जब 2024 के आम चुनाव शीघ्र ही होने वाले थे, तब गृह मंत्रालय (एमएचए) ने एक उल्लेखनीय कदम उठाया, जिसके तहत 11 मार्च को नागरिकता (संशोधन) नियम, 2024 को लागू करने की घोषणा की गई। ये नियम नागरिकता संशोधन अधिनियम (सीएए) के क्रियान्वयन की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है, जिसे मूल रूप से 2019 में संसद द्वारा पारित किया गया था। सीएए ने अपने प्रावधानों के कारण ध्यान आकर्षित किया, जो पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान के हिंदू, सिख, बौद्ध, पारसी, ईसाई और जैन समुदायों के बिना दस्तावेज वाले (undocumented) व्यक्तियों को नागरिकता प्रदान करता है।
यद्यपि इस विधान के तहत नागरिकता प्राप्त करने के लिए आवेदकों को पात्रता, दस्तावेजीकरण और समीक्षा की पेचीदगियों से गुजरना पड़ता है, तथापि सीएए विधिक, राजनीतिक और मानवीय विचारों के जटिल पारस्परिक प्रभाव को अभिव्यक्त करता है। इसका क्रियान्वयन भारतीय नागरिकता की रूपरेखा में एक नए अध्याय, जो समावेशिता, सुरक्षा और संवैधानिक सिद्धांतों के अनुपालन के बीच एक संवेदनशील संतुलन को आवश्यक बनाता है, की घोषणा करता है।
नागरिकता संशोधन अधिनियम (सीएए), 2019 के बारे में
सीएए, 2019 वह विधान है जो 1955 के नागरिकता अधिनियम में संशोधन करने का प्रयास करता है और यह भारत में रहने वाले विदेशी प्रवासियों की कुछ विनिर्दिष्ट श्रेणियों से संबद्ध है। इसे दिसंबर 2019 में पारित किया गया था, लेकिन तब से यह निष्क्रिय पड़ा हुआ था, क्योंकि भारत सरकार ने अभी तक नियम नहीं बनाए थे। इस अधिनियम का मुख्य उद्देश्य पीड़ित धार्मिक अल्पसंख्यकों को भारतीय नागरिकता प्रदान करना है।
नागरिकता संशोधन अधिनियम (सीएए), 2019 की मुख्य विशेषताएं
- नागरिकता अधिनियम, 1955 में संशोधन: सीएए, 2019 नागरिकता अधिनियम 1955 में संशोधन करता है, ताकि पाकिस्तान, अफगानिस्तान और बांग्लादेश से हिंदू, सिख, ईसाई, जैन, बौद्ध और पारसी समुदायों की विनिर्दिष्ट श्रेणियों से संबद्ध विदेशी प्रवासियों, जो 31 दिसंबर, 2014 को या उससे पहले भारत में प्रवेश कर गए हों और जिन्हें पासपोर्ट (भारत में प्रवेश) अधिनियम, 1920 की धारा 3 की उपधारा (2) के खंड (ग) के अधीन और विदेशियों विषयक अधिनियम, 1946 या उसके अधीन बनाए गए किसी नियम के उपबंधों या किए गए आदेशों के लागू होने से केंद्रीय सरकार द्वारा छूट प्राप्त है, को भारतीय नागरिकता प्रदान की जा सके, तथा उल्लेख करता है कि उन्हें अवैध प्रवासी नहीं माना जाना चाहिए।
- पात्रता मानदंड: इस अधिनियम में यह विनिर्दिष्ट किया गया है कि नागरिकता के लिए पात्र प्रवासियों को 31 दिसंबर, 2014 को या उससे पहले भारत में प्रवेश करना होगा। इसके अलावा, यह भी आवश्यक है कि उन्हें अपने देश में धर्म के आधार पर उत्पीड़न या भेदभाव का सामना करना पड़ा हो।
- आवेदन की प्रक्रिया: केंद्र सरकार या अधिकृत निकाय को आवेदन करने पर पात्र प्रवासियों को रजिस्ट्रीकरण या देशीयकरण का प्रमाणपत्र देने का अधिकार है। यह प्रक्रिया निर्धारित शर्तों, निर्बंधनों और प्रक्रियाओं के अधीन है, जो नागरिकता प्राप्ति के लिए एक व्यवस्थित दृष्टिकोण सुनिश्चित करती है।
- नागरिकता को मानना: ऐसे प्रमाणपत्र प्राप्त करने वाले व्यक्तियों को देश में प्रवेश की तिथि से भारत का नागरिक माना जाता है। तथापि, यह नागरिकता का दर्जा धारा 5 में विनिर्दिष्ट शर्तों की पूर्ति या इस अधिनियम की तीसरी अनुसूची में उल्लिखित देशीयकरण की अहर्ताओं को पूरा करने पर निर्भर है।
- विधिक कार्यवाहियों से उन्मुक्ति: इस धारा के तहत किसी व्यक्ति के विरुद्ध अवैध प्रवास या नागरिकता से संबंधित चल रही कोई भी कार्यवाही नागरिकता प्रदान किए जाने पर स्वतः ही खारिज हो जाती है। यह उपबंध सुनिश्चित करता है कि लंबित कार्यवाही वाले व्यक्ति नागरिकता के लिए आवेदन करने हेतु अनर्ह नहीं हैं। इसके अलावा, उनके आवेदनों को केवल लंबित कार्यवाही के आधार पर खारिज नहीं किया जा सकता। इसके अतिरिक्त, नागरिकता का आवेदन करने से पहले आवेदक के अर्जित अधिकारों और विशेषाधिकारों को कायम रखा जाता है, जो इस प्रक्रिया के दौरान उनके हितों की रक्षा करते हैं।
- विनिर्दिष्ट क्षेत्रों का बहिष्कार: भारत के संविधान की छठी अनुसूची में विनिर्दिष्ट कुछ क्षेत्रों को सीएए के कार्यक्षेत्र से बाहर रखा गया है। संविधान की छठी अनुसूची में विनिर्दिष्ट क्षेत्रों, अर्थात असम में दीमा हसाओ (पूर्व में उत्तरी कछार पहाड़ी जिला), कार्बी आंगलांग और बोडोलैंड प्रादेशिक क्षेत्र, मेघालय में गारो पहाड़ी और त्रिपुरा में जनजाति क्षेत्र, को वहां रहने वाले स्वदेशी जनजाति समुदायों के हितों की रक्षा के लिए सीएए के प्रावधानों से छूट दी गई है। बंगाल ईस्टर्न फ्रंटियर रेगुलेशन, 1873 के तहत अधिसूचित इनर लाइन परमिट सिस्टम (व्यवस्था) के अधीन आने वाले क्षेत्रों, जिनमें अरुणाचल प्रदेश, नागालैंड, मणिपुर और मिजोरम के कुछ हिस्से शामिल हैं, को भी सीएए के दायरे से बाहर रखा गया है। यह व्यवस्था स्थानीय निवासियों की संस्कृति और पहचान की रक्षा के लिए इन क्षेत्रों में बाहरी लोगों के प्रवेश को विनियमित करती है।
- निवास की आवश्यकता में परिवर्तन: यह अधिनियम देशीयकरण के लिए निवास की आवश्यकता को 11 वर्ष से घटाकर पांच वर्ष करता है, जिससे अफगानिस्तान, बांग्लादेश और पाकिस्तान में रहने वाले हिंदू, सिख, बौद्ध, जैन, पारसी और ईसाई समुदाय के प्रवासियों के लिए भारतीय नागरिकता के लिए अर्हता प्राप्त करना आसान हो जाता है।
- भारतीय विदेशी नागरिक (ओसीआई) कार्ड का निरसन: नागरिकता अधिनियम, 1955 की धारा 7घ में संशोधन के साथ, यह अधिनियम केंद्र सरकार को ओसीआई कार्डधारकों का रजिस्ट्रीकरण रद्द करने का अधिकार देता है, लेकिन उन्हें अपने ओसीआई कार्ड को रद्द करने से पहले केंद्र सरकार के समक्ष अपना दृष्टिकोण रखने की अनुमति प्रदान करता है।
सीएए 2019 के आवेदन के पीछे औचित्य
- ऐतिहासिक अन्याय और धार्मिक उत्पीड़न: 1947 में भारत के विभाजन के परिणामस्वरूप काफी बड़ी जनसंख्या का पलायन हुआ, जिसमें लाखों हिंदू, जैन, बौद्ध और पारसी पाकिस्तान और अन्य पड़ोसी देशों से भारत में आ बसे। तथापि, बड़ी संख्या में इन समुदायों से संबंधित व्यक्तियों ने पाकिस्तान और अन्य पड़ोसी देशों में रहना उचित समझा। पिछले कुछ वर्षों में इन देशों में अल्पसंख्यक समुदायों के धार्मिक उत्पीड़न और दुर्व्यवहार की खबरें सामने आई, जहां उनके अपने धर्म का पालन करने, प्रचार करने और उसे मानने के अधिकारों पर अंकुश लगाया गया। सीएए इस ऐतिहासिक अन्याय को स्वीकार करता है और इसका उद्देश्य उन लोगों को राहत प्रदान करना है जिन्हें अपने धर्म के कारण उत्पीड़न का सामना करना पड़ा। गृह मंत्रालय द्वारा दी गई जानकारी के अनुसार, 2022 तक चार वर्षों की अवधि के दौरान अफगानिस्तान, बांग्लादेश और पाकिस्तान (एबीपी) से आने वाले हिंदू, सिख, बौद्ध, जैन, पारसी और ईसाई समुदायों के 4,500 से अधिक व्यक्तियों को भारतीय नागरिकता प्रदान की गई है। वर्ष 2022 में उत्पीड़ित अल्पसंख्यक वर्ग से संबंधित व्यक्तियों को नागरिकता प्रदान करने की संख्या सबसे अधिक थी।
- अवैध प्रवासियों की स्थिति: नागरिकता अधिनियम, 1955 के प्रावधानों के तहत, पूर्वकथित धार्मिक समुदायों से संबंधित व्यक्ति जो पासपोर्ट और औपचारिक यात्रा दस्तावेजों के बिना भारत में प्रवास करते हैं या अपने दस्तावेजों की समाप्ति के बाद भी भारत में निवास करना जारी रखते हैं, उन्हें अवैध प्रवासी माना जाता है। यह स्थिति उन्हें मौजूदा विधिक ढांचे के तहत भारतीय नागरिकता के लिए आवेदन करने हेतु निरर्ह बनाती है। सीएए, 2019 ऐसे प्रवासियों के लिए नागरिकता का मार्ग प्रदान करके इस मुद्दे को संबोधित करता है।
- पात्र प्रवासियों को नागरिकता प्रदान करना: सीएए, 2019 में प्रावधान है कि पाकिस्तान, अफगानिस्तान और बांग्लादेश के इन विनिर्दिष्ट धार्मिक समुदायों से संबद्ध अवैध प्रवासी, जो 31 दिसंबर, 2014 से पहले भारत आए हों, केंद्र सरकार द्वारा निर्धारित रजिस्ट्रीकरण या देशीयकरण के माध्यम से भारतीय नागरिकता के पात्र होंगे। इस प्रावधान का उद्देश्य इन प्रवासियों को नागरिकता प्राप्त करने के लिए एक विधिक तंत्र प्रदान करना है, जिससे उन्हें भारतीय नागरिकों को प्राप्त अधिकार और सुरक्षा प्रदान की जा सके।
- निवास स्थान की आवश्यकता में कमी: यह अधिनियम देशीयकरण के लिए निवास स्थान की आवश्यकता में संशोधन करता है, यह छूट इन प्रवासियों द्वारा सामना की जाने वाली विशिष्ट परिस्थितियों और चुनौतियों को मानने का संकेत देती है, तथा नागरिकता प्राप्ति की प्रक्रिया को सुव्यवस्थित करने का प्रयास किया गया है।
- सांविधानिक गारंटियों का संरक्षण: सीएए पूर्वोत्तर क्षेत्र के मूल निवासियों को प्रदान की गई सांविधानिक गारंटियों की सुरक्षा पर भी जोर देता है। संविधान की छठी अनुसूची में विनिर्दिष्ट कुछ क्षेत्रों और इनर लाइन परमिट सिस्टम (व्यवस्था) के तहत आने वाले क्षेत्रों को छूट देकर, इस अधिनियम का उद्देश्य इन क्षेत्रों में रहने वाली जनजाति और मूल समुदायों के हितों की रक्षा करना है।
आवेदन जमा करने की प्रक्रिया
नागरिकता संशोधन अधिनियम (सीएए) के तहत नागरिकता के लिए आवेदन करने की प्रक्रिया में कई चरण और दस्तावेज संबंधी आवश्यकताएं शामिल हैं। सीएए के तहत नागरिकता के लिए आवेदन करने के लिए, व्यक्तियों को अपने आवेदन निर्दिष्ट ऑनलाइन पोर्टल indiancitizenshiponline.nic.in के माध्यम से जमा करने होंगे। जमा करने के बाद, आवेदकों को रजिस्ट्रीकरण का या देशीयकरण का डिजिटल प्रमाणपत्र प्राप्त होगा।
इन नियमों में विनिर्दिष्ट किया गया है कि केवल अफगानिस्तान, बांग्लादेश और पाकिस्तान के हिंदू, सिख, बौद्ध, जैन, पारसी और ईसाई धर्म मानने वाले व्यक्ति ही इस अधिनियम के तहत नागरिकता के पात्र होंगे।
नागरिकता (संशोधन) नियम, 2024 के प्रमुख उपबंध निम्नलिखित हैं:
- नियम 10क: नियम 10क नागरिकता अधिनयिम, 1955 की धारा 6ख के अनुसार योग्य व्यक्तियों के लिए पात्रता मानदंड और आवेदन प्रक्रिया विनिर्दिष्ट करता है। इस नियम द्वारा विभिन्न पात्रता श्रेणियों के आधार पर विभिन्न प्रकार के आवेदन प्ररूप (ऐप्लिकेशन फॉर्म) और आवश्यकताएं बताई गई हैं। यह नियम नागरिकता नियम, 2009 के नियम 10 के ठीक बाद जोड़ा गया है।
आवेदन प्रक्रिया पूरी करने के लिए आवेदकों को न्यूनतम पांच से छह दस्तावेज उपलब्ध कराने होंगे, जो इस प्रकार हैं:
भरा हुआ आवेदन प्ररूप - इस अधिनियम की अनुसूची 1क के अंतर्गत सूचीबद्ध कोई एक दस्तावेज, जैसे भूमि या किरायेदारी रिकॉर्ड, जन्म प्रमाणपत्र या पहचान के दस्तावेज
- अनुसूची 1ख से एक दस्तावेज, जिसमें राशन कार्ड, आधार कार्ड, लाइसेंस या सरकार अथवा न्यायालय द्वारा जारी कोई आधिकारिक पत्र जिस पर आधिकारिक मुहर लगी हो
- दिए गए बयानों की सत्यता की पुष्टि करने वाला एक हलफनामा, जो नोटरी/शपथ आयुक्त/मजिस्ट्रेट द्वारा सत्यापित किया गया हो।
- एक दस्तावेज जो यह साबित करता हो कि आवेदक या उसके माता-पिता में से कोई एक स्वतंत्र भारत का नागरिक था (पासपोर्ट या जन्म प्रमाणपत्र), और
- यदि उपलब्ध हो, तो वैध या समाप्त हो चुके विदेशी पासपोर्ट या आवासीय परमिट की एक प्रति।
- नियम 11क: इस नियम के तहत, धारा 6ख के अनुसार उत्पीड़ित पात्र व्यक्तियों के आवेदन स्वीकार करने के लिए जिम्मेदार प्राधिकारी को विनिर्दिष्ट किया गया है। इसमें जिला स्तरीय समिति की सहायता से सशक्त समिति में इलेक्ट्रॉनिक रूप से आवेदन प्रस्तुत करने की पूरी प्रक्रिया बताई गई है। इसमें सत्यापन प्रक्रियाओं और राजनिष्ठा की शपथ किस प्रकार दिलाई जाएगी, इसे भी विनिर्दिष्ट किया गया है।
- नियम 13क: यह नियम आवेदनों के निरीक्षण से संबंधित है, जो सशक्त समिति द्वारा किया जाता है। इस नियम के तहत सशक्त समिति की जिम्मेदारियां परिभाषित की गई हैं। ये जिम्मेदारियां धारा 6ख के तहत देशीयकरण या रजिस्ट्रीकरण के माध्यम से भारतीय नागरिकता प्राप्त करने के लिए आवेदनों का निरीक्षण करने से संबद्ध हैं। इससे यह सुनिश्चित होगा कि आवेदन पूर्ण रूप से प्रस्तुत किया गया है तथा आवेदक पात्रता मानदंड को पूरा करता है।
- नियम 14: इस नियम में संशोधन किया गया है। इसमें कहा गया है कि प्ररूप 10क या 11क में रजिस्ट्रीकरण के डिजिटल प्रमाणपत्र के साथ-साथ रजिस्ट्रीकरण प्रमाणपत्र की मुद्रित प्रति (hard copy) भी जारी की जाएगी। इसके अलावा, यह मुद्रित प्रति जारी करने से संबंधित सभी प्रावधानों का उल्लेख करता है। अधिकार प्राप्त समिति को प्रमाणपत्रों पर डिजिटल हस्ताक्षर करने होंगे, या उसके अध्यक्ष को प्रमाणपत्रों पर हस्ताक्षर करने होंगे।
- नियम 15: इस नियम में भी संशोधन किया गया है। इसमें कहा गया है कि प्ररूप 12क में देशीयकरण के डिजिटल प्रमाणपत्र और इन प्रमाणपत्रों की मुद्रित प्रति जारी की जाएगी। इसके अलावा, इसमें इस प्रकार की मुद्रित प्रति जारी करने से संबंधित सभी प्रावधानों का उल्लेख किया गया है। नियम 14 की तरह, सशक्त समिति को इन प्रमाणपत्रों पर डिजिटल रूप से हस्ताक्षर करने होंगे या इसके अध्यक्ष को इन प्रमाणपत्रों पर हस्ताक्षर करने चाहिए।
- नियम 17: नियम 17 के अंतर्गत, धारा 5 के साथ धारा 6ख का संदर्भ भी जोड़ा गया है, जिससे इस नियम में संशोधन किया गया है। इससे ज्ञात होता है कि नागरिकता के लिए पात्रता मानदंड में विस्तार किया गया है।
- नियम 38 (3): इस नियम के अनुसार, राजनिष्ठा की शपथ प्रभावी होने के लिए, नियम 11क में उल्लिखित नामनिर्दिष्ट अधिकारी को इसे प्रशासित करना होगा या उसके सामने हस्ताक्षर करना होगा। यह ध्यान दिया जाना चाहिए कि धारा 5(2) या धारा 6(2) के तहत राजनिष्ठा की शपथ आवश्यक है। यह शपथ लेने की प्रक्रिया को विधिमान्य और वैध बनाता है।
सीएए को चुनौती देने के कारण
- सांविधानिक विधिमान्यता: इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग (आईयूएमएल) ने सीएए को उच्चतम न्यायालय में चुनौती देते हुए कहा कि इसके प्रावधान सांविधानिक नहीं हैं और मुसलमानों के विरुद्ध पक्षपातपूर्ण हैं। इसके अलावा, नागरिकता देने के नियमों को अधिसूचित करने का समय उचित नहीं है, क्योंकि लोक सभा चुनाव निकट हैं। इससे मामला और बिगड़ सकता है। इसके बाद, 200 से अधिक याचिकाएं दायर की गई, जो आईयूएमएल की चुनौती का समर्थन करती हैं।
- मुसलमानों के लिए प्रतिकूल: सीएए ने मुसलमानों को उत्पीड़ित लोगों की श्रेणी में शामिल नहीं किया है, क्योंकि तीनों संबद्ध इस्लामिक देशों में मुसलमान बहुसंख्यक हैं। लेकिन इस कानून को यह ज्ञात करने के लिए एक परीक्षण से गुजरना होगा कि क्या मुसलमानों को बाहर रखने के लिए इन देशों को चुना गया था।
याचियों का दावा है कि यह कानून मुसलमानों को निशाना बनाता है। इस संशोधन के अनुसार, नागरिकता धार्मिक आधार पर दी जा रही है, जो धर्मनिरपेक्षता, समानता, न्याय और उदारवाद के सिद्धांतों का विरोध करती है। यह मुसलमानों के कुछ वर्गों को सीएए का लाभ उठाने की अनुमति नहीं देता, जिन्हें भारत के पड़ोसी देशों में भी सताया जा रहा है, जैसे पाकिस्तान में बलूच, शिया और अहमदिया मुसलमान और अफगानिस्तान में हजारा।
आलोचकों का तर्क है कि प्रस्तावित राष्ट्रीय भारतीय नागरिक रजिस्टर (एनआरआईसी—नेशनल रजिस्टर ऑफ इंडियन सिटिजन्स) के साथ सीएए को संयोजित कर देखने पर यह मुसलमानों को नागरिकता के अधिकार से वंचित कर उन पर प्रतिकूल प्रभाव डालता प्रतीत होता है। यद्यपि एनआरआईसी से बाहर रखे गए गैर-मुसलमानों को सीएए के माध्यम से नागरिकता हासिल करने का अवसर मिल सकता है, तथापि मुसलमानों को ऐसा विशेषाधिकार नहीं है। - समता के अधिकार का उल्लंघन: याचियों का तर्क है कि सीएए भारत के संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन करता है। यह अनुच्छेद निर्दिष्ट करता है कि ‘राज्य, भारत के राज्यक्षेत्र में किसी व्यक्ति को विधि के समक्ष समता से या विधियों के समान संरक्षण से वंचित नहीं करेगा’। सीएए समता के मूल अधिकार का उल्लंघन करने के लिए धार्मिक आधारों का प्रयोग करता है।
याचियों ने आगे तर्क दिया कि राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (एनआरसी—नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटिजन्स) और सीएए के माध्यम से असम में अवैध प्रवासियों की पहचान करते समय मुसलमानों को निशाना बनाया जा सकता है। उच्चतम न्यायालय को यह निर्धारित करने के लिए कदम उठाना होगा कि क्या उत्पीड़ित प्रवासियों को अनुच्छेद 14 के तहत दिया गया विशेष विशेषाधिकार उन्हें सीएए के अनुसार भारतीय नागरिकता प्रदान करने के लिए वर्गीकृत करने हेतु उचित है या सीएए केवल मुसलमानों को बाहर कर रहा है।
उच्चतम न्यायालय ने निर्णय दिया है कि सीएए को यह सिद्ध करने के लिए दो परीक्षणों से गुजरना होगा कि यह अनुच्छेद 14 का उल्लंघन नहीं कर रहा है। पहले परीक्षण में, यह जांच की जाएगी कि लोगों के समूहों को एक अंतर के आधार पर अलग किया जाना चाहिए जिसे स्पष्ट रूप से समझा जा सके। दूसरे परीक्षण में, यह जांच की जाएगी कि इस अंतर का सीएए के उद्देश्य से उचित संबंध होना चाहिए।
यदि कोई वर्गीकरण अनुचित है तो उच्चतम न्यायालय उसे रद्द करने के लिए अधिकृत है। इसके अलावा, अधिक महत्वपूर्ण प्रश्न है कि क्या धार्मिक आधार पर नागरिकता के लिए पात्रता निर्धारित करना धर्मनिरपेक्षता का उल्लंघन है, जो संविधान का एक आधारभूत सिद्धांत है। - असम एकोर्ड का अतिक्रमण: असम सदैव अवैध अप्रवासियों के मुद्दे से निपटता रहा है। असम एकोर्ड केंद्र और असम आंदोलन के नेताओं के बीच अगस्त 1985 में हुआ एक समझौता है। इसका मुख्य उद्देश्य असम में विदेशियों की पहचान करना है। असम एकोर्ड के खंड 5 के तहत, यह प्रावधान किया गया है कि ‘विदेशियों’ का पता लगाने और उन्हें हटाने के लिए कट-ऑफ डेट (अंतिम तिथि) का आधार 1 जनवरी, 1966 होगी। तथापि, इस तिथि के बाद लेकिन 24 मार्च, 1971 तक भारत में प्रवेश करने वाले लोगों को विनयमित करने के लिए कुछ प्रावधानों का उल्लेख किया गया है। 2019 में जारी अंतिम एनआरसी भी इन्हीं तिथियों पर आधारित थी।
सीएए की धारा 6क के अनुसार, 1 जनवरी, 1966 से 25 मार्च, 1971 के बीच असम में प्रवेश करने वाले विदेशी नागरिक भारतीय नागरिकता के लिए आवेदन कर सकते हैं। यदि उच्चतम न्यायालय वर्तमान कट-ऑफ डेट, अर्थात 24 मार्च, 1971 को राज्य में आने की कट-ऑफ डेट मानता है, तो सीएए असम एकोर्ड को कमजोर कर देगा, क्योंकि सीएए द्वारा तय की गई समय-सीमा अलग है। याचियों का यह भी तर्क है कि सीएए के कारण बांग्लादेश से असम में अवैध प्रवासियों के प्रवेश में वृद्धि हो सकती है। इसके अलावा, प्रवासियों के आगमन से पूर्वोत्तर राज्यों के मूल निवासी सांस्कृतिक, राजनीतिक और भूमि अधिकारों से वंचित हो सकते हैं। इस अधिनियम के उपबंधों से क्षेत्र में प्रवासियों का और अधिक आगमन हो सकता है, जिससे मौजूदा तनाव और चुनौतियां बढ़ सकती हैं।
सीएए के कार्यान्वयन, इसके नियमों और निहितार्थों से संबंधित अन्य चिंताएं और आलोचनाएं इस प्रकार हैं:
- सीएए की आलोचना इस बात के लिए की गई है कि इसमें नागरिकता के प्रति चयनात्मक दृष्टिकोण अपनाया गया है, जिसमें पड़ोसी देशों के विनिर्दिष्ट गैर-मुस्लिम समुदायों के बिना दस्तावेज वाले अप्रवासियों को नागरिकता देने में तेजी लाई गई है। इस चयनात्मक दृष्टिकोण को भेदभावपूर्ण और भारत के संविधान में निहित समानता और धर्मनिरपेक्षता के सिद्धांतों के विपरीत माना गया है।
- सीएए के तहत नागरिकता के लिए आवेदन करने के नियमों में विनिर्दिष्ट दस्तावेजों की आवश्यकताओं का प्रावधान है। ये आवश्यकताएं हाशिए पर खड़े समुदायों, जिनमें मुस्लिम, समलैंगिक व्यक्ति और दलित शामिल हैं, के लिए चुनौतियां खड़ी कर सकती हैं, जिनके पास आवश्यक दस्तावेजों तक पहुंच की कमी हो सकती है।
- अधिकार प्राप्त समिति की संरचना के बारे में यह आलोचना की जाती रही है कि यह संघवाद के लिए हानिकारक है, क्योंकि इसमें केंद्र और राज्य सरकारों के बीच प्रतिनिधित्व में असंतुलन है।
- ऑनलाइन पोर्टल दिशा-निर्देशों में उल्लिखित दोनों समितियों की संरचना में विभिन्न सरकारी एजेंसियों और विभागों के प्रतिनिधि शामिल हैं। फिर भी, भ्रष्टाचार और आवेदकों के साथ दुर्व्यवहार की संभावना के बारे में चिंताएं व्यक्त की गई हैं, विशेष रूप से सशक्त समिति की संरचना के कारण, जिसमें केंद्र सरकार के पक्ष में एकतरफा प्रतिनिधित्व है। इन समितियों में खुफिया ब्यूरो के अधिकारियों और केंद्र सरकार की ओर से अज्ञात नामनिर्दिष्ट व्यक्तियों की मौजूदगी ने संभावित पूर्वाग्रहों और जवाबदेही की कमी के बारे में आशंकाएं उत्पन्न की हैं।
नागरिकता (संशोधन) नियम, 2024 का जारी किया जाना भारत के नागरिकता ढांचे में एक महत्वपूर्ण कदम है, लेकिन सीएए अपनी वैधता, व्यापकता और राष्ट्र की सामाजिक विविधता पर संभावित प्रभाव के कारण विवादास्पद बना हुआ है। यह आवश्यक है कि कोई भी नागरिकता नीति पारदर्शी, जवाबदेह और सांविधानिक मूल्यों के अनुरूप हो, ताकि भारतीय नागरिकता प्राप्त करने की इच्छा रखने वाले सभी व्यक्तियों के लिए समान व्यवहार सुनिश्चित हो सके। आगे बढ़ते हुए, भारत की शरणार्थी और नागरिकता नीतियों की समावेशिता और निष्पक्षता को बढ़ाने के लिए विचार करने के लिए कई उपाय हैं। इनमें अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप एक अधिक समावेशी शरणार्थी नीति विकसित करना, व्यक्तियों, विशेष रूप से हाशिए पर खड़े समुदाय, को आवश्यक दस्तावेज प्राप्त करने में सहायता प्रदान करना, चिंताओं को दूर करने के लिए हितधारकों की सहभागिता और संवाद को सुविधाजनक बनाना, धार्मिक उत्पीड़न को दूर करने के लिए पड़ोसी देशों के साथ संवाद, तथा नागरिकता कानूनों और संवैधानिक सिद्धांतों की सार्वजनिक समझ को बढ़ावा देने के लिए शैक्षिक और जागरूकता अभियान चलाना शामिल है। इन उपायों को अपनाकर, भारत एक ऐसे नागरिकता ढांचे की दिशा में काम कर सकता है जो समता, धर्मनिरपेक्षता और समावेशिता के सिद्धांतों को कायम रखता है, साथ ही इसमें शामिल सभी हितधारकों की वैध चिंताओं को भी संबोधित करता है।
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