भारत सरकार ने अगस्त 2023 में भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) को प्रतिस्थापित करने हेतु भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) विधेयक पेश किया था। इस विधेयक का आकलन गृह मामलों की स्थायी समिति ने किया था, जिसने इस पर कुछ सिफारिशें भी दीं, जिसके बाद विधेयक को वापस ले लिया गया। 12 दिसंबर, 2023 को सरकार ने स्थायी समिति द्वारा की गई उन सिफारिशों को शामिल करने के बाद लोक सभा में भारतीय न्याय (दूसरी) संहिता (बीएनएस2), 2023 को फिर से पेश किया। 20 दिसंबर, 2023 को इसे लोक सभा में और इसके बाद, 21 दिसंबर, 2023 को राज्य सभा में पारित किया गया। अंततः, 25 दिसंबर, 2023 को राष्ट्रपति की सहमति मिलने के बाद यह एक अधिनियम बन गया।
मोटे तौर पर कहें तो इस अधिनियम में उन अपराधों, जिन्हें न्यायालयों द्वारा रद्द कर दिया गया है, को हटाने के साथ-साथ आईपीसी के अधिकांश प्रावधानों को बरकरार रखा गया है। इसके अलावा, कई नए अपराधों को भी पुरःस्थापित किया गया है।
भारतीय दंड संहिता
भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) दांडिक अपराधों के संबंध में मुख्य विधि है जो हमारे देश में लागू है।
1834 में, लॉर्ड थॉमस बबिंगटन मैकाले पहले भारतीय विधि आयोग के अध्यक्ष बने, जिन्हें तत्कालीन मौजूदा न्यायालयों की शक्ति एवं नियमों और उनके अधिकार क्षेत्र का विश्लेषण करना था। इसके अलावा, आयोग को देश में प्रवर्तनीय विधियों और पुलिस प्रतिष्ठानों की भी जांच करनी थी। नियत कार्यों को पूरा करने के बाद, आयोग ने सरकार को कई अधिनियम बनाने के लिए सिफारिश की। उनमें से प्रमुख सिफारिशें आईपीसी को लेकर थीं।
परिणामस्वरूप, 1860 में आईपीसी लागू किया गया था, जो अभी तक देश में लागू है। हालांकि समय-समय पर इसमें कुछ संशोधन किए जाते रहे हैं।
इस संहिता (विधि) में सम्मिलित कुछ अपराध हैं:
- मानव शरीर को प्रभावित करने (नुकसान पहुंचाने) वाले अपराध, जिनमें हमला एवं हत्या भी शामिल है;
- चोरी एवं जबरन वसूली सहित संपत्ति को नुकसान पहुंचाने वाले अपराध;
- दंगों और विधिविरुद्ध जमाव सहित लोक व्यवस्था को प्रभावित करने वाले अपराध;
- लोक स्वास्थ्य, शिष्टता, सुरक्षा, धर्म और सदाचार को प्रभावित करने वाले अपराध;
- मानहानि के मामले; और
- राज्य के विरुद्ध किए गए अपराध।
इस अधिनियम की आवश्यकता क्यों?
सामाजिक परिदृश्यों और बदलते समय के साथ, वर्तमान आपराधिक विधियों पर पुनर्विचार करना आवश्यक समझा गया ताकि देश में विधि-व्यवस्था को सुदृढ़ किया जा सके। इसके अलावा, विधिक प्रक्रियाओं को सरल बनाने की आवश्यकता है ताकि आम आदमी का जीवनयापन सुगम हो सके। सरकार को भी वर्तमान विधियों में संशोधन की आवश्यकता महसूस हुई ताकि ये विधियां समसामयिक परिस्थिति के अनुकूल हों और आम आदमी को शीघ्र न्याय मिल सके। इस प्रकार, विभिन्न हितधारकों के परामर्श पर कार्य करते हुए तथा लोगों की समकालीन आवश्यकताओं एवं अपेक्षाओं को ध्यान में रखते हुए, यह अधिनियम बनाया गया ।
इसलिए, भारतीय न्याय संहिता, 2023 का उद्देश्य निम्नलिखित प्रयोजनों को प्राप्त करना हैः
यह अधिनियम महिलाओं, बच्चों और राज्य के विरुद्ध होने वाले अपराधों को प्राथमिकता देता है। इसके अलावा, यह छोटे अपराधों के लिए सजा के रूप में ‘सामुदायिक सेवा’ को जोड़े जाने की सिफारिश करता है। यह कई अपराधों को ‘लिंग तटस्थ’ बनाता है। इसके अलावा, इसमें संगठित अपराध और आतंकवादी कृत्यों के नए अपराधों के साथ-साथ प्रतिबंधात्मक दंड भी शामिल किए गए हैं ताकि संगठित अपराध एवं आतंकवादी गतिविधियों के मुद्दे से प्रभावी ढंग से निपटा जा सके। इस अधिनियम में विभिन्न अपराधों से संबंधित कई नए दंड भी शामिल किए गए हैं।
इस अधिनियम की मुख्य विशेषताएं
- मानव शरीर के विरुद्ध किए गए अपराध: आईपीसी के तहत हत्या, हमला, किसी को आत्महत्या के लिए उकसाना, गंभीर चोट पहुंचाना और ऐसे अन्य कृत्य आपराधिक कृत्य माने जाते हैं। इस अधिनियम में इन प्रावधानों को बरकरार रखने के अलावा आतंकवाद, संगठित अपराध और कुछ विशिष्ट कारणों के आधार पर लोगों के एक समूह द्वारा गंभीर चोट या हत्या जैसे नए अपराधों को शामिल किया गया है।
- महिलाओं के विरुद्ध किए गए यौन अपराध: आईपीसी के अनुसार, बलात्संग, पीछा करना, ताक-झांक करना, किसी महिला की गरिमा को ठेस पहुंचाना और ऐसे अन्य कृत्य आपराधिक कृत्य माने जाते हैं। इस अधिनियम में कुछ अन्य प्रावधानों को जोड़ने के साथ-साथ इन प्रावधानों को बरकरार रखा गया है। उदाहरण के लिए, सामूहिक बलात्संग के मामले में, पीड़िता को ‘बालिग’ के अंतर्गत वर्गीकृत करने की सीमा दो वर्ष बढ़ा दी गई है, अर्थात 16 से 18 वर्ष। इसके अलावा, इस अधिनियम में धोखे से या झूठे वादे करके किसी महिला के साथ शारीरिक संबंध बनाना अपराध माना गया है।
- राजद्रोह: इस अधिनियम ने राजद्रोह के अपराध को खत्म कर दिया है, और इसके स्थान पर, निम्नलिखित कृत्यों को अपराध घोषित किया हैः (1) सशस्त्र विद्रोह, अलगाव और विध्वंसक कृत्यों को भड़काना या उत्प्रेरित करने की कोशिश करना; (2) अलगाववादी क्रियाकलापों की भावना को बढ़ावा देना; (3) देश की संप्रभुता, एकता और अखंडता खतरे में डालना। इसके अलावा, इस अधिनियम में उल्लिखित है कि इलेक्ट्रॉनिक संसूचना, मौखिक संसूचना, या सांकेतिक भाषा के माध्यम से संचार करना, अथवा वित्तीय साधनों का प्रयोग करना इन अपराधों का हिस्सा माना जा सकता है।
- आतंकवाद: निम्नलिखित कृत्यों को आतंकवाद के रूप में वर्गीकृत किया गया हैः (1) देश की सुरक्षा, अखंडता और एकता के साथ-साथ आर्थिक सुरक्षा को खतरे में डालना; (2) भारत में या विदेश में सभी नागरिकों या नागरिकों के किसी भी वर्ग में आतंक फैलाना। यदि कोई व्यक्ति आतंकवादी कृत्य करता या करने का प्रयास करता है जिसके कारण किसी व्यक्ति की मृत्यु हो जाती है, तो उसे मृत्यु या आजीवन कारावास और जुर्माने से दंडित किया जाएगा। इसके अलावा, यदि कोई व्यक्ति आतंकवादी कृत्य करता हो, तो उसे जुर्माने के साथ पांच वर्ष से लेकर आजीवन कारावास की सजा दी जाएगी।
- संगठित अपराध: संगठित अपराध से तात्पर्य अपराध सिंडिकेट (अपराध सिंडिकेट से दो या अधिक व्यक्तियों का कोई समूह अभिप्रेत है जो सिंडिकेट के रूप में अकेले या सामूहिक रूप से कार्य करते हुए गैर-कानूनी क्रियाकलापों में लिप्त होते हैं) के लिए अकेले या संयुक्त रूप से किसी व्यक्ति अथवा समूह द्वारा किए गए अपराधों से है। इन अपराधों में जमीन पर कब्जा करना, अपहरण, आर्थिक अपराध, संविदा पर (कॉन्ट्रैक्ट) हत्या, जबरन वसूली, साइबर अपराध आदि शामिल हैं। यदि कोई संगठित अपराध करता है या करने का प्रयास करता है जिससे किसी व्यक्ति की मृत्यु हो जाती है, तो उसे मृत्यु या आजीवन कारावास और 10 लाख रुपये तक के जुर्माने की सजा दी जाएगी। इसके अलावा, यदि कोई संगठित अपराध करता है या करने की कोशिश करता है, तो उसे पांच वर्ष से लेकर आजीवन कारावास और साथ ही न्यूनतम 5 लाख रुपये के जुर्माने से दंडित किया जाएगा।
- मॉब लिंचिंग: यह अधिनियम पांच या पांच से अधिक लोगों द्वारा जाति, मूलवंश, लिंग, भाषा या व्यक्तिगत विश्वास जैसे कुछ आधारों पर किसी की हत्या करने या गंभीर चोट पहुंचाने को अपराध मानता है। ऐसे आपराधिक कृत्य करने वाले लोगों को आजीवन कारावास या मृत्यु से दंडित किया जाएगा।
- उच्चतम न्यायालय: इस अधिनियम ने उच्चतम न्यायालय के कुछ निर्णयों का अनुपालन किया है, जैसे कि व्यभिचार को एक अपराध की श्रेणी से बाहर करना, हत्या करने या किसी की हत्या करने का प्रयास करने पर आजीवन कारावास के साथ-साथ मृत्युदंड को दंड के रूप में शामिल करना।
क्या आप जानते हैं
भारतीय न्याय संहिता, 2023 में पूर्ववर्ती आईपीसी में मौजूद 511 धाराओं के स्थान पर 358 खंड हैं।
मुद्दे और आलोचनात्मक विश्लेषण
इस अधिनियम से संबंधित कुछ प्रमुख मुद्दों का आलोचनात्मक विश्लेषण निम्न प्रकार से किया गया है।
- आपराधिक उत्तरदायित्व की अधिकतम न्यूनतम आयुः किसी बच्चे की आपराधिक उत्तरदायित्व की आयु उसकी वह न्यूनतम आयु होती है जिस पर न्यायालय किसी अपराध के लिए उसके विरुद्ध कार्रवाई कर सकते हैं। मस्तिष्क के विकास एवं किशोरों के व्यवहार के बीच संबंध के संदर्भ में एक हालिया अध्ययन के आधार पर, यह प्रश्न उठाया गया है कि बच्चों को उनके कार्यों के लिए किस हद तक उत्तरदायी ठहराया जाना चाहिए।
आईपीसी के अनुसार, सात वर्ष से कम आयु के बच्चे द्वारा किया गया कोई भी कृत्य अपराध नहीं माना जाएगा। यद्यपि, यदि यह पाया जाता है कि बच्चे में अपने आचरण की प्रकृति और परिणामों को समझने की परिपक्वता नहीं है, तो आपराधिक उत्तरदायित्व की यह आयु बढ़ाकर 12 वर्ष कर दी जाती है। इस अधिनियम में इन प्रावधानों को बरकरार रखा गया है। विशेषकर, अन्य देशों में आपराधिक उत्तरदायित्व की आयु भारत की तुलना में अधिक है। उदाहरण के लिए, जर्मनी में आपराधिक उत्तरदायित्व की आयु 14 वर्ष है। 2007 में संयुक्त राष्ट्र समिति की सिफारिशों के अनुसार, राष्ट्रों को यह आयु 12 वर्ष से अधिक निर्धारित करने की आवश्यकता थी।
- बच्चों के विरुद्ध एकसमान अपराधों के लिए पीड़ित की न्यूनतम आयु में विविधता: इस अधिनियम में बच्चों के विरुद्ध अपराधों के लिए अधिकतम दंड के प्रावधानों का उल्लेख किया गया है। महिलाओं एवं बच्चों से बलात्संग और सामूहिक बलात्संग की सजा में अंतर है। सामूहिक बलात्संग के मामले में सजा का निर्धारण पीड़िता की आयु, चाहे वह 18 वर्ष से अधिक हो या कम, के आधार पर किया जाता है। लेकिन बलात्संग के मामले में दंड का निर्धारण पीड़िता की आयु, चाहे वह 12 वर्ष से कम हो या 12 से 16 के बीच की हो अथवा 16 वर्ष से अधिक हो, के आधार पर किया जाता है। यह धारा लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण (पॉक्सो) अधिनियम, 2012 के अनुरूप नहीं है, जो 18 वर्ष से कम आयु के सभी लोगों को नाबालिग मानता है।
इसके अलावा, इस अधिनियम के अनुसार, किसी बालक के अपहरण का अपराध केवल 10 वर्ष से कम आयु के बालक पर लागू होता है, अर्थात 11 वर्ष के बालक के अपहरण का अपराध किसी वयस्क के अपहरण के समान ही माना जाएगा। परिणामस्वरूप दंड भी उतना ही होगा। इसके अलावा, किसी विदेशी बालिका दुर्व्यापार (या आयात) के अपराध के मामले में आईपीसी के तहत आयु सीमा 21 वर्ष है। इस अधिनियम में इसे बरकरार रखा गया है; तथापि, किसी विदेशी बालक के दुर्व्यापार के मामले में, यह अधिनियम आयु सीमा 18 वर्ष निर्धारित करता है।
गृह मामलों की स्थायी समिति (2023) की सिफारिशों के अनुसार, एक बालक को 18 वर्ष से कम आयु के व्यक्ति के रूप में परिभाषित किया गया है।
- इस अधिनियम और अन्य विशेष विधियों के तहत अपराधों की अतिव्याप्ति: आईपीसी में सभी प्रमुख दांडिक अपराध शामिल थे; हालांकि, समय के साथ विनिर्दिष्ट विषयों एवं संबंधित अपराधों से निपटने के लिए विशेष कानून लागू किए गए हैं। इस अधिनियम में आईपीसी के अंतर्गत आने वाले कुछ अपराध शामिल नहीं हैं। तथापि, अन्य अपराधों को बरकरार रखा गया है, जिससे विधियों का दोहराव हो गया है, जिसके परिणामस्वरूप समान अपराधों के लिए अलग-अलग दंड निर्धारित किए गए हैं।
ऐसे अपराधों को इस अधिनियम से हटा दिया जाना चाहिए ताकि दोहराव, विभिन्न प्रकार के दंड और संभावित विसंगतियों को दूर किया जा सके।
- किसी गिरोह के सदस्य और एक व्यक्ति के लिए एकसमान अपराध के लिए अलग-अलग दंड: यदि किसी गिरोह के सदस्य द्वारा पॉकेटमारी, वाहन चोरी और परीक्षा के प्रश्न पत्र बेचने जैसे छोटे संगठित अपराध किए जाते हैं, तो उसे एक से सात वर्ष तक के कारावास की सजा दी जा सकती है। यद्यपि, किसी व्यक्ति द्वारा किए गए समान अपराध के लिए उसे तीन वर्ष तक के कारावास की सजा हो सकती है।
- महिलाओं के विरुद्ध अपराध: आईपीसी में उल्लिखित बलात्संग से संबंधित प्रावधानों को इस अधिनियम में बरकरार रखा गया है। यद्यपि, न्यायाधीश वर्मा समिति (2013) और उच्चतम न्यायालय ने महिलाओं के विरुद्ध अपराधों से संबंधित कई सुधारों का प्रस्ताव दिया है, जिन्हें इस अधिनियम में संबोधित नहीं किया गया है।
- राजद्रोह के कुछ पहलुओं को बरकरार रखना: यह अधिनियम आईपीसी में उल्लिखित राजद्रोह के अपराध के केवल कुछ पहलुओं को बरकरार रखता है। हालांकि, देश की एकता और अखंडता के लिए संकट पैदा करने वाले कृत्यों का दायरा बढ़ा दिया गया है। तथापि, कई शब्द स्पष्ट रूप से परिभाषित नहीं किए गए हैं, जैसे ध्वंसात्मक कृत्य। इसके अलावा, इस बात को लेकर भी अस्पष्टता है कि कौन-सी गतिविधियां इस मानदंड पर खरी उतरेंगी।
1962 में, उच्चतम न्यायालय ने राजद्रोह के कृत्यों के अंतर्गत केवल ऐसे कृत्यों को समाविष्ट करने हेतु सीमित कर दिया था जो लोक अव्यवस्था पैदा करने या हिंसा भड़काने का इरादा रखते हैं या इस उद्देश्य से कार्य करते हैं।
- एकांत परिरोध के माध्यम से मौलिक अधिकारों का उल्लंघन: आईपीसी के अंतर्गत अपहरण या हत्या के प्रयोजन से व्यपहरण, आपराधिक साजिश तथा यौन उत्पीड़न जैसे अपराधों के लिए एकांत परिरोध की अनुमति है। इस अधिनियम में इन प्रावधानों को बरकरार रखा गया है। हालांकि, ये प्रावधान न्यायालय के फैसलों एवं विशेषज्ञों की सिफारिशों का अनुपालन नहीं करते। 1971 में विधि आयोग ने यह प्रस्ताव दिया था कि एकांत कारावास को आईपीसी से समाप्त कर दिया जाना चाहिए, जैसा कि यह आधुनिक विचारों के अनुरूप नहीं है। 1979 में, उच्चतम न्यायालय ने इस सिफारिश पर विचार किया और कहा कि एकांत परिरोध कैदियों को अनुच्छेद 21 के तहत उनके प्राण और दैहिक स्वतंत्रता के अधिकार से वंचित करता है; इसलिए, इसे केवल असाधारण परिस्थितियों में ही लागू किया जाना चाहिए।
- सामुदायिक सेवा का अस्पष्ट दायरा: यद्यपि इस अधिनियम में सामुदायिक सेवा को दंड के रूप में जोड़ा गया है, परंतु स्पष्ट रूप से यह उल्लेख नहीं किया गया है कि कौन-सी सेवा सामुदायिक सेवा के तहत शामिल होगी और इसका प्रबंधन कैसे किया जाएगा। गृह मामलों की स्थायी समिति (2023) द्वारा यह सिफारिश की गई कि ‘सामुदायिक सेवा’ की अवधि और प्रकृति को परिभाषित किया जाना चाहिए।
निष्कर्ष
हमारे देश के इतिहास में भारतीय न्याय संहिता, 2023 के अधिनियमन के साथ-साथ दो अन्य अधिनियम—भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 और भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 2023 को एक महत्वपूर्ण पहल के रूप में देखा जा रहा है। ये विधियां सार्वजनिक सेवा एवं कल्याण पर ध्यान केंद्रित करती हैं और आतंकवाद, संगठित अपराध तथा अन्य अपराधों की सख्ती से जांच करने के साथ-साथ गरीबों, हाशिए पर रहने वाले और समाज के कमजोर वर्गों के हितों की रक्षा के लिए लागू की हैं।
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