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होर्मुज की खाड़ी: महत्व एवं निहितार्थ

होर्मुज की खाड़ी या जलसंधि ओमान के मुसंदम प्रायद्वीप और ईरान के दक्षिणी तट के बीच स्थित एक संकरा लेकिन अत्यंत महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग है। यह सामरिक दृष्टि से विश्व के सबसे महत्त्वपूर्ण जलमार्गों में से एक है—जो तेल-समृद्ध फारस की खाड़ी (पश्चिम) को ओमान की खाड़ी और अरब सागर (दक्षिण-पूर्व) से जोड़ने वाला एकमात्र समुद्री मार्ग है। यह संकीर्ण मार्ग (chokepoint), अपने सबसे संकरे हिस्से में केवल 30 मील (48 किमी.) चौड़ा है, और फारस की खाड़ी के तेल उत्पादकों को शेष विश्व से जोड़ने वाला एकमात्र समुद्री मार्ग है।

इससे प्रतिदिन लगभग 21 मिलियन बैरल कच्चा तेल और परिशोधित उत्पाद गुजरते हैं। इसके माध्यम से लगभग 84 प्रतिशत तेल और तरलीकृत प्राकृतिक गैस (LNG) एशियाई देशों, जिनमें चीन, भारत, जापान और दक्षिण कोरिया शामिल हैं, में पहुंचाई जाती है। वैश्विक तेल आपूर्ति का लगभग 20 प्रतिशत और विश्व के एलएनजी का लगभग एक-तिहाई हिस्सा इसी संकरे जलमार्ग से होकर गुजरता है। परिणामस्वरूप, इस जलसंधि की सुरक्षा और सुगमता वैश्विक ऊर्जा स्थिरता और आर्थिक समृद्धि के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।

हाल के वर्षों में, और विशेष रूप से 2025 की शुरुआत से, मध्य पूर्व में बढ़ते भू-राजनीतिक तनावों ने होर्मुज जलसंधि की ओर विशेष रूप से ध्यान आकर्षित किया है। ईरान-इजराइल-अमेरिका के बीच सैन्य टकरावों, टैंकरों पर हमलों और आक्रामक बयानबाजी के बाद, इस महत्वपूर्ण जलमार्ग के बंद होने का जोखिम बढ़ गया है, जिससे संघर्ष, आर्थिक झटके और व्यापक अस्थिरता की संभावनाओं के संबंध में विश्व की चिंताएं बढ़ गई हैं।

भूगोल और सामरिक महत्व

होर्मुज जलसंधि ओमान और ईरानी तटरेखा के बीच एक संकरा समुद्री गलियारा है। संयुक्त राष्ट्र के नियमों के अनुसार, प्रत्येक देश अपनी तटरेखा से 12 समुद्री मील (लगभग 22 किमी.) तक के जलक्षेत्र पर अधिकार रख सकता है। इसका अर्थ है कि अपने सबसे संकरे हिस्से में होर्मुज जलसंधि और इसके नौवहन मार्ग पूरी तरह ईरान और ओमान के क्षेत्रीय जलक्षेत्र के भीतर आते हैं।

यह फारस की खाड़ी, जहां विश्व के सबसे बड़े तेल और गैस भंडार पाए जाते हैं, को ओमान की खाड़ी और अरब सागर से जोड़ती है। इस भौगोलिक स्थिति का अर्थ है कि सऊदी अरब, ईरान, संयुक्त अरब अमीरात, कुवैत, कतर, बहरीन और इराक जैसे खाड़ी देशों से निकलने वाला सारा कच्चा तेल और एलएनजी वैश्विक बाजारों तक पहुंचने के लिए इसी मार्ग से होकर गुजरते हैं।

अपनी रणनीतिक स्थिति और संकीर्ण चौड़ाई के कारण यह विश्व में तेल पारगमन का सबसे महत्वपूर्ण संकरा मार्ग है। जहाजों की आवाजाही नियंत्रित करने के लिए वाणिज्यिक नौवहन मार्गों को दोनों तरफ निर्धारित ‘ट्रैफिक सेपरेशन स्कीम’ (TSS) के तहत सख्ती से संचालित किया जाता है। यद्यपि मुसंदम प्रायद्वीप के पास यह जलसंधि अपेक्षाकृत गहरी है, तथापि समुद्री यातायात की अधिकता और सीमित नौगम्य क्षेत्र इसे अवरोध या भितरघात (अंतर्ध्वंस) के प्रति संवेदनशील बनाते हैं। पूर्ण रूप से भरे हुए विशाल कच्चे तेल वाहक (VLCC) इस जलसंधि से गुजर सकते हैं, लेकिन संकरे मार्ग दुर्घटनाओं या जान-बूझकर किए गए हमलों के जोखिम को और अधिक बढ़ा देते हैं।

इस जलसंधि के निकट होने के कारण ईरान को महत्वपूर्ण रणनीतिक लाभ मिलता है। पहले से ही, ईरान प्रतिबंधों या सैन्य आक्रामकता के जवाब में इस जलसंधि को बंद करने या इसमें बारूदी सुरंगें बिछाने की धमकियां देता रहा है। ऐसे कदम क्षेत्र के तेल निर्यात को ठप कर सकते हैं और वैश्विक रूप से ऊर्जा की कीमतें आसमान छू सकती हैं।

ऐतिहासिक संदर्भ और क्षेत्रीय गतिशीलता

खाड़ी क्षेत्र का अशांत इतिहास होर्मुज जलसंधि के आस-पास विद्यमान अस्थिरता को स्पष्ट रूप से दर्शाता है। 1980 के दशक में हुए ईरान-इराक युद्ध के दौरान दोनों देशों ने तथाकथित ‘टैंकर वॉर’ छेड़ा, जिसमें एक-दूसरे की अर्थव्यवस्था को कमजोर करने के लिए तेल के टैंकरों और व्यापारिक जहाजों पर हमले किए गए। इस संघर्ष ने खाड़ी में हस्तक्षेप करने के लिए अमेरिका को मजबूर कर दिया, क्योंकि वह तेल के मुक्त प्रवाह की सुरक्षा करना चाहता था। 1988 में, अमेरिकी नौसेना ने गलती से खाड़ी में एक ईरानी यात्री विमान को मार गिराया, जिसमें 290 नागरिकों की मृत्यु हो गई। यह उस दौर की सबसे दुखद घटनाओं में से एक थी।

हाल के दशकों में, तनाव लगातार बना हुआ है। 2010 में, अल-कायदा से संबद्ध उग्रवादियों ने होर्मुज जलसंधि के निकट एक जापानी तेल टैंकर पर हमला कर दिया, जिससे सुरक्षा संबंधी मौजूदा जोखिम और बढ़ गए। इसके बाद, विशेष रूप से सऊदी अरब और ईरान के बीच हुए परोक्ष संघर्षों ने रणनीतिक प्रतिस्पर्धा को और तेज कर दिया, जहां दोनों शक्तियां यमन, सीरिया, इराक और लेबनान जैसे देशों में विरोधी गुटों का समर्थन कर रही हैं।

ईरान का परमाणु कार्यक्रम और अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंध लंबे समय से तनाव के प्रमुख कारण रहे हैं। ईरान को परमाणु हथियार हासिल करने से रोकने के लिए पश्चिमी देशों ने उसके तेल निर्यात को निशाना बनाया, जिसके प्रत्युत्तर में ईरान बार-बार खाड़ी की सुरक्षा को खतरे में डालने की धमकी देता रहा। इन तनावपूर्ण रणनीतियों की परिणति 2015 में वैश्विक शक्तियों तथा ईरान के मध्य हुए परमाणु समझौते के रूप में हुई, जिसने अस्थायी रूप से तनाव कम कर दिया। हालांकि, 2018 में राष्ट्रपति ट्रंप के शासन (पहले कार्यकाल) के दौरान अमेरिका इस समझौते से बाहर हो गया, जिसके बाद प्रतिबंधों और टकराव का एक नया दौर शुरू हो गया।

हाल की घटनाएं और तनाव में वृद्धि

2025 में, अमेरिका और ईरान के बीच तनाव एक बार पुनः अपने चरम पर पहुंच गया है। जून 2025 में अमेरिकी हवाई हमलों में ईरानी परमाणु प्रतिष्ठानों को निशाना बनाए जाने के बाद, ईरानी अधिकारियों ने जवाबी कार्रवाई में होर्मुज जलसंधि को बंद करने या उसमें बारूदी सुरंगें बिछाने की धमकी दी थी। जलसंधि को बंद करने या उसमें सुरंगें बिछाने की आशंका ने सैन्य रणनीतिकारों को चिंतित कर दिया है, क्योंकि इस जाल में अमेरिकी नौसेना के जहाज फंस सकते हैं और वैश्विक तेल आपूर्ति बाधित हो सकती है।

आर्थिक जोखिम और वैश्विक प्रभाव

होर्मुज जलसंधि के आर्थिक महत्व को अतिशयोक्तिपूर्ण नहीं कहा जा सकता। यहां किसी भी तरह के व्यवधान से वैश्विक ऊर्जा की कीमतें आसमान छू सकती हैं, जिसका प्रभाव विश्व की सभी अर्थव्यवस्थाओं पर पड़ सकता है।

एशिया विशेष रूप से संवेदनशील है, क्योंकि चीन, भारत, जापान और दक्षिण कोरिया जैसे बड़े उपभोक्ता खाड़ी के तेल पर अत्यधिक निर्भर हैं, जो इसी जलसंधि से होकर गुजरता है। विश्व में ईरानी तेल का सबसे बड़ा खरीदार होने के कारण होर्मुज जलसंधि को बंद होने से रोकने में चीन के अपने महत्वपूर्ण लाभ और निहित स्वार्थ हैं। अमेरिका ने चीन से सक्रिय रूप से आग्रह किया है कि वह ईरान पर जलमार्ग खुला रखने के लिए दबाव डाले। साथ ही, अमेरिका ने ईरान को चेतावनी दी है कि होर्मुज जलसंधि को बंद करना ‘आर्थिक आत्महत्या’ करने के समान होगा, क्योंकि इससे उसे वैश्विक बाजारों और क्षेत्रीय पड़ोसी देशों की ओर से गंभीर परिणाम भुगतने पड़ेंगे। चीन का कहना है कि ईरान के परमाणु प्रतिष्ठानों पर हाल ही में हुए अमेरिकी हमलों ने अमेरिका की विश्वसनीयता को गहरी चोट पहुंचाई है और उसने अमेरिका से तत्काल युद्धविराम की अपील की है। इसके अतिरिक्त, चीन ने यह भी कहा कि ईरान में अमेरिकी दखलअंदाजी ने मध्य पूर्व की स्थिति को और अधिक जटिल और अस्थिर बना दिया है।

यद्यपि संयुक्त अरब अमीरात और सऊदी अरब में पाइपलाइनों का निर्माण कर इस जलसंधि की आवश्यकता को समाप्त करने या इससे बचने के प्रयास जारी हैं, तथापि ये पाइपलाइनें अब तक इसकी व्यापक क्षमता की भरपाई करने में सक्षम नहीं हैं। जब तक बड़े पैमाने पर वैकल्पिक पाइपलाइनें संचालित नहीं हो जातीं, तब तक वैश्विक तेल बाजार इस जलसंधि में उत्पन्न किसी भी अस्थिरता के प्रति संवेदनशील बना रहेगा।

जून 2025 में इजराइल और अमेरिका द्वारा ईरान पर किए गए हमलों के बाद तेल की कीमतों में अस्थायी उछाल देखा गया। उदाहरणस्वरूप, ब्रेंट क्रूड ऑयल 81.40 अमेरिकी डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गया, हालांकि बाद में यह स्थिर हो गया, जो बाजार की असुरक्षा को दर्शाता है। कीमतों में यह उतार-चढ़ाव वैश्विक अर्थव्यवस्था को प्रभावित करता है और परिवहन, विनिर्माण तथा उपभोक्ता वस्तुओं की लागत में वृद्धि करता है।

यदि ईरान द्वारा इस जलसंधि को बंद कर दिया गया होता, तो तेल की बढ़ती कीमतों का प्रभाव भारतीय उद्योगों पर भी पड़ता। एशियन पेंट्स और बर्जर जैसी पेंट बनाने वाली कंपनियों के कच्चे माल की कीमतें बढ़ जातीं, जबकि डॉ. रेड्डीज, ल्यूपिन और सन फार्मा जैसी दवा कंपनियां अपने उत्पादन और रसद (लॉजिस्टिक्स) पर प्रभाव महसूस करतीं। एयरलाइंस, जिनके कुल व्यय का 30 से 40 प्रतिशत केवल ईंधन पर ही खर्च होता है, के मुनाफे में भी कमी आती। सीमेंट, इस्पात और उर्वरक उद्योगों को भी डीजल और इनपुट लागत में वृद्धि से जूझना पड़ता। यहां तक कि हिंदुस्तान यूनिलीवर लिमिटेड और डाबर जैसी फास्ट मूविंग कंज्यूमर गुड्स (एफएमसीजी—रोजमर्रा के प्रयोग में आने वाली वस्तुएं बनाने वाली कंपनियां) कंपनियों को भी बढ़ते वितरण खर्च के कारण अपने उत्पादों की कीमतें बढ़ानी पड़तीं।

सैन्य स्थिति और सामरिक परिकल्पना

अमेरिका ने बढ़ते खतरे का जवाब सैन्य तैनाती बढ़ाकर दिया है, और अतिरिक्त सैनिकों व संसाधनों को क्षेत्र में भेजा है। बहरीन के मनामा में स्थित अमेरिकी नौसेना का पांचवां बेड़ा जलसंधि की सुरक्षा और नौवहन की स्वतंत्रता सुनिश्चित करने में अहम भूमिका निभा रहा है।

ईरानी नेतृत्व इस स्थिति से संबंधित जोखिमों को भली-भांति समझता है। सामरिक कमजोरियों के बावजूद, ईरान के पास एक सक्षम नौसेना है और वह विषम युद्ध (यानी असमान शक्ति और सेनाओं वाले देशों के बीच होने वाला युद्ध) के विभिन्न अस्त्र-शस्त्रों से लैस है। इनमें बारूदी सुरंगें, स्पीडबोट, मिसाइल बैटरियां और "कुद्स फोर्स", ईरान का सर्वोकृष्ट गुप्त सैन्य बल, शामिल हैं। ईरान की तेज नावें प्रायः जहाज-रोधी मिसाइलों से सुसज्जित होती हैं। इसके अतिरिक्त, वह सतही पोत, अर्ध-पनडुब्बियों और पनडुब्बियों का भी संचालन करता है। सैन्य विश्लेषकों का मानना है कि ईरान जलसंधि में लगातार बारूदी सुरंगें बिछाने की क्षमता रखता है। ऐसी स्थिति में अमेरिकी नौसेना को सुरंग बनाने के लिए हफ्तों या महीनों तक चलने वाला एक जटिल और जोखिमपूर्ण अभियान चलाना पड़ सकता है। यह न केवल अमेरिकी नौसैनिकों की जान को खतरे में डालेगा, बल्कि वाणिज्यिक नौवहन को भी गंभीर रूप से बाधित करेगा।

विशेषज्ञों का मानना है कि ईरान इस जलसंधि को केवल अस्थायी रूप से ही बाधित सकता है, क्योंकि अमेरिका और उसके सहयोगी सैन्य शक्ति के बल पर समुद्री यातायात को शीघ्र ही बहाल करने में सक्षम हैं।

परोक्ष संघर्ष और क्षेत्रीय प्रतिद्वंद्विता

खाड़ी क्षेत्र में परोक्ष संघर्ष विशेष रूप से ईरान और सऊदी अरब के बीच देखे जाते हैं, जो इस क्षेत्र में अपना प्रभुत्व स्थापित करने के लिए प्रतिस्पर्धा कर रहे हैं। दोनों देश मध्य पूर्व में राजनीतिक और उग्रवादी समूहों का समर्थन करते हैं, जिससे अस्थिरता बढ़ती है। इराक, लेबनान, सीरिया, बहरीन और कतर में ईरान-समर्थित मिलिशिया (नागरिक सेना) तथा यमन के हूती विद्रोही सक्रिय हैं। वहीं, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात, अमेरिका का समर्थन प्राप्त करने हेतु विरोधी गुटों का साथ देते हैं।

छद्म युद्ध (Proxy War) होर्मुज जलसंधि और व्यापक क्षेत्र में स्थिरता स्थापित करने के प्रयासों को जटिल बना रहा है। पाइपलाइनों, नौपरिवहन मार्गों और सैन्य ठिकानों पर हमले अकसर प्रतिनिधिक समूहों द्वारा अप्रत्यक्ष रूप से किए जाते हैं। ईरान इन हमलों में सीधे तौर पर शामिल होने से इनकार करता है, जिससे अनैतिक गतिविधियों की जिम्मेदारी टल जाती है और गलत अनुमान या गलतफहमी का जोखिम बढ़ जाता है।

राजनयिक प्रयास और अंतरराष्ट्रीय चिंताएं

हाल ही में बढ़ते तनावों के बीच अंतरराष्ट्रीय समुदाय गहरी चिंता के साथ हालात पर नजर रखे हुए है। अमेरिका ने चीन और अन्य वैश्विक शक्तियों से आग्रह किया है कि होर्मुज जलसंधि को बंद करने या सैन्य टकराव की स्थिति से बचने के लिए वे ईरान पर अपने कूटनीतिक प्रभाव का प्रयोग करें।

यूरोपीय देश, विशेषकर ब्रिटेन, समुद्री सुरक्षा प्रयासों में लगातार सक्रिय रहे हैं। इसका उदाहरण 2019 में ब्रिटेन द्वारा एक ईरानी टैंकर को जब्त कर लेने की घटना में देखा जा सकता है, जिस पर प्रतिबंधों के उल्लंघन का संदेह था। साथ ही, ईरानी जहाजों पर ब्रिटिश वाणिज्यिक जहाजों को बाधित करने की कोशिश के आरोप भी लगाए गए थे।

संयुक्त राष्ट्र और विभिन्न कूटनीतिक पक्षकार इस जलसंधि को बंद करने से होने वाले विनाशकारी वैश्विक परिणामों पर चिंता व्यक्त करते हुए, तनाव कम करने हेतु संवाद पर जोर दे रहे हैं।

निष्कर्ष

होर्मुज जलसंधि वैश्विक ऊर्जा सुरक्षा की धुरी और भू-राजनीतिक संघर्षों का एक निर्णायक केंद्र बना हुआ है। इसकी संकरी जलधारा से दुनिया के तेल और गैस का एक बड़ा हिस्सा होकर गुजरता है, जिससे इसके खुलेपन पर किसी भी तरह का खतरा अंतरराष्ट्रीय चिंता का गंभीर विषय बन जाता है। हाल के वर्षों में तनाव, सैन्य टकराव और परोक्ष संघर्षों में खतरनाक वृद्धि हुई है, जो एक भीषण युद्ध का रूप ले सकते हैं।

वैश्विक समुदाय के सामने एक जटिल चुनौती है: इस महत्वपूर्ण जलमार्ग की सुरक्षा सुनिश्चित करना, क्षेत्रीय शक्तियों के पारस्परिक हितों में संतुलन बनाए रखना और उस संभावित विनाशकारी अवरोध को रोकना, जिसका गंभीर प्रभाव विश्व की अर्थव्यवस्थाओं और समाजों पर पड़ेगा। ऐसे अस्थिर माहौल में सतर्क कूटनीति, रणनीतिक सैन्य तैयारियां और अंतरराष्ट्रीय सहयोग पहले से कहीं अधिक महत्वपूर्ण हो गए हैं। 

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