एक ऐतिहासिक आविष्कार के रूप में, भारतीय वैज्ञानिकों ने हिंद महासागर में 4,500 मीटर की सांतरण गहराई पर एक सक्रिय हाइड्रोथर्मल या उष्णजलीय निकास (वेंट) की पहली छवि ली है। यह सफलता पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय द्वारा संचालित 4,000 करोड़ रुपये के महत्वाकांक्षी डीप ओशन मिशन के अंतर्गत प्राप्त हुई जो देश के समुद्री अन्वेषण प्रयासों के लिए एक महत्वपूर्ण कदम है। प्रतिबिंबन (इमेजिंग) का यह प्रयास राष्ट्रीय ध्रुवीय एवं समुद्री अनुसंधान केन्द्र (एनसीपीओआर) और राष्ट्रीय समुद्र प्रौद्योगिकी संस्थान (एनआईओटी) द्वारा एक दशक से भी अधिक समय से किए जा रहे निरंतर अन्वेषण का परिणाम है।
2012 से, एनसीपीओआर हिंद महासागर के मध्य और दक्षिणी कटकों (रिज) में उष्णजलीय निकास की खोज के लिए भूभौतिकीय सर्वेक्षण कर रहा है। इन अन्वेषणों में जल धाराओं की विषमताओं और तापमान में परिवर्तन की सूक्ष्म खोज शामिल है, जो दर्शाता है कि समुद्र तल के नीचे उष्णजलीय गतिविधि होने की संभावना है।
हाइड्रोथर्मल निकास
हाइड्रोथर्मल या उष्णजलीय निकास मूलतः अंतर्जलीय उष्ण स्रोत होते हैं जो सामान्यतया विवर्तनिक (टेक्टोनिक) रूप से सक्रिय क्षेत्रों में बनते हैं। ये निकास तब बनते हैं जब शीतल समुद्री जल, सामान्यतया लगभग दो डिग्री सेल्सियस, दरारों एवं विदर के माध्यम से समुद्री पर्पटी (क्रस्ट) में रिसता है। जैसे ही यह जल पृथ्वी की पर्पटी के नीचे मैग्मा के संपर्क में आता है, यह अत्यधिक गर्म हो जाता है, 370° सेल्सियस या उससे भी अधिक तापमान तक पहुंच जाता है, और समुद्र तल से फिर से उभरता है, और अपने साथ कई विलयित खनिज और गैसें ले आता है।
धातुओं और अन्य यौगिकों से भरपूर ये निष्कासित तरल पदार्थ समुद्र तल में विशिष्ट चिमनी जैसी संरचनाएं बनाते हैं। ये संरचनाएं, जिन्हें कभी-कभी ‘ब्लैक स्मोकर्स’ भी कहा जाता है, न केवल खनिजों से समृद्ध होती हैं, बल्कि सूक्ष्मजीवों द्वारा समर्थित विशिष्ट पारिस्थितिक तंत्रों का भी आवास हैं, जो रसायन संश्लेषण नामक प्रक्रिया के माध्यम से सूर्य के प्रकाश की अनुपस्थिति में पनपते हैं। रसायन संश्लेषण जीवों को रसायनों का उपयोग कर अकार्बनिक अणुओं को ऊर्जा में परिवर्तित करने की सुविधा देता है।
सेंट्रल इंडियन रिज—लक्षित क्षेत्र
अप्रैल 2024 के आरंभ में, एनसीपीओआर की टीम ने एक ऑटोनमस अंडरवॉटर व्हीकल (एयूवी) की सहायता से, सेंट्रल इंडियन रिज [सेंट्रल इंडियन रिज (सीआईआर) 2° उत्तर और 25° दक्षिण पर त्रि-जंक्शन के बीच उत्तर-दक्षिण की ओर बढ़ने वाली प्रमुख सक्रिय मध्य-समुद्री रिज अर्थात कटक प्रणाली का एक हिस्सा है।] में एक विशिष्ट स्थान को उष्णजलीय गतिविधि के संभावित स्थान के रूप में चिह्नित किया। इसके परिणामस्वरूप एनसीपीओआर और एनआईओटी के बीच एक सहयोगात्मक अभियान शुरू हुआ। टीम का नेतृत्व वरिष्ठ वैज्ञानिक जॉन कुरियन और एन.आर.रमेश ने किया। दोनों टीमों ने दक्षिणी हिंद महासागर में सेंट्रल और साउथवेस्ट इंडियन रिज पर स्थित हाइड्रोथर्मल सल्फाइड क्षेत्रों के उच्च-रिजॉल्यूशन वाले गहन समुद्री प्रतिबिंब लेने (इमेजिंग) पर ध्यान केंद्रित किया।
4,500 मीटर की गहराई पर प्राप्त सफलता
दिसंबर 2024 में, 'सागर निधि' नामक अनुसंधान पोत पर किए गए एक संयुक्त अभियान में एक ऐतिहासिक उपलब्धि हासिल की गई। पहली बार, एक भारतीय एयूवी ने समुद्र तल से 4,500 मीटर नीचे स्थित एक सक्रिय उष्णजलीय निकास की सफलतापूर्वक विस्तृत छवि लीं। एनआईओटी द्वारा विकसित, ओशन मिनरल एक्सप्लोरर 6000 (ओएमई 6000) नामक एयूवी ने अत्यंत गहन जल के भीतरी भूभाग का भ्रमण किया और महत्वपूर्ण दृश्यात्मक छवियां और वैज्ञानिक नमूने एकत्र किए। यह प्रेक्षण 12 से 15 घंटों तक चला और वेंट चिमनी, ब्लैक स्मोकर्स और जीवित रसायन संश्लेषी जीवों की उच्च-रिजॉल्यूशन वाली छवियां प्राप्त हुईं। ओएमई 6000 का सफल प्रयोग न केवल गहन समुद्र की तकनीक में भारत की प्रगति को दर्शाता है, बल्कि भारत को ऐसे चुनिंदा देशों के समूह में भी शामिल करता है जो इस तरह के उच्च जोखिम वाले अंतर्जलीय अन्वेषण करने में सक्षम हैं।
एनसीपीओआर के वरिष्ठ वैज्ञानिक जॉन कुरियन के अनुसार, ये निकास कुछ सौ वर्षों से लेकर 30,000 वर्षों तक सक्रिय रह सकते हैं। यह अवधि उन्हें न केवल वैज्ञानिक अनुसंधान के लिए, बल्कि तांबा, जस्ता, सोना, चांदी, प्लैटिनम, लोहा, कोबाल्ट और निकल जैसे खनिजों की सांद्रता के मद्देनजर, आर्थिक दृष्टिकोण से भी महत्वपूर्ण बनाती है।
वैज्ञानिक और आर्थिक महत्व
इस खोज के दोहरे लाभ हैं। पहला, उष्णजलीय निकास द्वारा बने खनिज-समृद्ध भंडारों के कारण इसके व्यापक आर्थिक निहितार्थ हैं। इनमें दुर्लभ मृदा धातुएं (रेयर अर्थ मेटेरियल) तथा आधुनिक तकनीकों और स्वच्छ ऊर्जा समाधानों के लिए आवश्यक अन्य तत्व शामिल हैं। दूसरा, वैज्ञानिक दृष्टिकोण से, यह शोधकर्ताओं को ऐसे विषम वातावरणों में पनपने वाले विशिष्ट जीव रूपों का अध्ययन करने में सक्षम बनाता है।
सौर प्रकाश और प्रकाश-संश्लेषण पर निर्भर स्थलीय जीव रूपों के विपरीत, उष्णजलीय निकास के आस-पास के जीव, रसायन संश्लेषण के माध्यम से जीवित रहते हैं। यहां, सूक्ष्मजीव ऊर्जा उत्पन्न करने के लिए हाइड्रोजन सल्फाइड जैसे अकार्बनिक यौगिकों का उपयोग करते हैं, जिससे विशिष्ट पारिस्थितिक तंत्र बना रहता है। इस प्रक्रिया को पृथ्वी पर जीवन की संभावित उत्पत्ति की एक झलक माना जाता है, जो जैव रसायनज्ञ अलेक्सांद्र (जिन्हें अलेक्जेंडर भी कहा जाता है) ओपेरिन द्वारा 1922 में प्रस्तावित रसायन संश्लेषण के सिद्धांत का समर्थन करता है, जिसमें उल्लिखित था कि प्रारंभ में, अति प्राचीन काल में पृथ्वी पर जीवन की उत्पत्ति रासायनिक पदार्थों के संयोजनों की एक श्रृंखला के माध्यम से हुई होगी और यह सब जल में हुआ होगा।
दृश्यात्मक प्रमाणीकरण द्वारा पूर्व सर्वेक्षणों की पुष्टि
एनसीपीओआर के निदेशक डॉ. थम्बन मेलोथ ने कहा कि यह उपलब्धि वर्षों पहले किए गए निकट-तल सर्वेक्षणों और भूभौतिकीय अध्ययनों की पुष्टि करती है, जिनसे इस क्षेत्र में उष्णजलीय गतिविधि होने का संकेत मिला था। यह प्रतिबिंबन निर्णायक रूप में दृश्यात्मक प्रमाण प्रदान करता है जो पूर्ववर्ती सैद्धांतिक आंकड़ों को तथ्यात्मक साक्ष्य में बदल देता है।
मेलोथ ने जोर देकर कहा कि इस सफलता से भारत के डीप ओशन मिशन में वैज्ञानिकों का विश्वास बहुत बढ़ गया है। इस मिशन के व्यापक उद्देश्यों में खनिज अन्वेषण, गहन समुद्र की जैव विविधता का अध्ययन और जलवायु को नियंत्रित/समंजित करने में समुद्रों की भूमिका को समझना शामिल है। इसलिए, यह अन्वेषण इन लक्ष्यों की प्राप्ति में महत्वपूर्ण सफलता की एक कहानी है।
समुद्री चुनौतियों पर विजय
दक्षिणी हिंद महासागर में इस प्रकार के अभियान का संचालन करना एक अत्यंत कठिन कार्य है। यह क्षेत्र परिचालन संबंधी कई चुनौतियों से भरा है, जिनमें अत्यधिक गहराई, अप्रत्याशित समुद्री धाराएं और लगातार आने वाला तूफानी मौसम शामिल हैं। लक्षित स्थल की 3,000 से 5,000 मीटर के बीच की गहराई के साथ ही पूर्ण अंधकार ऐसे अभियानों को अत्यधिक जटिल बना देते हैं। सामान्यतया एक महीने की सर्वेक्षण अवधि के दौरान, शोधकर्ताओं को एयूवी तैनात करने और उसका अवलोकन करने के लिए केवल एक या दो सप्ताह का ही अनुकूलित मौसम मिल पाता है।
इसके अलावा, उष्णजलीय निकास को खोजना बहुत मुश्किल होता है क्योंकि ये केवल एक या दो मीटर चौड़े होते हैं। साथ ही, ये विशाल समुद्री क्षेत्रों में फैले हुए हैं, जिससे इनकी खोज 'सैकड़ों घास के ढेर में सुई ढूंढ़ने' के समान है। यह इस बात को स्पष्ट करता है कि सफलता पाने में सटीक उपकरणों और अनुभवी कर्मियों के साथ-साथ संयोग की भूमिका भी अहम होती है।
ऑटोनमस अंडरवॉटर व्हीकल
इस मिशन का एक प्रमुख आकर्षण एनआईओटी द्वारा तैयार किया गया स्व-योजनाबद्ध रोबोटिक एयूवी, ओएमई (OMe) 6000, का सफल प्रयोग है। इस वाहन ने ऊबड़-खाबड़ समुद्री तल पर सुचारु रूप से नौवहन करने और उष्णजलीय निकास के उच्च गुणवत्तापूर्ण दृश्यों को रिकार्ड करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। एनआईओटी के निदेशक, बालाजी रामकृष्णन के अनुसार, यह पिछले दो वर्षों में संचालित चार अभियानों का परिणाम था, जिनका उद्देश्य अन्वेषण रणनीति को सुधारना और तकनीकी तत्परता को बढ़ाना था।
उन्होंने पुष्टि की कि यद्यपि प्रारंभिक प्रतिबिंबन और डेटा संग्रह का चरण सफल रहा, तथापि वैज्ञानिक अभी भी मिशन के दौरान एकत्रित वीडियो, प्रतिबिंबों और रासायनिक नमूनों का विश्लेषण कर रहे हैं। इन विश्लेषणों से खोजे गए स्थल की भूवैज्ञानिक और जैविक विशेषताओं के बारे में गहन जानकारी मिलने की उम्मीद है।
आगे की राह और व्यापक प्रभाव
इस उपलब्धि के बाद, एनसीपीओआर की योजना टी.वी.-निर्देशित ग्रैब सैंपलिंग तकनीक (टी.वी. कैमरे द्वारा किसी निश्चित समय पर नमूने का पूर्ण विश्लेषण सुनिश्चित करना) को आगे बढ़ाने की है, जो समुद्र तल से नमूनों की सटीक पुनर्प्राप्ति की सुविधा देगा। ये नमूने आस-पास की विशेषताओं और खनिज भंडारों की आर्थिक व्यवहार्यता की बेहतर समझ प्रदान करेंगे।
इस खोज से भारत के भावी अभियानों पर भी प्रभाव पड़ना अपेक्षित है, जिसमें आगामी 'समुद्रयान' मिशन भी शामिल है, जिसका उद्देश्य मानव अन्वेषकों को लगभग 6,000 मीटर की गहराई तक भेजना है। उष्णजलीय निकास प्रतिबिंब से प्राप्त तकनीकी और वैज्ञानिक सीख, समुद्र की गहराई में इस अन्वेषण के अगले चरण की योजना बनाने और उसे क्रियान्वित करने के लिए एक आधार सिद्ध होंगी।
इस दीर्घकालिक रणनीति के तहत, भारत गहन समुद्र में सर्वेक्षण के लिए एक नया जहाज भी विकसित कर रहा है। इस जहाज का परिचालन तीन वर्षों के भीतर होने की संभावना है जो समुद्री अन्वेषण में भारत की क्षमताओं को और मजबूत करेगा और समुद्री संसाधनों, पारिस्थितिक तंत्रों तथा वैश्विक जलवायु प्रणालियों में उनकी भूमिका के संबंध में समझ को व्यापक करने में योगदान देगा।
वैश्विक वैज्ञानिक समुदाय के लिए योगदान
यह अन्वेषण भारत को ऐसे चुनिंदा देशों के समूह में शामिल करता है जो इस प्रकार के उच्च-स्तरीय अंतर्जलीय अन्वेषण करने में सक्षम हैं। यह पृथ्वी पर सबसे कम अन्वेषित क्षेत्रों में से एक को लेकर देश की बढ़ती तकनीकी विशेषज्ञता और प्रतिबद्धता को दर्शाता है। इसके अलावा, यह समुद्री संसाधन प्रबंधन और जैव विविधता संरक्षण पर अंतरराष्ट्रीय विमर्श में योगदान देने का संकेत देता है।
दक्षिणी हिंद महासागर की गहराइयों में उतरकर, भारतीय वैज्ञानिक पृथ्वी विज्ञान के बहुमूल्य संसाधनों की खोज कर रहे हैं। जैसा कि मेलोथ ने कहा, "यह तो बस शुरुआत है", निरंतर समर्थन, नीली अर्थव्यवस्था में निरंतर निवेश और अन्वेषण के निरंतर प्रयास भारत के लिए अपने गहन समुद्री क्षेत्र के व्यापक, रहस्यमय विस्तार के अन्वेषण हेतु आवश्यक होंगे।
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