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भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023

भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023

परिचय

भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस), 2023 को पहली बार 11 अगस्त, 2023 को लोक सभा के समक्ष दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी), 1973 को प्रतिस्थापित करने हेतु पेश किया गया था लेकिन इसे गृह मामलों की स्थायी समिति द्वारा की गई समीक्षा के उपरांत वापस ले लिया गया। इस विधेयक को स्थायी समिति की कुछ अनुशंसाओं को शामिल करने के बाद भारतीय नागरिक सुरक्षा (दूसरी) संहिता (बीएनएसएस2), 2023 के नाम से पुनः 12 दिसंबर, 2023 को पेश किया गया। इस विधेयक को लोक सभा द्वारा 20 दिसंबर और राज्य सभा द्वारा 21 दिसंबर, 2023 को पारित कर दिया गया। अंततः, 25 दिसंबर, 2023 को राष्ट्रपति की अनुमति प्राप्त होने के बाद यह अधिनियम बन गया।

दंड प्रक्रिया संहिता को परिभाषित करना

सीआरपीसी, एक कार्यविधिक कानून था जिसे 1861 में देश में विधिक व्यवस्थाओं की बहुलता के मुद्दे को हल करने के लिए पारित किया गया था। सीआरपीसी का मुख्य उद्देश्य भारतीय दंड संहिता (आईपीसी), 1860 का प्रशासन करना था, और इसके तहत गिरफ्तारी, अभियोजन, और जमानत के उपबंधों को शामिल किया गया था। सरकार ने इस अधिनियम को 1973 में निरस्त कर दिया, जिसे मौजूदा सीआरपीसी द्वारा प्रतिस्थापित किया गया जिसने कई परिवर्तन प्रस्तावित किए, उदाहरणार्थ अग्रिम जमानत। जैसा कि यह अधिनियम भी वांछित मानक के अनुरूप नहीं था, इसलिए सीआरपीसी, 1973 को प्रतिस्थापित करने हेतु इस अधिनियम को पुरःस्थापित किया गया है।

उद्देश्यों एवं कारणों का विवरण

इस अधिनियम के उद्देश्य एवं कारण नीचे दिए गए हैं।

  • भारतीय दंड संहिता के अनुसार, सीआरपीसी, 1973 गिरफ्तारी, जांच, अन्वेषण और अपराधों के विचारण (Trials) के लिए प्रक्रिया प्रशासित करता है। यह आपराधिक मामले में विचारण की प्रक्रिया हेतु उपबंध का वर्णन करता है। इसमें निम्न प्रक्रिया शामिल की गई है:
    1. शिकायत का पंजीकरण करना;
    2. विचारण चलाना;
    3. फैसला देना; और
    4. किसी फैसले के विरुद्ध अपील दायर करना।
  • एक त्वरित और प्रभावशाली न्याय प्रणाली सुशासन के आधार के रूप में कार्य करती है। तथापि, जटिल विधिक औपचारिकताएं, बड़ी संख्या में लंबित मामले, विधिक प्रक्रियाओं में प्रौद्योगिकी का सीमित उपयोग, असंगत फोरेंसिक (न्यायालयिक विज्ञान) का उपयोग, दोषसिद्धि की न्यून दर और कठिन प्रक्रिया अकसर न्याय के त्वरित वितरण के लिए बाधक होती हैं। इन मुद्दों से निपटने के लिए नागरिक-केंद्रित दंड प्रक्रिया विकसित करना समय की मांग है।
  • जैसा कि भारत के पास सात दशकों तक लोकतंत्र का अनुभव रहा है, इसलिए सीआरपीसी जैसी दंड विधि की व्यापक जांच की जानी चाहिए। फिर, इसे लोगों की समकालीन आवश्यकताओं एवं आकांक्षाओं के अनुसार अपनाया जाना चाहिए।
  • सरकार ‘सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास और सबका प्रयास’ मंत्र का अनुसरण करते हुए संविधान की लोकतांत्रिक आकांक्षाओं के अनुरूप सभी नागरिकों को तत्काल न्याय प्रदान करने की दिशा में कार्य कर रही है।
  • उपर्युक्त बिंदुओं को ध्यान में रखते हुए, यह सिफारिश की गई है कि सीआरपीसी को निरस्त किया जाना चाहिए और इस अधिनियम के स्थान पर एक नवगठित विधि लागू की जानी चाहिए। यह नई विधि अपराध की जांच करते समय और संचार के इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों से जानकारी, समन जारी करने आदि के लिए प्रौद्योगिकी एवं फोरेंसिक का उपयोग करने के प्रावधानों का उल्लेख करती है। समयबद्ध अन्वेषण, विचारण और निर्णय की घोषणा के मामले में, कुछ समय सीमाएं निर्दिष्ट की गई हैं। कई अन्य प्रावधानों के अलावा, मजिस्ट्रेट प्रणाली को पुनर्गठित किया गया है।

इलेक्ट्रॉनिक मोड (विधा) का प्रयोग विचारण, पूछताछ और कार्यवाहियों के दौरान किया जा सकता है। यह विचारण, अन्वेषण और पूछताछ के दौरान इलेक्ट्रॉनिक संचार उपकरणों का प्रयोग करने की अनुमति देगा, बशर्ते कि इन उपकरणों में डिजिटल साक्ष्य मौजूद हों।


अधिनियम के मुख्य उपबंध

इस अधिनियम के अंतर्गत विधेयक के कई उपबंधों को बनाए रखा गया है। तथापि, अधिनियम में प्रस्तावित कुछ मुख्य उपबंध निम्नलिखित हैं:

  • अभियुक्तों का निरोध: सीआरपीसी के अंतर्गत, यदि किसी अभियुक्त ने कारावास की अधिकतम अवधि पक्षपातपूर्ण रूप से जेल में बिताई है, तो उसे निजी मुचलके (बॉण्ड) पर रिहा करना अपरिहार्य है। लेकिन यह स्थिति मृत्युदंड से दंडनीय अपराधों पर लागू नहीं होती। इस अधिनियम के अनुसार, यह उपबंध भी निम्नलिखित स्थितियों में लागू नहीं होगाः (i) आजीवन कारावास से दंडनीय अपराध और (ii) ऐसे व्यक्ति जिनके विरुद्ध दो या दो से अधिक अपराधों में विधिक कार्रवाई लंबित हो।
  • चिकित्सीय जांच: सीआरपीसी के अंतर्गत, कुछ विशिष्ट मामलों में, जिनमें बलात्संग के मामले शामिल हैं, अभियुक्त की चिकितसीय जांच की जा सकती है। केवल एक पंजीकृत चिकित्सा व्यवसायी (आरएमपी) ही ऐसी जांच कर सकता है, जो कि कम से कम उप-अधीक्षक स्तर के पुलिस अधिकारी द्वारा अनुरोध किया गया हो। इस अधिनियम के अनुसार, किसी भी पुलिस अधिकारी द्वारा ऐसी जांच का अनुरोध किया जा सकता है।
  • फोरेंसिक जांच: इस अधिनियम के अनुसार, उन अपराधों के लिए फोरेंसिक जांच अनिवार्य है जो सात या अधिक वर्ष के कारावास से दंडनीय हैं। यह फोरेंसिक विशेषज्ञों का उत्तदायित्व होगा कि वे फोरेंसिक साक्ष्य एकत्र करें और अपराध स्थल पर मोबाइल फोन या किसी अन्य इलेक्ट्रॉनिक उपकरण का उपयोग कर इस पूरी प्रक्रिया को रिकॉर्ड करें। यदि किसी राज्य विशेष में फोरेंसिक सुविधा उपलब्ध न हो, तो किसी अन्य राज्य में उपलब्ध ऐसी सुविधा का उपयोग किया जा सकता है।
  • हस्ताक्षर और अंगुलि की छाप: सीआरपीसी के अनुसार, एक मजिस्ट्रेट किसी भी व्यक्ति को उसके हस्ताक्षर या लिखावट के नमूने जमा करने का निर्देश देने के लिए अधिकृत है। इस अधिनियम के अनुसार, इस उपबंध में अंगुलियों की छाप और आवाज के नमूने भी शामिल किए गए हैं। यहां तक कि जिन व्यक्तियों को हिरासत में नहीं लिया गया है, उनके लिए भी मजिस्ट्रेट द्वारा आदेश दिए जाने पर ऐसे नमूने जमा करना आवश्यक है।

प्रक्रियाओं की अवधि: इस अधिनियम के अंतर्गत विभिन्न प्रक्रियाओं की अवधि विनिर्दिष्ट की गई है। उदाहरणार्थ, बलात्संग पीड़ितों का परीक्षण करने वाले चिकित्सकों को सात दिनों की अवधि के भीतर अपनी रिपोर्ट जांच अधिकारी को सौंपनी होगी। अन्य विनिर्दिष्ट अवधियां इस प्रकार हैं:

(i) बहस पूरी होने के बाद 30 दिनों की अवधि के भीतर निर्णय दिया जाना चाहिए; इसे 45 दिनों तक बढ़ाया जा सकता है।

(ii) जांच में हुई किसी भी प्रगति के बारे में पीड़ित को 90 दिनों की अवधि के भीतर सूचित किया जाना चाहिए।

(iii) एक सत्र न्यायालय को ऐसे आरोपों की पहली सुनवाई पूरी होने के 60 दिनों की अवधि के भीतर आरोप तय करने चाहिए।

न्यायालयों का पदानुक्रम: सीआरपीसी के अनुसार, भारत में आपराधिक मामलों के निपटान हेतु न्यायालयों का एक पदानुक्रम निर्धारित है। ये न्यायालय हैं:

(i)  मजिस्ट्रेट न्यायालय: ये अधीनस्थ न्यायालय होते हैं जहां अधिकांश फौजदारी मामलों की सुनवाई होती है।

(ii) सत्र न्यायालय: इन न्यायालयों की अध्यक्षता एक सत्र न्यायाधीश करता है और मजिस्ट्रेट न्यायालयों द्वारा किए गए फैसलों के विरुद्ध की गई अपील पर सुनवाई हेतु उत्तरदायी होता है।

(iii) उच्च न्यायालय: ये अधिकारिता संबंधी सुनवाई और फौजदारी मामलों एवं अपीलों के निपटान हेतु उत्तरदायी हैं।

(iv) उच्चतम न्यायालय:  इस न्यायालय के पास उच्च न्यायालयों के निर्णय के विरुद्ध की गई अपील पर सुनवाई करने तथा कुछ मामलों पर अपना नियंत्रण संप्रयोजित करने की जिम्मेदारी है।

सीआरपीसी के अंतर्गत, राज्य सरकारें किसी शहर या कस्बे को, यदि उसकी जनसंख्या दस लाख से अधिक है, महानगरीय क्षेत्र के रूप में वर्गीकृत करने के लिए अधिकृत हैं। इन क्षेत्रों में मेट्रोपॉलिटन मजिस्ट्रेट होते हैं। यद्यपि, इस अधिनियम के अनुसार, महानगरीय क्षेत्रों एवं महानगर के मजिस्ट्रेटों के इस वर्गीकरण को समाप्त कर दिया गया है।

विभिन्न समितियों की प्रमुख सिफारिशें

अपराध से संबंधित सुधारों पर विभिन्न समितियों और विधि आयोग की कुछ प्रमुख सिफारिशें, जो इस अधिनियम में शामिल नहीं की गई हैं, इस प्रकार हैं:

  1. दंडादेश संबंधी दिशानिर्देश विनिर्दिष्ट करने हेतु उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश या उच्चतम न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश के नेतृत्व में एक सांविधिक समिति का गठन किया जाना चाहिए।
  2. सीआरपीसी के तहत उच्चतम न्यायालय द्वारा अभियुक्तों के विनिर्दिष्ट अधिकार शामिल होने चाहिए।
  3. यदि अधिकृत व्यक्ति किसी जांच को एक दिन में पूरा करने में सक्षम न हो तो उसकी प्रक्रिया को जांच प्रक्रिया में शामिल किया जाना चाहिए। उन अपराधों के संबंध में, जिनमें सात वर्ष से अधिक के कारावास का दंड है, पुलिस की हिरासत अधिकतम 30 दिनों की होनी चाहिए। भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता अर्थात बीएनएसएस के अनुसार, पुलिस हिरासत की अधिकतम अवधि 15 दिन है। यदि अपराध के लिए न्यूनतम 10 वर्ष की कारावास हो तो इसे 60 दिन तक और किसी अन्य अपराध के मामले में 40 दिन तक बढ़ाया जा सकता है।
  4. जो व्यक्ति दोषी नहीं हैं परंतु फिर भी अभियुक्त हैं तो उन्हें मुआवजा दिया जाना चाहिए।
  5. गिरफ्तारी के बाद किसी चिकित्सा अधिकारी को गिरफ्तार व्यक्ति की जांच करनी चाहिए। किसी भी चोट और जब वह चोट लगी होगी उसका अनुमानित समय अवश्य नोट किया जाना चाहिए। कारावास में रहते हुए ऐसी जांच नियमित रूप से हर 48 घंटे में की जानी चाहिए। यह खंड इस अधिनियम में आंशिक रूप से शामिल किया गया है; तथापि, 48 घंटे की जांच इसमें शामिल नहीं है।
  6. पुलिस को दिए गए बयान के संबंध में, सबसे पहले बयान देने वाले को संबद्ध बयान पढ़ना तथा फिर उस पर हस्ताक्षर करने होंगे। पुलिस को बयान की एक प्रति, बयान देने वाले को भी देनी होगी। इन बयानों का उपयोग भविष्य में बयान देने वाले के वक्तव्य का खंडन करने और उसे सत्यापित करने के लिए किया जा सकता है। इसके बजाय, यह अधिनियम मूल प्रावधान को बरकरार रखता है।
  7. पुलिस को गिरफ्तार किए गए व्यक्ति को गिरफ्तारी के कारणों की जानकारी उस व्यक्ति द्वारा समझी जाने वाली भाषा में लिखित रूप में देनी चाहिए। इसे शामिल करने के बजाय, अधिनियम में मूल प्रावधान को बरकरार रखा गया है।
  8. यदि विचारण में देरी होती है, तो आरोपी को या तो जमानत पर रिहा कर दिया जाएगा या न्यायालय द्वारा रिमांड (प्रतिपेषण) में भेज दिया जाएगा। इसके कारणों को सूचित किया जाएगा। अधिनियम में इसे शामिल करने के बजाय, मूल प्रावधान को बरकरार रखा गया है।
  9. यदि न्यायालय अभियुक्त को जमानत देने से मना करता है, तो उसे इसका कारण बताना होगा।

प्रमुख मुद्दे और विश्लेषण

पुलिस की शक्तियों में वृद्धि: सीआरपीसी द्वारा पुलिस की शक्तियों को विनियमित किया जाता है ताकि विधि व्यवस्था बनाए रखी जा सके और आपराधिक अन्वेषण किया जा सके। निरोध, तलाशी, जब्ती या अभिग्रहण, गिरफ्तारी और बल प्रयोग ऐसी कुछ शक्तियां हैं। इन शक्तियों के दुरुपयोग, जो अवैध निरोध, हिरासत में यातना और अत्यधिक बल प्रयोग हो सकते हैं, को रोकने के लिए उन पर कुछ प्रतिबंध हैं। इस अधिनियम के अनुसार, पुलिस हिरासत, निरोध और हथकड़ी का उपयोग करने से संबंधित प्रावधानों में संशोधन किया गया है। इससे कुछ समस्याएं उत्पन्न हो सकती हैं।

पुलिस हिरासत की प्रक्रिया में संशोधन: इस अधिनियम के अनुसार, अभियुक्त को 15 दिनों तक पुलिस हिरासत में रखने की अनुमति है। इसकी स्वीकृति 60 या 90 दिनों की अवधि में से पहले 40 या 60 दिनों के दौरान, पूर्णतः या आंशिक रूप से दी जा सकती है। परिणामस्वरूप, यदि पुलिस व्यक्ति को हिरासत में रखने की मांग करती है तो इस पूरी अवधि के लिए जमानत देने से इनकार किया जा सकता है। स्थायी समिति द्वारा इस खंड की व्याख्या को स्पष्ट करने की अनुशंसा की गई थी।

हथकड़ी के उपयोग से अभियुक्त की स्वतंत्रता में हस्तक्षेप हो सकता है: इस अधिनियम के अनुसार, हिरासत से भागे हुए सामान्य अपराधी या ऐसे व्यक्ति, जिस पर बलात्संग, संगठित अपराध, राज्य के विरुद्ध अपराध आदि करने का आरोप  है, को गिरफ्तार करते समय हथकड़ी का प्रयोग किया जा सकता है। यह  प्रावधान उच्चतम न्यायालय के फैसले के विरुद्ध है, जिसमें कहा गया है कि हथकड़ी का प्रयोग करना अनुचित है तथा अमानवीय व्यवहार को दर्शाता है। यदि हथकड़ी का प्रयोग करना आवश्यक हो, तो सहायक अधिकारी द्वारा ऐसा करने के कारणों को नोट किया जाना चाहिए। हथकड़ी का प्रयोग किया जाना चाहिए या नहीं, यह निर्णय लेना विचारण न्यायालय (ट्रायल कोर्ट) पर निर्भर है।

एकाधिक अभियोगों के मामले में जमानत के सीमित अवसरः सीआरपीसी के अंतर्गत, एक अभियुक्त को जमानत मिल सकती है यदि वह अपने कारावास की कुल अवधि के आधे से अधिक समय तक हिरासत में रहा हो। हालांकि, एक साथ कई अभियोगों का सामना कर रहे व्यक्तियों को यह सुविधा नहीं दी जाती है। ऐसे व्यक्तियों के पास जमानत के सीमित अवसर हो सकते हैं।

आपराधिक कृत्यों से अर्जित संपत्ति की कुर्कीः ‘आपराधिक कृत्यों से अर्जित संपत्ति’ को जब्त करने की शक्ति में किन्हीं सुरक्षोपायों का अभाव है। ये सुरक्षोपाय धन शोधन निवारण अधिनियम, 2002 में उल्लिखित हैं। परिणामस्वरूप, निरीक्षण की कमी या दुरुपयोग की संभावना हो सकती है।


आपराधिक कृत्यों (क्राईम प्रोसीड्स) से अर्जित संपत्ति का तात्पर्य आपराधिक गतिविधियों के परिणामस्वरूप प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से अर्जित संपत्ति से है।


लोक व्यवस्था और विचारण प्रक्रिया का अनुरक्षण: इस अधिनियम ने लोक व्यवस्था के अनुरक्षण के संबंध में सीआरपीसी प्रावधानों को बरकरार रखा है। लोक व्यवस्था और विचारण कार्यवाही का अनुरक्षण दो अलग-अलग कार्य हैं। अब प्रश्न उठता है कि क्या एक ही कानून द्वारा इनका नियमन किया जाना चाहिए या इनसे निपटने के लिए दो अलग-अलग कानून बनाए जाने चाहिए।

निवर्तमान विधियों का दोहरावः समय के साथ, सरकार ने आपराधिक कृत्यों से अर्जित संपत्ति के विभिन्न पहलुओं की निगरानी के लिए विशेष विधि लागू की गई हैं। हालांकि, इस अधिनियम में कुछ विधियों को बरकरार रखा गया है। इससे कुछ विधियों का दोहराव होता है।

आपराधिक पहचान के लिए डेटा संग्रहः अपराधी एवं अभियुक्तों का डेटा एकत्र करने के लिए एक व्यापक विधि पारित की गई है, लेकिन इस अधिनियम में डेटा संग्रह के प्रावधानों के विस्तार का कारण स्पष्ट रूप से परिभाषित नहीं किया गया है। 2022 के अधिनियम और इसकी संवैधानिक वैधता पर दिल्ली उच्च न्यायालय द्वारा पुनर्विचार किया जा रहा है।

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