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उच्चतम न्यायालय में एडवोकेट-ऑन-रिकॉर्ड्स

उच्चतम न्यायालय की हाल की कार्रवाइयों ने एडवोकेट-ऑन-रिकॉर्ड (एओआर) की भूमिका और भारत की विधिक व्यवस्था के भीतर इस महत्वपूर्ण घटक के कार्यकरण पर नए सिरे से ध्यान आकर्षित किया है। नवंबर 2023 में, उच्चतम न्यायालय ने एक एओआर को साधारण मामला दायर करने पर रोक दिया और जनहित याचिका (पीआईएल) को खारिज कर दिया। उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश संजय किशन कौल, सुधांशु धूलिया और पी.के. मिश्रा वाली न्यायपीठ ने वकील को दोषी ठहराया कि एओआर केवल हस्ताक्षर करने वाला प्राधिकारी नहीं हो सकता है, जो इन विधिवृत्तिकों (legal professional) द्वारा निभाई जाने वाली मूलभूत जिम्मेदारी को स्पष्ट करता है। इससे पहले सितंबर 2023 में, उच्चतम न्यायालय की भारत के मुख्य न्यायमूर्ति (सीजेआई) डॉ. डी. वाई. चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली न्यायपीठ, जिसमें न्यायाधीश पी. एस. नरसिम्हा और मनोज मिश्रा भी शामिल थे, ने एक एओआर पर बिना किसी वैध कागजात के अपने कनिष्ठ को न्यायपीठ के समक्ष पेश होने के लिए भेजने पर 2,000 रुपये का जुर्माना लगाया था। न्यायपीठ ने उच्चतम न्यायालय की एओआर व्यवस्था में सुधार करने के लिए एक व्यापक योजना का भी आह्वान किया है। यह विधिज्ञ परिषद (बार काउंसिल) के सहयोग से किया जाएगा।

केवल हस्ताक्षरकर्ता होने के अलावा, एओआर वादकारियों और देश के सर्वोच्च न्यायालय के बीच महत्वपूर्ण कड़ी के रूप में कार्य करते हैं। चूंकि उच्चतम न्यायालय एओआर व्यवस्था की प्रभावकारिता को बढ़ाने के लिए सुधारों पर विचार-विमर्श कर रहा है, इसलिए यह लीगल फैटर्निटी (ऐसे लोगों का समूह जिनका काम या अभिरुचि एक जैसी होती है, जैसे कि वकील) के भीतर इस विशेष काडर के महत्व और जटिलताओं के गहन निरीक्षण को प्रेरित करता है।

एडवोकेट-ऑन-रिकॉर्ड

एओआर व्यवस्था को पहली बार 1996 में उच्चतम न्यायालय के नियमों के माध्यम से प्रस्तुत किया गया था, जिसे बाद में 2013 और 2019 में संशोधित किया गया। एओआर एक अधिवक्ता होता है जो भारत के उच्चतम न्यायालय द्वारा तैयार किए गए सुप्रीम कोर्ट नियम, 2013 के आदेश IV के तहत विधिवत रूप से प्राधिकृत किया जाता है ताकि यह उच्चतम न्यायालय के परिसर के भीतर अपने मुवक्किलों की ओर से वकालत कर सके। एओआर को सीधे उच्चतम न्यायालय के समक्ष विधिक कार्यवाही शुरू करने का विशेषाधिकार प्राप्त है, जो एक सुस्पष्ट परमाधिकार है जो अन्य विधि व्यवसायियों को नहीं दिया जाता है।

आवश्यक रूप से विधिवृत्तिकों के एक प्रवर काडर का गठन करते हुए, एओआर मुख्य रूप से उच्चतम न्यायालय के समक्ष विधि व्यवसाय (legal practice) में संलग्न होते हैं, जो उच्चतम न्यायालय द्वारा विशेष योग्यता रखने वाले व्यक्तियों के विवेकपूर्ण चयन को दर्शाता है। इस व्यवसाय की रूपरेखा इस विचार को बल देती है कि एओआर, जिनका चयन स्वयं उच्चतम न्यायालय द्वारा ध्यानपूर्वक किया जाता है, अकसर अंतिम अधिकारिता वाले न्यायालय के रूप में समझे जाने वाले मामलों में वादियों का प्रतिनिधित्व करने के लिए उपयुक्त रूप से तैयार होते हैं। उच्चतम न्यायालय के समक्ष केवल एओआर द्वारा ही मामले दायर किए जा सकते हैं। एओआर के पास उच्चतम न्यायालय के समक्ष दलीलें पेश करने के लिए एओआर के अलावा अन्य वरिष्ठ अधिवक्ताओं जैसे अन्य वकीलों को नियुक्त करने का अधिकार है। तथापि, एक एओआर अनिवार्य रूप से वादकारी और उच्चतम न्यायालय के बीच की कड़ी है। इसके अलावा, उच्चतम न्यायालय में विधि व्यवसाय करने वाला प्रत्येक अधिवक्ता एओआर नहीं होता। सुप्रीम कोर्ट एड्वोकेट्स-ऑन-रिकॉर्ड असोसिएशन (एससीएओआरए) एडवोकेट्स-ऑन-रिकॉर्ड का आधिकारिक संघ है।

सांविधानिक उपबंध

भारत में एओआर व्यवस्था का सांविधानिक आधार अधिवक्ता अधिनियम की धारा 30 में मिलता है। यह धारा विधिज्ञ परिषद में नामनिर्दिष्ट किसी भी वकील को देश में किसी भी न्यायालय या अधिकरण के समक्ष विधि व्यवसाय करने के अधिकार की पुष्टि करती है। हालांकि, यह भारत के संविधान के अनुच्छेद 145 के तहत विधि व्यवसाय के अधिकार को स्पष्ट रूप से संरक्षित करता है।

अनुच्छेद 145 उच्चतम न्यायालय को मामलों की सुनवाई के लिए अपनी स्वयं की प्रक्रियाएं बनाने और विनियमित करने की शक्ति प्रदान करता है। यह उपबंध उच्चतम न्यायालय को अपने अधिकार क्षेत्र के अंतर्गत एओआर से अपेक्षित अर्हताओं, जिम्मेदारियों और आचरण को परिभाषित करने का अधिकार देता है।

एओआर व्यवस्था स्वयं ब्रिटिश विधि परंपरा, विशेष रूप से बैरिस्टर और सॉलिसिटर के व्यवसायों से प्रेरणा लेती है। बैरिस्टर पारंपरिक रूप से न्यायालयों में वकालत करते हैं, जबकि सॉलिसिटर न्यायालय के बाहर मुवक्किलों के विधिक मामलों को संभालते हैं। इसी तरह, भारत के संदर्भ में, एओआर बैरिस्टर के समान ही उच्चतम न्यायालय के समक्ष प्राथमिक प्रतिनिधि के रूप में कार्य करते हैं। वे अपनी विशिष्ट अर्हताओं और जिम्मेदारियों के कारण अलग हैं, जिसमें मामले दर्ज करना और तर्क प्रस्तुत करना शामिल है।

एओआर बनने के लिए आवश्यक शर्तें

यदि कोई अधिवक्ता भारत के सुप्रीम कोर्ट नियम, 2013 और ‘रेगुलेशंस रिगार्डिंग एओआर एक्जामिनेशन’ में उल्लिखित अर्हताओं को पूरा करता है, तो उसे एओआर के रूप में नामांकित किया जा सकता है। अधिवक्ता को किसी भी राज्य विधिज्ञ परिषद में नामांकित होना आवश्यक है। उच्चतम न्यायालय में एओआर के रूप में विधि व्यवसाय शुरू करने के इच्छुक अधिवक्ताओं के लिए एक अतिरिक्त अर्हता की आवश्यकता होती है। अधिवक्ता के रूप में व्यक्ति के पास कम-से-कम चार वर्ष के विधि व्यवसाय का अनुभव होना चाहिए। उसके बाद, उसे परीक्षा देने के लिए उच्चतम न्यायालय को यह दिखाना होगा कि उसने एओआर के लिए अनुमोदित न्यायालय में कम-से-कम एक वर्ष के लिए प्रशिक्षण लेना शुरू कर दिया है। एक वर्ष का प्रशिक्षण पूरा होने के बाद, वह परीक्षा दे सकता है, जिसमें अधिवक्ता को प्रत्येक विषय में कम-से-कम 50 प्रतिशत के साथ न्यूनतम 60 प्रतिशत अंक प्राप्त करने होते हैं। परीक्षा के विषयों में विधि व्यवसाय और प्रक्रिया, प्रारूपण, व्यावसायिक नैतिकता, तथा अग्रनिर्णय (leading cases) शामिल हैं। एक बार जब कोई अधिवक्ता परीक्षा उत्तीर्ण कर लेता है और एओआर बन जाता है, तो उसे दिल्ली में उच्चतम न्यायालय से 16 किलोमीटर के दायरे में एक कार्यालय खोलना होता है। एओआर को उच्चतम न्यायालय में एओआर के रूप में पंजीकृत होने के एक महीने के भीतर एक क्लर्क को नियुक्त करने का भी कार्य करना होता है। इन प्रक्रियाओं के पूरी होने के बाद ही, उच्चतम न्यायालय के चैंबर न्यायाधीश उसे एओआर के रूप में स्वीकार करते हैं।

सुप्रीम कोर्ट नियम, 2013, विनिर्दिष्ट रूप से आदेश IV नियम 5, में एओआर बनने के इच्छुक कुछ अधिवक्ताओं और सॉलिसिटरों को छूट प्रदान की गई है:

  • बॉम्बे इनकॉरपोरेटेड लॉ सोसाइटी में नामांकित सॉलिसिटरों को प्रशिक्षण और परीक्षण आवश्यकताओं से छूट प्रदान की गई है, यदि उनका नाम आवेदन के समय से कम-से-कम सात वर्षों तक राज्य विधिज्ञ परिषद की सूची में रहा हो।
  • राज्य विधिज्ञ परिषद की सूची में सूचीबद्ध अधिवक्ताओं को प्रशिक्षण से छूट दी गई है, यदि उनका नाम एओआर के पद के लिए आवेदन करने के समय कम-से-कम 10 वर्षों तक सूची में रहा हो।
  • विशेष विधिक ज्ञान या अनुभव रखने वाले अधिवक्ता प्रशिक्षण और परीक्षण आवश्यकताओं से छूट के पात्र हैं।

 

अधिवक्ता बनाम एडवोकेट-ऑन-रिकॉर्ड

अधिवक्ता

एडवोकेट-ऑन-रिकॉर्ड

  • अधिवक्ता एक विधिवृत्तिक (legal professional) होता है जो विनिर्दिष्ट शर्तों के अधीन किसी भी न्यायालय में किसी पक्ष या वादी का प्रतिनिधित्व करने के लिए अधिकृत होता है।
  • एडवोकेट-ऑन-रिकॉर्ड भारत के उच्चतम न्यायालय में पंजीकृत एक विधिवृत्तिक होता है, जो उसे किसी भी न्यायालय में पक्षों का प्रतिनिधित्व करने में सक्षम बनाता है।
  • भारत के उच्चतम न्यायालय में, कोई अधिवक्ता केवल एडवोकेट-ऑन-रिकॉर्ड द्वारा निर्देश दिए जाने पर या उच्चतम न्यायालय की अनुमति से ही अपना प्रतिनिधित्व कर सकता/सकती है।
  • एक एडवोकेट-ऑन-रिकॉर्ड किसी अन्य अधिवक्ता पर निर्भर हुए बिना उच्चतम न्यायालय में स्वयं का प्रतिनिधित्व कर सकता है, बशर्ते कि वह पंजीकरण संबंधी सभी आवश्यकताओं को पूरा करता हो।
  • यहां तक ​​कि यदि किसी अधिवक्ता को उच्चतम न्यायालय में तर्क करने की अनुमति दे दी जाए, तो भी वह अपना वकालतनामा (किसी मुवक्किल का प्रतिनिधित्व करने के लिए प्राधिकृति) दाखिल नहीं कर सकता।
  • उच्चतम न्यायालय में पंजीकृत मामलों में एडवोकेट-ऑन-रिकॉर्ड अपना स्वयं का वकालतनामा दाखिल कर सकता है।
  • कोई भी अधिवक्ता स्वतंत्र रूप से उच्चतम न्यायालय में विशेष अनुमति याचिका (एसएलपी) दायर नहीं कर सकता।
  • एक एडवोकेट-ऑन-रिकॉर्ड को उच्चतम न्यायालय में स्वतंत्र रूप से विशेष अनुमति याचिका दायर करने का अधिकार है।

 

एडवोकेट-ऑन-रिकॉर्ड की भूमिकाएं और जिम्मेदारियां

सुप्रीम कोर्ट नियम, 2013 के आदेश IV, नियम 7 में एओआर की भूमिकाओं और जिम्मेदारियों का स्पष्ट रूप से उल्लेख किया गया है, जो इस प्रकार हैं:

  • एओआर को ऐसे मामले में पक्षकार की ओर से कार्य करने तथा पैरवी करने, उक्त मामले के संबंध में न्यायालय के समक्ष की जाने वाली किसी भी कार्यवाही का संचालन करने तथा अभियोजन चलाने, तथा वकालतनामा  या प्राधिकृति पत्र के साथ पक्षकार की ओर से उपस्थिति ज्ञापन दाखिल करने के लिए अधिकृत किया गया है।
  • एओआर उक्त पक्ष की ओर से धन जमा कर सकता है और प्राप्त कर सकता है।
  • एओआर एकमात्र अधिवक्ता है जिसे न्यायालय में उपस्थित होने या किसी पक्ष का प्रतिनिधित्व करने की अनुमति है।
  • प्रत्येक एओआर के लिए लेखा बहियों का रखरखाव करना आवश्यक है, जो एओआर के रूप में उनके कार्य को प्रदर्शित करने और उन्हें कार्य से अलग करने के लिए आवश्यक है। लेखा बहियों में
    • उसके प्रत्येक मुवक्किल को या उसकी ओर से दिए गए धन के साथ-साथ उनसे या उनकी ओर से प्राप्त धन का भी उल्लेख होगा; तथा
    • प्राप्त धनराशि तथा स्वयं के खाते में भुगतान की गई धनराशि का उल्लेख होगा।
  • लागत बिल पर कर लगाने से पहले, प्रत्येक एओआर को कर अधिकारी के समक्ष एक प्रमाणपत्र दाखिल करना आवश्यक होता है, जिसमें उसे भुगतान की गई फीस की राशि या उसके मुवक्किलों द्वारा सहमत राशि का विवरण होता है।

आदेश IV, नियम 9 और 10 अवचार के परिणामों को विनिर्दिष्ट करते हैं, जिसमें

  • एओआर द्वारा मामले की कार्यवाही में आगे की अंतर्भागिता के बिना केवल नेम लेंडिंग  देना;
  • वह स्थिति जब मामला सुनवाई के लिए आता है और एओआर बिना किसी वैध कारण के न्यायालय से अनुपस्थित रहता है; तथा
  • उच्चतम न्यायालय में वास्तविक हाजिरी के संबंध में एओआर द्वारा विधिवत हस्ताक्षरित हाजिरी पर्ची प्रस्तुत करने में विफलता शामिल है।

एओआर व्यवस्था को उच्चतम न्यायालय के सुचारु कार्यकरण को समर्थन देने के लिए बनाया गया है। उच्चतम न्यायालय द्वारा विचारण के प्रत्येक मामले में व्यापक अभिलेख (रिकॉर्ड) होते हैं, जिनमें अकसर स्थानीय भाषाओं में दस्तावेज शामिल होते हैं। उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश उच्चतम न्यायालय की कार्य-प्रणाली और प्रक्रिया से तुरंत परिचित नहीं हो सकते हैं, क्योंकि इन्हें पूरे भारत के उच्च न्यायालयों से पदोन्नत किया जाता है। उन्हें जानकार और प्रशिक्षित एओआर के समर्थन की आवश्यकता हो सकती है।

याचिकाओं और मुख्तारनामों (पावर ऑफ अटॉर्नी) पर हस्ताक्षर करने के अलावा, एओआर प्रासंगिक तथ्यों को संकलित करने, महत्वपूर्ण विधिक मुद्दों का निर्धारण करने और उच्चतम न्यायालय के समक्ष मामले को उचित रूप से तैयार करने और प्रस्तुत करने का भी प्रभारी होता है। एओआर को वरिष्ठ अधिवक्ता के रूप में नामित करने, तथा उच्च न्यायालयों और उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश के रूप में पदोन्नत करने के लिए भी अलग से विचार किया जाता है।

एडवोकेट-ऑन-रिकॉर्ड व्यवस्था: कुछ मुद्दे

प्राधिकार का दुरुपयोग: विनिर्दिष्ट जिम्मेदारियों और योग्यताओं के बावजूद, एओआर द्वारा पर्याप्त तैयारी के बिना या उच्चतम न्यायालय में पेश हुए बिना मामले दर्ज करने के उदाहरण देखे गए हैं। यह एओआर व्यवस्था और कार्यवाही की सत्यता को कमजोर करता है।

पेशेवर नैतिकता को बनाए रखने में विफलता: कुछ एओआर एसएलपी दाखिल करने या प्रस्तुतियों की सटीकता या पर्याप्तता सुनिश्चित किए बिना हाजिरी दर्ज करने के लिए नेम लेंडिंग  करते पाए गए हैं। यह व्यवहार उच्चतम न्यायालय के समक्ष विधिक प्रतिनिधित्व की गुणवत्ता और सत्यनिष्ठा से समझौता करती है।

अपर्याप्त जवाबदेही: एओआर को उनके कार्यों के लिए उत्तरदायी ठहराने के लिए मौजूदा तंत्र अपर्याप्त माने जाते हैं। कदाचार या निरर्थक फाइलिंग के लिए कठोर परिणामों की कमी है, जिससे कुछ विधि व्यवसाय करने वालों के बीच दंड मुक्ति की संस्कृति विकसित हो रही है।

आगे की राह

भारत के उच्चतम न्यायालय में एओआर की भूमिका उच्चतम न्यायालय के सुचारु कार्यकरण को सुनिश्चित करने के लिए महत्वपूर्ण है। एओआर को सौंपी गई महत्वपूर्ण जिम्मेदारियों और विधि व्यवसाय की उभरती गतिशीलता को देखते हुए, मौजूदा व्यवस्था में संभावित परिवर्तनों या संवर्धनों पर विचार करना अनिवार्य है।

  • कठोर परिणामों का प्रभाव: नेम लेंडिंग  या निरर्थक याचिका दायर करने वाले अधिवक्ताओं के लिए कठोर दंड होना चाहिए। यह उपाय अनैतिक प्रथाओं को रोकेगा और विधिवृत्ति (legal profession) की सत्यनिष्ठा को बनाए रखेगा।
  • अनिवार्य उपस्थिति की आवश्यकता: एओआर या एओआर फर्मों के प्रतिनिधियों को उन मामलों में सुनवाई के लिए शारीरिक रूप से या आभासी रूप से उपस्थित होना आवश्यक होना चाहिए, जहां उन्होंने वकालतना में दायर किए हैं। यह विधिक कार्यवाहियों में जवाबदेही और सक्रिय भागीदारी सुनिश्चित करता है।
  • उन्नत प्रशिक्षण और अनुभव मानदंड: आकांक्षी अधिवक्ताओं को प्रशिक्षण देने के लिए जिम्मेदार वरिष्ठ एओआर को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि अभ्यर्थियों ने वरिष्ठ अधिवक्ताओं के अधीन नियमित रूप से काम करके या विनिर्दिष्ट अवधि के लिए उच्चतम न्यायालय में विधि व्यवसाय करके व्यावहारिक अनुभव प्राप्त किया है। इससे यह सुनिश्चित होगा कि अभ्यर्थी उच्चतम न्यायालय की चुनौतियों के लिए अच्छी तरह से तैयार हैं।
  • अहर्ता सीमा में वृद्धि: एओआर बनने के लिए आवश्यक अहर्ताओं की समय-समय पर समीक्षा की जानी चाहिए और उन्हें बढ़ाया जाना चाहिए ताकि विधिक जटिलताओं के अनुरूप मानकों को बनाए रखा जा सके।
  • फाइलिंग और हाजिरी की जांच: फाइलिंग और हाजिरी के रिकॉर्ड की गहन जांच की जानी चाहिए ताकि निर्धारित मानदंडों से किसी भी अनियमितता या विचलन का पता लगाया जा सके। यह सक्रिय उपागम असामान्य व्यवहार की पहचान करने और उन्हें सुधारने में सहायता करेगा।
  • निगरानी और निरीक्षण: किसी भी अनियमितता या कदाचार की पहचान करने के लिए एओआर की फाइलिंग और हाजिरी की निगरानी और निरीक्षण में वृद्धि करने की आवश्यकता है। इसमें फाइलिंग और हाजिरी का नियमित ऑडिट, साथ ही रिपोर्टिंग आवश्यकताओं का उचित प्रवर्तन शामिल किया जा सकता है।
  • उन्नत जवाबदेही मापदंड: एओआर को नियमों में उल्लिखित मौजूदा प्रमाणन प्रक्रिया के अलावा, प्रत्येक मामले का प्रारूप तैयार करने और दाखिल करने के लिए अपनी जिम्मेदारी की पुष्टि करने वाले घोषणापत्र पर हस्ताक्षर करने की आवश्यकता होनी चाहिए। यह जवाबदेही और नैतिक मानकों के पालन को सुदृढ़ करता है।
  • अतिरिक्त आचार संहिता की शुरुआत: एओआर के लिए विशेष रूप से तैयार की गई अतिरिक्त आचार संहिता और नैतिकता कानूनी बिरादरी के भीतर वृत्तिक मानकों और नैतिक आचरण को और सुदृढ़ बना सकती है।

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