5 अगस्त, 2019 को गृह मंत्री अमित शाह द्वारा राज्य सभा में जम्मू और कश्मीर पुनर्गठन विधेयक, 2019 प्रस्तुत किया गया, जिसे राज्य सभा द्वारा तत्काल स्वीकृति प्रदान कर दी गई। अगले ही दिन, 6 अगस्त, 2019 को पहले लोक सभा और तत्पश्चात 9 अगस्त, 2019 को राष्ट्रपति की अनुमति प्राप्त करने के साथ ही इस विधेयक ने अधिनियम का रूप ले लिया।
संसद की सिफारिश पर राष्ट्रपति द्वारा भारत के संविधान के अनुच्छेद 370 के खंड 1 के साथ पठित खंड 3 द्वारा प्रदत्त शक्तियों का प्रयोग करते हुए यह घोषणा की गई कि 6 अगस्त, 2019 से अनुच्छेद 370 के सभी खंड प्रचालन में नहीं रहेंगे, सिवाय निम्नलिखित के, जो नीचे दिए गए के अनुसार हैं, अर्थात—
अनुच्छेद 370, इस संविधान के समय-समय पर यथा-संशोधित, के सभी उपबंध बिना किन्हीं उपांतरणों या अपवादों के अनुच्छेद 152 या अनुच्छेद 308 या इस संविधान के किसी अन्य अनुच्छेद या जम्मू-कश्मीर के संविधान में किसी अन्य उपबंध या किसी विधि, दस्तावेज, निर्णय, अध्यादेश, आदेश, उपविधि, नियम, विनियम, अधिसूचना या भारत के राज्यक्षेत्र में विधि का बल रखने वाली किसी रूढ़ि या प्रथा या किसी अन्य लिखत, संधि या करार जो अनुच्छेद 363 के अधीन यथा परिकल्पित या अन्यथा है, में तत्प्रतिकूल किसी बात के अंतर्विष्ट होते हुए भी, जम्मू-कश्मीर राज्य पर लागू होंगे।
स्त्रोतः भारत का संविधान (26 नवंबर, 2021 को यथाविद्यमान) विधि और न्याय मंत्रालय के अधीन विधायी विभाग की वेबसाइट पर उपलब्ध।
जम्मू-कश्मीर अधिनियम, 2019 जम्मू और कश्मीर पर लागू अनुच्छेद 370 और 35क को निरसित कर राज्य को दो संघ राज्यक्षेत्रों—जम्मू और कश्मीर तथा लद्दाख में द्विविभाजित करता है।
अधिनियम के प्रमुख प्रावधान निम्नानुसार हैं:
- इस अधिनियम ने जम्मू और कश्मीर को दो संघ राज्यक्षेत्रों—बिना विधान-मंडल वाले लद्दाख, जो दो जिलों (लेह और कारगिल) से मिलकर बना है, और विधान-मंडल वाले जम्मू और कश्मीर—में विभाजित किया।
- अधिनियम के तहत लोक सभा में प्रतिनिधित्व के संबंध में, संघ राज्यक्षेत्र जम्मू और कश्मीर को पांच और संघ राज्यक्षेत्र लद्दाख को एक सीट आबंटित की गई।
- अधिनियम की धारा 13 के अनुसार, संविधान के अनुच्छेद 239क में निहित उपबंध, जो पुडुचेरी संघ राज्यक्षेत्र पर लागू हैं, जम्मू और कश्मीर संघ राज्यक्षेत्र पर भी लागू होंगे। इस संघ राज्यक्षेत्र की विधान सभा को केंद्र सरकार के दायरे के अंतर्गत आने वाले विशेष विषयों के सिवाय, राज्य सूची और समवर्ती सूची के अंतर्गत समाविष्ट विषयों पर कानून बनाने की शक्ति प्राप्त है। ‘लोक व्यवस्था’ तथा ‘पुलिस’ के विषय उप-राज्यपाल के माध्यम से केंद्र के क्षेत्राधिकार के अधीन रहेंगे। [दिल्ली में, अनुच्छेद 238 कक के अंतःस्थापन तथा संसद द्वारा पारित उनहत्तरवें संवैधानिक संशोधन के माध्यम से, विधान सभा राज्य सूची में सम्मिलित प्रविष्टि 18 (भूमि से संबंधित) से संबंधित विषयों पर कानून नहीं बना सकती। लेकिन जम्मू और कश्मीर की विधान सभा ऐसा कर सकती है।]
- संसद और विधान सभा द्वारा बनाई गई विधियों के बीच असंगतियों के मामले में, पूर्व विधि अभिभावी होगी और विधान सभा द्वारा बनाई गई विधि शून्य हो जाएगी।
- मुख्यमंत्री की भूमिका को उप-राज्यपाल के संचारक के रूप में न्यून कर दिया गया है। उसका कर्तव्य संघ राज्यक्षेत्र के प्रशासनिक मामलों और विधानों (कानूनों) के प्रस्तावों के संबंध में मंत्रिपरिषद के सभी निर्णयों के बारे में उप-राज्यपाल को सूचित करना है।
- अधिनियम निर्दिष्ट करता है कि संघ राज्यक्षेत्र जम्मू और कश्मीर, तथा संघ राज्यक्षेत्र लद्दाख के लिए एक ही उप-राज्यपाल होगा। लद्दाख के लिए, राष्ट्रपति अनुच्छेद 239 के अंतर्गत उप-राज्यपाल की नियुक्ति करेगा। उप-राज्यपाल की सहायता तब तक केंद्र सरकार द्वारा नियुक्त किए जाने वाले सलाहकारों द्वारा की जाएगी, जब तक संघ राज्यक्षेत्र में एक विधान सभा की स्थापना नहीं होगी। संघ राज्यक्षेत्र जम्मू और कश्मीर के मामले में, उप-राज्यपाल उन विषयों (मामलों) पर ‘अपने विवेक से कार्य’ करेंगे, जो विधान सभा को प्रदत्त शक्तियों के दायरे से बाहर हों; जिनमें उन्हें किन्हीं न्यायिक दायित्वों का निर्वहन करने की आवश्यकता हो, और/या वे मामले अखिल भारतीय सेवाओं और भ्रष्टाचार विरोधी ब्यूरो से संबंधित हों।
- उप-राज्यपाल द्वारा मुख्यमंत्री की नियुक्ति की जाएगी, और वे मुख्यमंत्री के परामर्श से अन्य मंत्रियों की नियुक्ति करेंगे। उप-राज्यपाल, मुख्यमंत्री और मंत्रियों को पद और गोपनीयता की शपथ दिलाएंगे। उप-राज्यपाल अध्यादेश प्रख्यापित करने की शक्ति का भी उपयोग करेंगे और उनके द्वारा प्रख्यापित अध्यादेश का वही प्रभाव होगा जो उप-राज्यपाल द्वारा अनुमोदित किए गए विधान सभा के किसी अधिनियम का होता है।
- निर्वाचन आयोग, संसदीय निर्वाचन क्षेत्र परिसीमन आदेश, 1976 में विनिर्दिष्ट सीटों के आबंटन के अनुसार, संघ राज्यक्षेत्र जम्मू और कश्मीर के लिए चुनाव करा सकता है।
- भू-स्वामित्व और रोजगार सभी भारतीय नागरिकों के लिए उपलब्ध/खुले होंगे।
- जम्मू और कश्मीर विधान सभा में अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लिए आरक्षित सीटों सहित प्रत्यक्ष निर्वाचन के लिए 107 सीटें होंगी। जब तक अधिकृत संघ राज्यक्षेत्र जम्मू और कश्मीर भू-भाग का अधिग्रहण नहीं हो जाता तथा वहां के निवासी अपने प्रतिनिधियों का चुनाव नहीं कर लेते, तब तक उस क्षेत्र के लिए आबंटित की गई विधान सभा की 24 सीटें रिक्त रहेंगी और विधान सभा की कुल सदस्यता के रूप में इनकी गणना नहीं की जाएगी।
- यदि विधान सभा किसी कारणवश पहले ही भंग नहीं की गई, तो इसका कार्यकाल पांच वर्ष होगा।
- मौजूदा जम्मू और कश्मीर राज्य का प्रतिनिधित्व करने वाले राज्य सभा के चार वर्तमान सदस्यों को संघ राज्यक्षेत्र जम्मू और कश्मीर की आबंटित सीटों को भरने के लिए निर्वाचित माना जाएगा। इन वर्तमान सदस्यों का कार्यकाल अपरिवर्तित रहेगा।
- अधिनियम की धारा 47 प्रावधान करती है कि विधान सभा विधि द्वारा संघ राज्यक्षेत्र जम्मू और कश्मीर में प्रयोग के लिए किसी एक या एक से अधिक भाषाओं या संघ राज्यक्षेत्र जम्मू और कश्मीर के किसी या सभी शासकीय प्रयोजनों के लिए हिंदी को राजभाषा के रूप में अपना सकती है। संघ राज्यक्षेत्र जम्मू और कश्मीर की विधान सभा में कार्य संचालन राजभाषा या भाषाओं अथवा हिंदी या अंग्रेजी में किया जाएगा, बशर्ते कि विधान सभा का अध्यक्ष या इस रूप में कार्य करने वाला कोई व्यक्ति, यथास्थिति, किसी सदस्य को अपनी मातृभाषा में विधान सभा को संबोधित करने के लिए अनुमति दे, जो उपर्युक्त किन्हीं भाषाओं में खुद को पर्याप्त रूप से अभिव्यक्त नहीं कर सकता।
- अधिनियम में किए गए कुछ अन्य प्रमुख संशोधन इस प्रकार हैं—एकल नागरिकता; तिरंगा एकमात्र ध्वज होगा; अनुच्छेद 360 लागू होगा; अल्पसंख्यक 16 प्रतिशत आरक्षण के पात्र होंगे; अब भारत के अन्य राज्यों के लोग भी जम्मू और कश्मीर में भूमि या संपत्ति का क्रय कर पाने में सक्षम होंगे; सूचना का अधिकार (आरटीआई) लागू होगा; यदि कोई महिला राज्य या देश के बाहर विवाह करती है, तो उसके सभी अधिकार और नागरिकता यथावत बने रहेंगे; और पंचायतों के पास वे सभी अधिकार होंगे, जो अन्य राज्यों की पंचायतों के पास हैं।
पृष्ठभूमि
देश के विभाजन के समय से ही भारत हमेशा यह दावा करता रहा है कि जम्मू और कश्मीर भारत का एक अभिन्न और अविभाज्य अंग है। परंतु एक पृथक संविधान एवं अलग ध्वज के साथ कुछ विशेष शक्तियों का प्रयोग करते हुए इस राज्य की स्थिति अपरिवर्तित बनी रही; इसके लिए भारतीय संविधान के अनुच्छेद 370 के तहत विशेष उपबंध किए गए थे। जैसा कि 1949 में अंतःस्थापित किए गए इस अनुच्छेद के द्वारा राज्य को विशेष दर्जा प्रदान किया गया था। और यह अनुच्छेद राज्य को अपने एक पृथक संविधान का सृजन व पालन करने, एक अलग ध्वज धारण करने की अनुमति तथा विदेश मामलों, रक्षा एवं संचार के अलावा, अन्य सभी विषयों पर स्वायत्तता प्रदान करता था। हालांकि, इस अनुच्छेद का शीर्षक ‘जम्मू-कश्मीर राज्य के संबंध में अस्थायी उपबंध’ है।
- अनुच्छेद 370(1) ने राज्य में भारतीय संविधान की प्रयोज्यता और राज्य के भीतर राष्ट्रीय सरकार की शक्तियों, दोनों को सीमित प्रक्षेत्रों तक प्रतिबंधित कर दिया। इसलिए, अन्य राज्यों की भांति जम्मू-कश्मीर को संघीय राज्य संघ में शामिल करने के लिए इस अनुच्छेद में संशोधन करना अपरिहार्य था। इस क्षेत्र की रणनीतिक अवस्थिति और कुछ अन्य मुद्दों, जो राज्य के भीतर और सीमा क्षेत्रों के बाहर, दोनों ओर जारी थे, के कारण ऐसा करना आवश्यक था।
पुनर्गठन प्रक्रिया
अनुच्छेद 370 स्वयं यह वर्णित करता है कि यदि राष्ट्रपति जम्मू-कश्मीर की संविधान सभा की पूर्व सिफारिश पर इस आशय (अनुच्छेद 370 के निरसन) से एक लोक अधिसूचना जारी करे, तो इस अनुच्छेद के तहत किए गए अस्थायी उपबंध निष्क्रिय/अप्रभावी हो सकते हैं।
5 अगस्त, 2019 को गृह मंत्री द्वारा दो सांविधिक प्रस्ताव प्रस्तुत किए गए—(i) यह अनुशंसा करने के लिए कि राष्ट्रपति अनुच्छेद 370 को निष्क्रिय/अप्रभावी करते हुए एक अधिसूचना जारी करें; और (ii) जम्मू और कश्मीर पुनर्गठन विधेयक को स्वीकृति दें।
तदनुसार, राष्ट्रपति द्वारा 5 अगस्त, 2019 को अनुच्छेद 370(1) के तहत अपनी शक्तियों का प्रयोग करते हुए जम्मू-कश्मीर के राज्यपाल की सहमति से राज्य में राष्ट्रपति शासन लगाने हेतु एक राष्ट्रपतीय आदेश जारी किया गया। इसे ‘संविधान (जम्मू और कश्मीर राज्य पर लागू) आदेश, 2019 के रूप में जाना जाता है।
अनुच्छेद 370(1) (ग) स्पष्टतया यह उल्लेख करता है कि अनुच्छेद 370 द्वारा भारतीय संविधान का अनुच्छेद 1 कश्मीर पर लागू होता है। अनुच्छेद 1 संघ के राज्यों को सूचीबद्ध करता है।
इस राष्ट्रपतीय आदेश ने 1954 के उस आदेश को प्रतिस्थापित किया, जिसने अनुच्छेद 3 में एक नया खंड प्रस्तुत किया था, जिसके अनुसार, ‘जम्मू-कश्मीर राज्यक्षेत्र में वृद्धि करने या उसे घटाने अथवा राज्य के नाम या सीमा में परिवर्तन करने हेतु राज्य की विधायिका की सहमति के बिना संसद में कोई भी विधेयक प्रस्तुत नहीं किया जा सकेगा।’
2019 में जारी किए गए राष्ट्रपतीय आदेश के साथ ही अब इस उपबंध का कोई अस्तित्व नहीं रह गया है, और इसने केंद्र सरकार को पुनर्गठन विधेयक प्रस्तावित करने हेतु स्वतंत्रता प्रदान की। इस आदेश ने अनुच्छेद 367 में भी कुछ नए खंड जोड़े, जिनमें कुछ उपबंधों का पठन या निर्वचन करने के लिए दिशानिर्देश अंतर्विष्ट थे। अनुच्छेद 367 के नए खंडों के अनुसार, जम्मू-कश्मीर में इस आदेश के लागू होने के पश्चात, सभी संदर्भों के लिए ‘सदर-ए-रियासत’ (राज्य सरकार) मंत्रिपरिषद की सहायता और परामर्श पर कार्य करेगा और उसे राज्य सरकार के संदर्भ में माना जाएगा, जिसका अर्थ है ‘राज्यपाल’। राष्ट्रपतीय आदेश ने अनुच्छेद 370(3) के परंतुक में एक महत्वपूर्ण संशोधन किया। खंड(3) में ‘संविधान सभा’ के संदर्भ को पठन हेतु संशोधित कर ‘राज्य विधान सभा’ किया गया।
विश्लेषण
विभिन्न विश्लेषकों द्वारा इस अधिनियम को मौजूदा (संशोधन से पूर्व) जम्मू-कश्मीर में सीमापार आतंकवाद से फैली उत्तेजना के कारण मौजूदा आतंरिक सुरक्षा की दृष्टि से तर्कसंगत ठहराया गया है। यह राज्य लंबे समय से उपेक्षित रहा है। राज्य में व्यापक स्तर पर फैले भ्रष्टाचार ने इसकी संरचना को कमजोर कर दिया है, जिसके कारण यहां के निर्धनों तक केंद्रीय योजनाओं का लाभ पहुंच ही नहीं पाता। पर्यटकों द्वारा सर्वाधिक पसंद किए जाने वाले देश के इस पर्यटन गंतव्य स्थल का विकास एक दूरस्थ स्वप्न बनकर रह गया। इसके अलावा, सामरिक दृष्टि से भी इस राज्य को मुख्यधारा में शामिल करना आवश्यक था। लद्दाख के संबंध में, एक लंबे समय से लद्दाख के नागरिकों की यह मांग थी कि लद्दाख को एक संघ राज्यक्षेत्र का दर्जा दिया जाए, ताकि वे अपनी आकांक्षाओं को पूरा कर सके।
परंतु कुछ विद्वान सरकार द्वारा उठाए गए इस कदम से असहमत हैं। उनके अनुसार, सरकार ने राज्य सभा के माध्यम से जम्मू-कश्मीर की स्थिति में परिवर्तन करने हेतु जो कदम उठाया, वह जल्दबाजी में और गुप्त रूप से उठाया गया था। यह दक्षिणपंथी राजनीति की मानसिकता को दर्शाता है, जो लोकतांत्रिक रूप से स्वीकार्य नहीं है। संभवतः सरकार द्वारा किया गया यह कार्य भारत के सामाजिक ताने-बाने को कमजोर करेगा और इसका प्रभाव न केवल जम्मू और कश्मीर पर, बल्कि संघवाद, संसदीय लोकतंत्र और विविधता पर अपनी मजबूत पकड़ रखने वाले सबसे बड़े लोकतंत्र के रूप में इसके सम्मान पर भी पड़ेगा। जिस प्रकार, अनुच्छेद 370 को निरस्त किया गया, उसे कार्यपालिका की अति के रूप में चिह्नित किया जा सकता है। यह एक संवेदनशील सीमावर्ती राज्य की संवैधानिक स्थिति को किसी विधायी सहयोग या उसके नागरिकों के प्रतिनिधियों की सहायता के बिना परिवर्तित करने के लिए उचित प्रक्रिया का आलंबन (या सहारा) लेता है।
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