20 नवम्बर, 2024 को अजरबैजान के बाकू में आयोजित वार्षिक यूएन क्लाइमेट कॉन्फ्रेंस में क्लाइमेट चेंज परफॉर्मेंस इंडेक्स (सीसीपीआई) 2025 की रिपोर्ट जारी की गई। इसे जर्मनवॉच, न्यूक्लाइमेट इंस्टिट्यूट और क्लाइमेट एक्शन नेटवर्क इंटरनेशनल जैसे थिंक टैंक्स [विशेषज्ञों का एक शोध संगठन जो वस्तुनिष्ठ शोध और विश्लेषण करता है] द्वारा प्रकाशित किया जाता है। सीसीपीआई एक स्वतंत्र दस्तावेज है जो जलवायु शमन के लिए 63 देशों और यूरोपीय संघ (ईयू) द्वारा किए गए प्रयासों की निगरानी करता है। 2005 में जारी अपने पहले वार्षिक प्रकाशन के बाद से, सीसीपीआई ने आकलन से संबद्ध देशों और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर महत्वपूर्ण सार्वजनिक और राजनीतिक बहस शुरू की है। यह वैश्विक स्तर पर जलवायु से संबंधित नीति में पारदर्शिता बढ़ाता है और सभी देशों में जलवायु शमन हेतु की गई प्रगति की तुलना करने की सुविधा देता है।
जलवायु परिवर्तन के लिए किए गए कार्यों के प्रदर्शन का मूल्यांकन चार क्षेत्रों में किया जाता है: (i) ग्रीनहाउस गैस (जीएचजी) उत्सर्जन जो कुल स्कोर का 40 प्रतिशत है; (ii) नवीकरणीय ऊर्जा जो कुल स्कोर का 20 प्रतिशत है; (iii) ऊर्जा उपयोग जो कुल स्कोर का 20 प्रतिशत है; और (iv) जलवायु नीति जो कुल स्कोर का 20 प्रतिशत है। मूल्यांकन का लगभग 80 प्रतिशत अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (आईईए), प्राइमैप (पीआरआईएमएपी), खाद्य एवं कृषि संगठन (एफएओ), और यूनाइटेड नेशन्स फ्रेमवर्क कन्वेंशन ऑन क्लाइमेट चेंज (यूएनएफसीसीसी) को प्रस्तुत राष्ट्रीय जीएचजी सूची (इन्वेंट्री) के मात्रात्मक आंकड़ों पर आधारित होता है। इस मूल्यांकन से संबद्ध शेष 20 प्रतिशत विश्व भर के 450 विशेषज्ञों, जिनमें नागरिक समाज, थिंक टैंक और शोध संस्थानों के ऊर्जा विशेषज्ञ शामिल होते हैं, के अपने वार्षिक सर्वेक्षण से प्राप्त आंकड़ों पर आधारित होता है।
प्राइमैप (पीआरआईएमएपी), पॉट्सडैम रीयल-टाइम इंटिग्रेटेड मॉडल फॉर द प्रॉबबिलिस्टिक असेसमेंट को निरूपित करता है। यह जलवायु संबंधी अध्ययनों में ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन, जलवायु नीतियों और उत्सर्जन की भावी संभावनाओं का मूल्यांकन करने के लिए प्रयोग किया जाने वाला एक फ्रेमवर्क अर्थात ढांचा है। व्यापक रूप से, पीआरआईएमएपी को साधनों एवं मॉडलों के एक समूह के रूप में देखा जा सकता है जिसका प्रयोग अंतरराष्ट्रीय जलवायु नीति के लिए पृथ्वी प्रणाली विज्ञान और उसकी अनिश्चितताओं को व्यक्त करने के लिए किया जाता है।
सीसीपीआई 2025 के समग्र परिणाम
- कोई भी देश सभी श्रेणियों में इतना उत्कृष्ट प्रदर्शन नहीं कर पाया कि उसे समग्र रूप से बहुत उच्च रेटिंग प्राप्त हो सके, जिससे शीर्ष तीन स्थानों पर किसी देश को नहीं रखा गया। डेनमार्क इस सूचकांक में सर्वोच्च रैंक प्राप्त करने वाला देश बना हुआ है। हालांकि, इसे समग्र रूप से अति उच्च रेटिंग प्राप्त नहीं हुई है।
- उच्च प्रदर्शन करने वाले G20 देशों में से केवल यूनाइटेड किंगडम (यूके) छठे स्थान पर और भारत दसवें स्थान पर हैं। G20 में शामिल 14 देशों को निम्न या अत्यंत निम्न रेटिंग प्राप्त हुई है।
- G20 जलवायु शमन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है, क्योंकि इसके सदस्य वैश्विक ग्रीन हाउस गैस उत्सर्जन के 75 प्रतिशत से अधिक के लिए जिम्मेदार हैं। सबसे निम्न स्थान प्राप्त करने वाले चार देश ईरान (67वां), सऊदी अरब (66वां), संयुक्त अरब अमीरात (65वां) और रूस (64वां) हैं—ये सभी विश्व के सबसे बड़े तेल और गैस उत्पादक देशों में से हैं।
- G20 में शामिल दक्षिण कोरिया (63वां), रूस (64वां) और सऊदी अरब (66वां) सबसे खराब प्रदर्शन करने वाले देश बने हुए हैं, जिन्हें कुल मिलाकर अत्यंत निम्न रेटिंग मिली है।
- यूरोपीय संघ 17वें स्थान पर गिर गया है और उसकी कुल रैंकिंग मध्यम बनी हुई है। यूरोपीय संघ के 16 देशों को उच्च या मध्यम प्रदर्शन करने वाले देशों की श्रेणी में रखा गया है, जिनमें डेनमार्क चौथे और नीदरलैंड पांचवें स्थान पर है, जो समग्र रैंकिंग में सबसे ऊपर है। जलवायु नीति में बेहतर प्रदर्शन के कारण पोलैंड 47वें स्थान पर पहुंच गया है, जबकि फिनलैंड 11 स्थान गिरकर 37वें स्थान पर आ गया है, जिसका मुख्य कारण इसकी कमजोर जलवायु नीति के परिणाम हैं। पिछले संस्करणों के विपरीत, यूरोपीय संघ के किसी भी देश को कुल मिलाकर अत्यंत निम्न रेटिंग नहीं मिली, बुल्गारिया 50वें स्थान पर सबसे खराब प्रदर्शन करने वाला देश रहा।
- अर्जेंटीना (59वें स्थान पर), जो COP29 से अलग हो गया और 2015 के पेरिस समझौते से भी बाहर हो सकता है, इस वर्ष के सूचकांक में सबसे अधिक नुकसान उठाने वालों देशों में से एक है। इसके नवनिर्वाचित राष्ट्रपति ने, मानवजनित जलवायु परिवर्तन को वैज्ञानिक सहमति के विपरीत जाकर, नकार दिया है।
- विश्व का सबसे बड़ा उत्सर्जक चीन 55वें स्थान पर है, जो अत्यंत निम्न स्तर पर पहुंच गया है। आशाजनक योजनाओं, रुझानों एवं उपायों के बावजूद, एशिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था वाला देश चीन कोयले पर अत्यधिक निर्भर है और इसके पास जलवायु सुधार संबंधी लक्ष्यों का पर्याप्त अभाव है।
- दूसरा सबसे बड़ा उत्सर्जक अमेरिका, अत्यधिक खराब प्रदर्शन करने वाले देशों में 57वें स्थान पर बना हुआ है।
क्षेत्रवार परिणाम
1. ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन: खतरनाक जलवायु परिवर्तन की रोकथाम का एकमात्र उपाय ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में अत्यधिक कमी लाना है। 2025 तक वैश्विक उत्सर्जन अपने चरम पर पहुंच सकता है और इसे 2030 तक, 2020 के स्तर की तुलना में, आधे से भी कम होना चाहिए। सूचकांक में शामिल सभी देशों के प्रदर्शन का निरीक्षण सीसीपीआई के ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन संबंधी चार संकेतकों के आधार पर किया गया।
इस श्रेणी में उच्च रेटिंग के साथ लक्जमबर्ग, स्वीडन और चिली शीर्ष पर हैं, जबकि ईरान, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात सबसे खराब प्रदर्शन करने वाले देश हैं।
यूके और भारत ही ऐसे G20 देश हैं जिन्हें समग्र रूप से उच्च रेटिंग प्राप्त हुई है। कनाडा, चीन और रूस सहित सात G20 देश बहुत खराब प्रदर्शन करने वालों में शामिल हैं, जबकि अधिकांश G20 देशों को निम्न या अत्यंत निम्न रेटिंग प्राप्त हुई है। सऊदी अरब लगातार सबसे खराब प्रदर्शन करने वाला G20 सदस्य देश बना हुआ है।
पूर्ववर्ती वर्षों की भांति, यूरोपीय संघ ने अपने समग्र प्रदर्शन के लिए मध्यम रेटिंग बरकरार रखी है, लेकिन 31वें स्थान पर खिसक गया है। लक्जमबर्ग यूरोपीय संघ का श्रेष्ठ प्रदर्शन करने वाला देश है, जो पांचवें स्थान पर है, जबकि स्वीडन, एस्टोनिया, डेनमार्क, पुर्तगाल, नीदरलैंड, रोमानिया और स्लोवाकिया को भी उच्च रेटिंग प्राप्त हुई है। लातविया इस श्रेणी में अत्यंत निम्न रेटिंग प्राप्त करने वाला यूरोपीय संघ का एकमात्र देश है।
अधिकांश उच्च-उत्सर्जन करने वाले देश वैश्विक ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन के 90 प्रतिशत से अधिक के लिए उत्तरदायी हैं।
2. नवीकरणीय ऊर्जा: नवीकरणीय ऊर्जा का तेजी से विस्तार जलवायु परिवर्तन के शमन हेतु एक आशाजनक संकेत देता है। 2023 में, वैश्विक नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता में रिकॉर्ड 473 गीगावाट की वृद्धि हुई, जो पिछले वर्ष के सकारात्मक विकास को पार कर गई। अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (आईईए) का अनुमान है कि वर्तमान जलवायु नीतियों और रुझानों से 2030 तक नवीकरणीय ऊर्जा में लगभग इतनी वृद्धि हो सकती है जिससे वैश्विक नवीकरणीय क्षमता को तीन गुना करने का लक्ष्य हासिल किया जा सके। सब्सिडी समाप्त करने और जीवाश्म ईंधन निष्कर्षण के नए लाइसेंसों को रोकने सहित जीवाश्म ईंधनों का त्वरित और चरणबद्ध रूप से पूर्ण उन्मूलन करना जलवायु परिवर्तन को रोकने हेतु महत्वपूर्ण बना हुआ है।
ऊर्जा क्षेत्र देशों के ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इसके अलावा, नवीकरणीय ऊर्जा रेटिंग तेजी से नवीकरणीय ऊर्जा के उपयोग के माध्यम से उत्सर्जन में और कमी लाने की यथेष्ट संभावना को रेखांकित करती है।
नॉर्वे लगातार इस श्रेणी में अति उच्च रेटिंग प्राप्त करता आ रहा है, जबकि पहली बार स्वीडन और डेनमार्क को भी अति उच्च रेटिंग प्राप्त हुई है। ईरान, दक्षिण अफ्रीका और अल्जीरिया रैंकिंग में सबसे नीचे हैं।
G20 देशों में शामिल रूस, सऊदी अरब और मेक्सिको सहित 14 देशों को निम्न या अत्यंत निम्न रैंक दी गई है। इस श्रेणी में किसी भी G20 देश को उच्च रेटिंग प्राप्त नहीं हुई है। ब्राजील, इंडोनेशिया और चीन शीर्ष प्रदर्शनकर्ता हैं, जिनमें से प्रत्येक को समग्र रूप से मध्यम रेटिंग प्राप्त हुई है।
समग्र रूप से मध्यम रेटिंग के साथ, यूरोपीय संघ का प्रदर्शन 2024 के सीसीपीआई के समान ही बना हुआ है। नॉर्वे, स्वीडन और डेनमार्क की अति उच्च रेटिंग के बाद, लातविया, फिनलैंड, नीदरलैंड और एस्टोनिया को उच्च रेटिंग प्राप्त हुई है। माल्टा और स्लोवाकिया का प्रदर्शन बहुत खराब है।
3. ऊर्जा उपयोग: 2023 में वैश्विक ऊर्जा खपत में तीव्र वृद्धि, 2.2 प्रतिशत की दर से, हुई जो 2010 से 2019 तक प्रति वर्ष हुई 1.5 प्रतिशत की औसत वृद्धि दर से महत्वपूर्ण रूप से अधिक तीव्र है।
फिलीपींस इस श्रेणी में अति उच्च रेटिंग प्राप्त करने वाला एकमात्र देश है, इसके बाद नाइजीरिया, कोलंबिया और पाकिस्तान का स्थान है। रैंकिंग में सबसे नीचे कोरिया, कनाडा और संयुक्त अरब अमीरात हैं।
एक बार फिर, इस श्रेणी में शामिल G20 देशों में से सात देशों का प्रदर्शन बहुत खराब रहा। यूके, भारत, मेक्सिको और दक्षिण अफ्रीका को उच्च रेटिंग मिली है, जबकि अन्य सभी G20 सदस्यों को मध्यम या निम्न रेटिंग मिली है।
पूर्ववर्ती सूचकांकों की भांति, यूरोपीय संघ को मध्यम रेटिंग मिली है। एस्टोनिया, रोमानिया, लिथुआनिया और माल्टा ही यूरोपीय संघ के ऐसे देश हैं जिनका प्रदर्शन उच्च स्तर पर है, जबकि बेल्जियम, स्वीडन, ऑस्ट्रिया, बुल्गारिया और फिनलैंड को अत्यंत निम्न रेटिंग मिली है।
4. जलवायु नीति: वर्तमान जलवायु लक्ष्य और उनका कार्यान्वयन वैश्विक तापमान वृद्धि को 1.5 डिग्री सेल्सियस तक सीमित रखने के लिए अपर्याप्त हैं। फरवरी 2025 तक, सभी देशों को अपने राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदान (एनडीसी) को अद्यतन करना होगा और 1.5 डिग्री सेल्सियस के लक्ष्य को प्राप्त करने योग्य बनाने की महत्वाकांक्षा एवं कार्यान्वयन संबंधी कमियों को दूर करना होगा।
सीसीपीआई 2025 में जलवायु नीति के संकेतक न केवल उत्सर्जन की राष्ट्रीय नीतियों और लक्ष्यों का मूल्यांकन करते हैं, बल्कि क्षेत्रीय नीतियों, लक्ष्यों और उनके कार्यान्वयन का मूल्यांकन भी करते हैं।
डेनमार्क इस श्रेणी में उच्च रेटिंग प्राप्त करने वाला एकमात्र देश है, इसके बाद मोरक्को, नीदरलैंड और भारत का स्थान है। किसी भी देश को अपनी राष्ट्रीय जलवायु नीति के लिए उच्च रेटिंग नहीं मिली है, जबकि चार देशों/क्षेत्रों—डेनमार्क, कोलंबिया, यूरोपीय संघ और यूके—को अंतरराष्ट्रीय जलवायु नीति के लिए उच्च रेटिंग मिली है।
इस श्रेणी में G20 के 7 सदस्यों को मध्यम रेटिंग प्राप्त हुई है। G20 के 12 सदस्य देशों को निम्न या अत्यंत निम्न रेटिंग दी गई है, जिनमें तुर्की, रूस और जापान सबसे खराब प्रदर्शन करने वाले देश हैं।
यूरोपीय संघ के देशों में से, डेनमार्क अपने मजबूत राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय जलवायु प्रदर्शन के कारण जलवायु नीति रैंकिंग में सबसे आगे है। यूरोपीय संघ के 19 देशों को निम्न या अत्यंत निम्न रेटिंग प्राप्त हुई, जो पिछले वर्ष की तुलना में तीन अधिक है। स्लोवाकिया, हंगरी और साइप्रस यूरोपीय संघ के अन्य ऐसे देश हैं जिनका प्रदर्शन बहुत निम्न रहा।
सीसीपीआई में भारत का प्रदर्शन
- सीसीपीआई 2025 में भारत 10वें स्थान पर है, जो सर्वोच्च प्रदर्शन करने वाले देशों में से एक है। इसे ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन और ऊर्जा उपयोग श्रेणियों में उच्च, जलवायु नीति में मध्यम, और नवीकरणीय ऊर्जा में निम्न स्थान प्राप्त हुआ है।
- जलवायु परिवर्तन की रोकथाम संबंधी कार्रवाई के संदर्भ में विकासोन्मुखी दृष्टिकोण का जारी रहना या इसका और अधिक तेज होना अपेक्षित है, जो इक्विटी (वाणिज्य) के विकार्बनन को प्राथमिकता देने के बजाय उद्योगों की बढ़ती ऊर्जा मांग और जनसंख्या वृद्धि के कारण और भी तीव्र होगा। इस दृष्टिकोण के प्रति राष्ट्रों के बीच, स्थानीय अपवादों को छोड़कर, महत्वपूर्ण रूप से मतभेद होंगे।
- भारत का प्रति व्यक्ति उत्सर्जन 2.9 टन कार्बन डाइऑक्साइड के समतुल्य (tCO₂eq) है, जो वैश्विक औसत उत्सर्जन 6.6 tCO₂eq से बहुत कम है। पिछले एक दशक में, नवीकरणीय ऊर्जा का तेजी से विस्तार हुआ है और भारत का लक्ष्य अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हरित ऊर्जा के क्षेत्र में अग्रणी भूमिका निभाना है। सीसीपीआई के आकलन में शामिल भारतीय विशेषज्ञों का अनुमान है कि भारत अपने एनडीसी को पूरा करेगा, लेकिन वे उत्सर्जन और विद्युत ऊर्जा के अलावा अन्य क्षेत्रों के लिए भी लक्ष्य निर्धारित करने के महत्व पर बल देते हैं। घरेलू स्तर पर, परिवहन, उद्योग, आवास और जल जैसे क्षेत्रों को विनियमित किया गया है और सीसीपीआई विशेषज्ञ इन क्षेत्रों को भी एनडीसी में अंतर्गत शामिल करने की अनुशंसा करते हैं।
- 2024 में, भारत ने नवीकरणीय ऊर्जा के क्षेत्र में, विशेष रूप से व्यापक स्तर पर सौर ऊर्जा परियोजनाओं और रूफटॉप सोलर योजना के माध्यम से, उल्लेखनीय प्रगति की है। हालांकि, सीसीपीआई विशेषज्ञ रूफटॉप और ऑफ-ग्रिड सौर प्रणालियों के लिए और अधिक समर्थन देने की मांग कर रहे हैं। ऊर्जा दक्षता मानक लागू होने के बावजूद, इसकी पहुंच अभी भी अपर्याप्त है। भारत इलेक्ट्रिक वाहनों, विशेष रूप से दोपहिया वाहनों, के प्रयोग में भी प्रगति कर रहा है।
- सकारात्मक प्रगति के बावजूद, भारत की कोयले पर बहुत अधिक निर्भरता है और सीसीपीआई विशेषज्ञों का कहना है कि इसे चरणबद्ध रूप से समाप्त करने की प्रक्रिया बहुत धीमी है। भारत, विश्व के 10 प्रचुर विकसित कोयला भंडार वाले देशों में से एक है जो अपने उत्पादन में वृद्धि की योजना बना रहा है। विशेषज्ञ, भारत के एनडीसी में संशोधन करने की सिफारिश करते हैं ताकि विभिन्न क्षेत्रों में उत्सर्जन कटौती के लिए अधिक महत्वाकांक्षी लक्ष्य निर्धारित किए जा सकें और यह सुनिश्चित करते हुए ऊर्जा संक्रमण में तेजी लाई जा सके कि यह संक्रमण यथार्थ/निष्पक्ष हो।
- भारत, ग्रीनहाउस गैसों का तीसरा सबसे बड़ा उत्सर्जक और सबसे तेजी से विकसित होने वाली प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में से एक होने के नाते, 2070 तक निवल-शून्य उत्सर्जन का लक्ष्य प्राप्त करने के लिए प्रतिबद्ध है और इसने 2030 तक 500 गीगावाट नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता हासिल करने का लक्ष्य रखा है। हालांकि, यह लक्ष्य भारत के एनडीसी का हिस्सा नहीं है, लेकिन यह देश की ऊर्जा योजना में एक मार्गदर्शक के रूप में कार्य करता रहेगा। यद्यपि, भारत की जलवायु प्रगति की चुनौतियां बनी हुई हैं, तथापि आज भी 70 प्रतिशत से अधिक विद्युत ऊर्जा की आपूर्ति कोयले से होती है, जो निवल-शून्य लक्ष्यों के लिए बाधा बन रही है। नंदगांव (पश्चिमी भारत) जैसे भूमि अधिग्रहण विवाद भी नवीकरणीय ऊर्जा के विस्तार को धीमा कर रहे हैं। इस दिशा में आगे बढ़ने के लिए, भारत को कोयले के उपयोग को चरणबद्ध तरीके से कम करना होगा, हरित परियोजनाओं के लिए भू-नीतियों को सुव्यवस्थित करना होगा, सभी क्षेत्रों के लिए जलवायु नियमों को कठोर बनाना होगा और ऊर्जा दक्षता को बढ़ावा देना होगा, ताकि एक पूर्ण और स्थायी परिवर्तन सुनिश्चित हो सके।
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