मई 2025 में प्रकाशित और समुद्री वैज्ञानिकों द्वारा किए गए एक अध्ययन के अनुसार, पिछले 20 वर्षों में विश्व भर में 20 प्रतिशत से अधिक महासागर में, अर्थात 75 मिलियन वर्ग किमी. से अधिक क्षेत्र में, दीप्ति ह्रास हुआ है। अर्थात, महासागरों के प्रकाशीय क्षेत्रों में पहले की तुलना में अत्यधिक कमी आई है।
यह शोध यूनिवर्सिटी ऑफ प्लायमाउथ में कार्यरत समुद्री जीवविज्ञानी थॉमस डेविस और यूनिवर्सिटी ऑफ एक्सेटर में कार्यरत समुद्री जैव-भू-रसायनज्ञ टिम स्मिथ द्वारा किया गया था। उन्होंने इस बात पर बल दिया कि यद्यपि वैज्ञानिक समुद्र में दीप्ति ह्रास होने और उसके परिणामों से अवगत हैं, तथापि समुद्र में दीप्ति ह्रास होने की वास्तविक सीमा का आकलन करना अभी शेष है।
महासागरीय दीप्ति ह्रास का अर्थ
महासागरीय दीप्ति ह्रास का अर्थ है कि महासागर का प्रकाशीय क्षेत्र संकुचित या कम होता जा रहा है। इसके कारण सौरप्रकाश महासागर में गहराई तक नहीं पहुंच पा रहा, जिससे महासागर में पाए जाने वाले वे पारिस्थितिक तंत्र प्रभावित हो रहे हैं जो सौरप्रकाश पर निर्भर हैं, साथ ही महासागर के भीतर होने वाली प्रकाश-संश्लेषण की प्रक्रिया भी प्रभावित हो रही है।
प्रकाशीय क्षेत्र क्या है
प्रकाशीय क्षेत्र में महासागर का सूर्यदीप्त जल शामिल है जहां 90 प्रतिशत समुद्री जीव फलते-फूलते और निवास करते हैं। दूसरे शब्दों में, इस क्षेत्र में समुद्र की ऊपरी सतह का जल शामिल है जो सौरप्रकाश प्राप्त करता है। इस क्षेत्र में रहने वाले समुद्री जीव सौरप्रकाश और चंद्रमा की रोशनी के साथ अभिक्रिया करते हैं, और इस प्रकार पृथ्वी पर पारिस्थितिक संतुलन बनाए रखने में योगदान देते हैं।
इस क्षेत्र के उथले या अगभीर भागों में मुख्य रूप से केल्प, समुद्री घास और पादप प्लवक (फाइटोप्लैंक्टन) जैसे प्राथमिक उत्पादक शामिल हैं जो सौर ऊर्जा का प्रयोग कर प्रकाश-संश्लेषण की प्रक्रिया को पूरा करते हैं। मछली, परुषकवची (क्रस्टेशियन), प्रवाल और समुद्री स्तनधारी जैसे अन्य समुद्री जीव भी इस क्षेत्र में रहते हैं, जैसा कि वे प्राथमिक उत्पादकों पर निर्भर होते हैं।
प्रकाशीय क्षेत्रों में संकुचन: वैज्ञानिकों के अनुसार, प्रकाशीय क्षेत्र का विस्तार समुद्र की सतह से 200 मीटर नीचे तक है। समुद्री जल के इस क्षेत्र में अपरिमित समुद्री पारिस्थितिक तंत्र मौजूद हैं।
हालांकि, शोध के अनुसार, प्रकाशीय क्षेत्र में कुछ चिंताजनक परिवर्तन हुए हैं। शोध में कहा गया है कि विश्व भर के महासागरों के महत्वपूर्ण प्रकाशीय क्षेत्रों में अत्यधिक कमी आई है। महासागरों का यह अंधकारमय क्षेत्र दक्षिण अमेरिका के क्षेत्रफल से भी बड़ा है। विश्व के सभी महासागरों में महत्वपूर्ण समुद्री प्रकाश के कम होने के कारण, महासागरों में रहने वाले समुद्री जीवों के लिए संकट उत्पन्न हो गया है।
शोध के निष्कर्ष
डेविस के अनुसार, पूर्ववर्ती शोधों से ज्ञात होता है कि पिछले दो दशकों में समुद्र की सतह का रंग, संभवतः परिवर्तित प्लवक समूहों के कारण, बदल गया है। डेविस और स्मिथ द्वारा किए गए शोध में यह स्पष्ट हुआ कि ऐसे परिवर्तन बड़े पैमाने पर महासागर में दीप्ति ह्रास हेतु उत्तरदायी थे। परिणामस्वरूप, समुद्र की सतह पर आने वाले सौरप्रकाश और चंद्रमा के प्रकाश की सहायता से जीवित रहने और प्रजनन करने वाले समुद्री जीवों के लिए समुद्र की सतह सीमित हो गई है। फलस्वरूप, उन्हें उपलब्ध संसाधनों के लिए प्रतिस्पर्धा करनी होगी।
जब डेविस और स्मिथ ने 2003 से 2022 के बीच की अवधि के लिए नेशनल एयरोनॉटिक्स एंड स्पेस एडमिनिस्ट्रेशन (NASA) के ओशन कलर वेब से प्राप्त संख्यात्मक प्रतिमानों और उपग्रह आंकड़ों का एक साथ अध्ययन किया, तो प्रकाशीय क्षेत्र की गहनता का एक विशिष्ट स्वरूप सामने आया। यह स्वरूप दर्शाता है कि अधिकतर समुद्री जीवों के आवास सीमित क्षेत्र में हैं। ये आवास दिन-प्रतिदिन निरंतर सीमित होते जा रहे हैं।
इन आंकड़ों के विश्लेषण से समुद्री जल की वह गहराई भी ज्ञात हुई जहां सौरप्रकाश पहुंचता है। शोध के अनुसार, प्रकाशीय क्षेत्रों की गहराई में नाटकीय रूप से कमी देखी गई। इसका अर्थ है कि विश्व के महासागरों के कुल जल के लगभग 9 प्रतिशत भाग में प्रकाशीय क्षेत्र की गहराई 50 मीटर से अधिक कम हो गई है। यह अत्यंत आश्चर्य का विषय है कि कुल समुद्री जल के 2.6 प्रतिशत भाग में प्रकाशीय क्षेत्र की गहराई में 100 मीटर से अधिक की कमी आ गई है।
स्मिथ के अनुसार, 24 घंटों की अवधि में समुद्री जल में प्रकाश के स्तर में अत्यधिक परिवर्तन होता है। प्रकाश की मौजूदगी में होने वाली प्रक्रियाएं और परिवर्तन उन समुद्री जीवों को सबसे अधिक प्रभावित करते हैं जो प्रकाश पर निर्भर हैं। यह स्थिति दर्शाती है कि महासागर कितना गतिशील है।
महासागरों में दीप्ति ह्रास के कारण
जब अवसाद, प्लवक, कार्बनिक पदार्थ और अन्य घुलनशील पदार्थ समुद्र के जल पर पड़ने वाले सौरप्रकाश के मार्ग में आते हैं, तो इससे महासागर में दीप्ति ह्रास की स्थिति उत्पन्न होती है। ये पदार्थ समुद्र की सतह पर प्रकीर्णित होकर और प्रकाश को अवशोषित कर अंतर्जलीय सौरप्रकाश को मंद कर देते हैं। शोधकर्ताओं के अनुसार, तटीय क्षेत्रों के निकटवर्ती जल में दीप्ति ह्रास के मुख्य कारण मूसलाधार वर्षा और कृषि अपवाह हैं। परिणामस्वरूप, अत्यधिक मात्रा में अवसाद और पोषक तत्व तटों के निकट एकत्रित हो जाते हैं।
खुले समुद्री जल वाले क्षेत्रों में, दीप्ति ह्रास का मुख्य कारण महासागर की सतह का तापमान, समुद्री धाराओं में परिवर्तन और शैवालों का इधर-उधर उगना है। ऐसे क्षेत्रों में अंटार्कटिक महासागर, आर्कटिक महासागर, और गल्फ स्ट्रीम से प्रभावित क्षेत्र शामिल हैं। ये क्षेत्र, जलवायु परिवर्तन के कारण, अपने जल में दीप्ति ह्रास के प्रति अधिक संवेदनशील हो गए हैं।
महासागरों में दीप्ति ह्रास के परिणाम
सूर्य द्वारा प्रदत्त या चंद्रमा द्वारा परावर्तित प्राकृतिक प्रकाश समुद्री जीवों के लिए कई प्रकार से उपयोगी होता है। पादप प्लवक, जो प्राथमिक उत्पादक है, केवल सौरप्रकाश की उपस्थिति में ही प्रकाश-संश्लेषण कर सकता है। यह समुद्री खाद्य जाल का आधार बनाता है। अन्य समुद्री जीवों को अपने महत्वपूर्ण कार्यों, जैसे अंडे देना, शिकार करना एवं प्रवास, के लिए सौरप्रकाश या चंद्र किरण की आवश्यकता होती है।
दिवानिश सामूहिक प्रवास (डाइल वर्टिकल माइग्रेशन—सतह और गहरे जल के बीच समुद्री एवं मीठे पानी के जीवों की समन्वित दैनिक गतिविधि), उल्लेखनीय प्रवासों में से एक है। यह समुद्र के भीतर प्रवास की प्रतिदिन होने वाली सबसे बड़ी घटना है। रात होते ही, अरबों समुद्री जीव और उनकी कई प्रजातियां प्रचुर मात्रा में प्लवक का संभरण करने और अंधेरे में शिकारियों से छिपने के लिए समुद्र की सतह पर ऊपर की ओर पलायन करती हैं। हालांकि, जैसे ही सूर्योदय होता है, वे शिकारियों से बचने के लिए गहन समुद्र के जल में वापस चली जाती हैं। यह प्रवास विश्व के महासागरों की पारिस्थितिकी को बनाए रखने के लिए महत्वपूर्ण है। सीमित प्रकाशीय क्षेत्र के कारण, इन छोटे जीवों को तंग जगहों के प्रति अनुकूल होना पड़ता है और उपलब्ध सीमित भोजन के लिए संघर्ष करना पड़ता है। इससे उनके आवास को भी खतरा हो सकता है।
इसके अलावा, समुद्री जल में कम प्रकाश के कारण प्रवाल भित्तियों और अन्य समुद्री जीवों के प्रजनन की प्रक्रिया बाधित हो सकती है। यह एक महत्वपूर्ण प्रक्रिया है जिसमें ये समुद्री जीव चंद्रमा के प्रकाश में प्रजनन करते हैं। किंतु अपर्याप्त चंद्र किरण या उसकी अनुपस्थिति में, ये जीव ठीक से प्रजनन नहीं कर पाते और उनकी आबादी कम होने लगती है।
समुद्री जल में प्रकाश की स्थिति पर निर्भर रहने वाले समुद्री जीवों को कम प्रकाशीय क्षेत्रों की दशा में समुद्री जल की सतह के पास एकत्रित होना पड़ता है। परिणामस्वरूप, वे भोजन और अस्तित्व के लिए तीव्र प्रतिस्पर्धा करते हैं, जिससे समुद्री पारिस्थितिक तंत्र अत्यधिक परिवर्तित हो सकता है।
अलग-अलग समुद्री प्रजातियों को प्रभावित करने के अलावा, ये प्रकाशीय क्षेत्र विश्व भर में समुद्री उत्पादकता और कार्बन चक्रण, जो पृथ्वी पर जलवायु को बनाए रखते हैं, में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। प्रकाश क्षेत्र के संकुचन से प्राथमिक उत्पादकों की उत्पादकता प्रभावित हो सकती है, जो मछलियों के लिए अपर्याप्त हो सकती है। मत्स्य उत्पादन कम होने से, मनुष्य और मत्स्यभोजी अन्य जानवर प्रभावित हो सकते हैं।
इसके अलावा, प्रकाशीय क्षेत्र में संकुचन समुद्री रसायन विज्ञान को प्रभावित कर सकता है, जिससे ऑक्सीजन और पोषक चक्रों के स्तर में बदलाव आ सकता है। इससे समुद्री पारिस्थितिक तंत्र को नुकसान पहुंच सकता है, जैव विविधता जोखिम में पड़ सकती है और वैश्विक पारिस्थितिक तंत्र बाधित हो सकते हैं।
इसके विपरीत, हालिया अध्ययन से यह भी ज्ञात होता है कि वैश्विक महासागरीय जल के कुछ हिस्से प्रदीप्त या चमकीले हो गए हैं। उदाहरणार्थ, यह पाया गया कि विश्व के लगभग 10 प्रतिशत महासागर, अर्थात 37 मिलियन वर्ग किमी. क्षेत्र, में प्रकाशीय क्षेत्र संकुचित हो गए हैं।
निष्कर्ष
अंततः, शोधकर्ताओं ने बल देकर कहा कि महासागरों की निगरानी एक नियमित गतिविधि होनी चाहिए। इसके अलावा, विश्व भर के लोगों को इस घटना के बारे में जागरूक किया जाना चाहिए ताकि समुचित एवं समय पर उपाय किए जा सकें। जलवायु परिवर्तन से निपटने, अवसाद और पोषक तत्वों के अपवाह को नियंत्रित करने और महासागरों की निगरानी में सुधार करने के साथ-साथ वैश्विक सहयोग प्राप्त कर, महासागरों में दीप्ति ह्रास की समस्या से निपटा जा सकता है और इस प्रकार समुद्री पारिस्थितिक तंत्रों का संरक्षण किया जा सकता है।
© Spectrum Books Pvt. Ltd.



