भारत जैसे विविधतापूर्ण और गतिशील राष्ट्र में, इसकी संसद का कामकाज सबसे महत्वपूर्ण है। प्रत्येक सत्र के साथ, यह देश विचारों के जीवंत आदान-प्रदान, महत्वपूर्ण मुद्दों पर चर्चा और नीतियों के निर्माण का साक्षी बनता है जो इसकी द्रुतगति को आकार देते हैं। तथापि, ऐसे क्षण भी आते हैं जब परिस्थितियों की गंभीरता से निपटने के लिए विधायी निकाय द्वारा असाधारण प्रतिक्रिया की आवश्यकता होती है। ऐसे समय में संसद का विशेष सत्र बुलाना अनिवार्य हो जाता है। विशेष सत्र का सार उन आवश्यक मामलों, जिनके लिए नियमित संसदीय कार्यक्रम का इंतजार नहीं किया जा सकता, को संबोधित करने की क्षमता में निहित है। ये सत्र ऐसे महत्वपूर्ण मुद्दों, भले ही वे राष्ट्रीय सुरक्षा, आर्थिक संकट या महत्वपूर्ण विधायी सुधार के मामले हों, पर विचार-विमर्श करने के लिए बुलाए जाते हैं जिन पर तत्काल ध्यान देने की आवश्यकता होती है। संसद में विशेष सत्र बुलाने का निर्णय उभरती चुनौतियों से निपटने में भारत की लोकतांत्रिक संरचना की दक्षता और जवाबदेही को दर्शाता है।
विशेष सत्र
संसद का विशेष सत्र एक असाधारण बैठक होती है जो वर्ष में आयोजित होने वाले सामान्य संसदीय सत्रों से अलग बुलाई जाती है। यह संविधान के अनुच्छेद 85(1) के अनुपालन में बुलाई जाती है, जो संसद को बुलाने की प्रक्रिया को परिभाषित करता है। यह देश के राष्ट्रपति को आवश्यक समझे जाने पर विशेष सत्र सहित संसद को सत्र के लिए बुलाने का अधिकार प्रदान करता है। ‘विशेष सत्र’ शब्द कभी-कभी सरकार द्वारा विशिष्ट अवसरों, जैसे राष्ट्रीय या संसदीय उपलब्धि के अवसर पर समारोह के लिए बुलाया गया सत्र, को संदर्भित करता है। विशेष सत्र में, पीठासीन अधिकारी कार्यवाही की अध्यक्षता करता है, जो प्रश्नकाल, शून्यकाल या गैर-सरकारी सदस्य के कार्य आदि जैसे किसी भी प्रक्रियात्मक साधन के बिना सीमित होती हैं।
संसदीय सत्रों के लिए कोई कैलेंडर नियत नहीं है। हालांकि, एक वर्ष में तीन सत्र होते हैं जब संसद की बैठकें होती हैं, जो इस प्रकार हैं:
(i) बजट सत्र (फरवरी से मई तक);
(ii) मानसून सत्र (जुलाई से अगस्त तक), और
(iii) शीतकालीन सत्र (नवंबर से दिसंबर तक)।
भारत के संविधान के अनुच्छेद 85 के तहत संसद के लिए वर्ष में कम-से-कम दो बार बैठक करना अनिवार्य है। इसके अलावा, यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि संसद के ये दो सत्र छह महीने की अवधि के भीतर होने चाहिए, अर्थात सत्रों के बीच का अंतराल छह महीने से अधिक नहीं होना चाहिए। भारत सरकार अकसर ऐसे सत्रों की तिथियों में बदलाव करती है, ताकि कई राजनीतिक और विधायी आवश्यकताएं पूरी की जा सकें। उदाहरण के लिए, कई बार राज्य चुनावों के कारण संसद सत्र बुलाने में देरी हुई है। संसद को बुलाने का निर्णय संसदीय मामलों की मंत्रिमंडल समिति द्वारा लिया जाता है, जिसे भारत के राष्ट्रपति द्वारा औपचारिक रूप दिया जाता है, जिसके नाम पर सांसदों को सत्र के लिए बुलाया जाता है।
भारत की संसद में राष्ट्रपति, राज्य सभा (उच्च सदन) और लोक सभा (निम्न सदन) शामिल हैं। संसद का एक संघटक भाग होने के नाते, राष्ट्रपति संसद के विचार-विमर्श में भाग नहीं लेता है। तथापि, राष्ट्रपति को भारत के संविधान के अनुच्छेद 85 के तहत संसद को बुलाने और स्थगित करने का सांविधानिक अधिकार है, अर्थात राष्ट्रपति संसद या अन्य विधान सभाओं का विघटन किए बिना उनके सत्र को समाप्त कर सकता है।
विशेष सत्र की आवश्यकता क्यों
संविधान या संसद की नियम पुस्तिकाओं में ‘विशेष सत्र’ शब्द का कोई स्पष्ट उल्लेख नहीं है। इसी तरह, इस बारे में विनिर्दिष्ट दिशा-निर्देश नहीं हैं कि ऐसा सत्र किस प्रकार और कब बुलाया जा सकता है। अनुच्छेद 352 के अनुसार, यह सदन की ‘विशेष बैठक’ के संदर्भ में आपात की घोषणा से संबंधित है। इस खंड को चवालीसवां (संशोधन) अधिनियम, 1978 के माध्यम से आपात के विरुद्ध सुरक्षोपाय के रूप में जोड़ा गया था। (यह अधिनियम उपबंध करता है कि आपात की कोई भी उद्घोषणा केवल छह महीने की अवधि के लिए लागू होगी और इसे संसद द्वारा इसके बाद पारित प्रस्तावों द्वारा ही जारी रखा जा सकता है। यदि उद्घोषणा को जारी रखने को अस्वीकृत करने वाला प्रस्ताव पारित किया जाता है तो घोषणा भी लागू नहीं होगी। लोक सभा के दस प्रतिशत या उससे अधिक सदस्य उद्घोषणा को अस्वीकृत करने के प्रस्ताव पर विचार करने के लिए विशेष बैठक की मांग कर सकते हैं)।
अभी तक, कई विशेष सत्र बुलाए जा चुके हैं, जिनमें किसी विशेष प्रयोजन या राष्ट्रीय महत्व वाले एजेंडे के लिए मध्य रात्रि के सत्र भी शामिल हैं।
पृष्ठभूमि: संसद के सदनों को बुलाने की परंपरा भारत सरकार अधिनियम, 1935 में निहित है, जिसमें उपबंध किया गया था कि दो सत्रों के बीच 12 महीने से अधिक का अतंराल नहीं होना चाहिए। अनुच्छेद 69 के प्रारूप, जिसे बाद में अनुच्छेद 85 के रूप में जाना गया और जिसे शुरू में 1949 में संविधान सभा द्वारा शुरू किया गया था, में प्रस्तावित किया गया था कि संसद के दो सत्रों के बीच की अवधि को छह महीने से बदलकर तीन महीने कर दिया जाए ताकि भारत के नागरिकों के मुद्दों को संबोधित करने के लिए अधिक से अधिक समय समर्पित किया जा सके। प्रोफेसर के.टी. शाह के एक अन्य सुझाव में इस बात पर जोर दिया गया कि संसद को अवकाश के साथ पूरे वर्ष बैठक बुलानी चाहिए, तथा नीति, मतदान निधि, भावी विकास आदि जैसे अनेक मुद्दों के महत्व पर विचार करना चाहिए। एच. बी. कामथ के सुझाव में भी अमेरिका और ब्रिटेन के समान लंबी अवधि वाले सत्रों का समर्थन किया गया।
हालांकि, बी. आर. अंबेडकर ने इन सुझावों को स्वीकार नहीं किया। उन्होंने इस तथ्य पर प्रकाश डाला कि विधान-मंडल को वर्ष में केवल दो बार ही बुलाया जाना बाध्यकारी नहीं होगा। उन्होंने कहा कि यदि सत्र इतने लगातार और लंबे होंगे, तो विधान-मंडल के सदस्य संभवतः सत्रों से थक जाएंगे। उन्होंने कहा कि कराधान, अनुदान की मांग और अन्य ऐसे महत्वपूर्ण कारक एक वर्ष में सत्रों की आवृत्ति तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे।
पिछले विशेष सत्र
पिछले विशेष सत्रों को (i) विचार-विमर्श या चर्चा वाले विशेष सत्रों और (ii) बिना किसी विचार-विमर्श वाले मध्यरात्रि के विशेष सत्रों में विभाजित किया जा सकता है।
विचार-विमर्श वाले विशेष सत्र: डॉ. बी.आर. अंबेडकर की 125वीं जयंती पर उन्हें श्रद्धांजलि देने के लिए 2015 में दो दिवसीय विशेष सत्र बुलाया गया था। यह वर्ष भर चलने वाले समारोह का हिस्सा था। चर्चा का विषय संविधान के प्रति भारत की राजनीति की प्रतिबद्धता पर चर्चा करना था। 1962 में भारत-चीन युद्ध की स्थिति पर चर्चा करने के लिए एक विशेष सत्र बुलाया गया था।
बिना किसी विचार-विमर्श वाले मध्यरात्रि के विशेष सत्र: वस्तु और सेवा कर (जीएसटी) के क्रियान्वयन के अवसर पर 2017 में एक विशेष सत्र बुलाया गया था। 1997 में, भारत की स्वतंत्रता की 50वीं वर्षगांठ (स्वर्ण जयंती) के अवसर पर एक विशेष सत्र बुलाया गया था। 1992 में, भारत छोड़ो आंदोलन की 50वीं वर्षगांठ के अवसर पर एक विशेष सत्र बुलाया गया था। 1972 में, भारत की स्वतंत्रता के 25 वर्ष पूरे होने का जश्न मनाने के लिए एक विशेष सत्र बुलाया गया था। 1947 में, भारत की स्वतंत्रता की पूर्व संध्या पर ब्रिटिश अधिकारियों से भारतीय लोगों को सत्ता हस्तांतरण का साक्षी बनाने हेतु संसद का पहला सत्र बुलाया गया था। इस अवसर पर, नेहरू ने ‘ट्रिस्ट विद डेस्टिनी (tryst with destiny)’ नामक भाषण दिया था।
इसके अलावा, लोक सभा और राज्य सभा में अलग-अलग कुछ विशेष सत्र आयोजित किए गए हैं। लोक सभा ने संसद की पहली बैठक की 60वीं वर्षगांठ मनाने के लिए 2012 में एक विशेष सत्र आयोजित किया था। 2008 में, जब विपक्षी दलों ने मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली तत्कालीन संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (यूपीए) सरकार से समर्थन वापस ले लिया था, तो विश्वास मत के लिए लोक सभा का एक विशेष सत्र बुलाया गया था। राज्य सभा में, 1977 और 1991 में विशेष सत्र बुलाए गए थे, जब राष्ट्रपति शासन पर निर्णय लेने के लिए लोक सभा का विघटन हुआ था। 99वां सत्र (1977 का विशेष सत्र) तमिलनाडु और नागालैंड में राष्ट्रपति शासन बढ़ाने के लिए था।
158वां सत्र (1991 का विशेष सत्र) हरियाणा में राष्ट्रपति शासन को अनुमोदन देने के लिए था।
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