जन्म और मृत्यु रजिस्ट्रीकरण (संशोधन) विधेयक, 2023 को लोक सभा में 1 अगस्त, 2023 को और राज्य सभा में 7 अगस्त, 2023 को पारित किया गया। इसे 11 अगस्त, 2023 को राष्ट्रपति की अनुमति प्राप्त हुई और यह एक अधिनियम बन गया। यह अधिनियम 1969 के जन्म और मृत्यु रजिस्ट्रीकरण (आरबीडी) अधिनियम में महत्वपूर्ण संशोधनों को अंतःस्थापित करता है। यह उपयुक्त प्रौद्योगिकियों द्वारा भारत में जन्म और मृत्यु रजिस्ट्रीकरण की प्रक्रिया को सुधारने और उसे सुव्यवस्थित करने पर केंद्रित है।
1969 का अधिनियम देश में जन्म और मृत्यु के विनियमन और रजिस्ट्रीकरण का उपबंध करता है। चूंकि जन्म और मृत्यु का रजिस्ट्रीकरण समवर्ती सूची का हिस्सा है, इसलिए संसद के साथ-साथ राज्य की विधान सभाओं को भी इस विषय पर विधि बनाने का अधिकार है।
वर्ष 2019 तक भारत में राष्ट्रीय स्तर पर जन्म रजिस्ट्रीकरण का अनुपात 93 प्रतिशत तथा मृत्यु रजिस्ट्रीकरण का अनुपात 92 प्रतिशत था।
मुख्य उपबंध
जन्म और मृत्यु रजिस्ट्रीकरण (संशोधन) अधिनियम, 2023 के मुख्य उपबंध इस प्रकार हैं:
जन्म और मृत्यु का डाटाबेस: 1969 के अधिनियम में प्रावधान है कि भारत के महारजिस्ट्रार को नियुक्त किया जाएगा, जो जन्म और मृत्यु के रजिस्ट्रीकरण के लिए साधारण निदेश जारी करने के लिए जिम्मेदार होगा। 2023 का संशोधन अधिनियम प्रावधान करता है कि भारत के महारजिस्ट्रार द्वारा राष्ट्रीय स्तर पर रजिस्ट्रीकृत जन्म और मृत्यु का डाटाबेस रखा और अनुरक्षित किया जाएगा। राज्य स्थानीय क्षेत्र अधिकारिता के लिए रजिस्ट्रार, जिला स्तर पर जिला रजिस्ट्रार और राज्य स्तर पर मुख्य रजिस्ट्रार नियुक्त करेंगे। इन रजिस्ट्रारों के लिए रजिस्ट्रीकृत जन्म और मृत्यु के डाटा को राष्ट्रीय डाटाबेस में प्रस्तुत करना अनिवार्य होगा। इसी प्रकार, राज्य स्तर पर मुख्य रजिस्ट्रार द्वारा ऐसा डाटाबेस बनाए रखा जाएगा।
इलेक्ट्रॉनिक प्रमाणपत्र: 1969 का अधिनियम प्रावधान करता है कि कोई भी भारतीय नागरिक (i) रजिस्ट्रार की सहायता से जन्म और मृत्यु के रजिस्टर में किसी भी प्रविष्टि की खोज शुरू कर सकता है और (ii) इस रजिस्टर से एक उद्धरण प्राप्त कर सकता है। इस संशोधन अधिनियम में उपबंध है कि कोई भी भारतीय नागरिक उद्धरण के स्थान पर जन्म या मृत्यु प्रमाणपत्र प्राप्त कर सकता है। यह प्रमाणपत्र इलेक्ट्रॉनिक या किसी अन्य रूप में हो सकता है।
माता-पिता और सूचनादाता के आधार विवरण की आवश्यकता: आरबीडी अधिनियम, 1969 के अनुसार, विनिर्दिष्ट व्यक्तियों को जन्म और मृत्यु के बारे में रजिस्ट्रार को सूचना देनी होती है। उदाहरण के लिए, बालक के जन्म की सूचना उस अस्पताल के चिकित्सा अधिकारी द्वारा दी जानी चाहिए जहां बालक ने जन्म लिया है। संशोधन अधिनियम, 2023 में प्रावधान करता है कि बालक के जन्म की स्थिति में, विनिर्दिष्ट व्यक्तियों को अपने स्वयं के विवरण के साथ-साथ माता-पिता के आधार का विवरण भी प्रस्तुत करना होगा।
यह उपबंध
- होटल या आवास के प्रबंधक या मालिक पर भी लागू होता है, यदि बालक वहां जन्म लेता है; और
- जेल में बालक के जन्म लेने की स्थिति में जेलर पर भी लागू होता है।
इसके अलावा, इस संशोधन अधिनियम में विनिर्दिष्ट व्यक्तियों की सूची में निम्नलिखित को भी शामिल किया गया है:
- सरोगेसी द्वारा बालक के जन्म लेने के मामले में जैविक माता-पिता;
- गैर-संस्थानिक दत्तक ग्रहण के संबंध में दत्तक ग्रहण करने वाले माता-पिता; और
- एक माता-पिता या अविवाहित माता से जन्में बालक के माता-पिता।
एकीकृत डाटाबेस और उसका सहभाजन: इस संशोधन अधिनियम में उपबंध है कि निर्वाचक नामावली, जनसंख्या रजिस्टर, राशन कार्ड और किसी अन्य अधिसूचित डाटाबेस जैसे अन्य डाटाबेसों का अनुरक्षण करने के लिए जिम्मेदार प्राधिकारियों की पहुंच राष्ट्रीय डाटाबेस तक हो सकती है। हालांकि, राष्ट्रीय डाटाबेस का उपयोग करने के लिए केंद्र सरकार का पूर्वानुमोदन प्राप्त करना आवश्यक है। इसी प्रकार, अन्य राज्य डाटाबेसों से संबंधित प्राधिकारियों की पहुंच राज्य सरकार के पूर्वानुमोदन से राज्य डाटाबेस तक हो सकती है।
जन्म प्रमाणपत्र का उपयोग: संशोधन अधिनियम, 2023 प्रावधान करता है कि इस अधिनियम के लागू होने के दिन या उसके बाद जन्म लेने वाले लोगों की जन्म तिथि और स्थान को जन्म और मृत्यु प्रमाणपत्र का प्रयोग करके सिद्ध किया जाना चाहिए।
इस जानकारी का प्रयोग निम्नलिखित प्रयोजनों के लिए किया जा सकता है:
- स्कूल, कॉलेज या विश्वविद्यालय में प्रवेश लेते समय;
- सरकारी पद पर नियुक्ति लेते समय;
- ड्राइविंग लाइसेंस, पासपोर्ट या आधार नंबर जारी करते समय;
- मतदाता सूची तैयार करते समय;
- विवाह के पंजीकरण के समय; और
- केंद्र सरकार द्वारा अधिसूचित किसी अन्य प्रयोजन के समय।
अपील की प्रक्रिया: संशोधन अधिनियम, 2023 प्रावधान करता है कि यदि कोई भारतीय नागरिक रजिस्ट्रार या जिला रजिस्ट्रार की कार्रवाई (या आदेश) से असंतुष्ट है, तो वह अपनी शिकायत के निवारण के लिए क्रमशः जिला रजिस्ट्रार या मुख्य रजिस्ट्रार के समक्ष अपील कर सकता है। पीड़ित नागरिक को ऐसी कार्रवाई (या आदेश) के 30 दिनों के भीतर ऐसी अपील करनी चाहिए। ऐसी अपील के 90 दिनों के भीतर, जिला रजिस्ट्रार या मुख्य रजिस्ट्रार अपना निर्णय देने के लिए बाध्य है। इस उपबंध का उद्देश्य उचित तंत्र का उपयोग करके रजिस्ट्रीकरण से संबंधित विवादों (चिंताओं) को संबोधित करना है।
महामारी या आपदा की स्थिति में: संशोधन अधिनियम, 2023 के अनुसार, आपदा या महामारी के समय रजिस्ट्रार रजिस्ट्रीकरण प्रक्रिया को आगे बढ़ाने के लिए विशेष उप-रजिस्ट्रार नियुक्त कर सकते हैं। यह उपबंध चुनौतीपूर्ण समय में भी जन्म और मृत्यु के रिकॉर्ड की सटीकता को सुनिश्चित करता है।
दंड: संशोधन अधिनियम, 2023 के अनुसार, इस अधिनियम के उल्लंघन या गलत जानकारी देने संबंधी दंड में संशोधन किया गया है। यह उन दोषियों पर जुर्माना लगाता है जो गलत जानकारी देते हैं, या जानकारी नहीं देते, या सहयोग नहीं करते। दंड की सीमा अपराध की प्रकृति और इसमें शामिल लोगों की श्रेणी पर निर्भर करती है।
मुद्दे और चिंताएं
जन्म और मृत्यु रजिस्ट्रीकरण (संशोधन) अधिनियम, 2023 से संबंधित कुछ प्रमुख मुद्दे निम्नानुसार हैं:
भारत के संविधान का उल्लंघन: इस संशोधन अधिनियम के अनुसार, जन्म प्रमाणपत्र का प्रयोग विभिन्न प्रयोजनों के लिए आवश्यक है, जैसे कि किसी शैक्षणिक संस्थान में दाखिला लेना और सरकारी पद पर नियुक्ति प्राप्त करना। इनमें से कुछ प्रयोजन वास्तव में भारत के संविधान में नागरिकों के लिए निर्दिष्ट मूल अधिकार हैं। जन्म प्रमाणपत्र के कारण ये अधिकार सशर्त हो सकते हैं और इस प्रकार इनका उल्लंघन हो सकता है।
निम्नलिखित उदाहरणों को देखें:
- यदि किसी बालक के पास जन्म प्रमाणपत्र नहीं है, तो उसे संशोधन अधिनियम के अनुसार स्कूल में प्रवेश से वंचित किया जा सकता है। इसके परिणामस्वरूप, अनुच्छेद 21क के तहत शिक्षा के मूल अधिकार का उल्लंघन हो सकता है। शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2009 में कहा गया है कि जन्म प्रमाणपत्र या किसी अन्य निर्धारित दस्तावेज का प्रयोग बालक की आयु निर्धारित करने और उसे प्राथमिक विद्यालय में प्रवेश देने के लिए किया जा सकता है। हालांकि, आयु प्रमाण की कमी के कारण प्रवेश से इनकार नहीं किया जा सकता है। संशोधन अधिनियम, 2023 में इस तरह की छूट का उल्लेख नहीं किया गया है। इसका तात्पर्य है कि यदि बालक के जन्म का रजिस्ट्रीकरण नहीं हुआ है, तो उसे जीवन भर के लिए शैक्षणिक संस्थानों में प्रवेश से वंचित किया जा सकता है।
- भारत के संविधान के अनुच्छेद 326 के तहत, 18 वर्ष या उससे अधिक आयु के प्रत्येक नागरिक को मतदान करने का अधिकार है। फिर भी, आरबीडी (संशोधन) अधिनियम, 2023 में उस व्यक्ति का कोई उल्लेख नहीं है जिसके पास जन्म प्रमाणपत्र न होने के कारण उसका नाम मतदाता सूची में दर्ज नहीं है। यह उस व्यक्ति के मताधिकार का उल्लंघन करता है।
आधार को जन्म रिकॉर्ड से लिंक करना: यह संशोधन अधिनियम माता-पिता के आधार विवरण और सूचनादाता के बीच एक लिंक स्थापित करता है (अर्थात, अस्पताल का चिकित्सा अधिकारी, या जेलर, या इनमें से किसी भी स्थान पर बालक का जन्म होने की स्थिति में होटल का प्रबंधक; या थानागृह अधिकारी (स्टेशन हाउस ऑफिसर—एसएचओ) जहां कोई परित्यक्त नवजात शिशु पाया जाता है)। इस उपबंध के परिणामस्वरूप सूचना देने वाले के निजता के अधिकार का उल्लंघन हो सकता है। उदाहरण के लिए, यदि किसी चिकित्सा अधिकारी का आधार उसके अस्पताल में जन्मे किसी बालक से संबद्ध (लिंक) है, या किसी एसएचओ का आधार उसके अधिकार क्षेत्र में पाए गए सभी परित्यक्त बालकों से संबद्ध है, तो यह उनके निजता के अधिकार का अनुचित रूप से उल्लंघन होगा।
सभी डाटाबेसों को लिंक करना: इस संशोधन अधिनियम के अनुसार, जन्म और मृत्यु के लिए राष्ट्रीय डेटाबेस को अन्य डेटाबेस को विनियमित करने वाले प्राधिकारियों के साथ साझा किया जा सकता है। इसी प्रकार, राज्य डेटाबेस को अन्य राज्य डेटाबेस को विनियमित करने वाले प्राधिकारियों के साथ साझा किया जा सकता है। यह क्रमशः केंद्र और राज्य सरकारों की सहमति से किया जाता है। लेकिन जिन व्यक्तियों का डेटा साझा किया जा रहा है, उन्हें इन मामलों में अपनी सहमति देने की आवश्यकता नहीं है। यह संबंधित व्यक्तियों के निजता के अधिकार का उल्लंघन करता है।
देखभाल और संरक्षण की आवश्यकता वाले बालकों के साथ भेदभाव: इस संशोधन अधिनियम के लागू होने के साथ, देश में जन्म लेने वाले प्रत्येक बालक को आयु और जन्म स्थान के प्रमाण के लिए जन्म प्रमाणपत्र की आवश्यकता होगी। इसलिए, जिन बालकों के पास जन्म प्रमाणपत्र नहीं है और जिन्हें देखभाल और संरक्षण की आवश्यकता है, उनके साथ भेदभाव किया जा सकता है। उदाहरण के लिए, कोई बालक अपने जन्म के कुछ वर्ष बाद घर से भाग गया हो या किसी प्राकृतिक आपदा में अपने माता-पिता को खो दिया हो। चूंकि उनकी आयु निर्धारित नहीं की जा सकती, इसलिए ऐसे बालक देश भर के किसी भी स्कूल में दाखिला नहीं ले सकेंगे।
यह अधिनियम किशोर न्याय (बालकों की देखरेख और संरक्षण) अधिनियम, 2015 के उपबंधों का भी अनुपालन नहीं करता, जो देखभाल और संरक्षण की आवश्यकता वाले बालकों के सामाजिक पुनः एकीकरण और पुनर्वास की सुविधा पर केंद्रित है। यह जन्म प्रमाणपत्र न होने की स्थिति में आयु का कोई वैकल्पिक प्रमाण प्रदान नहीं करता है। फिर भी, किशोर न्याय अधिनियम, 2015 के तहत, ऐसे व्यक्ति की आयु का पता लगाने के अन्य तरीके भी हैं जिनके पास जन्म प्रमाणपत्र नहीं है।
निष्कर्ष
आरबीडी (संशोधन) अधिनियम, 2023 का उद्देश्य विशिष्ट रूप से उन्नत प्रौद्योगिकियों को शामिल करके भारत में जन्म और मृत्यु रजिस्ट्रीकरण की प्रक्रिया को सुदृढ़ बनाना है। तथापि, यह अधिनियम कितना सफल सिद्ध होता है, यह देखना अभी शेष है।
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