की सटीकता, विश्वसनीयता और एकरूपता सुनिश्चित करना है।

विधिक माप विज्ञान (Legal metrology) का तात्पर्य, व्यापार और सार्वजनिक लेन-देन में निष्पक्षता, सुरक्षा और उपभोक्ता संरक्षण सुनिश्चित करते हुए मापन और माप उपकरणों से संबंधित विधिक मानकों और विनियमों के प्रवर्तन से है।


परियोजना का उद्देश्य

यह परियोजना भारत सरकार के उपभोक्ता मामले विभाग द्वारा राष्ट्रीय भौतिक प्रयोगशाला (एनपीएल) और भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) के सहयोग से प्रारंभ की गई है। यह परियोजना भारतीय मानक समय (आईएसटी) को मिलिसेकंड से माइक्रोसेकंड तक की सटीकता के साथ प्रसारित करने पर केंद्रित है, ताकि समय-सामंजस्य में अधिकतम सटीकता सुनिश्चित हो सके। इस उद्देश्य की प्राप्ति हेतु भारत के विभिन्न क्षेत्रों में स्थापित पांच विधिक माप विज्ञान प्रयोगशालाओं में एक ठोस अवसंरचना विकसित की जा रही है। वर्तमान में समय का सटीक समन्वय कई महत्वपूर्ण क्षेत्रों, जैसे—दूरसंचार, नेविगेशन, बैंकिंग, विद्युत ग्रिड प्रबंधन, डिजिटल गवर्नेंस और वैज्ञानिक अनुसंधान, के लिए अत्यंत आवश्यक है। इसमें गुरुत्वाकर्षण तरंगों का पता लगाना और गहन-अंतरिक्ष मिशन भी शामिल हैं।

वर्तमान में अनेक दूरसंचार सेवा प्रदाता (टीएसपी) और इंटरनेट सेवा प्रदाता (आईएसपी) ग्लोबल पोजिशनिंग सिस्टम (जीपीएस) जैसे विदेशी स्रोतों पर निर्भर हैं, जिसके परिणामस्वरूप साइबर सुरक्षा संबंधी जोखिम उत्पन्न होते हैं और रणनीतिक अर्थव्यवस्था संकट में आ जाती है। इस भेद्यता को दूर करने के लिए यह परियोजना सभी कालाश्रित प्रणालियों में भारतीय मानक समय (आईएसटी) को अपनाना अनिवार्य बनाती है।


भारतीय मानक समय (आईएसटी) 82°30′ पूर्वी देशांतर पर स्थित है, जो उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर के निकट से गुजरता है। यह ग्रीनविच माध्य समय (जीएमटी) अथवा समन्वित सार्वभौमिक समय (यूटीसी) से 5 घंटे 30 मिनट आगे है।

0° देशांतर रेखा पर स्थित प्रमुख याम्योत्तर, जो ग्रीनविच, इंग्लैंड, से होकर गुजरता है, को वैश्विक समय का मानक निर्देशांक माना जाता है।

चूंकि पृथ्वी 24 घंटे में 360° घूमती है—अर्थात प्रति घंटे 15° या हर 4 मिनट में 1°— इसलिए सभी देश इसी रेखा से निश्चित अंतराल पर अपने मानक टाइम जोन निर्धारित करते हैं।

भारत द्वारा 82°30’ पूर्वी देशांतर को अपनाया गया है, जो पूरे देश में एक समान समय सुनिश्चित करता है।


भारतीय मानक समय (आईएसटी) को अनिवार्य करने के लिए बनाए गए नियम

भारतीय मानक समय (आईएसटी) के साथ समन्वय सुनिश्चित करने हेतु विधिक रूप से लागू किए जा सकने वाले एक ढांचे के निर्माण के लिए एक उच्चस्तरीय अंतर-मंत्रालयी समिति का गठन किया गया। उपभोक्ता मामले विभाग के सचिव की अध्यक्षता में गठित इस समिति में दूरसंचार, रेलवे और वित्तीय सेवाओं जैसे महत्वपूर्ण सरकारी विभागों के मंत्रियों सहित आईआईटी कानपुर, राष्ट्रीय भौतिक प्रयोगशाला (एनपीएल), राष्ट्रीय सूचना विज्ञान केंद्र (एनआईसी), भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो), भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (सेबी) तथा कंप्यूटर इमरजेंसी रिस्पॉन्स टीम-इंडिया (CERT-In) जैसे प्रमुख संस्थानों के प्रतिनिधि भी शामिल थे।

समिति के अधिदेश में विधिक मापविज्ञान अधिनियम, 2009 के अंतर्गत विनियमों का मसौदा तैयार करना शामिल था। उक्त अधिनियम में निम्नलिखित से संबद्ध प्रावधान हैं:

  • राष्ट्रव्यापी स्तर पर आईएसटी को अपनाने के लिए विधिक अधिकारियों को नियुक्ति;
  • डिजिटल और संचार प्रणालियों में समय के समन्वयन के लिए दिशानिर्देश;
  • साइबर सुरक्षा और टाइम स्टैम्पिंग के लिए कठोर ढांचा; और
  • आधुनिक तकनीकों और अवसंरचना के माध्यम से यह जांच करना कि आईएसटी प्रसार परियोजना सफलतापूर्वक लागू हुई है या नहीं।

समय समन्वयन ढांचा

2025 के मसौदा नियमों के अनुसार, आईएसटी का प्रयोग अनिवार्य है। आईएसटी, यूटीसी से 5 घंटे 30 मिनट आगे है। आईएसटी के संरक्षक के रूप में, आईएसटी की यूटीसी से अनुरेखणीयता को बनाए रखने और इसे सुनिश्चित करने के लिए वैज्ञानिक तथा औद्योगिक अनुसंधान परिषद्–राष्ट्रीय भौतिक प्रयोगशाला (CSIR-NPL) जिम्मेदार है। नियमों में समय की मूल इकाई सेकंड को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्वीकृत परमाणु घड़ी सीजियम-133 के मानक के रूप में परिभाषित किया गया है। समय का समन्वय नेटवर्क टाइम प्रोटोकॉल (NTP) और प्रिसीजन टाइम प्रोटोकॉल (PTP) के माध्यम से किया जाना चाहिए। इसके साथ ही, आधुनिक अवसंरचना जैसी भूमि-आधारित समय विभाजन प्रणालियां तथा "नेविगेशन विद इंडियन कॉन्स्टेलेशन" (NaVIC) उपग्रह के संकेतों का प्रयोग विश्वसनीयता बढ़ाने के लिए किया जाएगा, विशेषकर बाधाओं या साइबर घटनाओं की स्थिति में। वैकल्पिक समय संकेतों का प्रयोग निषिद्ध है, जब तक कि इसके लिए स्पष्ट रूप से अनुमति न दी गई हो। इसका उद्देश्य एकरूपता सुनिश्चित करना और समय के अनधिकृत स्रोतों के प्रयोग से उत्पन्न होने वाली विसंगतियों को समाप्त करना है।

नियमों के कुछ प्रमुख उपबंध

  • भारत में किए जाने वाले सभी प्रकार के, जैसे—वाणिज्यिक, कानूनी, वित्तीय और प्रशासनिक, लेन-देन में आईएसटी को अपनाना अनिवार्य होगा। आईएसटी समय के आधिकारिक संकेत के रूप में कार्य करेगा। इससे न केवल समय निर्धारण की विसंगतियां दूर होंगी, बल्कि पूरे देश में और अधिक एकरूपता और सटीकता के साथ समय का समन्वयन भी सुनिश्चित होगा।
  • समय को दर्शाने के लिए मानक प्रारूप है
    • दिनांक और समय: DD-MM-YYYY, HH:MM:SS;
    • केवल समय: HH:MM:SS.
  • सभी सरकारी कार्यालयों और सार्वजनिक संस्थानों में प्रयुक्त समय-निर्धारण उपकरणों में आईएसटी प्रदर्शित किया जाना अनिवार्य होगा। सभी क्षेत्रों में आईएसटी का समुचित समन्वय सुनिश्चित करने हेतु आधुनिक तकनीकों, अर्थात तुल्यकालन-एनटीपी (NTP) और पीटीपी (PTP) जैसे प्रोटोकॉल का प्रयोग किया जाएगा।
  • यद्यपि आईएसटी को समय के प्राथमिक संकेत के रूप में अपनाया जाएगा, तथापि अन्य टाइम जोन्स को भी केवल सूचना के उद्देश्य से प्रदर्शित किया जा सकेगा। यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि इन्हें आईएसटी के साथ ही प्रदर्शित और उचित रूप से लेबल किया गया हो।
  • चूंकि समय के समन्वय के लिए बड़े पैमाने पर डिजिटल प्रणालियों का प्रयोग आवश्यक है, इसलिए साइबर सुरक्षा उपायों को अपनाना अनिवार्य है, ताकि स्पूफिंग, जैमिंग और समय-समन्वयन विभाजन प्रणालियों पर होने वाले साइबर हमलों जैसे खतरों को रोका जा सके।
  • नाविक (NavIC) के संकेतों और भूमि-आधारित समय विभाजन प्रणालियों जैसे बैकअप तंत्रों का प्रयोग अनिवार्य है। व्यवधानों की स्थिति में इनका प्रयोग अत्यंत आवश्यक है, ताकि सटीकता और विश्वसनीयता सुनिश्चित की जा सके। इसके अतिरिक्त, साइबर सुरक्षा उपायों और वैकल्पिक संदर्भ तंत्रों का भी प्रयोग किया जाना चाहिए, जिससे प्रणाली में लचीलापन लाया जा सके।
  • हालांकि, कुछ अपवाद भी हैं। विशेष परिस्थितियों में, जैसे खगोल विज्ञान, वैज्ञानिक अनुसंधान और नौवहन के क्षेत्रों में, आईएसटी में परिवर्तन की अनुमति दी जा सकती है, परंतु केवल पूर्व अनुमोदन प्राप्त करने के बाद और सरकार द्वारा निर्धारित दिशानिर्देशों के अनुरूप ही।
  • अनुपालन और आवधिक लेखापरीक्षा की एक कठोर प्रणाली स्पष्ट रूप से परिभाषित की गई है। इससे आईएसटी मानकों का अनुपालन सुनिश्चित होगा। इसके अलावा, समकालिकता और रिपोर्टिंग प्रणालियों में सटीकता के आकलन हेतु विस्तृत मानकों वाले कुछ परामर्श प्रकाशित किए जाएंगे।
  • नियमों का कोई भी उल्लंघन जुर्माना और अनुशासनात्मक कार्रवाई, दोनों के रूप में दंडनीय होगा। विधिक मापविज्ञान अधिनियम (Legal Metrology Act) के अंतर्गत संबद्ध अधिकारियों को दंड निर्धारित करने का अधिकार दिया गया है।
  • इन नियमों के प्रभावी क्रियान्वयन को सुनिश्चित करने हेतु केंद्र सरकार द्वारा कुछ अतिरिक्त दिशानिर्देश और परामर्शिकाएं जारी की जाएंगी। ये दिशानिर्देश निगरानी तंत्र, समय-समन्वयन विधियों और समय के सटीक मानकों से संबंधित होंगे।
  • समन्वय की प्रणाली, सटीकता के मानक और क्रियान्वयन हेतु दिशानिर्देश निर्धारित किए गए हैं। इसके परिणामस्वरूप, पूरे देश में आईएसटी के साथ संरेखण सुनिश्चित होता है और साथ ही साइबर सुरक्षा, परिचालन दक्षता तथा सुशासन को प्रोत्साहन मिलता है।
  • आपातकालीन प्रतिक्रिया समन्वय को सुदृढ़ किया गया है; सटीक वित्तीय लेन-देन सुनिश्चित हुए हैं; और सार्वजनिक परिवहन की नियमित समय-सारणी को लागू किया गया है। इसके अतिरिक्त, प्रलेखन और अभिलेखों के रखरखाव हेतु समय के सुसंगत मानक स्थापित किए गए हैं, जिससे विधिक एवं विनियामक अनुपालन सुनिश्चित होता है।
  • औद्योगिक परिचालन को बेहतर एकीकृत प्रौद्योगिकी, समन्वित विनिर्माण पद्धतियों और उच्चतर वैश्विक प्रतिस्पर्धात्मकता से लाभ मिलेगा।
  • अभिलेखों का सटीक रखरखाव सुनिश्चित होगा तथा राष्ट्रीय अवसंरचना और संचार नेटवर्क के समन्वयन हेतु एक महत्वपूर्ण तंत्र कुशलतापूर्वक स्थापित किया जाएगा।

विश्व माप विज्ञान दिवस 2025: भारत द्वारा अनुपालन और योगदान

भारत सरकार के उपभोक्ता मामले विभाग द्वारा 20 मई, 1875 को पेरिस में हस्ताक्षरित मीटर कन्वेंशन की 150वीं वर्षगांठ के उपलक्ष्य में विश्व मापविज्ञान दिवस 2025 का आयोजन किया गया। इस ऐतिहासिक समझौते ने मापन मानकों में वैश्विक एकरूपता सुनिश्चित मीट्रिक प्रणाली की नींव रखी। उल्लेखनीय है कि भारत 1956 में बाट एवं माप मानक अधिनियम (Standards of Weights and Measures Act) को अधिनियमित करने के उपरांत 1957 में मीटर कन्वेंशन में शामिल हुआ था।

इंटरनेशनल कमेटी फॉर वेट एंड मेजर्स (International Committee for Weights and Measures-CIPM) द्वारा 1999 में प्रारंभ की गई इस पहल का उद्देश्य विज्ञान और समाज में माप विज्ञान की महत्वपूर्ण भूमिका का प्रचार करना है। वर्ष 2025 की थीम Measurement for all times, for all people जीवन के सभी क्षेत्रों में—अतीत से लेकर भविष्य तक—मापन की प्रासंगिकता को रेखांकित करती है।


निष्कर्ष

विधिक माप विज्ञान (आईएसटी) नियम, 2025 का मसौदा भारत में समय प्रबंधन में क्रांतिकारी बदलाव लाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। इन नियमों के माध्यम से, सरकार की प्रवर्तन गतिविधियां और प्रशासनिक कार्य अधिक कुशल, सटीक और समन्वित रूप से संपादित किए जा सकेंगे। दूरसंचार, बैंकिंग, 5जी तकनीक, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और इंटरनेट ऑफ थिंग्स जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों की सटीकता में सुधार होगा। इन नियमों के कार्यान्वयन से न केवल विभिन्न क्षेत्रों में समय निर्धारण में एकरूपता सुनिश्चित होगी, बल्कि तकनीकी प्रगति, आर्थिक दक्षता और सामरिक सुरक्षा का मार्ग भी प्रशस्त होगा।

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