गर्भावस्था का समापन या गर्भपात एक संवेदनशील विषय है जिस पर विश्व के लगभग सभी देशों में कई वर्षों से चर्चा और बहस होती रही है। भारत के उच्चतम न्यायालय ने अपने ऐतिहासिक फैसले में घोषणा की कि गर्भ का चिकित्सीय समापन (संशोधन) अधिनियम, 2021 के अनुमत प्रावधानों के अनुपालन में सभी महिलाओं, भले ही विवाहित हों या नहीं, को 24 सप्ताह तक के गर्भ का गर्भपात कराने का समान अधिकार है। महिला को अपनी शारीरिक संपूर्णता के अधिकार और प्रजनन विकल्प का चयन करने की स्वायत्तता पर विचार करते हुए अपने गर्भ को समाप्त करने का अधिकार है जो कि “संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत उसकी व्यक्तिगत स्वतंत्रता” का एक घटक है।
इसकी आवश्यकता क्यों
गर्भ का चिकित्सीय समापन (संशोधन) अधिनियम, 1971 (अर्थात एमटीपी अधिनियम, 1971) के लागू होने से पहले, भारत में प्रति वर्ष लगभग पांच मिलियन गर्भों का चिकित्सीय समापन किया जाता था, जिनमें से लगभग तीन मिलियन समापन अवैध होते थे। कई महिलाओं ने अनुभवहीन व्यक्तियों के हाथों असुरक्षित गर्भपात की पद्धतियों का सहारा लिया। उच्चतम न्यायालय के अनुसार, एमटीपी अधिनियम, 1971 ने एक सीमित 'गर्भपात का अधिकार' और गर्भावस्था का समापन प्रदान किया, जिसे कभी भी गर्भवती माताओं के लिए एक सामान्य अवलंब के रूप में मान्यता नहीं दी गई थी।
इसके अलावा, हाल ही में न्यायालयों में कई याचिकाएं दायर की गई हैं, जिनमें भ्रूण की गंभीर विकृतियों या यौन हिंसा से उत्पन्न होने वाले गर्भधारण का हवाला देते हुए, अनुमेय गर्भकालीन आयु पार कर चुके गर्भ का समापन करने की अनुमति मांगी गई है। इस प्रकार, बदले हुए सामाजिक परिदृश्य, चिकित्सा क्षेत्र में प्रगति और अवैध एवं असुरक्षित गर्भपात के बढ़ते मामलों को देखते हुए, केंद्र सरकार ने विधि के दायरे में सुरक्षित और समय पर गर्भपात सेवाओं तक पहुंच प्रदान करने की आवश्यकता को पहचाना और तदनुसार एमटीपी अधिनियम, 1971 में कई संशोधन किए।
एमटीपी अधिनियम, 1971 बनाम एमटीपी (संशोधन) अधिनियम, 2021
जब सुरक्षित गर्भपात सेवाओं तक पहुंच की बात आती है तो एमटीपी (संशोधन) अधिनियम, 2021 महिलाओं की गरिमा, स्वायत्तता और निजता की गारंटी देता है।
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एमटीपी अधिनियम, 1971 |
एमटीपी (संशोधन) अधिनियम, 2021 |
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गर्भावधि की आयु सीमा |
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पंजीकृत मेडिकल प्रैक्टिशनर (आरएमपी) की राय/अनुमति |
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गर्भनिरोधक की विफलता |
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महिलाओं की गोपनीयता |
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संस्कृतियों, धार्मिक मान्यताओं, परंपराओं तथा विचारधाराओं के संबंध में हमारे देश की विविधता को ध्यान में रखते हुए, एमटीपी संशोधन अधिनियम, 2021 को महिलाओं को उनके शरीर और जीवन पर अधिकार के अपने संवैधानिक अधिकार का प्रयोग करने की अनुमति देने और उसे बढ़ावा देने के लिए उठाया गया एक साहसिक एवं क्रांतिकारी कदम माना जाता है।
विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा भी नए कानून का स्वागत किया गया है, जिसने इसे “सतत विकास लक्ष्यों (एसडीजी) 3.1, 3.7 और 5.6 को पूरा करने में सहायता करने हेतु निरोध्य मातृ मृत्यु दर को समाप्त करना” और सुरक्षित और सुलभ प्रजनन स्वास्थ्य सेवाओं तक सार्वभौमिक पहुंच प्रदान करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर माना।
उच्चतम न्यायालय का ऐतिहासिक फैसला
29 सितंबर, 2022 को उच्चतम न्यायालय ने अपने फैसले में कहा कि अविवाहित महिलाओं को भी विवाहित महिलाओं के समान ही अपने गर्भ को समाप्त करने का अधिकार है।
एक्स बनाम प्रमुख सचिव स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग और अन्य मामले पर निर्णय उच्चतम न्यायालय की तीन न्यायाधीशों की पीठ, जिसमें डी. वाई. चंद्रचूड़, ए. एस. बोपन्ना, और जे. बी. पारदीवाला शामिल थे, द्वारा दिया गया। याची को ज्ञात हुआ कि वह जून 2022 में गर्भवती थी। 5 जुलाई, 2022 को एक अल्ट्रासाउंड में 22 सप्ताह की अंतर्गभाशयी गर्भावस्था का पता चला। उसने उच्च न्यायालय की 24 सप्ताह की कानूनी सीमा की अवधि के बीच ही दिल्ली उच्च न्यायालय के समक्ष एक याचिका दायर कर 15 जुलाई, 2022 से पहले किसी निजी या सरकारी केंद्र पर आरएमपी के माध्यम से गर्भ का चिकित्सीय समापन करने का अनुरोध किया। उसने न्यायालय से अविवाहित महिलाओं को धारा 3(2)(ख) के दायरे में शामिल करने का अनुरोध किया जो 20 से 24 सप्ताह के बीच के गर्भ के चिकित्सीय समापन का विधान करती है। उच्च न्यायालय ने कहा कि चूंकि याची एक अविवाहित महिला है, जो सहमति से बने संबंध से गर्भवती हुई है, इसलिए उसका मामला एमटीपी नियमों के नियम 3ख के अंतर्गत नहीं आता है। इसके बाद उसने उच्चतम न्यायालय में एक याचिका दायर की, जिसमें यह स्थापित किया गया कि सांविधिक व्याख्या का सिद्धांत यह है कि किसी विधि के शब्दों को उनके पूरे संदर्भ में पढ़ा जाना चाहिए।
उच्चतम न्यायालय ने अपना ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए इस बात पर जोर दिया कि लिंग-सम समाज में, यह आवश्यक है कि एमटीपी अधिनियम एवं नियमों के निर्वचन में वर्तमान सामाजिक वास्तविकताओं पर विचार किया जाए। उच्चतम न्यायालय ने अपने फैसले में कहा, “बदली हुई सामाजिक परिस्थितियां हमारी विधियों को पुनः समायोजित करने की मांग करती हैं। कानून को अपरिवर्ती नहीं होना चाहिए और इसका निर्वचन बदलती सामाजिक परिस्थिति को ध्यान में रखकर करना चाहिए तथा सामाजिक न्याय के उद्देश्य को आगे बढ़ाना चाहिए।” एमटीपी (संशोधन) अधिनियम के साथ इस फैसले ने भारत में एमटीपी के दायरे में बहुत हद तक वृद्धि की है।
इसके अलावा, शीर्ष न्यायालय ने स्पष्ट किया कि बलात्संग, गर्भपात के आधार के रूप में, के तहत वैवाहिक बलात्संग भी शामिल है। न्यायालय के अनुसार, एमटीपी अधिनियम के प्रावधानों का पठन किसी ऐसी रीति से करने से जो विवाहित महिलाओं, जो अपने पतियों के बलात या अपमानजनक यौन आचरण के परिणामस्वरूप गर्भवती हो सकती हैं, को बाहर रखती है, तो यह उन्हें अत्याचारी जीवनसाथी के साथ बच्चे पैदा करने हेतु मजबूर करेगा।
न्यायालय ने सहानुभूतिपूर्वक कहा कि एमटीपी एक लाभकारी कानून है जिसका उद्देश्य सभी गर्भवती महिलाओं को गर्भपात सेवाओं तक पहुंच प्रदान करना है। इसलिए, आरएमपी को पति-पत्नी या परिवार की सहमति, दस्तावेजीकरण, न्यायिक प्राधिकार आदि जैसी किसी भी अतिरिक्त-विधिक शर्तों के बिना एमटीपी सेवाएं प्रदान करनी चाहिए।
एमटीपी मामलों में कुछ अन्य उल्लेखनीय निर्णय
न्यायमूर्ति के. एस. पुट्टास्वामी (सेवानिवृत्त) बनाम भारत संघ और अन्य (2017) और सुचिता श्रीवास्तव बनाम चंडीगढ़ प्रशासन मामलों में उच्चतम न्यायालय ने पुष्टि की कि प्रजनन विकल्प चुनना महिलाओं के संवैधानिक अधिकारों में शामिल है। इसने कहा कि संतान को जन्म देने या देने का निर्णय एक महिला की व्यक्तिगत स्वतंत्रता के साथ-साथ भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत उसकी शारीरिक संपूर्णता का स्वाग्रह है।
मीरा संतोष पाल बनाम भारत संघ मामले में, उच्चतम न्यायालय ने एक महिला की शारीरिक संपूर्णता और प्रजनन विकल्पों के अधिकार को बरकरार रखा। उच्चतम न्यायालय ने कहा कि एक महिला को अपने जीवन की रक्षा के लिए सभी आवश्यक कदम उठाने का अधिकार है, और इस प्रकार गर्भ के समापन की अनुमति दी गई। इसी प्रकार, ममता वर्मा बनाम भारत संघ और तपस्या उमेश पिसल बनाम भारत संघ मामले में, उच्चतम न्यायालय ने भ्रूण की गंभीर दुर्बलता के आधार पर 20 सप्ताह के बाद गर्भपात की अनुमति दी, जो गर्भाशय से बाहर के जीवन के साथ असंगत थे।
ऐसे मामलों में जहां लोग गर्भ का चिकित्सीय समापन कराने के लिए न्यायालय से अनुमति मांगते हैं, न्यायालयों द्वारा सामान्यतया एमटीपी अधिनियम की धारा 3 का उल्लेख किया जाता है जो या तो ऐसे गर्भपात की अनुमति देते हैं या मेडिकल बोर्ड को याची के गर्भ का समापन करने की संभावना का फैसला करने का निर्देश देते हैं।
उदाहरणार्थ, एक्स बनाम दिल्ली राष्ट्रीय राजधानी राज्यक्षेत्र मामले में, एक एचआईवी पॉजिटिव महिला ने न्यायालय से 18 सप्ताह के अपने गर्भ का समापन करने की अनुमति मांगी, जिसे उसने बलात वेश्यावृत्ति का परिणाम बताया था।
एमटीपी अधिनियम की धारा 3 पर विश्वास करते हुए, और विशेष रूप से बलात्संग के परिणामस्वरूप हुई गर्भावस्था का समापन करने की उसकी इच्छा पर, उच्च न्यायालय ने उक्त महिला की मानसिक, शारीरिक, सामाजिक और आर्थिक समस्याओं पर विचार करते हुए गर्भपात की अनुमति दी कि यदि महिला को अपनी गर्भावस्था जारी रखने के लिए मजबूर किया गया तो उसे इन समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है।
उसी समय, बशीर खान बनाम पंजाब राज्य और कमला देवी बनाम हरियाणा राज्य मामले में, पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय ने फैसला सुनाया कि एमटीपी की संरचना के तहत, 20 सप्ताह से कम के गर्भ का समापन करने के लिए, वांछित संख्या में आरएमपी की चिकित्सकीय राय और संबंधित महिला या नाबालिग के मामले में अभिभावक की सहमति के अलावा, किसी भी प्राधिकारी से अनुमति प्राप्त करने की आवश्यकता नहीं है।
कुछ संबंधित पद
- गर्भावस्था का समापन: इसे चिकित्सा या शल्य चिकित्सा पद्धतियों का उपयोग कर गर्भ का चिकित्सीय समापन करने के लिए की जाने वाली प्रक्रिया के रूप में परिभाषित किया गया है।
- विशिष्ट मामले: 24 सप्ताह तक के गर्भ का समापन एमटीपी (संशोधन) अधिनियम, 2021 के तहत अधिसूचित एमटीपी नियम, 2021 के नियम 3ख के तहत सूचीबद्ध महिलाओं की विशिष्ट श्रेणियों पर लागू होगा। इनमें बलात्संग, कौटुंबिक व्यभिचार के उत्तरजीवी, नाबालिग, वैवाहिक प्रास्थिति में बदलाव (विधवा या विवाह-विच्छेद) का अनुभव करने वाली महिलाएं, दिव्यांग महिलाएं, भ्रूणीय विसंगति वाली महिलाएं, और आपातकाल, आपदा या मानवीय संकट के बीच रहने वाली महिलाएं शामिल हैं।
- अनचाहा गर्भ: यह किसी विवाहित महिला या उसके पति द्वारा बच्चों की संख्या सीमित करने के लिए प्रयुक्त किसी गर्भनिरोधक साधन या पद्धति की विफलता के कारण होता है। चूंकि ऐसी अनचाही गर्भावस्था, गर्भवती महिला के मानसिक स्वास्थ्य के लिए गंभीर क्षति हो सकती है, इसलिए गर्भावस्था का समापन करने की अनुमति दी जाती है। एमटीपी (संशोधन) अधिनियम, 2021 ने 'विवाहित महिला या उसके पति' वाक्यांश को 'महिला या उसके साथी' से प्रतिस्थापित किया है।
- चिकित्सा बोर्ड का गठन: एमटीपी संशोधन अधिनियम में उल्लिखित है कि गर्भावस्था के समापन की ऊपरी सीमा उन मामलों में लागू नहीं होगी जहां भ्रूण में गंभीर विकृतियों का निदान किया जाता है। इन विकृतियों का निदान प्रत्येक राज्य सरकार द्वारा गठित एक चिकित्सा बोर्ड द्वारा किया जाएगा, जिसमें (i) एक स्त्री रोग विशेषज्ञ, (ii) एक बाल रोग विशेषज्ञ, (iii) एक रेडियोलॉजिस्ट या सोनोलॉजिस्ट, और (iv) अन्य कई सदस्य शामिल होंगे। जैसा कि राज्य सरकार द्वारा अधिसूचित किया जाए।
- गर्भवती महिला की सहमति: एमटीपी से गुजरने वाली महिला की स्पष्ट सहमति प्राप्त करना एमटीपी अधिनियम के सभी संस्करणों में सर्वोपरि महत्व रखता है। गर्भवती महिला की सहमति के बिना एमटीपी करने की अनुमति नहीं है। हालांकि, विशेष मामलों में, जैसे कि मानसिक रोग या किसी अन्य दुर्बलता की समस्या से पीड़ित किसी नाबालिग की गर्भावस्था, अभिभावक की सहमति लिखित रूप में ली जाती है।
निष्कर्ष
एमटीपी अधिनियम एक प्रगतिशील विधान रहा है। इसने भारत में महिलाओं को प्रजनन अधिकारों और स्वायत्तता का एक पहलू दिया है, जैसा कि उच्चतम न्यायालय ने अपने ऐतिहासिक फैसले के माध्यम से उद्धृत किया है। उल्लेखनीय है कि भारत में महिलाओं के प्रजनन अधिकारों को एमटीपी अधिनियम, 2021 द्वारा बनाए रखा गया था और उच्चतम न्यायालय का फैसला ऐसे समय पर आया जब विश्व के कुछ देश अभी भी अपने एमटीपी कानूनों में दी गई कुछ अनुमतियों को निरसित करने की योजना बना रहे हैं। भारत सरकार का यह उदार और प्रगतिशील कदम कई अन्य देशों के कठोर और प्रतिबंधात्मक विधानों के बिल्कुल विपरीत है, जहां महिलाओं को ऐसी सेवाओं तक पहुंच से निषिद्ध किया गया है।
तथापि, यह भी ध्यान दिया जाना चाहिए कि गर्भ समापन सेवाओं की इच्छा करने पर मानसिक पीड़ा से गुजरने की प्रक्रिया को न तो संशोधन अधिनियम और न ही उच्चतम न्यायालय के फैसले ने सुविधाजनक बनाया है। साथ ही, एमटीपी अधिनियम के दायरे को बढ़ाने और इसमें ट्रांसजेंडर लोगों को भी शामिल करने की आवश्यकता है, जिन्हें यौन और प्रजनन स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंचने में बड़ी बाधाओं का सामना करना पड़ता है।
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