एक ऐतिहासिक और सर्वसम्मत निर्णय में, उच्चतम न्यायालय ने इलेक्टोरल बॉण्ड (निर्वाचन बंधपत्र—ईबी) योजना को ‘असंवैधानिक और स्पष्ट रूप से मनमाना’ घोषित करते हुए एक महत्वपूर्ण निर्णय सुनाया। इस योजना, जो राजनीतिक दाताओं को अनामता (anonymity) प्रदान करती थी और जो निगमों को असीमित राजनीतिक अंशदान देने की अनुमति देने वाले महत्वपूर्ण विधिक संशोधनों वाली योजना थी, को भारत के संविधान के अनुच्छेद 19(1)(क) के तहत राजनैतिक निधीयन के बारे में मतदाताओं के सूचना का अधिकार का उल्लंघन माना गया। भारत के मुख्य न्यायमूर्ति डी. वाई. चंद्रचूड़ की अध्यक्षता में पांच न्यायाधीशों की न्यायपीठ ने स्पष्टतया व्यक्त किया कि यह योजना और इससे संबद्ध संशोधनों ने निर्वाचन प्रक्रिया में कारपोरेट के अनियंत्रित दखल एवं प्रभाव को बढ़ावा दिया है। उच्चतम न्यायालय ने पूर्ण गोपनीयता (absolute non-disclosure) के अंतर्निहित खतरों पर प्रकाश डालते हुए कहा कि इससे भ्रष्टाचार को बढ़ावा मिलता है, तथा दाताओं और राजनीतिक संस्थानों के बीच तत्प्रतित (quid pro quo) की प्रवृत्ति को बढ़ावा मिलता है।
इस निर्णय में ईबी योजना द्वारा उत्पन्न घोर असमानता, जिससे राजनीतिक भागीदारी में निगमों को आम नागरिकों से अधिक अनुचित लाभ प्राप्त हुआ, को रेखांकित किया गया। भारत के मुख्य न्यायमूर्ति ने इस बात पर बल दिया कि यह स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनावों के मूल सिद्धांत को कमजोर करता है तथा इससे राजनीतिक समानता, जो ‘एक व्यक्ति, एक मत’ के सार में समाहित है, समाप्त होती है। इस निर्णय का मुख्य बिंदु व्यक्तियों द्वारा समर्थन की वास्तविक अभिव्यक्ति और निगमों द्वारा निहित स्वार्थों के लिए किए गए अंशदान या चंदे के बीच अंतर था। उच्चतम न्यायालय ने इस धारणा को खारिज कर दिया कि अनामता वित्तीय अंशदान को प्रोत्साहित करती है और बलपूर्वक कहा कि वास्तव में यह राजनीतिक वित्तपोषण के बारे में महत्वपूर्ण सूचना के लिए मतदाताओं के अधिकार से समझौता करता है।
इसके अलावा, उच्चतम न्यायालय ने काले धन पर अंकुश लगाने में योजना की प्रभावशीलता के बारे में सरकार के तर्क को खारिज कर दिया, जिसने सूचना के अधिकार के संबंध में इसकी विफलता को उजागर किया। उच्चतम न्यायालय ने ‘दोहरे आनुपातिकता मानकों’ को लागू करके, ईबी योजना के खंड 7(4) को असंवैधानिक माना, जैसा कि यह मतदाताओं के सूचना के अधिकार और दाताओं के निजता के अधिकार के बीच संतुलन बनाने में विफल रहा। यह निर्णय इसके बाद उन विधायी संशोधनों की संवीक्षा, जो अनामता की सुविधा प्रदान करते हैं, तथा पारदर्शिता और जवाबदेही पर उनके प्रभाव की आलोचना करता है। मुख्य विधायी अधिनियमों में किए गए संशोधनों ने प्रभावी रूप से कारपोरेट चंदों पर प्रतिबंधों को हटा दिया, जिससे निर्वाचन प्रक्रिया की सत्यनिष्ठा कमजोर पड़ गई।
अंततः, यह निर्णय लोकतांत्रिक सिद्धांतों की सुदृढ़ता के साथ पुष्टि करता है, तथा पारदर्शिता, जवाबदेही और राजनीतिक प्रभाव के न्यायसंगत वितरण के सर्वोच्च महत्व की पुष्टि करता है। याचियों, जिनका प्रतिनिधित्व प्रमुख अधिवक्ताओं द्वारा किया गया था, ने सरकार के उद्देश्य को चुनौती दी, जिसके परिणामस्वरूप यह ऐतिहासिक निर्णय आया, जिसने भारत में राजनैतिक वित्तपोषण के परिदृश्य को नया रूप दिया।
उच्चतम न्यायालय का निर्णय
एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स एंड अनदर बनाम यूनियन ऑफ इंडिया एंड अदर्स (2024) मामले में उच्चतम न्यायालय ने पुष्टि की कि लोकतंत्र में राजनीतिक समानता के लिए पूरी जानकारी के साथ मतदान का अधिकार आवश्यक है। इस निर्णय का भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था पर महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ा, जैसा कि उच्चतम न्यायालय ने कई संसदीय विधियों को असंवैधानिक माना, विशिष्ट रूप से 2016 और 2017 के वित्त अधिनियम के माध्यम से चार अधिनियमों में किए गए संशोधन को असंवैधानिक माना। ये संशोधित अधिनियम हैं: लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951; विदेशी अभिदाय (विनियमन) अधिनियम 2010; आय-कर अधिनियम 1961; और कंपनी अधिनियम, 2013।
ईबी योजना को अनुच्छेद 19(1)(क) का उल्लंघन करने वाला और असंवैधानिक घोषित करने वाले उच्चतम न्यायालय के निर्णय के पीछे कई मुख्य कारण हैं, जिन्हें अधिमत (verdict) में स्पष्ट किया गया है। इस योजना ने दाताओं को अपनी पहचान और अंशदान विवरण को गुप्त रखने की अनुमति दी; इस प्रकार, इसने राजनीतिक वित्तपोषण में पारदर्शिता को खत्म कर दिया। इसके अलावा, कारपोरेट चंदों पर सीमा जैसे महत्वपूर्ण सुरक्षा उपायों को हटाने से संभावित रूप से असीमित कारपोरेट निधीयन और राजनीतिक वित्तपोषण के लिए शेल कंपनियों (ऐसी महत्वपूर्ण कंपनी जिसका शेयर मूल्य [स्टॉक एक्सचेंज पर], जैसे कि उसका स्तर, अन्य कंपनियों द्वारा खरीदा जा सकता है।) के निर्माण को सक्षम किया गया।
आनुपातिकता परीक्षण का अनुप्रयोग
उच्चतम न्यायालय ने परस्पर विरोधी मूल अधिकारों के बीच संतुलन बनाने के संदर्भ में दाताओं के सूचना के अधिकार को प्राथमिकता देने के लिए आनुपातिकता परीक्षण (proportionality test) का उपयोग किया। उच्चतम न्यायालय ने मूल अधिकारों के बीच संतुलन बनाने के लिए अतीत में प्रयुक्त विभिन्न मानकों का संदर्भ दिया, जिनमें सामूहिक हित या लोक हित मानक, एकल आनुपातिकता मानक और दोहरा आनुपातिकता मानक शामिल हैं।
आनुपातिकता के सिद्धांत ने इस योजना की संवैधानिकता के मूल्यांकन में उच्चतम न्यायालय द्वारा प्रयुक्त एक मूलभूत ढांचे के रूप में कार्य किया।
उच्चतम न्यायालय ने विनिर्णय दिया कि ईबी योजना, गुप्त राजनीतिक चंदे की अनुमति देकर, भारत के संविधान के अनुच्छेद 19(1)(क) के तहत सूचना के मूल अधिकार का अतिलंघन करती है। उच्चतम न्यायालय ने इस बात पर जोर दिया कि यह अधिकार सहभागी लोकतंत्र के लिए आवश्यक है, जो सरकार को जवाबदेह बनाए रखने में सहायता करता है। उच्चतम न्यायालय ने राजनीतिक भागीदारी पर आर्थिक असमानता के हानिकारक प्रभाव पर प्रकाश डाला और राजनीतिक दलों को वित्तीय अंशदान के परिणामस्वरूप होने वाली तत्प्रतित (quid pro quo) व्यवस्था की संभावना को स्पष्ट किया।
उच्चतम न्यायालय ने सरकार के इस तर्क को खारिज कर दिया कि इस योजना से काले धन पर अंकुश लगेगा, और कहा कि इस प्रकार का समर्थन मूल अधिकारों के अधिक्रमण को उचित नहीं ठहराता। इस निर्णय ने के. एस. पुट्टस्वामी मामले से आनुपातिकता परीक्षण का हवाला देते हुए इस बात पर जोर दिया कि सरकार ने अपने उद्देश्य को प्राप्त करने के लिए न्यूनतम प्रतिबंधात्मक तरीका नहीं अपनाया। उच्चतम न्यायालय ने गुप्त चंदे को सीमित करने और चुनावी ट्रस्टों का उपयोग करने जैसे विकल्प सुझाए।
उच्चतम न्यायालय ने इसके बाद निश्चयपूर्वक कहा कि दाता की अनामता का अधिकार तत्प्रतित (quid pro quo) किए गए अंशदान पर लागू नहीं होता। उच्चतम न्यायालय ने वास्तविक राजनीतिक समर्थन और स्वार्थ के लिए किए गए अंशदान के बीच अंतर करते हुए निश्चयपूर्वक कहा कि यद्यपि वास्तविक राजनीतिक समर्थन गोपनीयता संरक्षण के योग्य है, तथापि नीतियों को प्रभावित करने के प्रयोजन से किए गए अंशदान को ऐसा नहीं माना जाना चाहिए।
ईबी योजना के संदर्भ में, मुख्य न्यायाधीश चंद्रचूड़ ने मूल अधिकारों के बीच परस्पर विरोध को संतुलित करने में एकल आनुपातिकता मानक की सीमाओं पर ध्यान दिलाया, विशिष्ट रूप से जब राज्य का हित किसी अन्य मूल अधिकार के अनुरूप होता है। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि आनुपातिकता मानक मूल अधिकारों को प्रमुखता देने और उन पर प्रतिबंधों को कम करने के लिए तैयार किया गया है। इस प्रकार, उन्होंने गोपनीयता और सूचना के प्रतिस्पर्धी मूल अधिकारों को मान्यता देते हुए ‘दोहरे आनुपातिकता’ परीक्षण की अवधारणा प्रस्तुत की।
आनुपातिकता का सिद्धांत यूरोपीय प्रशासनिक विधि से उत्पन्न हुआ है, और यह विहित करता है कि प्रशासनिक निणर्यों और आदेशों को व्यक्तिगत अधिकारों को केवल उस सीमा तक निर्बंधित करना चाहिए जो विधिसम्मत लोक प्रयोजन को प्राप्त करने के लिए आवश्यक हो। निर्णय-कर्ताओं को अपने कार्यों की आनुपातिकता पर विचार करने की आवश्यकता बताकर, यह सिद्धांत व्यक्तियों के अधिकारों की रक्षा करता है तथा यह सुनिश्चित करता है कि सरकारी कार्य लोकतांत्रिक सिद्धांतों और संवैधानिक मानदंडों के अनुरूप हों।
दूसरे शब्दों में, आनुपातिकता का सिद्धांत वांछित उद्देश्य और उसे प्राप्त करने के लिए नियोजित साधनों के बीच एक युक्तियुक्त अंतर्संबंध स्थापित करने का प्रयास करता है। यह भिन्न-भिन्न उद्देश्यों या हितों का आकलन करने के लिए एक संतुलन परीक्षण के समान है, और यह सुनिश्चित करता है कि अपनाया गया उपाय आवश्यकता से अधिक निर्बंधनात्मक न हो। आनुपातिकता पुनर्विलोकन विषय-वस्तु और शामिल अधिकारों की प्रकृति के आधार पर तीव्रता में भिन्न हो सकती है, जिससे निर्णय की शुद्धता और उस तक पहुंचने के लिए उपयोग की जाने वाली विधि दोनों का मूल्यांकन करने के लिए न्यायिक पुनर्विलोकन के दायरे का विस्तार होता है।
आनुपातिकता के दो मुख्य मॉडल हैं—ब्रिटिश मॉडल और यूरोपीय मॉडल। ब्रिटिश मॉडल विधायी उद्देश्यों की आवश्यकता पर जोर देता है और प्रशासनिक कार्रवाइयों को उन उद्देश्यों को प्राप्त करने के लिए आवश्यक समझे जाने वाले कार्यों तक सीमित रखता है। यह न्यायिक सम्मान और अवरोध पर जोर देता है, विशिष्ट रूप से उन मामलों में जहां मूल अधिकार दांव पर लगे हों। दूसरी ओर, प्रशिया (Prussia) से उत्पन्न यूरोपीय मॉडल, प्रशासनिक उपायों की वैधता, उपयुक्तता, आवश्यकता और आनुपातिकता का आकलन करने के लिए चार-चरणीय परीक्षण को अपनाता है। यह अधिकारों को सीमित करने और विधायी लक्ष्यों को प्राप्त करने के बीच संतुलन को अनुकूलित करने का प्रयास करता है, साथ ही न्यायिक मर्यादा और अवरोध के महत्व को भी संबोधित करता है।
परीक्षण के आवेदन के लिए मानदंड: l अधिकारों का अधिक्रम (Hierarchy of rights): उच्चतम न्यायालय ने सबसे पहले यह मूल्यांकन किया कि परस्पर विरोधी अधिकारों के बीच कोई अधिक्रम/अनुक्रम मौजूद है या नहीं। यदि भारत के संविधान द्वारा किसी एक अधिकार को उच्च दर्जा दिया गया है, तो वह दूसरे अधिकार पर अभिभावी होगा। हालांकि, जब कोई अधिक्रम मौजूद नहीं था, तो न्यायालय आनुपातिकता परीक्षण के अगले चरणों की ओर प्रवृत्त हुआ।
- उपाय की उपयुक्तता: उच्चतम न्यायालय ने मूल्यांकन किया कि क्या विचाराधीन उपाय दोनों परस्पर विरोधी अधिकारों को आगे बढ़ाने के लिए उपयुक्त है। यह आवश्यक नहीं था कि ये उपाय अधिकारों को साकार करने में एकमात्र सक्षम साधन हो; अधिकारों की आंशिक पूर्ति ही पर्याप्त थी। ईबी योजना के मामले में, इस उपाय का उद्देश्य अंशदाताओं की गोपनीयता के अधिकार और मतदाताओं के सूचना के अधिकार दोनों की रक्षा करना था।
- न्यूनतम निर्बंधनात्मक और समान रूप से प्रभावी उपाय: उच्चतम न्यायालय ने निर्धारित किया कि क्या यह उपाय दोनों परस्पर विरोधी अधिकारों को प्राप्त करने के लिए सबसे कम निर्बंधनात्मक और समान रूप से प्रभावी साधन है। इसने मूल्यांकन किया कि क्या वैकल्पिक उपाय मौजूद हैं जो अधिकारों को वास्तविक और पर्याप्त तरीके से पूरा कर सकते हैं और साथ ही उन्हें अलग तरह से प्रभावित कर सकते हैं। निर्वाचन संबंधी निधीयन के मामले में, उच्चतम न्यायालय ने इस बात पर विचार किया कि क्या ऐसे वैकल्पिक तंत्र थे, जो दाता की गोपनीयता की रक्षा करते हुए पारदर्शिता प्रदान कर सकते हैं।
- असंगत प्रभाव: उच्चतम न्यायालय ने विश्लेषण किया कि क्या इस उपाय का दोनों परस्पर विरोधी अधिकारों पर असंगत प्रभाव पड़ा है। इसने आकलन किया कि क्या एक अधिकार में हस्तक्षेप की लागत दूसरे की पूर्ति की सीमा के आनुपातिक थी। इस चरण में, उच्चतम न्यायालय ने संबद्ध विचारों के तुलनात्मक महत्व और अधिकारों के अतिलंघन के औचित्य पर विचार किया। इसने यह भी आकलन किया कि क्या सूचना के अधिकार जैसे एक अधिकार के अतिलंघन का प्रभाव, निजता के अधिकार जैसे लक्ष्य को प्राप्त करने के आनुपातिक था।
ईबी योजना के मूल्यांकन में, उच्चतम न्यायालय ने दोनों परस्पर विरोधी अधिकारों पर एकल आनुपातिकता मानक लागू किया, जिससे एक संतुलित दृष्टिकोण सुनिश्चित हुआ, और इसका उद्देश्य यह आकलन करना था कि क्या यह योजना अंशदाताओं की सूचनात्मक अनामता और मतदाताओं के सूचना के अधिकार के परस्पर विरोधी अधिकारों को पर्याप्त रूप से संतुलित करती है। अंततः, इस व्यापक आनुपातिकता परीक्षण को लागू करके, उच्चतम न्यायालय ने ईबी योजना के संदर्भ में मतदाताओं के सूचना के अधिकार का सर्वोपरि होना मान्य ठहराया, जिससे निर्वाचन प्रक्रिया में पारदर्शिता को प्राथमिकता दी गई। - सांविधानिक अधिक्रम नहीं: उच्चतम न्यायालय ने स्थापित किया कि दो अधिकारों—अंशदाताओं की सूचनात्मक गोपनीयता का अधिकार और मतदाताओं की सूचना का अधिकार—के बीच कोई अंतर्निहित अधिक्रम नहीं है। यह माना गया कि दोनों अधिकार मूल अधिकार हैं और भारत के संविधान के अनुच्छेद 19(1)(क) में निहित हैं। यह नोट कर लिया गया था कि राजनीतिक अंशदान की अनामता का अधिकार राजनीतिक भाषण और अभ्यापत्ति (Protest) जैसे अन्य मूल अधिकारों को सुविधाजनक बनाता है, लेकिन राजनीतिक निधीयन के बारे में जानकारी का अधिकार एक सूचित निर्वाचक मंडल के लिए समान रूप से महत्वपूर्ण है।
- उपयुक्तता के आयाम (prong) का विश्लेषण: उच्चतम न्यायालय को ज्ञात हुआ कि ईबी योजना का खंड 7(4), जो ईबी के क्रेताओं द्वारा प्रदान की गई जानकारी की गोपनीयता को अनिवार्य बनाता है, मतदाता के सूचना के अधिकार से संबंधित उपयुक्तता के आयाम (prong—किसी बहुआयामी अवधारणा या तर्क का एक पहलू या भाग) को पूरा करने में विफल रहा। यद्यपि इस खंड का उद्देश्य अंशदाताओं की अनामता की रक्षा करना था, तथापि मतदाताओं को राजनीतिक अंशदान या चंदा के प्रकटीकरण के उद्देश्य पर विचार करते समय इसमें युक्तिसंगत अंतर्संबंध का अभाव था। मतदाताओं को जानकारी का खुलासा न करना राजनीतिक निधीयन के बारे में जानकारी हासिल करने के मूल उद्देश्य का खंडन करता है, जिससे यह खंड पारदर्शिता के उद्देश्य को प्राप्त करने में अनुपयुक्त हो जाता है।
- वैकल्पिक उपायों की विद्यमानता: उच्चतम न्यायालय ने लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 29ग जैसे वैकल्पिक उपायों का विद्यमानता पर प्रकाश डाला, जो वास्तविक और अधिष्ठायी तरीके से दोनों अधिकारों की रक्षा करने का एक साधन है। धारा 29ग के तहत राजनीतिक दलों को 20,000 रुपये से अधिक के अंशदान का खुलासा करना अनिवार्य है, जिससे राजनीतिक निधीयन में पारदर्शिता सुनिश्चित होती है, जबकि मूल अधिकारों पर कम निर्बंधन लगाए जाते हैं। उच्चतम न्यायालय ने तर्क दिया कि सीमा से अधिक अंशदान सरकारी निर्णयों को प्रभावित करने की क्षमता रखता है, इसलिए ऐसे मामलों में सूचना के अधिकार को सूचनात्मक अनामता पर प्राथमिकता दी जानी चाहिए।
- संतुलन का आयाम अनावश्यक: चूंकि ईबी योजना के खंड 7(4) को परस्पर विरोधी अधिकारों को संतुलित करने के लिए अपर्याप्त माना गया था, इसलिए उच्चतम न्यायालय ने निष्कर्ष निकाला कि आनुपातिकता परीक्षण के संतुलन का आयाम अनावश्यक था। यह खंड अंशदाताओं की अनामता की रक्षा करने और राजनीतिक निधीयन के बारे में जानकारी तक मतदाताओं की पहुंच सुनिश्चित करने के दोहरे उद्देश्यों को प्राप्त करने के लिए सबसे कम निर्बंधनात्मक साधन को निरूपित नहीं करता था।
इस प्रकार, उच्चतम न्यायालय ने आनुपातिकता परीक्षण के अपने अनुप्रयोग के माध्यम से, इस योजना के दाता की अनामता पर जोर देने की तुलना में मतदाताओं के सूचना के अधिकार को प्राथमिकता दी। उच्चतम न्यायालय को बोध हुआ कि ईबी योजना के खंड 7(4) लोक सूचना हितों की कीमत पर सूचनात्मक अनामता का अत्यधिक पक्ष लेती थी, जिससे परस्पर विरोधी अधिकारों के बीच संतुलन में व्यवधान आया।
धारा 7(4) को दोहरे आनुपातिकता मानक को पूरा न करने के कारण केवल निरस्त करने के बजाय, उच्चतम न्यायालय ने संपूर्ण ईबी योजना को असंवैधानिक माना। यह निर्णय इस समझ से दिया गया है कि अंशदाताओं की अनामता इस योजना की परिकल्पना के लिए आधारिक थी। उच्चतम न्यायालय ने तर्क दिया कि यदि अनामता के घटक को हटा दिया जाता है, तो यह योजना बैंकिंग चैनलों, जैसे चेक ट्रांसफर या इलेक्ट्रॉनिक क्लियरिंग सिस्टम्स, के माध्यम से अंशदान के अन्य तरीकों से अलग नहीं होगी।
योजना को अमान्य घोषित करना
उच्चतम न्यायालय ने इलेक्टोरल बॉण्ड जारी करने पर तत्काल रोक लगाने के निर्देश जारी किए और एसबीआई को राजनीतिक दलों द्वारा खरीदे गए इलेक्टोरल बॉण्ड का ब्यौरा उपलब्ध कराने का निर्देश दिया। उसने भारत निर्वाचन आयोग (ईसीआई) को यह जानकारी अपनी वेबसाइट पर प्रकाशित करने का भी निर्देश दिया। इसके अतिरिक्त, विधिमान्यता अवधि के भीतर लेकिन राजनीतिक दलों द्वारा अभी तक न भुनाए गए इलेक्टोरल बॉण्ड को वापस किया जाना चाहिए, साथ ही खरीददारों को प्रतिदान (रिफंड) जारी किया जाना चाहिए।
उच्चतम न्यायालय ने कंपनी अधिनियम, 2013 की धारा 182 में संशोधन की भी आलोचना की, जिसके तहत कंपनियों को असीमित राजनीतिक अंशदान की अनुमति दी गई है, तथा कहा कि यह स्पष्टतः मनमाना रवैया है। इसने राजनीतिक प्रक्रिया में व्यक्तियों की तुलना में कंपनियों के असंगत प्रभाव पर प्रकाश डाला, तथा स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव कराने की आवश्यकता पर बल दिया गया।
उच्चतम न्यायालय ने लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 29ख के तहत इलेक्टोरल बॉण्ड के माध्यम से चंदे को प्रकटीकरण आवश्यकताओं से छूट देने वाले संशोधन को रद्द कर दिया। इसने 20,000 रुपये से अधिक के अंशदान के लिए मूल प्रकटीकरण आवश्यकता को बहाल कर दिया।
संपूर्ण ईबी योजना को अविधिमान्य करके, उच्चतम न्यायालय ने मतदाताओं के सूचना के अधिकार को सर्वोपरि होना मान्य ठहराया, जिससे राज्य की कार्रवाइयों के लिए मूल अधिकारों का सम्मान करते हुए अपने उद्देश्यों के अनुरूप बने रहना सुनिश्चित हुआ। यह निर्णय राजनीतिक वित्तपोषण में पारदर्शिता और जवाबदेही की रक्षा के लिए उच्चतम न्यायालय की प्रतिबद्धता को स्पष्ट करता है, जिससे भारत के संविधान में निहित लोकतांत्रिक सिद्धांत सुदृढ़ बनेंगे।
निष्कर्षतः, उच्चतम न्यायालय का अधिमत लोकतांत्रिक मूल्यों की दृढ़ पुष्टि है, जो निर्वाचन प्रक्रियाओं में पारदर्शिता, जवाबदेही और निष्पक्षता की अनिवार्यता पर जोर देता है। यह लोकतांत्रिक संस्थाओं की सत्यनिष्ठा को बनाए रखने और नागरिकों के अधिकारों को प्रभाव और भ्रष्टाचार से बचाने के लिए एक मिसाल कायम करता है।
भारत में कुछ महत्वपूर्ण निर्णय जिनमें आनुपातिकता के सिद्धांत को लागू किया गया है, उनमें शामिल हैं:
- चिंतामन राव बनाम मध्य प्रदेश राज्य (1950) मामले में विधायी या प्रशासनिक निर्बंधनों के विरुद्ध मूल अधिकारों के बीच संतुलन बनाने पर जोर दिया गया और इसने भारतीय विधि में आनुपातिकता के सिद्धांत को लागू करने के लिए आधार तैयार किया।
- हिंद कंस्ट्रक्शन एंड इंजीनियरिंग कंपनी लिमिटेड बनाम देयर वर्कमेन (1964) मामले में छोटी गलती के लिए श्रमिकों को बर्खास्त किए जाने के विरुद्ध विनिर्णय दिया गया और इसने रोजगार संबंधी मामलों में आनुपातिकता के सिद्धांत पर प्रकाश डाला।
- भगत राम बनाम हिमाचल प्रदेश राज्य और अन्य (1983) मामले में अभिनिर्धारित किया गया कि अनुपातहीन दंड भारत के संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन है और इसने अनुशासनात्मक कार्रवाइयों में आनुपातिकता की प्रासंगिकता पर बल दिया।
- रंजीत ठाकुर बनाम भारत संघ और अन्य (1987) मामले में रंजीत कुमार को सजा काटते समय भोजन से इनकार करने के अपराध के लिए सेवा से बर्खास्त करना अनुपातहीन पाया गया। इसने अनुशासनात्मक मामलों में आनुपातिकता के अनुप्रयोग की पुष्टि की।
- ओम कुमार और अन्य बनाम भारत संघ (2000) मामले में प्रशासनिक कार्यों के पुनर्विलोकन में आनुपातिकता के सिद्धांत को मान्यता दी गई और भारत के संविधान के अनुच्छेद 14, 19 और 21 का अतिलंघन करने वाले मामलों में इस सिद्धांत को लागू किया गया।
- संदीप सुभाष पराते बनाम महाराष्ट्र राज्य और अन्य (2006) मामले में एक विश्वविद्यालय को अपीलार्थी छात्र को अविधिमान्य जाति प्रमाणपत्र के साथ डिग्री प्रदान करने का निर्देश दिया गया और इस अन्याय के लिए आनुपातिक उपाय के रूप में मुआवजा देने का आदेश दिया गया।
- सहारा इंडिया रियल एस्टेट कॉर्पोरेशन लिमिटेड और अन्य बनाम भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड और एक अन्य (2012) मामले में उच्चतम न्यायालय ने संरचित आनुपातिकता मानक के समान दो-आयामी (two-prong) मानक विकसित किया। जनहित मानक में प्रतिस्पर्धी अधिकारों के सांविधानिक मूल्यों का आकलन और उस मूल्य को अधिक महत्व देना शामिल था जो जनहित के उच्च स्तर को बढ़ावा देता है। ये मानक उपाय की आवश्यकता पर केंद्रित थे और क्या इसके लाभकारी प्रभाव मूल अधिकारों पर इसके हानिकारक प्रभावों से अधिक थे।
- मजदूर किसान शक्ति संगठन बनाम भारत संघ और अन्य (2018) में उच्चतम न्यायालय ने सबसे कम निर्बंधनात्मक आयाम (prong) पर विचार करते हुए आनुपातिकता-पूर्व चरण से आनुपातिकता चरण की ओर कदम बढ़ा दिया।
- संरचित आनुपातिकता मानक का उपयोग न्यायमूर्ति के. एस. पुट्टस्वामी (सेवानिवृत्त) और एक अन्य बनाम भारत संघ (2019) मामले में किया गया था, जहां उच्चतम न्यायालय ने सूचनात्मक अनामता के अधिकार को भोजन के अधिकार के साथ संतुलित किया था, और उच्चतम न्यायालय को ज्ञात हुआ था कि भोजन के अधिकार को बढ़ावा देने वाले उपबंध निजता के अधिकारों पर न्यूनतम अधिभार के साथ व्यापक लोक हित को संतुष्ट करते हैं।
- केंद्रीय लोक सूचना अधिकारी, भारत का उच्चतम न्यायालय बनाम सुभाष चंद्र अग्रवाल (2019) मामले में भारत के मुख्य न्यायमूर्ति ने इस बात पर जोर दिया कि न्यायालयों को दो मूल अधिकारों के बीच संतुलन बनाते समय प्रकटीकरण और अनामता दोनों के पक्ष में सटीक हितों की पहचान करने की आवश्यकता है। न्यायालय को केवल सैद्धांतिक विश्लेषण नहीं करना चाहिए, बल्कि प्रत्येक अधिकार के व्यावहारिक निहितार्थों पर भी विचार करना चाहिए।
- विमुद्रीकरण: आनुपातिकता के सिद्धांत ने 2016 में 500 और 1000 रुपये के नोटों के विमुद्रीकरण के संबंध में उच्चतम न्यायालय के निर्णय में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। केंद्र सरकार के फैसले को बरकरार रखते हुए, उच्चतम न्यायालय ने निष्कर्ष निकाला कि विमुद्रीकरण काले धन और नकली मुद्रा पर अंकुश लगाने के घोषित उद्देश्यों के लिए असंगत नहीं था। विमुद्रीकरण से पहले केंद्र और भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के बीच परामर्श पर्याप्त माना गया, और विमुद्रीकरण की घोषणा करने वाली अधिसूचना को युक्तियुक्त माना गया।
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