राज्यपाल द्वारा विधेयकों पर स्वीकृति रोकने की शक्ति पर उच्चतम न्यायालय का निर्णय—भाग-1
राज्यपाल के पद से संबंधित विभिन्न पहलुओं ने समय-समय पर विवादों को जन्म दिया है। राज्यपाल की नियुक्ति की प्रक्रिया, राज्यपाल की शक्तियां और विवेकाधिकार कुछ ऐसे मुद्दे हैं जिन पर वर्षों से बहस होती रही है। राज्यपाल की भूमिका को लेकर विवाद तब और अधिक मुखर हो जाते हैं जब केंद्र और राज्यों में भिन्न-भिन्न राजनीतिक दल सत्ता में होते हैं, जैसा कि वर्तमान में प्रायः देखने को मिलता है।
हाल के दिनों में, तमिलनाडु, केरल, पंजाब और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में केंद्र सरकार द्वारा नियुक्त राज्यपालों और निर्वाचित राज्य सरकारों के बीच तीखे टकराव देखने को मिल रहे हैं। ऐसा ही एक मुद्दा तमिलनाडु राज्य विधान-मंडल द्वारा पारित विधेयकों, जिन्हें स्वीकृति के लिए राज्यपाल के पास भेजा गया था, पर राज्यपाल द्वारा निर्णय लेने में होने वाली देरी से संबंधित है। उच्चतम न्यायालय ने डीएमके के नेतृत्व वाली तमिलनाडु सरकार द्वारा संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत दायर एक रिट याचिका पर सुनवाई करते हुए इस मुद्दे पर अपना निर्णय दिया।

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