देश भर में समकालिक चुनाव कराने की मांग ने काफी जोर पकड़ा है, जिसका प्रमाण पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद की अध्यक्षता वाली उच्च स्तरीय समिति (एचएलसी) द्वारा हाल ही में दिए गए प्रस्तावों से मिलता है। 18,000 से अधिक पृष्ठों की रिपोर्ट में, समिति ने लोक सभा और राज्य की विधान सभाओं दोनों के लिए समकालिक चुनाव कराने की दिशा में महत्वपूर्ण परिवर्तन करने की वकालत की। इस परिवर्तन के प्रारंभिक चरण में आम चुनाव के 100 दिनों के भीतर नगरपालिका तथा पंचायत चुनावों का एकीकरण करना शामिल है, जिससे चुनावी सुधार के लिए एक सुदृढ़ तंत्र तैयार होगा। विधि आयोग के आगामी निष्कर्षों, जिनसे 2029 के आम चुनाव चक्र से शुरू होने वाले समकालिक चुनावों का समर्थन करने की अपेक्षा है, से उच्च प्रत्याशाएं हैं। इन प्रस्तावित सुधारों के तत्वों में राष्ट्रपति द्वारा एक ‘निर्धारित तिथि’ को नियत किया जाना निहित है, जो आम चुनावों के बाद एक नए चुनावी चक्र की शुरुआत का संकेत देती है। पैनल संवैधानिक संशोधनों, विशिष्ट रूप से अनुच्छेद 83 और अनुच्छेद 172 में किए गए संशोधन, जिनका उद्देश्य इस परिवर्तन को सहजता से सुविधाजनक बनाने के लिए विधायी निकायों के कार्यकाल को फिर से परिभाषित करना है का समर्थन करता है। इसके अलावा, भारत के निर्वाचन आयोग (ईसीआई) को सशक्त बनाने और जमीनी स्तर पर निर्वाचन प्रक्रियाओं को सुव्यवस्थित करने वाले संशोधन राज्यों के अनुसमर्थन को आवश्यक बनाते हैं। इस प्रस्तावित सुधार के पक्ष में 32 दलों और इसके विरुद्ध 15 दलों सहित, राजनीतिक हितधारकों की उल्लेखनीय प्रतिक्रिया इस सुधार की शर्तों पर ध्रुवीकृत चर्चा को रेखांकित करती है। समिति की सिफारिशें भारत के लोकतांत्रिक ढांचे के क्रम विकास में एक निर्णायक मील के पत्थर को चिह्नित करती हैं, जो निर्वाचन के शासन में एक आदर्श परिवर्तन के प्रारंभ के लिए तैयार हैं।
समकालिक चुनाव का अर्थ
समकालिक चुनाव को ‘एक राष्ट्र, एक चुनाव’ के रूप में भी जाना जाता है, जो एक ऐसे विचार को संदर्भित करता है जिसमें देश में लोक सभा और राज्य विधान सभाओं के चुनावों का समय समकालिक होगा। इस अवधारणा में नगर निगम और पंचायत के चुनाव भी एक साथ कराना शामिल है। इसलिए, शासन के विभिन्न स्तरों पर एक ही समय में चुनाव होंगे। इस प्रस्ताव का उद्देश्य निर्वाचन प्रक्रिया को सुव्यवस्थित करना, बिना किसी बाधा के देश में उचित प्रशासन सुनिश्चित करना और चुनाव कराने के दौरान होने वाले व्यय को कम करना है।
भारत में समकालिक चुनाव कराने के विचार की उत्पत्ति
उल्लेखनीय है कि समकालिक चुनावों की अवधारणा वास्तव में देश के लिए नई नहीं है। संविधान को अपनाने के बाद, 1951 से 1967 तक लोक सभा और सभी राज्य विधान सभाओं के चुनाव एक साथ हुए थे। हालांकि, इसके बाद, समकालिक चुनावों का चक्र अवरुद्ध हो गया। लोक सभा और सभी राज्य विधान सभाओं के पहले आम चुनाव 1951-52 में एक साथ हुए थे। यह प्रथा बाद के तीन आम चुनावों—1957, 1962 और 1967—में जारी रही। यद्यपि, 1968 और 1969 में समय से पहले कुछ विधान सभाओं के भंग होने के कारण यह चक्र पहली बार अवरुद्ध हुआ। 1970 में, चौथी लोक सभा को समय से पहले ही भंग कर दिया गया था और 1971 में नए चुनाव हुए थे। इस प्रकार, पहली, दूसरी और तीसरी लोक सभा ने पूरे पांच वर्ष का कार्यकाल पूरा किया। पांचवीं लोक सभा का कार्यकाल अनुच्छेद 352 (राष्ट्रीय आपात) के तहत 1977 तक बढ़ा दिया गया था। उसके बाद, आठवीं, दसवीं, चौदहवीं और पंद्रहवीं लोक सभाएं अपना पांच वर्ष का कार्यकाल पूरा कर सकीं। छठी, सातवीं, नवीं, ग्यारहवीं, बारहवीं और तेरहवीं लोक सभाएं समय से पहले ही भंग हो गई थी। समय के साथ विभिन्न राज्य विधान सभाओं को भी इसी प्रकार की समस्याओं का सामना करना पड़ा।
परिणामस्वरूप, कई कारणों से समकालिक चुनाव कराने का चक्र पूरी तरह बाधित हो गया:
- राजनीति अस्थिर थी और सरकारें तेजी से बदलती रहीं।
- राज्य विधान सभाओं का विघटन।
- ऐसा महसूस किया गया था कि केवल अलग-अलग चुनावों के माध्यम से ही क्षेत्रीय मुद्दों से निपटा जा सकता है।
यह देखा गया कि 2019 में केवल चार राज्यों में एक साथ चुनाव कराए गए थे। इनमें सिक्किम, ओडिशा, अरुणाचल प्रदेश और आंध्र प्रदेश शामिल थे।
हालांकि, कुछ सरकारी और गैर-सरकारी संगठनों (एनजीओ) ने समकालिक चुनाव कराने की सिफारिश की है। उदाहरण के लिए, ईसीआई और भारत के विधि आयोग ने क्रमशः 1983 और 1999 में सुझाव दिया था कि समकालिक चुनाव कराने से निर्वाचन प्रक्रिया को और अधिक दक्ष बनाने में सहायता मिलेगी।
उच्च स्तरीय समिति (एचएलसी) के बारे में
एचएलसी द्वारा प्रस्तुत 18,000 से अधिक पृष्ठों की यह रिपोर्ट, लगभग 200 दिनों के कुशल कार्य का परिणाम है।
केंद्र सरकार ने 2 सितंबर, 2023 को ‘एक राष्ट्र, एक चुनाव’ की संकल्पना की जांच के लिए भारत के पूर्व राष्ट्रपति राम नाथ कोविंद की अध्यक्षता में एक समिति का गठन किया। इस प्रस्ताव को तब बढ़ावा मिला जब न्यायमूर्ति (सेवानिवृत्त) ऋतु राज अवस्थी के नेतृत्व में विधि आयोग ने कोविंद के नेतृत्व वाली समिति के समक्ष एक व्यापक रूपरेखा प्रस्तुत की। इस रूपरेखा में समकालिक चुनाव करवाने के लिए आवश्यक संवैधानिक संशोधनों और सुव्यवस्थित तंत्रों को रेखांकित किया गया।
राम नाथ कोविंद की अध्यक्षता वाली समिति में केंद्रीय गृह मंत्री और सहकारिता मंत्री अमित शाह, राज्य सभा में विपक्ष के पूर्व नेता गुलाम नबी आजाद, पंद्रहवें वित्त आयोग के पूर्व अध्यक्ष एन. के. सिंह, लोक सभा के पूर्व महासचिव डॉ. सुभाष सी. कश्यप, वरिष्ठ अधिवक्ता हरीश साल्वे, तथा पूर्व मुख्य सतर्कता आयुक्त संजय कोठारी सहित कई अन्य सदस्य शामिल हैं। इसके अलावा, इस समिति में विधि एवं न्याय मंत्रालय के राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) अर्जुन राम मेघवाल एक विशेष आमंत्रित सदस्य के रूप में तथा एचएलसी के सचिव डॉ. नितेन चन्द्र भी शामिल थे।
अपने कार्यकाल के दौरान, समिति ने विभिन्न हितधारकों, विशेषज्ञों और राजनीतिक प्रतिनिधियों के साथ व्यापक विचार-विमर्श किया, जिनसे पूरे स्पेक्ट्रम (किसी वस्तु के समस्त संभव भेद) से अंतर्दृष्टि और सुझाव एकत्र किए गए। समिति ने इस मामले पर जनता की राय भी मांगी, जो समावेशी निर्णय लेने के प्रति प्रतिबद्धता को दर्शाता है; ऐसा भारत में समकालिक चुनाव की व्यवहार्यता और निहितार्थों के बारे में बढ़ती चर्चा और बहस के चलते किया गया।
एचएलसी ने शुरुआत में छह देशों, अर्थात दक्षिण अफ्रीका, बेल्जियम, स्वीडन, जापान, जर्मनी, फिलीपींस और इंडोनेशिया, में निर्वाचन प्रक्रिया का परीक्षण किया। केवल उसके बाद ही, समिति द्वारा लोक सभा और राज्य की विधान सभाओं के लिए समकालिक चुनाव कराने की सिफारिशें की गई थी।
समकालिक चुनाव पर एचएलसी की सिफारिशें
कोविंद समिति द्वारा प्रस्तुत की गई सिफारिशों का उद्देश्य दो संविधान संशोधन विधेयकों के माध्यम से भारत में समकालिक चुनाव कराने का मार्ग प्रशस्त करना है। पहला विधेयक लोक सभा और राज्य विधान सभाओं के लिए समकालिक चुनाव कराए जाने वाले परिवर्तन के साथ-साथ समय से पहले भंग होने की स्थिति में नए चुनाव कराने की प्रक्रिया पर केंद्रित है। इसमें एक नया अनुच्छेद, अनुच्छेद 82क, अंतःस्थापित करने का प्रस्ताव है, ताकि प्रक्रिया शुरू की जा सके और समकालिक चुनाव के संचालन को शामिल करने के लिए अनुच्छेद 327 के तहत संसद की शक्ति का विस्तार किया जा सके। अनुच्छेद 83 और अनुच्छेद 172 में संशोधन पूर्ण कार्यकाल से पहले विघटन की स्थिति में विधायी निकायों के कार्यकाल को फिर से परिभाषित करते हैं। इसके अलावा, संघ राज्यक्षेत्रों में विधान सभाओं को विनियमित करने वाली विधियों में संशोधन किया जाएगा ताकि उनके चुनाव राष्ट्रीय और राज्य चुनावों के साथ-साथ किए जा सकें।
दूसरा संशोधन विधेयक नगरपालिका और पंचायत चुनावों, स्थानीय सरकार के मामलों पर राज्यों की अधिकारिता के कारण उनके द्वारा अनुसमर्थन को आवश्यक बनाते है, को संबोधित करता हैं। यह संसद को स्थानीय निकाय समकालिक के चुनावों को विनियमित करने के लिए सशक्त बनाने हेतु अनुच्छेद 324क प्रस्तुत करता है और राज्य निर्वाचन आयोगों (SECs) के परामर्श से ईसीआई द्वारा एकल निर्वाचक नामावली तैयार करने के लिए अनुच्छेद 325 में संशोधन का प्रस्ताव करता है। यह निर्वाचक नामावली की निर्माण प्रक्रिया को सरल बनाता है, जिसमें ईसीआई की अग्रणी भूमिका होगी और SEC परामर्श देंगे।
एचएलसी ने समकालिक चुनावों में परिवर्तन को सुविधाजनक बनाने के लिए निम्नलिखित सिफारिशें दी हैं:
- समिति भारतीय संविधान के अनुच्छेद 82क में संशोधन की सिफारिश करती है। इस संशोधन के साथ, राष्ट्रपति को एक ‘निर्धारित तिथि’ निर्दिष्ट करने के लिए अधिकृत किया जाएगा, जिस दिन लोक सभा और राज्य की विधान सभाओं के समकालिक चुनाव आयोजित किए जा सकते हैं।
- यदि भारत सरकार इन सिफारिशों को स्वीकार करती है और 2024 के लोक सभा चुनाव होने के बाद इन्हें लागू करती है, तो पहला समकालिक चुनाव 2029 में होगा। अन्यथा, ये सिफारिशें 2029 के लोक सभा चुनाव के बाद लागू की जा सकती हैं, और पहले समकालिक चुनाव 2034 में आयोजित हो सकते हैं।
- चुनावों का संचालन लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 द्वारा विनियमित होता है। इस अधिनियम में संशोधन किया जाएगा ताकि समकालिक चुनाव की समय-सारणी को शामिल किया जा सके। इसके अलावा, इससे उन संभारिक और विधिक मुद्दों से निपटने में सहायता मिलेगी जो समकालिक चुनाव के कारण सामने आ सकते हैं।
- अनुच्छेद 327 में संशोधन कर प्रक्रिया के नियमों में संशोधन किया जाएगा ताकि समकालिक चुनाव की प्रक्रिया के साथ-साथ नए चुनाव चक्र को सम्मिलित किया जा सके। ये नियम लोक सभा और राज्य की विधान सभाओं के कार्यकरण को प्रशासित करते हैं।
- देश में समकालिक चुनाव के प्रवर्तन के लिए, इस प्रकार के संशोधन करना महत्वपूर्ण है। लेकिन उससे पहले, विधि-निर्माताओं की सहमति प्राप्त करना, व्यापक चर्चा का आयोजन करना और सावधानीपूर्वक एक विधायी प्रक्रिया को लागू करना आवश्यक है।
- 18वीं लोक सभा के चुनाव के साथ, जून 2024 से मई 2029 के बीच राज्यों में होने वाले चुनाव समाप्त हो जाएंगे। परिणामस्वरूप, कई राज्यों की विधान सभाओं का कार्यकाल पांच वर्ष से कम हो सकता है, जो कभी-कभार होता है।
- तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल (2026); उत्तर प्रदेश, पंजाब और उत्तराखंड (2027); तथा छत्तीसगढ़, कर्नाटक और तेलंगाना (2028) जैसे कई राज्यों के चुनाव चक्र समकालिक चुनाव के साथ एक ही समय पर होंगे।
- 2024 के लोक सभा चुनावों के बाद सत्ता में बैठी सरकार द्वारा यह निर्णय किया जाएगा कि समकालिक चुनाव 2029 में लागू किए जाएंगे या 2034 में।
- समिति अनुच्छेद 83 और अनुच्छेद 172 में संशोधनों की सिफारिश करती है। यदि संसद या राज्य की विधान सभा अपना कार्यकाल पूरा होने से पहले भंग हो जाती है, तो केवल शेष अवधि के लिए नए चुनाव कराए जाएंगे, अर्थात पांच वर्ष के कार्यकाल के शेष समय के लिए, और यह सरकार अगले समकालिक चुनावों तक सत्ता में रहेगी ताकि समकालीनता बनी रहे। इस उपाय से, त्रिशंकु विधान सभा (ऐसी स्थिति जिसमें किसी एक राजनीतिक दल या चुनाव पूर्व गठबंधन के पास सदन/विधान सभा में पूर्ण बहुमत हासिल करने के लिए पर्याप्त निर्वाचित सदस्य नहीं होते हैं) की स्थिति में, अविश्वास प्रस्ताव का समकालिक चुनावों के आयोजन पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा।
- समिति अनुच्छेद 324क पुरःस्थापित कर संसद को विधि लागू करने की सिफारिश करती है ताकि नगरपालिकाओं और पंचायत चुनावों को आम चुनावों के साथ कराया जा सके। इस विधान से, स्थानीय निकायों के कार्यकाल निश्चित किए जाएंगे और उनके चुनावों का समय राष्ट्रीय चुनावों के साथ होगा।
- समिति ने संविधान के अनुच्छेद 325 में संशोधन करने की भी सिफारिश की है। इस संशोधन के साथ, ईसीआई को SECs के साथ चर्चा के बाद एकल निर्वाचक नामावली और मतदाता फोटो पहचान-पत्र (ईपीआईसी) तैयार करने का अधिकार होगा। यह निर्वाचक नामावली और ईपीआईसी सरकार के सभी स्तरों के लिए होगी।
- ईसीआई लोक सभा के लिए निर्वाचक नामावली बनाने, इनका अनुरक्षण करने और अद्यतन करने के लिए जिम्मेदार है, जबकि SECs स्थानीय निकायों के लिए निर्वाचक नामावली बनाने और उनका अनुरक्षण करने के लिए जिम्मेदार हैं।
- दोहराव को रोकने और मतदाताओं के अधिकारों की रक्षा करने के लिए, SECs और एसईसी को एक-दूसरे के साथ सामंजस्य में काम करना होगा।
- समिति ने सिफारिश की है कि समकालिक चुनाव कराने के प्रयोजन से, ईसीआई को व्यय और आवश्यकताओं का विस्तार से आकलन करना चाहिए और उस पर अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत करनी चाहिए।
- समिति ने यह भी सुझाव दिया है कि ईसीआई और SECs को सभी समावेशी योजनाएं एवं आकलन तैयार करने चाहिए ताकि संभार की परिपूर्ण व्यवस्था की जा सके। इन योजनाओं और आकलनों में सुरक्षोपाय, कर्मियों की तैनाती और उपकरणों की आवश्यकता शामिल होनी चाहिए।
- समिति ने जोर दिया है कि शासन स्थिर होना चाहिए ताकि निर्णय लेने की प्रक्रिया प्रभावी हो और सतत विकास को बढ़ावा मिले।
- समिति इस बात पर बल देती है कि संवृद्धि एवं विकास के लिए अनुकूल व्यवस्था को बढ़ावा देने और नीतिगत गतिहीनता की रोकथाम में समकालिक चुनाव किस प्रकार महत्वपूर्ण हो सकते हैं।
समकालिक चुनाव कराने के लाभ और हानि
लाभ
- समकालिक चुनाव से केंद्र और राज्य सरकारों के चुनावों के दौरान होने वाले आवर्ती व्ययों में बहुत कमी आएगी। इससे मतदाताओं के रजिस्ट्रीकरण, मतदान केंद्रों की व्यवस्था, चुनाव कर्मचारियों एवं सुरक्षा कर्मियों की नियुक्ति और अन्य संभार के प्रबंधन पर होने वाले व्यय में कमी आएगी। चूंकि सभी चुनावों के लिए एक ही निर्वाचक नामावली होगी, इसलिए सुरक्षा कर्मियों, नागरिक अधिकारियों और अन्य ऐसे प्रशासनिक संसाधनों की सेवाओं का इष्टतम रूप से उपयोग किया जा सकेगा। परिणामस्वरूप, लोक निधि की बचत होगी जिसे अन्य नागरिक मुद्दों पर निर्दिष्ट किया जा सकेगा।
- बहुत अधिक चुनाव कराने से शासन एवं प्रशासन पर दबाव बनता है। समकालिक चुनाव कराने से चुनावी प्रक्रिया पुनर्गठित होगी। इससे, इस प्रकार का दबाव कम होगा।
- अलग-अलग चुनाव कराने से सुरक्षा कर्मियों और पुलिस बलों को लंबे समय तक अपनी सेवाएं देनी पड़ती हैं, जिससे राष्ट्रीय सुरक्षा को खतरा होता है। इससे विधि प्रवर्तन के प्रयासों में भी बाधा आती है। समकालिक चुनाव से इन मुद्दों को कम किया जा सकता है।
- चुनाव के समय एक निश्चित आचार संहिता का पालन करना होता है, जो बड़े पैमाने पर अधिकारियों के तबादले के साथ-साथ व्यवधान में भी वृद्धि करता है। इससे सरकार के कामकाज में बाधा आ सकती है। समकालिक चुनाव कराने से इस समस्या का समाधान हो सकता है।
- समकालिक चुनाव के कारण चुनाव प्रचार अभियानों की संख्या में कमी आएगी, जिससे संबद्ध व्यय कम होंगे। इसलिए, राजनीति में धन का उपयोग कम होगा।
- ईसीआई राष्ट्रीय स्तर पर वित्त विनियमन के अभियान को अधिक दक्ष तरीके से लागू करने में सक्षम होगा। अतः, चुनाव लड़ने वाले सभी दलों और अभ्यर्थियों को उनका उचित हिस्सा मिलेगा।
- समय-समय पर, बार-बार होने वाले चुनाव मतदाताओं को प्रभावित और एकजुट करते समय क्षेत्रवाद, सांप्रदायिकता और जातिवाद को जन्म देते हैं। ये सभी कारक देश को विभाजित करने का कार्य करते हैं। समकालिक चुनाव कराने से क्षेत्रवाद, सांप्रदायिकता और जातिवाद के विघटनकारी प्रभावों को कम करने में सहायता मिल सकती है।
- ‘एक राष्ट्र, एक चुनाव’ की अवधारणा राष्ट्रीय मुद्दों पर बल देती है और एक संयुक्त चुनावी उद्देश्य पर कार्य करती है। यह न केवल व्यक्तिगत संकीर्ण हितों से ऊपर उठने में सहायता करती है, बल्कि देश के नागरिकों में एकता की भावना पैदा करने में भी सहायता करती है।
- सरकार के तीनों स्तरों पर समकालिक चुनाव कराने की परिकल्पना शासन की संरचना को आगे बढ़ाने के लिए की गई है, जो एक दूरदर्शी भारत की आकांक्षाओं के अनुरूप होगी।
- यह मतदाताओं को बार-बार होने वाले चुनावों से होने वाली थकान से राहत दिला सकता है। ऐसे चुनावों से, राष्ट्रीय स्तर पर मतदान दर में अत्यधिक वृद्धि हो सकती है। ऐसा इसलिए क्योंकि समकालिक चुनाव मतदाताओं की उदासीनता कम करने और सभी चुनावों के महत्व में वृद्धि करने में सहायक हो सकते है।
हानि
- समकालिक चुनाव होने से, संघवाद का सिद्धांत कमजोर हो सकता है, जैसा कि चुनावी प्रक्रिया केंद्रीकृत हो जाएगी। यह राष्ट्रीय मुद्दों के मद्देनजर स्थानीय एवं क्षेत्रीय मुद्दों को दरकिनार कर देगी। इसी प्रकार से, राष्ट्रीय दल क्षेत्रीय दलों पर हावी हो सकते हैं, जिससे भारतीय संविधान में समाविष्ट संघवाद को चुनौती मिल सकती है।
- समकालिक चुनाव होने की स्थिति में ऐसे कुछ राज्य हाशिए पर जा सकते हैं जो देश में गैर-प्रमुख दलों द्वारा प्रशासित हैं।
- समकालिक चुनाव के लिए अतिरिक्त इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों (ईवीएम) और वोटर वेरिफिएबल पेपर ऑडिट ट्रेल (वीवीपीएटी) मशीनों की आवश्यकता होगी, जिससे वित्तीय बोझ बढ़ेगा।
- विधान परिषदों (राज्य सभा) के द्विवार्षिक चुनाव और उप-चुनाव कराने के लिए अलग-अलग चुनाव कराने की आवश्यकता होगी। समकालिक चुनाव कराने के बावजूद अंततः इससे लागत में वृद्धि होगी।
- सरकार के विभिन्न स्तरों पर बारंबार चुनाव कराए जाने से निर्वाचित सदस्य जवाबदेह बने रहते हैं। ऐसे चुनाव मतदाताओं को नियमित रूप से अपने विचार व्यक्त करने में सक्षम बनाते हैं। समकालिक चुनाव कराने से जवाबदेही का नियंत्रण सीमित हो सकता है, जिससे निर्वाचित पदधारी अपने निर्वाचन क्षेत्रों की बदलती आवश्यकताओं को पूरा करने के बजाय अपनी स्वेच्छा से कार्य करने के लिए स्वतंत्र हो सकते हैं।
- भारतीय संविधान के अनुच्छेद 83, 85, 172 और 174 में संशोधन करना आवश्यक है, जैसा कि सभी सदनों को पांच वर्ष की निश्चित अवधि के कार्यकाल को पूरा करना होता है। इन अनुच्छेदों में सदनों की अवधि और विघटन के बारे में उपबंध हैं। इसके अलावा, अनुच्छेद 356 में समकालिक चुनावों को शामिल करना आवश्यक है, जैसा कि यह राज्यों में राष्ट्रपति शासन के कार्यान्वयन के बारे में नियम निर्दिष्ट करता है।
- चूंकि समकालिक चुनाव कराने के लिए बड़ी संख्या में सुरक्षा बलों को तैनात करने की आवश्यकता होगी, इसलिए राष्ट्रीय सुरक्षा का क्षय हो सकता है। जैसा कि ये बल तब राष्ट्रीय सीमाओं की रक्षा करने के अपने लक्ष्य से दूर होंगे।
निष्कर्ष
अंत में, पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद की अध्यक्षता वाली उच्च स्तरीय समिति ने भारत में शासन के विभिन्न स्तरों पर समकालिक चुनाव कराने का समर्थन करते हुए एक व्यापक सिफारिश प्रस्तुत की है। यह रिपोर्ट, हालांकि महत्वपूर्ण है और बार-बार होने वाले चुनावों से विभिन्न क्षेत्रों पर पड़ने वाले बोझ को कम करने के लिए समन्वय की आवश्यकता पर जोर देती है। इस रिपोर्ट में समकालिक चुनाव कराने के लिए संवैधानिक संशोधन प्रस्तावित किए गए है, जिनका उद्देश्य मौजूदा संवैधानिक ढांचे में न्यूनतम व्यवधान पैदा करना है। विभिन्न राजनीतिक दलों और न्यायविदों से महत्वपूर्ण समर्थन के साथ-साथ वैश्विक स्तर पर चुनाव की प्रथाओं के व्यापक अध्ययन के साथ, यह सिफारिश भारत की चुनावी प्रक्रियाओं को सुव्यवस्थित करने के लिए एक संतुलित प्रस्ताव के रूप में सामने आई है।
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