महिला आरक्षण विधेयक, 2023 या संविधान (एक सौ अट्ठाईसवां संशोधन) विधेयक, 2023, क्रमशः 20 और 21 सितंबर, 2023 को लोक सभा और राज्य सभा दोनों में पारित किया गया। इस विधेयक का मुख्य उद्देश्य लोक सभा और राज्य की विधान सभाओं में कुल सीटों में से महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण प्रस्तावित करना था, जिसमें अनुसूचित जातियों (एससी) और अनुसूचित जनजातियों (एसटी) की महिलाओं के लिए आरक्षित सीटें भी शामिल थीं। ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’ शीर्षक से भी प्रस्तुत यह विधेयक 28 सितंबर, 2023 को राष्ट्रपति की अनुमति मिलने के बाद, संविधान (एक सौ छठा संशोधन) अधिनियम, 2023 बन गया।
महिला आरक्षण विधेयक, 2023 नए संसद भवन में दोनों सदनों द्वारा पारित किया जाने वाला पहला विधान है, जो प्रतीकात्मक रूप से नए संसद भवन के आरंभ होने को चिह्नित करता है।
इस अधिनियम के अनुसार, लोक सभा और राज्य की विधान सभाओं (दिल्ली राष्ट्रीय राजधानी राज्यक्षेत्र सहित) की सभी सीटों में से एक-तिहाई सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित होंगी। यह प्रावधान लोक सभा और राज्य की विधान सभाओं में अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लिए आरक्षित सीटों पर भी लागू होगा।
अधिनियम की मुख्य विशेषताएं
दिल्ली की विधान सभा में आरक्षण
- दिल्ली की विधान सभा में अनुसूचित जाति वर्ग के लिए आरक्षित सीटों में से एक-तिहाई सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित होंगी।
- प्रत्यक्ष निर्वाचन द्वारा भरी जाने वाली कुल सीटों में से एक-तिहाई सीटें, जिनमें अनुसूचित जाति वर्ग की महिलाओं के लिए आरक्षित सीटें भी शामिल हैं, संसद द्वारा विहित रीति से महिलाओं के लिए आरक्षित होंगी।
लोक सभा में आरक्षण
- लोक सभा में महिलाओं के लिए सीटें आरक्षित करने के उपबंध हेतु एक नया अनुच्छेद 330क पुरःस्थापित किया गया।
- अनुच्छेद 330क के तहत आरक्षित कुल सीटों में से लगभग एक-तिहाई सीटें अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति वर्ग की महिलाओं के लिए आरक्षित होंगी।
राज्य की विधान सभाओं में आरक्षण
- एक नया अनुच्छेद 332क पुरःस्थापित किया गया, जिसके तहत प्रत्येक राज्य की विधान सभा में महिलाओं के लिए सीटें आरक्षित होंगी।
- अनुच्छेद 332क के अंतर्गत आरक्षित कुल सीटों में से एक-तिहाई सीटें अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति वर्ग की महिलाओं के लिए आरक्षित होंगी।
- प्रत्येक राज्य की विधान सभा में प्रत्यक्ष निर्वाचन द्वारा भरी जाने वाली कुल सीटों (अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति की महिलाओं के लिए आरक्षित सीटों सहित) में से एक-तिहाई सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित होंगी।
कार्यान्वयन और अवधि
- अनुच्छेद 334क, 2023 अधिनियम के कार्यान्वयन और अवधि को रेखांकित करता है।
- आरक्षण संबंधी उपबंध 2023 में संशोधन अधिनियम के प्रारंभ होने के बाद आयोजित होने वाली पहली जनगणना के बाद परिसीमन कार्य पूरा होने के पश्चात प्रभावी होंगे।
- इस संशोधन अधिनियम के प्रारंभ होने के पंद्रह वर्ष की अवधि के बाद आरक्षण उपबंध प्रभावी नहीं रहेंगे।
- चक्रानुक्रम प्रत्येक पश्चातवर्ती परिसीमन कार्य, जैसा कि संसद द्वारा अवधारित किया जाएगा, के बाद प्रभावी होगा।
सांविधानिक उपबंध
1993 में, तिहत्तरवां और चौहत्तरवां संशोधन पारित होने के बाद पंचायतों और नगर पालिकाओं को भारत के संविधान में शामिल किया गया था। इन संशोधनों के अनुसार, इन निकायों में कुल सीटों में से एक-तिहाई सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित हैं। भारत के संविधान में लोक सभा और राज्य की विधान सभाओं में अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लिए सीटें आरक्षित करने के उपबंध किए गए हैं। ऐसी आरक्षित सीटों की संख्या का निर्धारण संबंधित निर्वाचन क्षेत्रों में उनकी संख्या के अनुपात में किया गया है। तथापि, हमारे संविधान में लोक सभा और राज्य की विधान सभाओं में महिलाओं के लिए सीटों के आरक्षण के बारे में कोई उपबंध नहीं है। ऐसा इसलिए है, क्योंकि संविधान के निर्माण के समय संविधान सभा के कुछ सदस्य ऐसे थे, जो ऐसे निकायों में महिलाओं के लिए सीटों के आरक्षण के विरोध में थे।
उदाहरण के लिए, सत्रहवीं लोक सभा के कुल सदस्यों में से केवल 15 प्रतिशत महिलाएं ही थीं, जबकि राज्य की विधान सभाओं के कुल सदस्यों में से केवल 9 प्रतिशत महिलाएं हैं। 2015 की रिपोर्ट ऑफ द हाई लेवल कमिटी ऑन द स्टेटस ऑफ वुमेन इन इंडिया के अनुसार, राजनीति में महिलाओं का प्रतिनिधित्व नगण्य है। अतः, यह सिफारिश की गई कि विभिन्न स्तरों पर सरकारी नौकरियों, जैसे संसद, राज्य की विधान सभाएं और स्थानीय निकाय, में कुल सीटों में से लगभग 50 प्रतिशत सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित की जानी चाहिए।
सांविधानिक संशोधनों की आवश्यकता
जैसा कि आरक्षण को केवल परिसीमन की पूर्व शर्त के साथ ही लागू किया जा सकता है, इसलिए परिसीमन की प्रक्रिया आवश्यक है। ऐसा करने के लिए, भारत के संविधान के अनुच्छेद 82 और 170(3) में संशोधन करना आवश्यक है। अनुच्छेद 82 में जनगणना के दौरान लोक सभा और राज्य की विधान सभाओं के निर्वाचन क्षेत्रों (उनकी संख्या और सीमाओं सहित) को पुनः समायोजित करने का उपबंध किया गया है। अनुच्छेद 170(3) में विधान सभाओं के गठन का उपबंध किया गया है।
ऐतिहासिक परिदृश्य
भारत के स्वतंत्रता संग्राम के समय, भारत सरकार के समक्ष महिलाओं के प्रतिनिधित्व का मुद्दा उठाया गया था और यह चर्चा का एक महत्वपूर्ण मुद्दा बना। हालांकि, भारत के संविधान के निर्माण के समय, महिला सदस्यों को भय था कि राजनीति में महिलाओं के लिए आरक्षण उनके प्रतिनिधित्व को सीमित कर सकता है। अतः, उन्होंने ऐसे आरक्षण की मांग नहीं की। संविधान सभा की महत्वपूर्ण सदस्यों में से एक रेणुका रे ने आरक्षण के कारण उत्पन्न होने वाले कई मुद्दों का उल्लेख किया और इस बात पर जोर दिया कि एकमात्र मानदंड, क्षमता होनी चाहिए।
तथापि, भारत को स्वतंत्रता मिलने के पश्चात, यह अपेक्षा की गई कि महिलाओं को विधायी निकायों में प्रतिनिधित्व प्राप्त होगा, लेकिन ऐसा हुआ नहीं।
बाद में, तिहत्तरवें और चौहत्तरवें संविधान संशोधन के लागू होने के साथ ही, विधान-मंडलों में महिलाओं के लिए समान कोटा की मांग की गई। अतः, कई सरकारों ने महिला आरक्षण विधेयक पारित करने के प्रयास किए, लेकिन सफल नहीं हुईं। संसद और राज्य की विधान सभाओं में महिलाओं के लिए सीटें आरक्षित करने के लिए, भारत के संविधान में संशोधन करने वाले विधेयक क्रमशः 1996, 1998, 1999, 2008 और 2010 में पुरःस्थापित किए गए थे। चूंकि पहले तीन विधेयक पुरःस्थापित करने वाली लोक सभाओं का विघटन हो गया था, इसलिए ये विधेयक व्यपगत हो गए। जहां तक 2008 के विधेयक का प्रश्न है, इसे राज्य सभा ने पारित किया था, लेकिन जब पंद्रहवीं लोक सभा विघटित हुई थी, तो यह भी व्यपगत हो गया। इसके अलावा, 2010 के विधेयक को लोक सभा में पारित करने में देरी हुई, जैसा कि राज्य सभा में पारित होने के बावजूद विपक्षी दलों द्वारा इसका विरोध किया गया।
1996 और 2008 के विधेयकों की जांच करने वाली समितियों ने सिफारिश की थी कि
- जब भी आवश्यक समझा जाए, अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) वर्ग की महिलाओं के लिए आरक्षण पर विचार किया जाए;
- 15 वर्ष के आरक्षण का प्रावधान करने और फिर उस पर पुनर्विचार किया जाए; तथा
- उन तौर-तरीकों पर विचार-विमर्श किया जाए, जिनके तहत महिलाओं को राज्य सभा और राज्य विधान परिषदों में भी आरक्षण मिल सके।
अधिनियम से संबंधित मुद्दे
इस अधिनियम से संबंधित कुछ मुद्दे जिन पर ध्यान दिया जाना चाहिए, वे इस प्रकार हैं:
- इस अधिनियम में उच्च सदन अर्थात राज्य सभा और राज्य विधान परिषदों में महिलाओं के लिए सीटों के आरक्षण के संबंध में कोई उपबंध नहीं किया गया है। उच्च सदन में महिलाओं का प्रतिनिधित्व पहले से ही कम है।
- विधायी निकायों में महिलाओं के लिए आरक्षण केवल परिसीमन पूरा होने के बाद ही लागू किया जाएगा। कोविड-19 महामारी के कारण 2021 की जनगणना स्थगित कर दी गई थी, इसलिए जनगणना को अगले आदेशों तक 2024-25 के लिए पुनर्निर्धारित किया गया। जनगणना में देरी का सीधा प्रभाव परिसीमन की समय-सीमा और अधिनियम के कार्यान्वयन पर पड़ेगा।
- इस अधिनियम में ओबीसी वर्ग की महिलाओं के लिए आरक्षण का उपबंध नहीं किया गया है। 2011 की जनगणना के अनुसार, ओबीसी वर्ग की जनसंख्या 41 प्रतिशत है; इसलिए विधायी निकायों में उनका प्रतिनिधित्व अपर्याप्त माना जाता है।
- इस अधिनियम के क्रियान्वयन के लिए आवश्यक परिसीमन की प्रक्रिया उत्तर-दक्षिण क्षेत्र के बीच विभाजन का कारण बन सकती है। इसे जनगणना के आधार पर संचालित करने की आवश्यकता है, इसलिए दक्षिण भारत के राज्य अपनी कम जनसंख्या के कारण पिछड़ सकते हैं। इस भेदभाव को रोकने के लिए सरकार को इस प्रक्रिया को स्पष्ट करने के लिए आवश्यक कदम उठाने चाहिए।
- इस अधिनियम के कार्यान्वयन के लिए अभी भी व्यापक स्तर पर प्रशासनिक कार्य की आवश्यकता है, जिसमें कई वर्ष लग सकते हैं, जैसा कि निर्वाचन क्षेत्रों को पुनः परिभाषित करना होगा।
आरक्षण की आवश्यकता क्यों
निम्नलिखित कारणों से देश के विधान-मंडलों में महिलाओं के लिए सीटें आरक्षित होनी चाहिए:
- यदि महिलाओं को देश की राजनीतिक व्यवस्था में आनुपातिक रूप से अपना प्रतिनिधित्व करने का अवसर नहीं मिलेगा तो वे नीति-निर्माण में भाग नहीं ले पाएंगी।
- संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा अपनाए गए कन्वेंशन ऑन द इलिमिनेशन ऑफ ऑल फॉर्म्स ऑफ डिस्क्रिमिनेशन अगेंस्ट वुमेन के अनुसार, सार्वजनिक और राजनीतिक जीवन में महिलाओं के विरुद्ध भेदभाव को दूर करने के प्रयास किए जाने चाहिए। यद्यपि हमारा देश इस कन्वेंशन में भाग लेता है, तथापि महिलाओं के साथ विधान-मंडलों में उनके प्रतिनिधित्व के विरुद्ध भेदभाव किया जाता है।
- 2003 में किए गए एक अध्ययन के अनुसार, पंचायतों में निर्वाचित होने वाली महिलाओं की महिलाओं से जुडे़ हितों में रुचि बढ़ी और उन्होंने उनमें अधिक प्रतिबद्धता दिखाई।
- कार्मिक, लोक शिकायत, विधि और न्याय संबंधी स्थायी समिति (2009) के अनुसार, स्थानीय सरकारी निकायों में सीटों के आरक्षण के कारण महिलाओं ने राजनीति में महत्वपूर्ण योगदान दिया है।
अधिनियम का महत्व
- यह अधिनियम लैंगिक समानता का समर्थन करता है, जैसा कि अब महिलाएं सरकार में निर्णय लेने वाले पदों पर आसीन हो सकती हैं। उन्हें पूरे देश के लिए नीतियां और विधि बनाने में भाग लेने का अधिकार दिया जाएगा।
- यह सुनिश्चित करके कि देश के विधायी निकायों में महिलाओं के दृष्टिकोण और चिंताओं को ध्यान में रखा जाए, जिससे कि इस अंतर को कम किया जा सके, यह अधिनियम भारत की राजनीतिक व्यवस्था में लैंगिक असमानता के मुद्दे का समाधान करता है।
- जैसे-जैसे देश के राजनीतिक मामलों में महिलाओं की भागीदारी बढ़ेगी, संसद में विविध दृष्टिकोण और अनुभव प्रस्तुत किए जाएंगे। परिणामस्वरूप, नीति-निर्माण की प्रक्रिया परिपक्व और व्यापक होगी, जिससे शासन में अधिक जवाबदेही आएगी।
- शिक्षा, स्वास्थ्य देखभाल, परिवार कल्याण और लिंग आधारित हिंसा के संबंध में सभी क्षेत्रों की महिलाओं से प्राप्त विविध और विशिष्ट सूचनाओं के आधार पर सुविचारित विधि बनाई जा सकती हैं।
- यह अधिनियम समाज में सकारात्मक बदलाव लाने का एक साधन प्रदान करेगा। युवा लड़कियां विधायी निकायों में शामिल महिलाओं को अपने आदर्श के रूप में देख सकती हैं।
- राजनीति में महिलाओं का प्रतिनिधित्व सामाजिक विकास के लिए बेहतर नतीजे सुनिश्चित करेगा। एक अध्ययन के अनुसार, जिन देशों में राजनीति में महिलाओं की भागीदारी उच्च स्तर पर है, वहां शिक्षा, स्वास्थ्य देखभाल और अन्य ऐसे क्षेत्रों में नतीजे बेहतर हुए हैं।
- भारत की राजनीति में समावेशिता की संस्कृति स्थापित होगी और विभिन्न पृष्ठभूमियों से, यहां तक कि उपेक्षित समुदायों से भी, महिलाएं राजनीति में आएंगी।
- महिलाओं के अधिकार, शिक्षा, स्वास्थ्य सेवा और ऐसे अन्य मुद्दों को महिला नेताओं द्वारा प्राथमिकता दी जाएगी। इस प्रकार, इन क्षेत्रों में सार्वजनिक सेवाओं और नीतियों में सुधार किया जाएगा।
- कार्यस्थल पर उत्पीड़न, घरेलू हिंसा और भेदभाव सहित महिलाओं के अधिकारों की रक्षा के लिए बनाई गई विधियों को महिला राजनीतिक नेताओं द्वारा लागू किया जाएगा और उन्हें सुदृढ़ बनाया जाएगा।
महिलाओं के राजनीतिक प्रतिनिधित्व का वैश्विक परिदृश्य
यह देखा गया है कि भारत सहित पूरे विश्व में शासन में महिलाओं का प्रतिनिधित्व कम है। 185 देशों में से 134 में सरकार में महिलाओं का प्रतिनिधित्व 33 प्रतिशत से कम है। अन्य 91 देशों में राजनीति में महिलाओं का प्रतिनिधित्व 25 प्रतिशत से कम है, जबकि भारत में पिछले कुछ वर्षों में इस तरह की भागीदारी में उल्लेखनीय वृद्धि के बावजूद शासन में महिलाओं की भागीदारी मात्र 15 प्रतिशत है।
तथापि, लगभग 107 देशों में समाज में महिलाओं की महत्वपूर्ण भूमिका को ध्यान में रखते हुए शासन में महिलाओं के लिए कोटा तय किया गया है। इनमें से कुछ देश जर्मनी, यूके, ऑस्ट्रेलिया, स्वीडन और यूएई हैं। निचले सदनों में महिलाओं की सर्वाधिक भागीदारी केवल छह देशों, अर्थात रवांडा में 61 प्रतिशत, क्यूबा में 53 प्रतिशत, निकारागुआ में 52 प्रतिशत, मैक्सिको में 50 प्रतिशत, न्यूजीलैंड में 50 प्रतिशत और यूएई में 50 प्रतिशत, में ही देखी गई है। इसके अलावा, 23 देशों ने शासन में महिलाओं की भागीदारी 40 प्रतिशत या उससे अधिक हासिल की है; इनमें यूरोप के 13 देश, अफ्रीका के छह, लैटिन अमेरिका और कैरिबियन के तीन-तीन तथा एशिया का एक देश शामिल है।
एशिया में एक देश है जहां लगभग 40 प्रतिशत महिलाओं को राजनीतिक भागीदारी हासिल है, वह है तिमोर-लेस्ते (Timor-Leste), जिसे ईस्ट तिमोर के नाम से भी जाना जाता है।
संयुक्त राष्ट्र के महिला संबंधी आंकड़ों के अनुसार, विश्व के विभिन्न देशों में निचले सदन में महिलाओं की भागीदारी का अनुपात लगभग 26 प्रतिशत है, जो 1995 के 11 प्रतिशत से अधिक है।
अधिनियम के संबंध में विचार
विधेयक पेश करने के विशेष सत्र के दौरान संसद में महिला अधिकारों के बारे में बात करते हुए, प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा, “ईश्वर ने इस शुभ कदम के लिए मुझे चुना है।” बाद में उन्होंने ट्विटर पर लिखा, “हमारे देश की लोकतांत्रिक यात्रा का एक ऐतिहासिक क्षण! इस विधेयक के पारित होने से महिला शक्ति का प्रतिनिधित्व मजबूत होगा और उनके सशक्तिकरण का एक नया युग शुरू होगा।”
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की नेता सोनिया गांधी ने कहा, “मैं नारी शक्ति वंदन अधिनियम के समर्थन में खड़ी हूं। धुएं से भरी रसोई से लेकर भरे स्टेडियम तक भारत की महिलाओं का सफर लंबा रहा है..."। हालांकि, उन्होंने ओबीसी वर्ग की महिलाओं के लिए भी उप-कोटे की मांग की।
यद्यपि महिला अधिकार कार्यकर्ता फ्लाविया एग्नेस ने संशोधन अधिनियम को आगे बढ़ने का एक रास्ता बताया, तथापि उन्होंने बताया कि राजनीतिक क्षेत्र में महिलाओं के सशक्तिकरण के प्रति राजनीतिक दलों की प्रतिबद्धता की बेहतर तस्वीर तब सामने आएगी, जब वे 2024 के लोक सभा चुनावों में महिला अभ्यर्थियों को टिकट आबंटित करेंगे।
इसके अलावा, पूर्व लोक सभा सचिव और संवैधानिक विशेषज्ञ पीडीटी आचार्य ने भी अपनी निराशा व्यक्त की, जैसा कि इस अधिनियम का कार्यान्वयन 2026, अर्थात जब परिसीमन कार्य किया जाएगा, तक स्थगित कर दिया जाएगा।
निष्कर्ष
यह एक प्रगतिशील और परिवर्तनकारी विधान है, जो देश के शासन में लैंगिक समानता प्राप्त करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। यह समय की मांग है कि इस अधिनियम को गति मिले, ताकि देश में ठोस बदलाव लाया जा सके।
© Spectrum Books Pvt. Ltd.



