एक महत्वपूर्ण निर्णय, जो सरकार के उच्च स्तर (जहां सबसे महत्वपूर्ण लिए जाते हैं) के अधिकारियों के लिए गुंजायमान था, में भारत के उच्चतम न्यायालय ने इलेक्टोरल बॉण्ड (ईबी—निर्वाचन बंधपत्र) योजना को सुस्पष्ट रूप से असंवैधानिक घोषित कर दिया। इस योजना को भारत सरकार ने 2 जनवरी, 2018 को कई प्रमुख अधिनियमों, जिनमें लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 (आरपीए); कंपनी अधिनियम, 2013; आय-कर अधिनियम, 1961; और विदेशी अभिदाय (विनियमन) अधिनियम, 2010 (एफसीआरए) शामिल हैं, में संशोधन के माध्यम से पारदर्शी राजनीतिक निधीयन (फंडिंग) की सुविधा के लिए शुरू किया था। इन संशोधनों को 2016 और 2017 के वित्त अधिनियम में शामिल किया गया था।
इलेक्टोरल बॉण्ड
इस योजना के अनुसार, इलेक्टोरल बॉण्ड ब्याज-मुक्त वाहक बॉण्ड या मुद्रा लिखत (मनी इंस्ट्रूमेंट) हैं जो 1,000 रुपये से लेकर 1 करोड़ रुपये तक के मूल्यवर्ग में उपलब्ध हैं, और इन्हें भारतीय स्टेट बैंक (एसबीआई) की प्राधिकृत शाखाओं से व्यक्ति और कंपनियां दोनों खरीद सकते थे। इन बॉण्डों का प्रयोग राजनीतिक दलों को दान देने के लिए किया जाता था। इलेक्टोरल बॉण्ड को अनामता बनाए रखने के लिए तैयार किया गया था, जैसा कि दाता का नाम और अन्य विवरण मुद्रा लिखत पर दर्ज नहीं किया गया था। इसके अलावा, किसी व्यक्ति या कंपनी द्वारा खरीदे जा सकने वाले इलेक्टोरल बॉण्ड की संख्या की कोई सीमा नहीं है।
इलेक्टोरल बॉण्ड प्राप्त करने के पात्र वे राजनीतिक दल हैं जिन्होंने पिछले लोक सभा या राज्य के विधान सभा चुनावों में डाले गए वोटों का कम से कम एक प्रतिशत हासिल किया हो और जो आरपीए, 1951 की धारा 29क के तहत पंजीकृत हों।
ईसीआई इन राजनीतिक दलों के खातों का सत्यापन करता है। इलेक्टोरल बॉण्ड की रकम क्रय (खरीद) के 15 दिनों के भीतर राजनीतिक दलों के सत्यापित खातों में जमा कर दी जाती है। राजनीतिक दलों के पास इलेक्टोरल बॉण्ड को भुनाने के लिए 15 दिनों की निश्चित अवधि होती है। यदि इस अवधि के भीतर बॉण्ड को भुनाया नहीं जाता, तो इलेक्टोरल बॉण्ड की राशि प्रधान मंत्री राहत कोष (पीएमआरएफ) में जमा कर दी जाती है।
इलेक्टोरल बॉण्ड पूरे वर्ष क्रय हेतु उपलब्ध नहीं होते। वे प्रत्येक चार महीने के अंतराल (जनवरी, अप्रैल, जुलाई और अक्टूबर) में 10 दिनों की अवधि के लिए उपलब्ध होते हैं। इसके अतिरिक्त, लोक सभा चुनाव के वर्षों में, इलेक्टोरल बॉण्ड 30 दिनों की अवधि के लिए उपलब्ध होते हैं।
इलेक्टोरल बॉण्ड को एक नए तंत्र के रूप में शुरू किया गया था, जिसने पिछली इलेक्टोरल न्यास योजना (इलेक्टोरल ट्रस्ट स्कीम) का स्थान लिया है, और इसमें इलेक्टोरल न्यासों की तुलना में राजनीतिक निधीयन में उल्लेखनीय वृद्धि देखी गई है।
2013 में यूपीए सरकार द्वारा स्थापित इलेक्टोरल न्यास, कंपनी अधिनियम, 1956 की धारा 25 के तहत पंजीकृत कंपनियों द्वारा गठित संस्थाएं हैं। भारत का कोई भी नागरिक, भारत में पंजीकृत कंपनी, फर्म, हिंदू अविभाजित परिवार या भारत में रहने वाले व्यक्तियों का संघ इलेक्टोरल न्यास को दान कर सकता है। इलेक्टोरल न्यासों को व्यक्तियों और कंपनियों के योगदान के साथ-साथ राजनीतिक दलों को दिए गए दान का विवरण देते हुए भारत के निर्वाचन आयोग (ईसीआई) को वार्षिक रिपोर्ट प्रस्तुत करने की आवश्यकता होती है। दान के समय दाताओं की जानकारी, जैसे कि पैन (निवासियों के लिए) या पासपोर्ट नंबर (एनआरआई के लिए), एकत्र की जाती है।
इलेक्टोरल न्यासों को एक वित्तीय वर्ष में प्राप्त अंशदान का 95 प्रतिशत आरपीए अधिनियम, 1951 के तहत पंजीकृत राजनीतिक दलों को दान करना चाहिए। यह अंशदाताओं और लाभार्थियों दोनों के बारे में पारदर्शिता प्रदान करता है, जिससे जनता को पता चल सके कि कौन किस दल को निधि दे रहा है।
इलेक्टोरल बॉण्ड योजना शुरू करने की आवश्यकता
सरकार ने दावा किया कि इलेक्टोरल बॉण्ड इसलिए शुरू किए गए हैं ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि सभी राजनीतिक दानों का हिसाब राजनीतिक दलों की बैलेंस शीट (तुलन पत्र) में रखा जाएगा और दाताओं की पहचान जनता के समक्ष प्रकट नहीं की जाएगी। इस कदम का औचित्य यह था कि चुनावों के निधीयन में काले धन के प्रयोग पर रोक लगाई जा सके, क्योंकि दाताओं को अब ऐसे नकद दान का आश्रय लेने की आवश्यकता नहीं होगी, जिसका हिसाब-किताब नहीं हो सकता।
इलेक्टोरल बॉण्ड की पुरःस्थापना से राजनीतिक दान पर लगे कई निर्बंधन हट गए। पहले, विदेशी कंपनियों को कंपनी अधिनियम के तहत राजनीतिक दलों को दान देने से प्रतिषिद्ध किया गया था। किसी कंपनी द्वारा किए जा सकने वाले राजनीतिक दान की राशि की सीमाएं थीं, साथ ही खातों के वार्षिक विवरण में ऐसे दानों के प्रकटीकरण की आवश्यकताएं भी थीं। इसने भारतीय, विदेशी और शेल कंपनियों को दान का खुलासा किए बिना राजनीतिक दलों को दान देने की अनुमति दी।
आलोचना
सरकार के दावों के बावजूद, इलेक्टोरल बॉण्ड पर काफी विवाद हुआ है। आलोचकों ने तर्क दिया कि यह योजना राजनीतिक निधीयन में पारदर्शिता से समझौता करती है। चूंकि इलेक्टोरल बॉण्ड के खरीददार और प्राप्तकर्ता राजनीतिक दल दोनों को ही दाता की पहचान को उजागर करने की आवश्यकता नहीं होती है, इसलिए हितधारक और मतदाता राजनीतिक निधीयन के स्रोतों से अनभिज्ञ रहते हैं। पारदर्शिता की यह कमी काले धन के अंतर्वाह और राजनीतिक प्रक्रिया में कॉर्पोरेट हितों के अनुचित प्रभाव की संभावना के बारे में चिंताएं पैदा करती है। इलेक्टोरल बॉण्ड योजना के विरोधियों ने आरोप लगाया कि इसे बड़े कॉर्पोरेट घरानों को अज्ञात रूप से धन दान करने की अनुमति देकर उन्हें लाभ पहुंचाने के लिए तैयार किया गया था, जिससे लोकतांत्रिक प्रक्रिया कमजोर हो गई। नागरिक अधिकार समाजों ने चिंता व्यक्त की है कि दाताओं की अनामता राजनीतिक दलों की पारदर्शिता और जवाबदेही के प्रति आशंका उत्पन्न करती है।
इलेक्टोरल बॉण्ड की शुरुआत के बाद से भारत का उच्चतम न्यायालय इनकी वैधता और निहितार्थों के मूल्यांकन में शामिल हो गया था। अप्रैल 2019 में, उच्चतम न्यायालय ने सभी राजनीतिक दलों को इलेक्टोरल बॉण्ड के माध्यम से प्राप्त दान का विवरण ईसीआई को प्रस्तुत करने का निर्देश दिया। ईसीआई ने अज्ञात दान के बारे में शंकाएं व्यक्त कीं और राजनीतिक फंडिंग में पारदर्शिता एवं प्रकटीकरण के महत्व पर जोर दिया। भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने भी कथित तौर पर इस योजना की आलोचना की तथा चेतावनी दी, कि इससे भारतीय बैंक नोटों में विश्वास कम हो सकता है और धन-शोधन को बढ़ावा मिल सकता है।
राजनीतिक दलों द्वारा प्राप्त अंशदान
मार्च 2018 से जनवरी 2024 तक इलेक्टोरल बॉण्ड के माध्यम से प्राप्त कुल धनराशि का मूल्य 16,518.11 करोड़ रुपये है। यह देखा गया है कि दलों द्वारा प्राप्त कुल अंशदान का 50 प्रतिशत से अधिक इलेक्टोरल बॉण्ड के माध्यम से प्राप्त होता है। इलेक्टोरल बॉण्ड के माध्यम से कुछ क्षेत्रीय दलों द्वारा प्राप्त अंशदानों की प्रतिशतता 90 प्रतिशत से भी अधिक है। इलेक्टोरल बॉण्ड में लगभग आधी धनराशि कॉर्पोरेट स्रोतों से प्राप्त होती है, जबकि शेष राशि विभिन्न अन्य स्रोतों से प्राप्त होती है।
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भारतीय जनता पार्टी |
कांग्रेस |
अन्य दल |
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2022-23 में कुल आयः 2,360 करोड़ रुपये |
2022-23 में कुल आयः 452 करोड़ रुपये |
2022-23 में टीएमसी (तृणमूल कांग्रेस) की कुल आयः 325 करोड़ रुपये |
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इलेक्टोरल बॉण्ड से प्राप्त निधि: लगभग 1,300 करोड़ रुपये |
इलेक्टोरल बॉण्ड से प्राप्त निधि: 171 करोड़ रुपये |
इलेक्टोरल बॉण्ड से प्राप्त निधि: बीआरएस (भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस) को 529 करोड़ रुपये और डीएमके (द्रविड़ मुनेत्र कझगम): 185 करोड़ रुपये |
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इलेक्टोरल बॉण्ड से प्राप्त कुल आय का हिस्साः लगभग 55 प्रतिशत |
इलेक्टोरल बॉण्ड से प्राप्त कुल आय का हिस्साः लगभग 38 प्रतिशत |
इलेक्टोरल बॉण्ड से प्राप्त कुल आय का हिस्सा: बीजेडी (बीजू जनता दल) 152 करोड़ रुपये; टीडीपी (तेलुगु देशम पार्टी): 34 करोड़ रुपये समाजवादी पार्टी और शिरोमणि अकाली दल को इलेक्टोरल बॉण्ड के माध्यम से कोई अंशदान प्राप्त नहीं हुआ। |
योजना से संबंधित मुद्दे
सरकार के दावों के बावजूद कि यह योजना पारदर्शिता को बढ़ावा देती है और काले धन को बढ़ावा नहीं देती, आलोचकों का तर्क है कि यह अविनियमित राजनीतिक दान के लिए रास्ते खोलती है। ईबी योजना को लेकर कानूनी लड़ाई में कई उतार-चढ़ाव देखने को मिले हैं, जिनमें अंतरिम आदेश और न्यायिक पुनर्विलोकन के अभिवचन शामिल हैं।
इस योजना के संबंध में आलोचकों द्वारा उठाए गए कुछ प्रमुख मुद्दे इस प्रकार हैं:
- इस योजना के तहत, राजनीतिक दलों द्वारा निधीयन के बारे में सूचनाएं देने से इनकार करना अनुच्छेद 19(1)(क) के तहत नागरिकों के सूचना के मूल अधिकार का उल्लंघन करता है, जिससे भ्रष्टाचार और अघोषित समझौतों का संदेह होता है।
- आरबीआई और ईसीआई दोनों ने इस योजना पर आपत्ति जताई और काले धन का प्रयोग करने के लिए शेल कंपनियों के संभावित दुरुपयोग के बारे में चेतावनी दी है।
- ऐसी चिंताएं हैं कि इलेक्टोरल बॉण्ड अप्रत्यक्ष रूप से लॉबिंग (अपने पक्ष में जनमत तैयार करना) की सुविधा देते हैं, जिसमें कॉर्पोरेट अपना हित सुनिश्चित करने हेतु कथित तौर पर सत्ता में बैठे राजनीतिक दलों को दान देते हैं। यह अनामता दाताओं और राजनीतिक दलों के बीच संभावित रूप से तत्प्रतित (quid pro quo) की व्यवस्था को सक्षम कर सकती है।
- ‘इलेक्टोरल बॉण्ड’ नाम भ्रामक है, क्योंकि इसकी निधियों का उपयोग चुनाव के अलावा अन्य उद्देश्यों के लिए भी किया जा सकता है। व्यय पर निर्बंधन न होने से राजनीतिक दल चुनाव से संबंधित गतिविधियों से अलग दूसरे उद्देश्यों के लिए भी इस निधि का उपयोग कर सकते हैं।
- दाताओं को अनामता प्रदान कर, यह भ्रष्टाचार विरोधी विधियों के तहत अपराधियों को अभियोजन से बचाता है। इसके अतिरिक्त, प्रकटीकरण सीमा को कम करने से राजनीति में नकदी के उपयोग में प्रभावी रूप से कमी नहीं आ सकेगी और इससे भ्रष्टाचार को बढ़ावा मिल सकता है।
- इलेक्टोरल बॉण्ड प्राप्त करने में सत्तारूढ़ दल के प्रभुत्व ने राजनीतिक दलों के बीच निष्पक्षता और समानता को लेकर चिंताएं बढ़ा दी हैं। विपक्षी दलों का तर्क है कि यह योजना सत्तारूढ़ दल का पक्ष लेती है, जिससे राजनीतिक निधीयन में असंतुलन पैदा होता है और लोकतंत्र को नुकसान पहुंचता है।
- यह कॉर्पोरेट दाताओं को अनामता प्रदान करती है, जबकि कम दान करने वाले नागरिकों को अपनी पहचान उजागर करना आवश्यक होता है, जिससे लोकतांत्रिक प्रक्रिया में नागरिकों के मत पर कॉर्पोरेट प्रभाव को संभावित रूप से महत्व दिया जा सकता है।
- कंपनियों में निवेश करने वाले शेयरधारकों को इस बारे में सूचना नहीं दी जाती होगी कि इलेक्टोरल बॉण्ड के माध्यम से उनका धन किस प्रकार व्यय किया जा रहा है, जिससे निगमों के भीतर उनके हितों और उत्तरदायित्व को नुकसान पहुंचता है।
- यद्यपि इलेक्टोरल बॉण्ड का व्यापार प्रतिषिद्ध है, तथापि ऐसी गतिविधियों को रोकने में असमर्थता के बारे में चिंताएं हैं, जिससे धन के दुरुपयोग को रोकने और पारदर्शिता को बढ़ावा देने में इस योजना की प्रभावशीलता पर प्रश्न उठते हैं।
निष्कर्ष
अंततः, यह कहना सही होगा कि यद्यपि इलेक्टोरल बॉण्ड योजना को राजनीतिक निधीयन में सुधार और काले धन पर अंकुश लगाने के प्रयोजन से शुरू किया गया था, तथापि इसे उल्लेखनीय आलोचना का सामना करना पड़ा और यह शुरू से ही विवादास्पद रही। इस योजना में पारदर्शिता एवं उत्तरदायित्व की कमी के कारण इसकी संवैधानिकता को चुनौती दी गई, और उच्चतम न्यायालय ने लोक सभा चुनाव से पहले इसे असंवैधानिक घोषित कर दिया।
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