दिल्ली राष्ट्रीय राजधानी राज्यक्षेत्र शासन (जीएनसीटीडी) (संशोधन) विधेयक, 2023 (या दिल्ली सेवा विधेयक 2023) को 03 अगस्त, 2023 को लोक सभा में मंजूरी दी गई थी। 07 अगस्त, 2023 को यह विधेयक राज्य सभा में पारित हुआ और 11 अगस्त, 2023 को इसे राष्ट्रपति की अनुमति प्राप्त हुई और यह एक अधिनियम बन गया। यह अधिनियम जीएनसीटीडी अधिनियम 1991 में संशोधन करता है।
मुख्य प्रावधान
जीएनसीटीडी (संशोधन) अधिनियम, 2023 के कुछ मुख्य प्रावधान निम्नलिखित प्रकार से हैं:
- इस अधिनियम के अनुसार, केंद्र सरकार दिल्ली राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र के शासन के मामलों से संबंधित कानून एवं नीतियां बनाने के लिए अधिकृत है, जैसे कि अधिकारियों तथा कर्मचारियों की सेवा शर्तें और उनकी भूमिकाएं आदि।
- अधिनियम के मुख्य प्रावधानों में से एक राष्ट्रीय राजधानी सिविल सेवा प्राधिकरण (एनसीसीएसए) की स्थापना करना है, जिसमें अध्यक्ष के रूप में दिल्ली के मुख्यमंत्री, सदस्य के रूप में दिल्ली सरकार के मुख्य सचिव और सदस्य सचिव के रूप में दिल्ली सरकार के प्रमुख गृह सचिव शामिल होंगे। केंद्र द्वारा दो सचिवों की नियुक्ति की जाएगी। इस प्राधिकरण का मुख्य कार्य सरकारी अधिकारियों की तैनाती (पोस्टिंग) और स्थानांतरण के साथ-साथ अन्य अनुशासनात्मक मामलों और सतर्कता से संबंधित मामलों में दिल्ली के उपराज्यपाल (एलजी) को परामर्श देना होगा। एनसीसीएसए उपस्थित सदस्यों के बहुमत के आधार पर निर्णय लेगा। इसका तात्पर्य यह है कि सेवाएं मुख्य रूप से केंद्र द्वारा नियुक्त सदस्यों के नियंत्रणाधीन होंगी और मुख्यमंत्री द्वारा दिए गए सुझावों एवं आपत्तियों को नजरअंदाज किया जा सकता है।
यदि एलजी और प्राधिकरण के बीच असहमति हो तो एलजी का निर्णय बाध्यकारी होगा।
- यह अधिनियम राजधानी में सेवा नियंत्रण से संबंधित अध्यादेश को निरस्त करता है और उच्चतम न्यायालय (एससी) के उस निर्णय की अवहेलना करता है, जिसने निर्वाचित राज्य सरकार का समर्थन किया था। साथ ही यह दिल्ली के प्रशासनिक मामलों पर एलजी को अतिरिक्त शक्तियां प्रदान करता है।
- ‘सेवाओं’ को दिल्ली की विधान सभा के अधिकार क्षेत्र से बाहर कर दिया गया है। अर्थात, ‘सेवाओं’ पर विधि-निर्माण का अधिकार केंद्र सरकार को दे दिया गया है। यह सरकार सेवाओं के लिए चयनित लोगों की सेवा शर्तों, अर्थात उनकी अर्हता, सेवा की शर्तों, शक्तियों तथा भूमिकाओं, वेतन और निलंबन से संबंधित मामलों में अपने विवेकाधिकार का प्रयोग करेगी।
‘सेवा’ विषय के अंतर्गत सतर्कता के साथ-साथ दिल्ली सरकार के कर्मचारियों की नियुक्ति, तैनाती और स्थानांतरण से संबंधित सभी मामले शामिल हैं।
- एलजी को कई मामलों पर पूर्ण रूप से निर्णय लेने के लिए अधिकृत किया गया है, जैसे दिल्ली की विधान सभा का सत्र बुलाने, स्थगित करने और भंग करने से जुड़े मामले; तथा एनसीसीएसए से संबद्ध मामले।
- लोक व्यवस्था, पुलिस एवं भूमि को छोड़कर, राज्य एवं समवर्ती सूची के विषयों के संबंध में विधियां बनाना दिल्ली की विधान सभा के अधिकार में है, हालांकि दिल्ली सरकार उन्हीं विषयों के संबंध में इन विधियों को लागू करती है। इसके अलावा, संसद भी दिल्ली से संबद्ध राज्य एवं समवर्ती सूची के सभी विषयों पर विधि बनाने के लिए अधिकृत है। दिल्ली का प्रशासक एलजी है जो दिल्ली के मंत्रिपरिषद की सहायता एवं परामर्श पर अपने दायित्वों का पालन करता है। दिल्ली की विधान सभा और दिल्ली सरकार का कामकाज जीएनसीटीडी अधिनियम, 1991 के अनुपालन में किया जाना चाहिए, जिसमें एलजी, दिल्ली की विधान सभा की शक्तियों और मुख्यमंत्री के कर्तव्यों सभी को परिभाषित किया गया है।
पूर्ववर्ती गतिविधियां
विगत कुछ वर्षों से दिल्ली सरकार और केंद्र सरकार के बीच शक्ति की साझेदारी के मुद्दे पर खींचतान चल रही है। इसलिए, कई बार उच्चतम न्यायालय ने हस्तक्षेप किया है और अपना निर्णय दिया है।
इससे पहले, 11 मई, 2023 को उच्चतम न्यायालय ने निर्णय दिया था कि लोक व्यवस्था, भूमि और पुलिस को छोड़कर सभी सेवाओं पर दिल्ली सरकार का पूर्ण नियंत्रण होगा जैसा कि ये तीनों विषय केंद्र सरकार के नियंत्रण में हैं। इसके अलावा, यह भी निर्णय दिया गया कि एलजी स्वतंत्र रूप से कोई निर्णय नहीं ले सकते और उन्हें मंत्रिपरिषद के परामर्श पर कार्य करना होगा।
19 मई 2023 को, भारत के राष्ट्रपति द्वारा जीएनसीटीडी (संशोधन) अध्यादेश, 2023 प्रख्यापित किया गया था, जिसमें दिल्ली सरकार को कुछ आनुषंगिक संस्थाओं के साथ-साथ तैनाती, स्थानांतरण, सतर्कता के मामलों के संबंध में दिल्ली के एलजी को परामर्श देने के लिए अधिकृत किया गया था। इसके अलावा, इसने सेवाओं को दिल्ली की विधान सभा के अधिकार क्षेत्र से बाहर दिया।
प्रमुख मुद्दे एवं विश्लेषण
जीएनसीटीडी (संशोधन) अधिनियम, 2023 के अनुसार, ‘सेवा’ विषय को दिल्ली की विधान सभा को अधिकारिता से बाहर कर दिया गया है। यद्यपि, यह अधिनियम संविधान का उल्लंघन कर सकता है जैसा कि ‘सेवाएं’ दिल्ली सरकार की अधिकारिता में नहीं होंगी जबकि इसकी कार्यकारी एवं विधायी शक्तियां सह-विस्तारी हैं। इसके अलावा, एनसीसीएसए के तीन सदस्यों में से दो की नियुक्ति केंद्र द्वारा की जाती है और वे दिल्ली के मुख्यमंत्री के विरुद्ध मतदान कर सकते हैं।
परिणामस्वरूप निम्नलिखित संवैधानिक मुद्दे उत्पन्न होंगेः
- संविधान में वर्णित दिल्ली की विधान सभा की शक्तियों को अधिनियम द्वारा संशोधित किया गया है। संविधान के अनुच्छेद 239कक के अनुसार, दिल्ली की विधान सभा के पास सिवाय लोक व्यवस्था, पुलिस और भूमि के, राज्य और समवर्ती सूची में उल्लिखित सभी विषयों पर विधि बनाने की शक्ति है। अब, यह उल्लिखित कर कि ‘सेवाओं’ पर विधि-निर्माण की शक्ति भी दिल्ली की विधान सभा के पास नहीं होगी, यह अधिनियम ऐसे विषयों की संख्या में वृद्धि करता है जिन पर विधान सभा कानून नहीं बना सकती। इस प्रकार, इस नए अधिनियम से संवैधानिक ढांचे में बदलाव होगा।
इसके अलावा, संसद को दिल्ली की विधान सभा की शक्तियों के संबंध में उपबंधों की पूर्ति करने हेतु विधियां बनाने का भी अधिकार है। इसे ‘संशोधन’ नहीं माना जाता है। इसलिए यदि इस संशोधन के निहितार्थ को अनुमति दी जाती है, तो दिल्ली की विधान सभा के अधिकार क्षेत्र से संपूर्ण राज्य सूची को हटाया जा सकता है। परिणामस्वरूप, दिल्ली की विधान सभा और दिल्ली सरकार बेकार/अनावश्यक हो सकती है।
- लोकतंत्र की मूल संरचना का उल्लंघन हो सकता है। यदि ‘सेवाएं’ केंद्र के नियंत्रण में चली जाती हैं तो मूल संरचना का उल्लंघन हो सकता है। लोकतांत्रिक व्यवस्था में, जवाबदेही की त्रिस्तरीय शृंखला होती है, अर्थात, सिविल सेवक मंत्रियों के प्रति जवाबदेह होते हैं, जो क्रमशः विधायिकाओं के प्रति जवाबदेह होते हैं, जो आगे चलकर जनता के प्रति उत्तरदायी होते हैं। यदि इस शृंखला की पहली कड़ी काट दी जाए तो यह शृंखला टूट जाएगी। परिणामस्वरूप, संसदीय लोकतंत्र के सिद्धांत का उल्लंघन होगा।
- एलजी पर मंत्रिपरिषद की सहायता एवं परामर्श से निर्णय लेने के लिए कोई रोक नहीं हो सकती। अनुच्छेद 239कक के तहत, एलजी को मंत्रिपरिषद के परामर्श से कार्य करना चाहिए, सिवाय जब वह अपने विवेकाधिकार से कार्य कर रहा हो।
अधिनियम के अनुसार, विभिन्न मामलों पर एलजी की एकमात्र विवेकाधीन शक्ति का विस्तार किया गया है। इसके अलावा, एलजी और मुख्यमंत्री के बीच मतभेद की स्थिति में एलजी की राय मान्य होगी। परिणामस्वरूप, उपराज्यपाल द्वारा मंत्रिपरिषद के परामर्श से निर्णय लेने के सिद्धांत का उल्लंघन हो सकता है। इसके अलावा, ये उपबंध दर्शाते हैं कि निर्णय लेने की शक्ति निर्वाचित सरकार में निहित नहीं है।
कई मामलों में एकमात्र विवेकाधीन शक्तियां एलजी के पास होंगी, जैसे कि विधान सभा को बुलाने का समय निर्धारित करना। इसलिए, मुख्यमंत्री द्वारा कोई सत्र नहीं बुलाया जा सकता है, भले ही वह महत्वपूर्ण सरकारी कार्य के संबंध में ही क्यों न हो।
- अधिनियम में कुछ शर्तें अस्पष्ट हैं। जीएनसीटीडी अधिनियम, 1991 के अनुसार, एलजी कुछ मामलों में अपने विवेकाधिकार से निर्णय ले सकता है। इसमे शामिल हैं:
(क) एलजी को सौंपे गए मामले, क्योंकि वे दिल्ली की विधान सभा के दायरे से बाहर हैं; और
(ख) ऐसे मामले जिनमें उसे न्यायिक या अर्ध-न्यायिक कार्य करने होते हैं या जहां कोई विधि उसे अपने विवेकाधिकार से कार्य करने के लिए अधिकृत करती है।
अधिनियम स्पष्ट करता है कि इन मामलों में एलजी को अपने विवेकाधिकार से काम करना चाहिए। इससे प्रश्न उठता है, ‘व्यक्तिगत विवेक और विवेकाधिकार के बीच क्या अंतर है’?
- एलजी को कुछ मामलों के बारे में सूचित किया जाना चाहिए जिनके लिए कोई विनिर्दिष्ट मानदंड नहीं है। अधिनियम में उल्लिखित है कि एलजी, मुख्यमंत्री और मुख्य सचिव के साथ, संबंधित विभाग के सचिव को कुछ मामलों के बारे में सूचित किया जाना चाहिए। इनमें दिल्ली सरकार और केंद्र/किसी राज्य सरकार/उच्चतम न्यायालय/दिल्ली उच्च न्यायालय के बीच विवादास्पद मामले शामिल हैं। हालांकि, अधिनियम यह विनिर्दिष्ट नहीं करता है कि किन मामलों को ‘विवादास्पद’ माना जाता है।
इसके अलावा, विभाग के सचिव सीधे एलजी, मुख्यमंत्री और मुख्य सचिव के पास जा सकते हैं और संबंधित मंत्री को मामले की जानकारी दिए बिना उन्हें मामले से अवगत करा सकते हैं। नतीजतन, शासन की नियमित शृंखला बाधित हो जाएगी, क्योंकि संबंधित मंत्री अपने ही मंत्रालय से जुड़े मुद्दों पर कोई इनपुट या विचार नहीं दे पाएंगे। साथ ही, इससे मंत्रिमंडल के सामूहिक उत्तरदायित्व के सिद्धांत का भी उल्लंघन हो सकता है।
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