मार्च 2024 में, भारत निर्वाचन आयोग (ईसीआई) ने दो पूर्वोत्तर राज्यों, अर्थात सिक्किम और अरुणाचल प्रदेश, के विधान सभा चुनावों की मतगणना की तारीख 4 जून से 2 जून कर दी थी। ईसीआई द्वारा यह महत्वपूर्ण कदम मतगणना की तिथि और इन राज्यों की विधान सभाओं के कार्यकाल की समाप्ति के बीच सामंजस्य स्थापित करने के लिए उठाया गया था, अर्थात यह सुनिश्चित करने के लिए कि निर्वाचन प्रक्रिया पूरी होने के बाद ही इनकी विधान सभाओं का कार्यकाल समाप्त हो।
अरुणाचल प्रदेश और सिक्किम की तत्कालीन विधान सभाओं की पहली बैठक 3 जून, 2019 को आयोजित की गई। सांविधानिक प्रावधानों के अनुसार, इनके कार्यकाल 2 जून, 2024 को समाप्त होने थे। इसलिए, निर्वाचन प्रक्रिया इस तिथि से पहले समाप्त हो जानी चाहिए थी ताकि पुरानी विधान सभाओं को आसानी से नई विधान सभाओं से परिवर्तित किया जा सके। यह एक संवैधानिक अधिदेश है कि विधायी निकायों के विघटन से पहले चुनाव हो जाने चाहिए। परिणामस्वरूप, भारत निर्वाचन आयोग द्वारा 2 जून, 2024 की मध्यरात्रि से पहले मतों की गणना और परिणामों की घोषणा निर्धारित की गई थी, जिससे राज्यपाल नई विधान सभाओं के गठन की प्रक्रिया शुरू कर सकें।
लोक सभा और राज्य विधान सभाओं के कार्यकाल के संबंध में सांविधानिक उपबंध
भारत का संविधान लोक सभा और राज्य विधान सभाओं के कार्यकाल के संबंध में निम्नलिखित उपबंधों को विनिर्दिष्ट करता हैः
लोक सभा का कार्यकाल: भारतीय संविधान के अनुच्छेद 83(2) के अनुसार, लोक सभा का कार्यकाल पांच वर्ष का होता है। यह उस तिथि से शुरू होता है जब इसकी पहली बैठक होती है। जब पांच वर्ष की अवधि पूरी हो जाती है, तो सदन का विघटन हो जाता है। हालांकि, लोक सभा को उसके कार्यकाल की समाप्ति से पहले भी भंग किया जा सकता है।
राज्य विधान सभा का कार्यकाल: भारतीय संविधान के अनुच्छेद 172(1) के अनुसार, प्रत्येक राज्य की विधान सभा का कार्यकाल पांच वर्ष होता है। लोक सभा की तरह, इसका कार्यकाल भी उस तिथि से शुरू होता है जब इसकी पहली बैठक होती है। जब पांच वर्ष की कार्यकाल अवधि समाप्त हो जाती है, तो विधान सभा का विघटन हो जाता है। हालांकि, विधान सभा को उसके कार्यकाल की समाप्ति से पहले भी भंग किया जा सकता है।
विधान सभा के कार्यकाल में विस्तार: कुछ परिस्थितियों में, जैसे आपात की घोषणा के समय, संसद द्वारा विधान सभा का कार्यकाल एक बार में एक वर्ष की अवधि तक बढ़ाया जा सकता है। हालांकि, यह विस्तार उद्घोषणा की समाप्ति की तिथि से छह महीने से अधिक नहीं होना चाहिए।
निर्वाचन कार्यक्रम का निर्धारण
भारत निर्वाचन आयोग मुख्य शासी निकाय है जो न केवल निर्वाचन प्रक्रियाओं को स्थापित करने के लिए बल्कि पूरे देश में उनका संचालन और पर्यवेक्षण करने के लिए भी जिम्मेदार है। इस भूमिका के अंतर्गत, निर्वाचन आयोग का सबसे महत्वपूर्ण कार्य विधान-मंडल, अर्थात लोक सभा और राज्य विधान सभाओं के लिए निर्वाचन कार्यक्रम निर्धारित करना है।
निर्वाचन आयोग सभी पहलुओं पर विचार करते हुए निर्वाचन कार्यक्रम तय करता है। यह मतदान की तिथियों को पहले से ही विनिर्दिष्ट करता है, जैसे मतदान की शुरुआत और मतगणना की तिथि। भारत निर्वाचन आयोग उपयुक्त हितधारकों, जैसे सरकारी अधिकारी, राजनीतिक दल और आम जनता, को कार्यक्रम की सूचना देता है।
भारत निर्वाचन आयोग निम्नलिखित बातों को ध्यान में रखते हुए निर्वाचन कार्यक्रम तय करता है:
संभार संबंधी आवश्यकताएं: निर्वाचन कार्यक्रम तय करने के लिए, भारत निर्वाचन आयोग देश की ऐतिहासिक और भौगोलिक स्थिति का अध्ययन करता है। यह स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित करने के लिए निर्वाचन में ड्यूटी पर सुरक्षा बलों को तैनात करने जैसी संभार की आवश्यकताओं पर भी विचार करता है।
विधायी निकायों का कार्यकाल: निर्वाचन कार्यक्रम तय करने के लिए, ईसीआई मुख्य रूप से विधायी निकायों के कार्यकाल की समाप्ति की तिथि पर सांविधानिक उपबंधों के अनुसार विचार करता है। निर्वाचनों का कार्यक्रम निर्धारित करते समय यह आवश्यक है। ईसीआई को इस तिथि के बारे में पहले से ही पता होता है, अर्थात पांच वर्ष पहले। इसकी गणना मौजूदा विधायी निकायों की पहली बैठक की तिथि से की जा सकती है।
निर्वाचन प्रक्रिया पूरी करने की तिथि: ईसीआई का मुख्य लक्ष्य मौजूदा विधायी निकायों के कार्यकाल की समाप्ति से कम-से-कम एक दिन पहले निर्वाचन प्रक्रिया को पूरा करना है। ईसीआई यह सुनिश्चित करता है कि वह ऐसी समाप्ति से कुछ दिन पहले चुनाव के परिणाम घोषित करे ताकि दस्तावेजीकरण और अन्य विधिक औपचारिकताएं आसानी से पूरी की जा सकें।
अन्य कारकः निर्वाचन आयोग कई कारकों को ध्यान में रखता है, जैसे कि महत्वपूर्ण परीक्षाओं और क्षेत्रीय त्योहारों की तिथियां, मौसम की स्थिति, मतदान केंद्रों के रूप में प्रयुक्त स्कूल भवनों और अन्य आधारिक संरचना की उपलब्धता, तथा निर्वाचन कार्यक्रम निर्धारित करते समय स्कूल के शिक्षकों को निर्वाचन में ड्यूटी करने के लिए नामांकित करना। निर्वाचन कार्यक्रम और संभार का निर्धारण करते समय पारंपरिक मतदान पैटर्न और सुरक्षा आवश्यकताओं को भी ध्यान में रखा जाता है।
आदर्श आचार संहिता (एमसीसी)
निर्वाचन कार्यक्रम के साथ-साथ, ईसीआई चुनाव के समय राजनीतिक दलों/अभ्यर्थियों और उनके व्यवहार की निगरानी के लिए दिशा-निर्देशों की एक शृंखला विनिर्दिष्ट करता है। इन्हें संयुक्त रूप से आदर्श आचार संहिता के रूप में जाना जाता है। एमसीसी का मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि निर्वाचन प्रक्रिया निष्पक्ष और नैतिक रूप से संचालित हो। यह दलों और अभ्यर्थियों को अपने स्वार्थी हितों के लिए सरकारी संसाधनों का दोहन करने से भी प्रतिषिद्ध करता है। एमसीसी के कुछ महत्वपूर्ण प्रावधान हैं:
- राजनीतिक दलों और अभ्यर्थियों से यह अपेक्षा की जाती है कि वे इस प्रकार से व्यवहार करें कि जिससे निर्वाचन प्रक्रिया की सत्यनिष्ठा बनी रहे और साथ ही न्यायपूर्ण और निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित हो।
- रैलियां और शोभायात्रा/जुलूस निकालने और सार्वजनिक बैठकें आयोजित करना कुछ निर्बंधनों के अधीन है ताकि देश में विधि व्यवस्था बनी रहे और बाधाओं से बचा जा सके।
- चुनाव प्रचार के लिए सरकारी संसाधनों, सरकारी मशीनरी और मीडिया का प्रयोग करना प्रतिबंधित है, ताकि कोई भी सत्तारूढ़ दल होने का अनुचित लाभ न उठा सके।
- राजनीतिक दलों और अभ्यर्थियों को लोक निधि का उपयोग कर विज्ञापन देने की अनुमति नहीं है। न ही उन्हें मतदाताओं के व्यवहार में परिवर्तन लाने के लिए सरकार द्वारा प्रायोजित विज्ञापन प्रकाशित करने की अनुमति है।
- चुनाव प्रचार के प्रयोजन से सार्वजनिक सुख-सुविधाओं के साथ-साथ संसाधनों तक पहुंच प्रदान करते समय सभी राजनीतिक दलों और अभ्यर्थियों के साथ समान व्यवहार किया जाना चाहिए।
- चुनाव प्रचार के दौरान, राजनीतिक दलों और अभ्यर्थियों को अलग-अलग जातियों, धर्मों और समुदायों आधारित पर युक्तियों का प्रयोग करने के बजाय केवल अपने प्रदर्शन और पिछले रिकॉर्ड पर जोर देना चाहिए।
- जिस दिन लोग वोट डालेंगे, उससे दो दिन पहले ‘चुनावी मौन’ लागू किया जाता है। 48 घंटे की इस अवधि में चुनाव प्रचार नहीं किया जाता है और यह समय मतदाताओं को यह सोचने और तय करने के लिए दिया जाता है कि उन्हें किसे वोट देना है।
निर्वाचन कार्यक्रम में बदलाव के पूर्ववर्ती उदाहरण
साधारणतया, निर्वाचन कार्यक्रमों में कोई बदलाव नहीं किया जाता। हालांकि, कुछ मौकों पर, भारत निर्वाचन आयोग द्वारा इन कार्यक्रमों में बदलाव किए गए हैं ताकि विशिष्ट परिस्थितियों से निपटा जा सके। उदाहरण के लिए, दो दशक पहले 2004 में, भारत निर्वाचन आयोग ने आंध्र प्रदेश में मतगणना की तिथि 13 मई से 11 मई कर दी थी ताकि यह तिथि और उसकी विधान सभा के कार्यकाल की समाप्ति, अर्थात 13 मई, 2004, एक ही समय पर न हो।
स्थानीय प्राथमिकताओं, प्रासंगिक घटनाओं और त्योहारों को लेकर निर्वाचन आयोग लचीला भी हो सकता है। उदाहरण के लिए, 2023 में, भारत निर्वाचन आयोग ने मिजोरम की विधान सभा के चुनावों की मतगणना की तारीख 3 दिसंबर से 4 दिसंबर कर दी थी, क्योंकि 3 दिसंबर को रविवार था। भारत निर्वाचन आयोग ने वहां रहने वाले अधिकांश ईसाइयों के लिए रविवार के महत्व के मद्देनजर ऐसा किया।
इससे पहले, भारत निर्वाचन आयोग द्वारा इस तरह से कार्यक्रम तय किए गए थे कि किसी विशिष्ट राज्य में होने वाली मतगणना को देश के अन्य राज्यों में होने वाली मतगणना या उसी समय होने वाले अन्य चुनावों की मतगणना से अलग रखा जाए। ऐसा इसलिए किया जाता है ताकि विधान सभाओं और लोक सभा के कार्यकाल की समाप्ति पर विचार करने के साथ-साथ चुनाव कराने में सुविधा हो।
निष्कर्ष
निष्कर्षतः, भारत निर्वाचन आयोग का निर्णय संवैधानिक समय-सीमाओं और निर्वाचन प्रक्रिया में प्रक्रियात्मक समग्रता पर सावधानीपूर्वक ध्यान देने को रेखांकित करता है। यह समायोजन सुनिश्चित करता है कि राज्य विधान सभाओं की अवधि समाप्त होने से पहले चुनाव प्रक्रिया पूरी हो जाए जैसा कि संविधान द्वारा अधिदेशित है। यद्यपि इस तरह के संशोधन बहुत कम हुए हैं, तथापि ये विभिन्न सुव्यवस्था संबंधी एवं क्षेत्रीय कारकों पर विचार करते हुए निर्वाचन समय-सीमा की शुचिता को बनाए रहने के लिए निर्वाचन आयोग की प्रतिबद्धता को प्रदर्शित करते हैं। कभी-कभी समायोजन के बावजूद, स्वतंत्र, निष्पक्ष और समय पर चुनाव कराने के लिए भारत निर्वाचन आयोग का समर्पण सदृढ़ बना हुआ है, जो यह सुनिश्चित करता है कि नागरिकों के लोकतांत्रिक अधिकार सुरक्षित हैं।
© Spectrum Books Pvt. Ltd.



