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जम्मू-कश्मीर स्थानीय निकाय विधियां (संशोधन) अधिनियम, 2024

जम्मू-कश्मीर स्थानीय निकाय विधियां (संशोधन) अधिनियम, 2024 का उद्देश्य संघ राज्यक्षेत्र जम्मू-कश्मीर (जेएंडके) में स्थानीय शासन के प्रमुख पहलुओं को संबोधित करना है। मुख्य रूप से, यह पंचायतों और नगरपालिकाओं में अन्य पिछड़े वर्गों (ओबीसी) को आरक्षण का लाभ प्रदान करना चाहता है। इसके अलावा, यह अधिनियम शहरी स्थानीय निकाय के चुनावों के निरीक्षण का उत्तरदायित्व मुख्य निर्वाचन अधिकारी (सीईओ) के बजाय राज्य निर्वाचन आयुक्त (एसईसी) को देते हुए, उसके प्राधिकार में वृद्धि करने का प्रयास करता है, जैसा कि पहले होता था। प्रस्तावित संशोधन जम्मू और कश्मीर में स्थानीय निकायों की चुनावी प्रक्रियाओं और संचालन को नियंत्रित करने वाले तीन महत्वपूर्ण कानूनों को लक्षित करते हैं: जम्मू-कश्मीर पंचायती राज अधिनियम, 1989; जम्मू-कश्मीर नगरपालिका अधिनियम, 2000; तथा जम्मू-कश्मीर नगर निगम अधिनियम, 2000। इन संशोधनों के साथ, इस अधिनियम का उद्देश्य संघ राज्यक्षेत्र के स्थानीय शासन की रूपरेखा में अधिक समावेशिता और दक्षता सुनिश्चित करना है।

जम्मू-कश्मीर में स्थानीय शासन की वर्तमान स्थिति

ओबीसी आरक्षण का कोई उपबंध नहीं: जम्मू-कश्मीर की पंचायतों और नगरपालिकाओं में ओबीसी के लिए आरक्षण का उपबंध नहीं है जो देश के विभिन्न अन्य राज्यों द्वारा अपनाई गई प्रथाओं के बिल्कुल विपरीत है। प्रतिनिधित्व की इस कमी के कारण क्षेत्र के स्थानीय शासन की संरचना में एक महत्वपूर्ण अंतर रह गया है, जिससे ओबीसी समुदाय समान भागीदारी और अवसरों से वंचित हो रहे हैं।

लंबित चुनावः इस क्षेत्र को अपनी निर्वाचन प्रक्रिया में एक समालोचनात्मक अंतराल का सामना करना पड़ रहा है, लगभग 28,000 स्थानीय प्रतिनिधियों का कार्यकाल नए चुनावों के आयोजन के बिना समाप्त हो रहा है। अंतिम पंचायत चुनाव 2018 में हुए थे और तब से, इससे आगे कोई निर्वाचन प्रक्रिया शुरू नहीं हुई है। निर्वाचक नामावलियों में जारी पुनरीक्षण के बावजूद, नए चुनाव कराने की दिशा में कोई प्रगति न होने के कारण स्थानीय शासन व्यवस्था को निर्वाचित प्रतिनिधियों से वंचित कर दिया है जिसके परिणामस्वरूप लोकतंत्रीय न्यूनता और प्रशासनिक चुनौतियां बढ़ गई हैं।

राजनीतिक गतिशीलता: 2018 में हुए पिछले पंचायत चुनावों के दौरान नेशनल कॉन्फ्रेंस और पीपल्स डेमोक्रेटिक पार्टी जैसे प्रमुख क्षेत्रीय दलों के बहिष्कार के कारण राजनीतिक परिदृश्य बदला हुआ था। इस रणनीतिक कदम से चुनावी मुकाबला मुख्य रूप से भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) और कांग्रेस तक सीमित हो गया था। ये गतिशीलता केंद्र सरकार के अनुच्छेद 370 के निराकरण के फैसले से पूर्व बढ़ी, जिसने क्षेत्र की राजनीतिक गतिशीलता और शासन संरचना को फिर से आकार दिया जिससे इसके चुनावी परिदृश्य में जटिलता बढ़ गई।

संशोधन की आवश्यकता

वर्तमान में, जेएंडके की पंचायतों और नगरपालिकाओं में ओबीसी के लिए सीटें आरक्षित करने के प्रावधानों की उल्लेखनीय कमी है।

प्रस्थापित अधिनियम स्थानीय निकायों में ओबीसी के लिए आरक्षण की पुरःस्थापना कर इस कमी को दूर करने का प्रयास करता है। इस पहल का उद्देश्य प्रतिनिधित्व में लंबे समय से चली आ रही कमियों को समाप्त करना है जिसने क्षेत्र की स्थानीय शासन संरचना की समावेशी प्रकृति को बहुत हद तक बाधित किया है।

जम्मू-कश्मीर में राज्य निर्वाचन आयुक्त से संबद्ध मौजूदा विधियां सांविधानिक उपबंधों के अनुरूप नहीं हैं, जिसके कारण विधिक विसंगतियां हैं। अधिनियम का उद्देश्य, इस मुद्दे को संबोधित करने के लिए, एसईसी से संबंधित उपबंधों को भारत के संविधान के अनुरूप बनाना है, ताकि संवैधानिक आदेशों का पालन सुनिश्चित हो सके।

एसईसी को हटाने की वर्तमान प्रक्रिया संवैधानिक मानदंडों के भिन्न है, जिससे शासन प्रथाओं में असमानता उत्पन्न होती है।

संविधान के अनुच्छेद 243ट के अनुरूप, यह अधिनियम एसईसी के लिए एक निष्कासन प्रक्रिया स्थापित करने का सुझाव देता है जो संवैधानिक सिद्धांतों का पूर्णतया पालन नहीं करती है, जिससे प्रक्रियात्मक निष्पक्षता और पारदर्शिता सुनिश्चित होती है।

जम्मू-कश्मीर में आसन्न पंचायत और नगरपालिका चुनावों से इस अधिनियम का महत्व स्पष्ट होता है। जमीनी स्तर पर लोकतंत्रीय प्रतिनिधित्व में उल्लेखनीय अंतर है। इसके लिए निर्वाचित प्रतिनिधियों के अभाव को दूर करने के लिए विधायी सुधारों की आवश्यकता है।

इसके अलावा, निर्वाचक नामावली में संशोधन और निर्वाचन क्षेत्रों के परिसीमन जैसी अविरत गतिविधियों के लिए निर्बाध चुनावी प्रक्रियाओं को संभव बनाने और लोकतंत्रीय सिद्धांतों को कायम रखने के लिए विधायी समायोजन की आवश्यकता होती है।

संशोधन अधिनियम की मुख्य विशेषताएं

जम्मू-कश्मीर स्थानीय निकाय विधियां (संशोधन) अधिनियम, 2024 अनुसूचित जातियों (एससी) और अनुसूचित जनजातियों (एसटी) के लिए जम्मू-कश्मीर में विभिन्न स्थानीय संस्थानों में सीटों के आरक्षण से संबंधित तीन प्रमुख अधिनियमों में संशोधन करता है। इन संस्थानों में पंचायतें, नगरपालिकाएं, नगर निगम, ब्लॉक विकास परिषदें और जिला विकास परिषदें शामिल हैं। आरक्षित सीटें संबंधित संस्थागत क्षेत्रों में इन समुदायों की आबादी के आधार पर आबंटित की गई हैं, जिसमें से एक-तिहाई सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित हैं।

प्रतिनिधित्व और समावेशिता में वृद्धि करने हेतु, यह अधिनियम ओबीसी, जिन्हें संघ राज्यक्षेत्र जम्मू-कश्मीर की सरकार द्वारा वंचित वर्ग के रूप में मान्यता दी गई है, को शामिल करने के लिए आरक्षण के विस्तार को प्रस्थापित करता है। प्रस्थापित संशोधन मौजूदा निम्नलिखित तीन विधियों को लक्षित करते हैं:

  • जम्मू-कश्मीर पंचायती राज अधिनियम, 1989 की धारा 2 में किए गए संशोधन ने ‘अन्य पिछड़ा वर्ग’ की परिभाषा अंतःस्थापित की है। यह परिभाषा विनिर्दिष्ट करती है कि ओबीसी वे हैं जिन्हें जम्मू-कश्मीर अधिनियम, 2004 के अनुसार संघ राज्यक्षेत्र जम्मू-कश्मीर सरकार द्वारा ओबीसी के रूप में घोषित किया गया है। यह ओबीसी के लिए आरक्षण से संबंधित सांविधानिक उपबंधों के अनुरूप है और स्थानीय शासन संरचनाओं में उनका प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करती है।
  • जम्मू-कश्मीर पंचायती राज अधिनियम, 1989 की धारा 2क, जो अधिनियम के भीतर शब्दावली से संबंधित है, को शासन में निराकरण के बाद के संरचनात्मक परिवर्तनों को प्रतिबिंबित करने के लिए संशोधित किया गया है। ‘जिला योजना और विकास बोर्ड’ और ‘जिला पंचायत अधिकारी’ के संदर्भों को क्रमशः ‘जिला विकास परिषद’ और ‘सहायक पंचायत आयुक्त’ से प्रतिस्थापित किया गया है।
  • जम्मू-कश्मीर पंचायती राज अधिनियम, 1989 की धारा 4 और धारा 27 में किए गए संशोधन से पंचायतों की संरचना और उनके भीतर सीटों के आरक्षण में एससी और एसटी के साथ ओबीसी को शामिल करने हेतु आरक्षण के प्रावधानों में विस्तार करते हैं। यह समायोजन स्थानीय शासन संरचनाओं में समावेशी प्रतिनिधित्व के लिए संवैधानिक अधिदेशों के अनुरूप है।
  • जम्मू-कश्मीर पंचायती राज अधिनियम, 1989 की उपधारा (2) और (3) के लिए धारा 36क में किया गया संशोधन एसईसी के लिए सेवा की शर्तों में महत्वपूर्ण बदलाव करता है। संशोधित उपधाराएं एसईसी के वेतन, भत्ते और सेवा की अन्य शर्तों के बारे में विस्तृत दिशा-निर्देशों का उपबंध करती हैं।
    • इसमें उल्लिखित है कि एसईसी के लिए वेतन, भत्ते और सेवा की अन्य शर्तें लेफ्टिनेंट गवर्नर (उपराज्यपाल) द्वारा नियमों के माध्यम से निर्धारित की जाएंगी। हालांकि, एसईसी का कार्यभार ग्रहण करने से पहले पूर्ववर्ती सरकारी सेवा से पेंशन प्राप्त करने वाले या पाने के पात्र व्यक्तियों के संबंध में एक प्रावधान किया गया है। ऐसे मामलों में, आयुक्त के रूप में उनका वेतन उस पेंशन की राशि से कम हो जाएगा। इसके अतिरिक्त, यदि उन्हें पद धारण करने से पहले अपनी पेंशन के एक हिस्से का सारांशित मूल्य प्राप्त हुआ था, तो वेतन पेंशन के उस हिस्से की राशि से और कम हो जाएगा।
    • यह एसईसी को उपलब्ध यात्रा भत्ता, किराया-मुक्त आवास, परिवहन सुविधाओं और चिकित्सा सुविधाओं जैसे अन्य लाभों को संबोधित करता है। यह सुनिश्चित करता है कि एसईसी इन लाभों के लिए यथासंभव, या तो उसकी सेवानिवृत्ति के समय या उसकी नियुक्ति के समय, हकदार है।
    • यह एसईसी को अवकाश देने या मना करने, साथ ही उन्हें दिए गए अवकाश को रद्द करने या कम करने की शक्ति लेफ्टिनेंट गवर्नर में निहित करता है। यह प्रावधान एसईसी के अवकाश से संबद्ध अधिकारों से संबंधित प्रशासनिक पहलुओं के प्रबंधन में लेफ्टिनेंट गवर्नर के प्राधिकार पर जोर देता है।
  • जम्मू-कश्मीर पंचायती राज अधिनियम, 1989 की धारा 36ख के प्रतिस्थापन में एसईसी को हटाने की प्रक्रिया का उल्लेख किया गया है। इससे पहले, जम्मू-कश्मीर पंचायती राज अधिनियम के तहत, एसईसी को केवल लेफ्टिनेंट गवर्नर द्वारा जारी आदेश के माध्यम से ही पद से हटाया जा सकता था। पदच्युति के आधारिक कारणों में कदाचार या अक्षमता शामिल थे, जिसकी जांच या तो उच्च न्यायालय के वर्तमान या सेवानिवृत्त न्यायाधीश द्वारा की जाती थी। हालांकि, इस अधिनियम में किए गए संशोधन के साथ, एक महत्वपूर्ण बदलाव हुआ है। इस अधिनियम में प्रावधान है कि एसईसी को पदच्युति के लिए उन्हीं प्रक्रियात्मक मानकों और आधारों का पालन करना होगा जो उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की पदच्युति के लिए लागू होते हैं। यह व्यवस्था निष्कासन प्रक्रिया में स्पष्टता और एकरूपता सुनिश्चित करती है, तथा पारदर्शिता और निष्पक्षता को बढ़ावा देता है।
  • जम्मू-कश्मीर पंचायती राज अधिनियम, 1989 की धारा 36घ में संशोधन राज्य निर्वाचन आयोग की शक्तियों को विनिर्दिष्ट करता है और प्रशासनिक दक्षता और सत्ता के विकेंद्रीकरण के संवैधानिक सिद्धांतों के साथ-साथ शक्तियों के प्रतिसंहरण और प्रत्यायोजन के उपबंध पुरःस्थापित करता है।
  • जम्मू-कश्मीर नगरपालिका अधिनियम, 2000 की धारा 282 में किए गए संशोधनों से, उपधारा (2) को प्रतिस्थापित किया गया है जो राज्य निर्वाचन आयोग को विभिन्न कार्यों, जिनमें सूचना की आवश्यकता, निर्देश जारी करना, शक्तियों का प्रत्यायोजन, नगरपालिकाओं का निर्धारण और परिसीमन करना, अपनी स्वयं की प्रक्रिया को विनियमित करना, तथा संघ राज्यक्षेत्र जम्मू-कश्मीर सरकार द्वारा निर्धारित अन्य शक्तियों का प्रयोग करना शामिल है, के लिए सशक्त बनाता है। यह संशोधन चुनावों के सुचारु संचालन और प्रभावी शासन को सुनिश्चित करने में आयोग की भूमिका को सुदृढ़ करता है।
  • जम्मू-कश्मीर पंचायती राज अधिनियम, 1989 की धारा 39 में किए गए संशोधन के अनुसार, किसी व्यक्ति का नाम निर्वाचक नामावली से हटाने का आधार राज्य निर्वाचन आयोग द्वारा निर्धारित किया जाएगा। यह स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित करने वाले सांविधानिक उपबंधों के अनुरूप निर्वाचक नामावलियों की सत्यनिष्ठा बनाए रखने में राज्य निर्वाचन आयोग को स्वायत्तता प्रदान करता है।
  • जम्मू-कश्मीर नगरपालिका अधिनियम, 2000 की धारा 11क में किए गए संशोधनों में सुसंगत उपबंधों में एससी और एसटी के साथ ओबीसी को सम्मिलित किया गया है। यह संशोधन नगरपालिका की रूपरेखा के अंतर्गत सभी वंचित समूहों के लिए समान प्रतिनिधित्व और लाभ सुनिश्चित करता है।
  • जम्मू-कश्मीर नगर निगम अधिनियम, 2000 में ‘मुख्य निर्वाचन अधिकारी’ और ‘पिछड़ा वर्ग’ शब्दों को क्रमशः ‘राज्य निर्वाचन आयोग’ और ‘अन्य पिछड़ा वर्ग’ से प्रतिस्थापित किया गया है। यह संशोधन पारिभाषिक शब्द में सामंजस्य सुनिश्चित करता है और अद्यतित शासन संरचना को दर्शाता है।
  • इसके अलावा, जम्मू-कश्मीर नगर निगम अधिनियम, 2000 की धारा 10क में किए गए संशोधन ‘अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति’ शब्दों को ‘अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग’ से प्रतिस्थापित करते हैं। यह उपांतरण ओबीसी को सम्मिलित करने के लिए आरक्षण उपबंधों के दायरे को विस्तारित करता है और उन्हें प्रमाणपत्र की प्रक्रियाओं में शामिल करता है। इसके अलावा, यह संशोधन इस धारा के लिए एसईसी को सक्षम प्राधिकारी के रूप में नामित करता है, जिससे संशोधित उपबंधों का कुशल प्रशासन और प्रवर्तन सुनिश्चित होता है।

संशोधित अधिनियम का महत्व

समावेशन और प्रतिनिधित्व: जम्मू-कश्मीर में पंचायतों और शहरी स्थानीय निकायों (यूएलबी) में ओबीसी के लिए आरक्षण की शुरुआत समावेशी शासन सुनिश्चित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। ओबीसी को प्रतिनिधित्व प्रदान कर, इस अधिनियम का उद्देश्य ऐतिहासिक असमानताओं को दूर करना और समाज के विभिन्न वर्गों में लोकतांत्रिक भागीदारी को बढ़ाना है।

संवैधानिक अवलंबन: प्रस्थापित संशोधन जम्मू-कश्मीर की स्थानीय निकाय विधियों को अनुच्छेद 243घ और 243न के खंड (6) में उल्लिखित सांविधानिक उपबंधों के अनुरूप बनाते हैं। यह व्यवस्थापन न केवल कानूनी संबद्धता सुनिश्चित करता है बल्कि संविधान में निहित लोकतंत्र और समता के सिद्धांतों को भी सुदृढ़ करता है।

पदच्युति की प्रक्रिया का मानकीकरणः यह अधिनियम भारत के अन्य राज्यों/संघ राज्यक्षेत्रों में प्रचलित प्रथाओं के अनुरूप एसईसी की पदच्युति की प्रक्रिया और सेवा की शर्तों को मानकीकृत करता है। यह मानकीकरण चुनावी संरचना में पारदर्शिता और उत्तरदायित्व में वृद्धि करता है, जिससे चुनावी प्रक्रिया में विश्वास बढ़ता है।

राज्य निर्वाचन आयोग की बढ़ी हुई भूमिकाः यह अधिनियम न्यायसंगत और निष्पक्ष चुनावों के लिए एईसी को चुनावी प्रक्रियाओं का अधीक्षण, निर्देशन और नियंत्रण सौंपकर, सांविधानिक अधिदेश को सुदृढ़ करता है। सीईओ से एसईसी में यह बदलाव पंचायतों और नगरपालिकाओं के चुनावों के निरीक्षण में अधिक स्वायत्तता और दक्षता सुनिश्चित करता है।

चुनावों की तैयारीः स्थानीय निकायों के लंबित चुनावों और अविरत चुनावी सुधारों के लिए, यह अधिनियम जम्मू-कश्मीर में पारदर्शी, समावेशी और प्रभावी चुनावी प्रक्रियाओं के संचालन की नींव रखता है। प्रमुख संरचनात्मक कमियों को संबोधित करने और संवैधानिक सिद्धांतों के साथ अनुकूलन करने के माध्यम से, यह अधिनियम आगामी चुनावों के सुचारु संचालन के लिए मंच तैयार करता है, जो संघ राज्यक्षेत्र जम्मू-कश्मीर के लोकतांत्रिक कार्यकरण के लिए आवश्यक है।

राजकोषीय प्रबंधन: इस अधिनियम का वित्तीय ज्ञापन स्पष्ट करता है कि यदि यह लागू किया जाता है, तो अधिनियम भारत की संचित निधि में से कोई भी व्यय, आवर्ती या अनावर्ती, ग्रहण नहीं करेगा। यह प्रस्थापित विधायी संशोधनों को लागू करने में राजकोषीय जिम्मेदारी और दक्षता सुनिश्चित करता है।

आलोचना

जम्मू-कश्मीर स्थानीय निकाय विधियां (संशोधन) अधिनियम, 2024 ने स्थानीय शासन के दायरे में कुछ महत्वपूर्ण मुद्दों को सुधारने के अपने कथित प्रयोजनों के बावजूद, विभिन्न मोर्चों पर महत्वपूर्ण आलोचनाओं का सामना कर रहा हैः

विधान सभा चुनावों में विलंबः इस अधिनियम की प्रमुख आलोचनाओं में से एक यह है कि यह जम्मू-कश्मीर में विधान सभा चुनाव कराने के लिए एक स्पष्ट समय-सारिणी निर्धारित करने में विफल रहा है। आलोचकों का तर्क है कि निर्वाचन प्रक्रियाओं में यह देरी संघ राज्यक्षेत्र जम्मू-कश्मीर के निवासियों को विधान सभा के लिए प्रतिनिधियों का चुनाव करने के उनके मूल लोकतांत्रिक अधिकार से वंचित करती है, जिससे पूरी तरह कार्यात्मक लोकतांत्रिक प्रणाली की स्थापना में बाधा उत्पन्न होती है।

सत्ता का केंद्रीकरणः इस अधिनियम के अंतर्गत किए गए उस उपबंध के बारे में चिंताएं जताई गई हैं जो शहरी स्थानीय निकाय चुनावों के निरीक्षण का दायित्व सीईओ से एसईसी को हस्तांतरित करता है। आलोचकों को भय है कि इस परिवर्तन से सत्ता का केंद्रीकरण हो सकता है और स्थानीय चुनाव प्रक्रियाओं की स्वायत्तता और निष्पक्षता संभावित रूप से कमजोर हो सकती है, जो विकेंद्रीकरण और स्थानीय स्वायत्तता के लोकतांत्रिक सिद्धांतों के लिए जोखिम है।

एसईसी की पदच्युति की प्रक्रियाः यह अधिनियम सांविधानिक उपबंधों के साथ एसईसी की पदच्युति की प्रक्रिया को बदलता है, जबकि इस परिवर्तन की आवश्यकता के बारे में संशय है। आलोचकों का तर्क है कि यह संशोधन पदच्युति की प्रक्रिया में राजनीतिक प्रभाव के लिए भेद्यताओं को उजागर कर सकता है, जो एसईसी की भूमिका की स्वतंत्रता और सत्यनिष्ठा से संभावित रूप से समझौता कर होगा।

परामर्श का अभावः विवाद का एक और बिंदु इस अधिनियम की शुरुआत से पहले परामर्श की कथित कमी पर जोर देता है। आलोचकों का तर्क है कि मसौदा तैयार करने की प्रक्रिया के दौरान स्थानीय निकायों, राजनीतिक दलों और नागरिक समाज संगठनों सहित हितधारकों के साथ पर्याप्त रूप से परामर्श नहीं किया गया था। परामर्श की यह कमी महत्वपूर्ण दृष्टिकोणों और विधान से सीधे प्रभावित होने वाले लोगों पर संशोधनों के संभावित प्रभावों की अनदेखी करने के संबंध में चिंता उत्पन्न करती है।

ओबीसी के प्रतिनिधित्व पर पर्याप्त रूप से ध्यान न देनाः इस अधिनियम का उद्देश्य, स्थानीय निकायों में ओबीसी के लिए आरक्षण प्रदान करना होने के बावजूद, आलोचकों का कहना है कि यह ओबीसी प्रतिनिधित्व और सशक्तिकरण से जुड़े बहुआयामी मुद्दों को पर्याप्त रूप से संबोधित करने में विफल हो सकता है। स्थानीय शासन की संरचना , जो न्यायसंगत लोकतांत्रिक प्रथाओं को बढ़ावा देने में मजबूत और समावेशी नीतियों के महत्व पर बल देती हो, में ओबीसी का वास्तविक और प्रभावी प्रतिनिधित्व, तथा भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए अधिक व्यापक उपायों की मांग की जा रही है।

निष्कर्ष

निष्कर्षतः, जम्मू-कश्मीर स्थानीय निकाय विधियां (संशोधन) अधिनियम, 2024, केंद्र सरकार द्वारा संघ राज्यक्षेत्र जम्मू-कश्मीर के स्थानीय शासन की संरचना में महत्वपूर्ण मुद्दों को संबोधित करने के लिए एक महत्वपूर्ण प्रयास को निरूपित करता है। निर्वाचन प्रक्रियाओं और स्थानीय निकाय संचालन को नियंत्रित करने वाले प्रमुख कानूनों में संशोधन करके, इस अधिनियम का उद्देश्य प्रतिनिधित्व, समावेशिता और दक्षता को बढ़ावा देना है। इस अधिनियम को विभिन्न मोर्चों पर आलोचना का भी सामना करना पड़ रहा है, जिसमें विधान सभा चुनावों में देरी, सत्ता का केंद्रीकरण और परामर्श की कथित कमी के बारे में चिंताएं शामिल हैं। लंबित चुनावों और राजनीतिक दबावों के साथ ओबीसी आरक्षण का अभाव, जम्मू-कश्मीर के स्थानीय शासन की संरचना में सुधारों की आवश्यकता को रेखांकित करती है। निर्वाचक नामावलियों में चल रहे पुनरीक्षण के साथ-साथ आगामी पंचायत और नगरपालिका चुनाव इन मुद्दों को संबोधित करने की तत्काल आवश्यकता को उजागर करते हैं। इसके अतिरिक्त, अगस्त 2019 में अनुच्छेद 370 के निराकरण के बाद से इस क्षेत्र में अभी तक विधान सभा चुनाव नहीं हुए हैं, जो शासन परिदृश्य और भी जटिल बनाता है।

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