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अनुच्छेद 370 के निराकरण पर उच्चतम न्यायालय: कतिपय पहलू

परिचय

जम्मू-कश्मीर में अनुच्छेद 370 के निराकरण (abrogation) पर उच्चतम न्यायालय के हालिया निर्णय ने भारत में संघवाद की सक्रियता पर महत्वपूर्ण चर्चा को जन्म दे दिया है। 11 दिसंबर, 2023 को सर्वसम्मति (5-0) से लिए गए एक ऐतिहासिक निर्णय में, उच्चतम न्यायालय ने केंद्र की कार्रवाइयों, जो कुछ परिस्थितियों में संघ की अति महत्वपूर्ण शक्ति को महत्व देती है, को बरकरार रखा। इस निर्णय ने संघ और राज्यों के बीच शक्ति संतुलन, विधिक प्रक्रियाओं की शुचिता (Sanctity—अत्यंत महत्वपूर्ण होने के कारण सुरक्षा एवं संरक्षण के योग्य होने की अवस्था या परिस्थिति) और भारत के साथ इस क्षेत्र के एकीकरण के ऐतिहासिक संबंध के बारे में प्रासंगिक प्रश्न उठाए हैं। एस. आर. बोम्मई मामले में अपने पूर्व निर्णय पर उच्चतम न्यायालय का भरोसा राज्य की स्वायत्तता और केंद्रीय प्राधिकरण के बीच के जटिल संतुलन को चिह्नित करता है।

5 अगस्त, 2019 को भारत सरकार ने अनुच्छेद 370 को रद्द कर दिया और जम्मू-कश्मीर राज्य को दो संघ राज्यक्षेत्रों में, अर्थात जम्मू-कश्मीर तथा लद्दाख, पुनर्गठित किया।

अब, जम्मू-कश्मीर पूर्णतः भारतीय संघ में एकीकृत हो गया है; तथापि, इसके राज्य का दर्जा पुनर्बहाल करने की योजनाएं बनाई जा रही हैं।


भारत के संविधान का अनुच्छेद 3 नए राज्यों के निर्माण और वर्तमान राज्यों के क्षेत्रों, सीमाओं या नामों में परिवर्तन से संबंधित है। राष्ट्रपति के लिए ऐसी किसी भी विधि को संबद्ध राज्य विधान-मंडल के पास उनके विचार प्रकट किए जाने के लिए भेजना आवश्यक होता है।


अनुच्छेद 370: ऐतिहासिक संदर्भ

जम्मू-कश्मीर ब्रिटिश शासन के अधीन एक देशी रियासत थी। 1947 में स्वतंत्रता के बाद, इसके शासक, महाराजा हरि सिंह, पाकिस्तान की जनजातीय नागरिक सेना द्वारा किए जाने वाले हमलों के विरुद्ध सहायता प्राप्त करने के लिए भारत में सम्मिलित हो गए। अधिमिलन पत्र (इंस्ट्रूमेंट ऑफ एक्सेशन—आईओए) पर जवाहरलाल नेहरू और महाराजा हरि सिंह द्वारा हस्ताक्षर किए गए थे, लेकिन इसमें इस बात पर जोर दिया गया था कि भारत में जम्मू-कश्मीर का अधिमिलन (accession) सशर्त होगा, अर्थात जम्मू-कश्मीर के पास अपना संविधान रखने का अधिकार तथा एक महत्वपूर्ण दर्जे की स्वायत्तता होगी।

जम्मू-कश्मीर को प्रदत्त विशेष दर्जे को संरक्षित करने के लिए 17 अक्तूबर, 1949 को अनुच्छेद 370—एक विशेष उपबंध जो जम्मू-कश्मीर राज्य को भारतीय संघ में एक विशिष्ट स्वायत्त दर्जा प्रदान करता था—को भारत के संविधान में सम्मिलित किया गया था। अनुच्छेद 370 का मसौदा तैयार करने का कार्य एन. गोपालस्वामी अय्यंगर को सौंपा गया था। इस अनुच्छेद ने यह सुनिश्चित किया कि जम्मू-कश्मीर का भारत के साथ सुभिन्न संबंध था। रक्षा, विदेशी मामलों और संचार के सिवाय विभिन्न विषयों पर स्वायत्तता प्रदान करते हुए यह अनुच्छेद जम्मू-कश्मीर के संबंध में भारत की संसद के अधिकार क्षेत्र को भी सीमित करता था।

जम्मू-कश्मीर में जारी विरोधों तथा राज्य विधान-मंडल की अनुपस्थिति सहित अन्य परिस्थितियों को अनुच्छेद 370 के अस्थायी उपबंध के कारणों के रूप में उद्धृत किया गया था। इसे तब तक एक ‘अंतरिम व्यवस्था’ माना जाना था जब तक कि जम्मू-कश्मीर अपना संविधान नहीं अपना लेता।


अधिमिलन पत्र (Instrument of Accession)

स्वतंत्रता के बाद, भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम, 1947 ने देशी रियासतों के लिए तीन विकल्पों का उपबंध किया: (i) स्वतंत्र रहना; (ii) भारत डोमिनियन में शामिल होना; या (iii) पाकिस्तान डोमिनियन में शामिल होना। दोनों में से किसी भी डोमिनियन में शामिल होने को अधिमिलन पत्र के माध्यम से औपचारिक रूप दिया गया था।

जम्मू-कश्मीर का भारत में अधिमिलन वास्तव में विशिष्ट शर्तों पर आधारित था, लेकिन  अन्य रियासतों से अलग इसकी विशेष शर्तें भी थीं। विशिष्ट परिस्थितियों तथा राज्य और भारत सरकार के बीच बातचीत से तय की गई विशिष्ट शर्तों के कारण जम्मू-कश्मीर के महाराजा हरि सिंह द्वारा हस्ताक्षरित आईओए मानक अधिमिलन करारों से भिन्न था।


अनुच्छेद 370 की मुख्य विशेषताएं

  • अनुच्छेद 370 इस समझौते के साथ अंतःस्थापित किया गया था कि यह एक अंतरिम व्यवस्था होगी, जो विशेष परिस्थितियों पर आधारित होगी जिनके तहत जम्मू-कश्मीर भारत में सम्मिलित हुआ। जम्मू-कश्मीर की संविधान सभा को यह अवधारित करने का अधिकार दिया गया कि भारत के संविधान की कौन-सी धाराएं जम्मू-कश्मीर राज्य पर लागू होंगी।
  • अनुच्छेद 370 से उत्पन्न अनुच्छेद 35क, जो 1954 में पुरःस्थापित किया गया था, ने जम्मू-कश्मीर विधान-मंडल को राज्य के ‘स्थायी निवासियों’ को परिभाषित करने और उन्हें विशेष अधिकार और विशेषाधिकार प्रदान करने का अधिकार दिया।
  • आईओए में शामिल विषयों में केंद्रीय कानूनों के विस्तार के लिए जम्मू-कश्मीर राज्य सरकार का परामर्श अनिवार्य कर दिया गया। तथापि, अन्य विषयों के लिए, राज्य सरकार की सहमति अनिवार्य थी।

अनुच्छेद 35क को वर्ष 1954 में राष्ट्रपति के आदेश के माध्यम से भारत के संविधान में सम्मिलित किया गया था। अधिकांश अन्य अनुच्छेदों के विपरीत, अनुच्छेद 35क संशोधन से पूर्व भारत के संविधान के मुख्य भाग में नहीं, बल्कि परिशिष्ट 1 में दिखाई देता था।

यह एक विवादास्पद उपबंध है जो जम्मू-कश्मीर के स्थायी निवासियों को विशेष अधिकार और विशेषाधिकार प्रदान करता है। यह राज्य के ‘स्थायी निवासी’ पद को परिभाषित करने के लिए जम्मू-कश्मीर के विधान-मंडल को अधिकृत करता है। ये अधिकार संपत्ति के स्वामित्व से लेकर शैक्षिक और रोजगार के अवसरों तक विभिन्न क्षेत्रों तक फैले हो सकते हैं।

अनुच्छेद 35क से संबंधित कुछ प्रतिबंध अन्य राज्यों में भी लागू होते हैं, जैसे कुछ उपबंध पूर्वोत्तर राज्यों और हिमाचल प्रदेश में। अनुच्छेद 371घ के तहत आंध्र प्रदेश जैसे राज्यों में भी प्रवेश और रोजगार में अधिवास-आधारित आरक्षण की प्रणाली प्रचलित है। यद्यपि जम्मू-कश्मीर में अनुच्छेद 370 लागू था, भारतीय संघ के अन्य राज्यों में अनुच्छेद 371 के तहत विशेष उपबंध हैं, जो 371क से लेकर 371ञ तक हैं। ये उपबंध इन राज्यों के विशिष्ट ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और प्रशासनिक विषयों की आवश्यकताओं को पूरा करते हैं।


  • अनुच्छेद 370 ने भारत के राष्ट्रपति को इसके उपबंधों और विषय-क्षेत्र में संशोधन करने का अधिकार भी दिया, जिससे इसके अनुप्रयोग में लचीलेपन का स्तर सुनिश्चित हो सके।

निराकरण के पक्ष में तर्क

  • अनुच्छेद 370 के तहत जम्मू-कश्मीर को अनुदत्त किए गए विशेष दर्जे से भारतीय संघ में राज्य के एकीकरण को सुविधाजनक बनाने के लिए एक विशेष व्यवस्था प्रदान करना अभिप्रेत था। इसलिए, अनुच्छेद 370 की कल्पना एक ‘अस्थायी उपबंध’ के रूप में की गई थी, जो विशिष्ट शर्तों पर समाश्रित था, तथा यह अपेक्षित था कि जब इस अनुच्छेद में उल्लिखित उद्देश्यों की पूर्ति हो जाएगी या भारत में जम्मू-कश्मीर राज्य के अधिमिलन के संबंध में अंतिम प्रस्ताव प्राप्त कर लिया जाएगा तो यह समाप्त हो जाएगा।
  • अनुच्छेद 370 को निरस्त करने का सरकार का निर्णय उसकी इस धारणा पर आधारित था कि इससे इस क्षेत्र का विकास बाधित हुआ तथा जम्मू-कश्मीर के लिए शेष भारत के साथ एकीकृत होना और अधिक कठिन हो गया। इसने तर्क दिया कि निराकरण से इस क्षेत्र में बेहतर शासन, समान अधिकार और अवसर, तथा सामाजिक-आर्थिक विकास होगा।
  • सरकार ने यह दावा करते हुए कि इसे हटाने से सुरक्षा उपायों और आतंकवाद विरोधी अभियानों को बढ़ावा मिलेगा, यह माना कि विशेष दर्जे ने इस क्षेत्र के विकास और एकीकरण को बाधित किया है। इसके अतिरिक्त, इससे राष्ट्रीय नीतियों और पहलों को लागू करना भी सरल हो जाएगा, जो पहले जम्मू-कश्मीर में पूर्णतः लागू नहीं थी।
  • सत्तारूढ़ दल ने 2009, 2014 और 2019 के आम चुनावों के लिए अपने चुनावी घोषणापत्र में लगातार अनुच्छेद 370 के निराकरण के अपने उद्देश्य को व्यक्त किया था। सत्ता में रहते हुए, उसने इस प्रतिबद्धता पर काम किया।
  • उल्लेखनीय घरेलू और अंतरराष्ट्रीय जांच और आलोचना के बावजूद, संसदीय बहुमत द्वारा समर्थित सरकार ने परिवर्तनों को लागू करने के लिए राजनीतिक समाधान का प्रदर्शन किया।

निराकरण के विरुद्ध तर्क

  • याचिकाकर्ताओं ने दृढ़तापूर्वक कहा कि 1957 में संविधान सभा के विघटन के बाद अनुच्छेद 370, आरंभ में जिसकी कल्पना एक अस्थायी उपबंध के रूप में गई थी, को प्रभावी रूप से स्थायित्व प्राप्त हुआ। उन्होंने प्रतिवाद किया कि विघटन के बिना, अनुच्छेद 370 में किसी भी संशोधन या निराकरण के लिए संविधान सभा की सहमति आवश्यक होगी।
  • आलोचकों और विपक्षी नेताओं ने तर्क दिया कि इस कदम के पीछे का उद्देश्य मुस्लिम-बहुल क्षेत्र की जनसांख्यिकी संरचना में परिवर्तन करना था; सरकार द्वारा इस आरोप का दृढ़ता से खंडन किया गया।
  • याचिकाकर्ताओं ने दावा किया कि केंद्रीय सरकार ने मूल रूप से संविधान सभा के लिए आरक्षित भूमिका को अपनाकर अपने प्राधिकार का उल्लंघन किया है। उन्होंने तर्क दिया कि इस अनुच्छेद से संबद्ध कार्यों का अवधारण करने का अधिकार केवल संविधान सभा के पास था।
  • राज्य सरकार से सहमति प्राप्त न करने, विशेषकर राष्ट्रपति शासन के दौरान, को याचिकाकर्ताओं ने एक महत्वपूर्ण सांविधानिक गलती के रूप में चिह्नित किया है। उनका मानना था कि राज्य के निर्वाचित प्रतिनिधियों के समर्थन के बिना इस तरह के महत्वपूर्ण निर्णय से संबद्ध कार्यवाही नहीं की जानी चाहिए थी।
  • याचिकाकर्ताओं की ओर से राज्यपाल के प्राधिकार को लेकर प्रश्न उठाए गए थे। उन्होंने राज्यपाल के विधान सभा को विघटित करने के विकल्प को चुनने के अधिकार, विशेषकर मंत्रि-परिषद की सलाह के बिना, की वैधता और संवैधानिकता को चुनौती दी।
  • याचिकाकर्ताओं ने प्रतिवाद किया कि अनुच्छेद 370 के निराकरण के लिए प्रयुक्त गई रीतियां असंवैधानिक थी। उन्होंने जोर दिया कि यद्यपि इस अनुच्छेद का निरसन करने से अपेक्षित परिणाम प्राप्त हो सकता था, तथापि इस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए नियोजित प्रक्रियाएं वैध रूप से संदिग्ध थी।

निराकरण हेतु प्रयुक्त रीतियां

अनुच्छेद 370(1) के तहत राष्ट्रपति के आदेश द्वारा आरंभ: 5 अगस्त, 2019 को भारत के संविधान के अनुच्छेद 370 के उपबंधों को ‘संविधान (जम्मू-कश्मीर पर लागू) आदेश 2019’—सी. ओ. 272 द्वारा प्रभावी ढंग से संशोधित किया गया था, जिसे तत्कालीन राष्ट्रपति राम नाथ कोविंद द्वारा जारी किया गया था जिससे जम्मू-कश्मीर राज्य को प्राप्त विशेष स्वायत्त दर्जा समाप्त हो गया।

अनुच्छेद 367 में रणनीतिक संशोधन: संविधान के अनुच्छेद 367 में एक संशोधन किया गया था। अनुच्छेद 370(3) में खंड (2) में उल्लिखित “राज्य की संविधान सभा” पद के स्थान पर “राज्य की विधान सभा” का प्रयोग किया गया, जिससे अनुच्छेद 367 पुनः परिभाषित हुआ। इस परिवर्तन ने संबद्ध प्राधिकार को जम्मू-कश्मीर की गतकालिक/अप्रचलित संविधान सभा से इसकी वर्तमान विधान सभा में पुनर्निदेशित कर दिया, जिससे विधान सभा की सिफारिशों के आधार पर अनुच्छेद 370 में भविष्य में संशोधन का मार्ग प्रशस्त हो गया।


अनुच्छेद 370(3) के अनुसार, इस अनुच्छेद को राष्ट्रपति आदेश से हटाया जा सकता है। तथापि, मूल रूप से यह अनिवार्य था कि इस तरह के आदेश को जम्मू-कश्मीर की संविधान सभा की पूर्व सहमति ली जानी चाहिए।


सी. ओ. 273 द्वारा संसदीय सहमति: सी. ओ. 273 को संसद की सहमति सुनिश्चित करते हुए प्रख्यापित किया गया था; संसद ने अब तक जम्मू-कश्मीर विधान-मंडल की विधायी शक्तियां ग्रहण कर ली थी। इस आदेश में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि अनुच्छेद 370 के सभी खंड प्रचालन में नहीं रहेंगे, सिवाय कुछ विशेष उपबंधों के।

अनुच्छेद 370 को निरसित करने का संकल्प: अनुच्छेद 370(1) और अनुच्छेद 367 की संशोधित रूपरेखा को ध्यान में रखते हुए, विधायी निकायों ने विचार-विमर्श किया और “भारत के संविधान के अनुच्छेद 370 को निरस्त करने के संकल्प” का समर्थन किया। यह विधायी युक्ति कौशल अनुच्छेद 370 को औपचारिक रूप से निष्प्रभावी करने की दिशा में एक निर्णायक कदम था।

राष्ट्रपति शासन के दौरान राज्यपाल की भूमिका: जम्मू-कश्मीर में राज्यपाल के शासन की समाप्ति के साथ, भारत के राष्ट्रपति ने भारत के संविधान के अनुच्छेद 356(1)(ख) द्वारा प्रदत्त प्राधिकार का प्रयोग किया। इस उद्घोषणा ने स्पष्ट कर दिया कि पहले राज्य विधान-मंडल द्वारा प्रयुक्त शक्तियों का प्रयोग अब भारत की संसद द्वारा या उसके पर्यवेक्षण में किया जाएगा।

जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन अधिनियम, 2019 को संस्थित करना: अनुच्छेद 370 को निष्प्रभावी करने के बाद, विधान व्यवस्था (legislative apparatus) ने जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन अधिनियम, 2019 पुरःस्थापित किया। इस ऐतिहासिक विधान ने पूर्ववर्ती राज्य को दो अलग-अलग संघ राज्यक्षेत्रों, अर्थात जम्मू-कश्मीर और लद्दाख संघ राज्यक्षेत्र, में द्विभाजित करने की रूपरेखा तैयार की।

निराकरण के प्रभाव

  • जम्मू-कश्मीर और लद्दाख संघ राज्यक्षेत्र देश की मुख्यधारा के साथ एकीकृत हो गए हैं। इन दोनों संघ राज्यक्षेत्रों के निवासी अब भारत के संविधान में निहित अधिकारों का उपभोग कर सकते हैं और अन्य भारतीय नागरिकों के समान केंद्रीय विधियों से लाभ प्राप्त कर सकते हैं।
  • इन क्षेत्रों में सामाजिक-आर्थिक प्रगति हुई है, जिसमें यहां के लोगों का सशक्तिकरण, अनुचित कानूनों को हटाने और सर्वसमावेशी विकास की दिशा में एक केंद्रित प्रयास शामिल है, जिनका उद्देश्य शांति और प्रगति को बढ़ावा देना है।

जम्मू-कश्मीर की महिलाओं के लिए क्या बदलाव आया

संपत्ति के अधिकार और अधिवास की स्थिति: अगस्त 2019 से पहले, इस राज्य के बाहर विवाह करने वाली जम्मू-कश्मीर की महिलाओं को संपत्ति के अधिकारों पर प्रतिबंध का सामना करना पड़ता था। हालांकि, केंद्रीय सरकार की अधिसूचना अब ऐसी महिलाओं के जीवनसाथी को अधिवास का दर्जा देती है, जिससे उन्हें जमीन खरीदने और सरकारी नौकरियों के लिए आवेदन करने की अनुमति मिलती है जिससे महिलाओं के संपत्ति अधिकारों की सुरक्षा होती है।

बेहतर सुरक्षा: गृह मंत्रालय की रिपोर्ट के अनुसार, आतंकवादी गतिविधियों में गिरावट ने महिलाओं की सुरक्षा पर सकारात्मक प्रभाव डाला है। आतंक संबंधी घटनाओं में कमी आने से अधिक सुरक्षित वातावरण प्राप्त हुआ है, जो महिलाओं के लिए लाभदायक है।

औद्योगिक विकास योजनाओं और आर्थिक पुनरुद्धार की योजनाओं से महिलाओं के लिए रोजगार के अवसर पैदा होने, उनकी वित्तीय सुरक्षा और आत्मविश्वास में वृद्धि अपेक्षित है।


  • पंचायती राज संस्थाओं (पीआरआई) के लिए निर्वाचनों की शुरुआत ने जम्मू-कश्मीर में जमीनी स्तर के लोकतंत्र की त्रि-स्तरीय प्रणाली स्थापित की है, जिसमें पंच, सरपंच, ब्लॉक विकास परिषद और जिला विकास परिषद शामिल हैं।
  • निराकरण के बाद, जम्मू-कश्मीर में हिंसा में उल्लेखनीय गिरावट आई है। आतंकवादी घटनाओं की आवृत्ति में कमी आई है, और सुरक्षा बलों ने कई आतंकवादियों को सफलतापूर्वक मार गिराया है, जो सुरक्षा स्थितियों में वृद्धि का सूचक है।
  • आर्थिक विकास को प्रोत्साहित करने के लिए प्रधानमंत्री का विकास पैकेज (पीएमडीपी) और औद्योगिक विकास योजना (आईडीएस) जैसी पहल शुरू की गई, जिसके परिणामस्वरूप निवेश, नौकरी के अवसर और सकल राज्य घरेलू उत्पाद (जीएसडीपी) में वृद्धि हुई है।
  • सड़कों, पुलों, सुरंगों और बिजली की लाइनों सहित अवसरंचना परियोजनाओं में सरकार के निवेश से संयोजकता बढ़ी है और विकास को गति मिली है।
  • उन्नत सुरक्षा उपायों और बेहतर विपणन रणनीतियों ने जम्मू-कश्मीर में पर्यटकों की बढ़ती संख्या को आकर्षित किया है; इस क्षेत्र में हाल के वर्षों में पर्यटकों के आने की संख्या अपने आप में एक रिकॉर्ड है।
  • निराकरण ने इस क्षेत्र के राजनीतिक परिदृश्य को नया आकार दिया है, जिससे प्रमुख राजनीतिक दलों के वक्तव्यों और बदली हुई स्थिति के प्रति उनके रुख में बदलाव आया है।
  • स्पष्ट सकारात्मक विकास के बावजूद, लोकतांत्रिक मूल्यों, शासन और परिवर्तनों के संभावित प्रभावों के बारे में चिंताएं बनी हुई हैं, जैसा कि विभिन्न पर्यवेक्षकों और रिपोर्टों द्वारा रेखांकित किया गया है। यद्यपि क्रमागत उग्रवाद में उल्लेखनीय गिरावट देखी गई है, तथापि युवाओं की नई भर्तियों और विकसित होती रणनीति की विशेषता वाले ‘हाइब्रिड उग्रवाद’ के उद्भव से ज्ञात होता है कि सुरक्षा क्षेत्र में चुनौतियां बनी हुई हैं।
  • इसने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ध्यान आकर्षित किया है। कुछ पड़ोसी देशों और अंतरराष्ट्रीय निकायों ने इन घटनाक्रमों के संबंध में चिंता व्यक्त की है या बयान जारी किए हैं।

जम्मू-कश्मीर में अन्य परिवर्तन

  • अनुच्छेद 35क को निष्प्रभावी कर दिया गया है। 2019 का राष्ट्रपति आदेश भारत के संविधान के सभी उपबंधों को जम्मू-कश्मीर तक विस्तारित करता है, जिसमें मूल अधिकारों का अध्याय भी शामिल है, जिससे अनुच्छेद 35क के विभेदकारी उपबंध असंवैधानिक हो गए हैं।
  • सदर-ए-रियासत का पद संघ राज्यक्षेत्र के राज्यपाल द्वारा प्रतिस्थापित किया गया है, जो अपने मंत्रि-परिषद की सलाह पर कार्य करेगा। इसके अलावा, संघ राज्यक्षेत्रों में अब राज्यपाल नहीं बल्कि उपराज्यपाल होगा, जैसा कि दिल्ली और पुडुचेरी में प्रशासनिक व्यवस्था है।

यह अपेक्षित है कि इन परिवर्तनों से गैर-निवासियों के लिए जम्मू-कश्मीर में जमीन खरीदने और रोजगार तलाशने के अवसरों का मार्ग प्रशस्त होगा, जिससे संभावित रूप से लंबी अवधि में जनसांख्यिकी बदलाव हो सकता है।

ये परिवर्तन भारत के संविधान के अनुच्छेद 370 के तहत अधिनियमित किए गए थे, जो जम्मू-कश्मीर में कुछ उपबंधों को लागू करने के संबंध में अपवादों और संशोधनों की अनुमति देता है। हालांकि, यह प्रक्रिया विवादास्पद रही है, क्योंकि इसमें अब विघटित हो चुकी जम्मू-कश्मीर की विधान सभा के साथ परामर्श शामिल नहीं था।

उच्चतम न्यायालय का निर्णय

जम्मू-कश्मीर की प्रभुता पर: अनिवार्य रूप से जम्मू-कश्मीर की किसी भी विशिष्ट प्रभुता से इनकार करते हुए, उच्चतम न्यायालय ने युवराज करण सिंह की 1949 की उद्घोषणा, जिसमें कहा गया था कि जम्मू-कश्मीर भारत के संविधान द्वारा शासित होगा, का संदर्भ देते हुए माना कि जम्मू-कश्मीर की प्रभुता को बरकरार नहीं रखा गया है।

मुख्य न्यायमूर्ति ने उल्लेख किया कि भारत के संविधान के अनुच्छेद 370(1) ने जम्मू-कश्मीर को बिना किसी संशोधन के भारत का अभिन्न अंग बना दिया है। उन्होंने आगाह किया कि जम्मू-कश्मीर को विशेष स्वायत्तता प्रदान करना विशेष व्यवस्था वाले अन्य राज्यों के लिए एक उदाहरण बन सकता है।

धारा 370 की अस्थायी प्रकृति पर: उच्चतम न्यायालय ने धारा 370 की अल्पकालिक और अस्थायी प्रकृति पर जोर दिया, तथा भारत के संविधान के अस्थायी उपबंधों (भाग 21) में इसके स्थानन के बारे में बताया। इसने यह भी स्पष्ट किया कि संविधान सभा का विघटन अनुच्छेद 370 को निष्प्रभावी करने की राष्ट्रपति की शक्तियों को प्रतिबंधित नहीं कर सकता।

राष्ट्रपति शासन के दौरान संविधान की वैधता पर: याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि राष्ट्रपति शासन की अवधि के दौरान संघ ने राज्य की सहमति के बिना अपरिवर्तनीय कार्रवाई की। भारत के मुख्य न्यायमूर्ति और न्यायमूर्ति कौल दोनों ने एस. आर. बोम्मई बनाम भारत संघ मामले में 1994 के निर्णय को उद्धृत किया, जिसने जम्मू-कश्मीर के विशेष दर्जे को निष्प्रभावी करने में राष्ट्रपति के कार्यों को मान्य और राष्ट्रपति शासन की उद्घोषणा के मापदंडों को परिभाषित किया था।

उच्चतम न्यायालय ने स्पष्ट किया कि न्यायालय अनुच्छेद 356 के तहत राष्ट्रपति शासन का अवलंब लेने की राष्ट्रपति की योग्यता को संबोधित नहीं करेगा। इसके बजाय, राष्ट्रपति शासन के दौरान की गई कार्रवाइयों पर ध्यान केंद्रित किया गया। राष्ट्रपति अपरिवर्तनीय निर्णय, यहां तक कि राज्य विधान सभा को भंग करने सहित, ले सकता है लेकिन उसकी शक्तियां न्यायिक और सांविधानिक निरीक्षण दोनों के अधीन हैं।

उच्चतम न्यायालय ने प्रशासनिक आवश्यकता और संवैधानिक संरक्षोपायों के बीच संतुलन पर जोर देते हुए राष्ट्रपति शासन के तहत की गई कार्रवाइयों के संबंध में न्यायिक पुनर्विलोकन के दायरे और सीमाओं पर स्पष्टता प्रदान की।


एस. आर. बोम्मई बनाम भारत संघ मामला भारत के उच्चतम न्यायालय के 1994 के एक ऐतिहासिक निर्णय को संदर्भित करता है जिसने भारत के संविधान के अनुच्छेद 356 के उपबंधों को निर्वचित और परिभाषित किया था। अनुच्छेद 356 उन दशाओं का वर्णन करता है जिनके तहत सांविधानिक तंत्र के विफल होने की स्थिति में राज्यों में राष्ट्रपति शासन लगाया जा सकता है।

बोम्मई मामले के निर्णय के कुछ प्रमुख बिंदु निम्नलिखित हैं:

  • उच्चतम न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया कि राष्ट्रपति शासन लगाने के राष्ट्रपति के निर्णय की अवैधता, दुर्भावना, बाह्य विचार, शक्ति का दुरुपयोग या कपट जैसे आधारों पर न्यायिक पुनर्विलोकन किया जा सकता है।
  • इस निर्णय ने सिद्ध किया कि राष्ट्रपति शासन की घोषणा के लिए राष्ट्रपति की उद्घोषणा को दो महीने के भीतर संसद के दोनों सदनों के अनुमोदन की आवश्यकता होती है। यदि यह अनुमोदित नहीं होती, तो पूर्व में पदच्युत सरकार स्वतः पुनः बहाल हो जाएगी।
  • इस निर्णय में इस बात पर जोर दिया गया कि राज्य केवल केंद्र के विस्तार या उपांग नहीं हैं।
  • केंद्र भारत के शासन की संरचना की संघीय प्रकृति को उजागर करते हुए, राज्यों के लिए आरक्षित शक्तियों का अनुचित रूप से अतिलंघन नहीं कर सकता।
  • बोम्मई अधिमत के बाद, राष्ट्रपति शासन लगाए जाने की घटनाएं उल्लेखनीय रूप से काफी कम हो गई, जो इस सांविधानिक उपबंध के अधिक नियंत्रित प्रयोग का संकेत है।
  • जम्मू और कश्मीर के संदर्भ में, बोम्मई निर्णय ने राष्ट्रपति द्वारा किए गए कार्यों की सांविधानिक विधिमान्यता को समझने के लिए एक आधारिक ढांचा प्रदान किया, विशेष रूप से अनुच्छेद 370 का निराकरण करने जैसे महत्वपूर्ण निर्णयों के संबंध में।

संसद को विधायी शक्तियों के अंतरण पर: अनुच्छेद 356(1) (क) भारत के राष्ट्रपति को राज्य की विधायी शक्तियां संसद को प्रत्यायोजित करने की अनुमति देता है। विभिन्न विधायी शक्तियों के बीच अंतर करने के तर्कों को खारिज करते हुए, उच्चतम न्यायालय ने कहा कि विधान सभा की सांविधानिक शक्तियां अनुच्छेद 356 के उपबंधों के अनुरूप हैं।

सी. ओ. 272 और सी. ओ. 273 की विधिमान्यता पर: सी. ओ. 272, जिसने ‘संविधान सभा’ शब्द को ‘विधान सभा’ में बदल दिया, को उसकी प्रकृति और राज्य सरकार का अनुमोदन न मिलने के कारण अविधिमान्य समझा गया था। तथापि, उच्चतम न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया कि सी. ओ. 272 उस सीमा तक विधिमान्य है कि यह भारत के संविधान के सभी उपबंधों को जम्मू और कश्मीर पर लागू करता है।

सी. ओ. 273, जिसने अनुच्छेद 370 को अप्रवर्तनशील बना दिया था, को बरकरार रखा गया, जिसमें राष्ट्रपति के निर्णय लेने के प्राधिकार तथा भारत के साथ जम्मू और कश्मीर के पूर्ण एकीकरण पर जोर दिया गया था।

जम्मू और कश्मीर के संविधान की अप्रवर्तनशीलता पर: उच्चतम न्यायालय ने यह निर्णय दिया कि सी. ओ. 272 और सी. ओ. 273 के कार्यान्वयन के साथ, संपूर्ण भारत का संविधान अब जम्मू और कश्मीर पर लागू होता है, जो इस राज्य के संविधान को अप्रभावी बना देता है।

जम्मू और कश्मीर के पुनर्गठन पर: जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन अधिनियम, 2019, जिसने जम्मू और कश्मीर को दो संघ राज्यक्षेत्रों में द्विभाजित कर दिया, को सांविधानिक रूप से चुनौती दी गई थी। यद्यपि उच्चतम न्यायालय जम्मू और कश्मीर की बदली हुई स्थिति पर विनिश्चय देने से विरत रहा, तथापि उसने जम्मू और कश्मीर के राज्य के दर्जे की पुनर्बहाली की वकालत की और शीघ्र विधान सभा चुनावों का आह्वान किया।

न्यायमूर्ति कौल की सिफारिश: न्यायमूर्ति कौल ने उच्चतम न्यायालय के दबाव के बावजूद, सुधारात्मक कार्रवाइयों के लिए राज्य की जिम्मेदारी को रेखांकित करते हुए जम्मू और कश्मीर में मानव अधिकारों के उल्लंघन को संबोधित करने के लिए ‘सत्य और सुलह आयोग’ के गठन का प्रस्ताव रखा।


सत्य और सुलह आयोग (Truth and Reconciliation Commission—टीआरसी) पिछली गलतियों और मानव अधिकारों के हनन को संबोधित करने के लिए स्थापित एक औपचारिक निकाय है, विशेषकर उन संदर्भों में जहां संघर्ष या अत्याचार का इतिहास रहा है। प्राथमिक लक्ष्य न केवल इन गलतियों को स्वीकार करना है बल्कि प्रभावित व्यक्तियों और समुदायों के बीच मेल-मिलाप को बढ़ावा देना भी है।

  • टीआरसी मुख्य रूप से मौजूदा मुद्दों या संघर्षों के बजाय पिछली घटनाओं पर ध्यान केंद्रित करते हैं। ये एक निश्चित अवधि में घटित हुई घटनाओं की शृंखला या दुर्व्यवहार के पैटर्न की जांच करते हैं।
  • टीआरसी सक्रिय रूप से पीड़ितों, गवाहों और दुर्व्यवहार से प्रभावित समुदायों के साथ जुड़ते हैं तथा प्राथमिक विवरण और साक्ष्य एकत्रित करते हैं।
  • टीआरसी आमतौर पर अस्थायी निकाय होते हैं, जिनकी स्थापना उनके काम को पूरा करने और अंतिम रिपोर्ट तैयार करने के विशिष्ट उद्देश्य से की जाती है।

अपनी वैधता और प्राधिकार के लिए, टीआरसी को राज्य या समीक्षाधीन इकाई द्वारा आधिकारिक तौर पर अधिकृत या सशक्त किया जाता है।

यद्यपि टीआरसी हमेशा अभियोजन का नेतृत्व नहीं करते हैं, तथापि ये सच्चाई को उजागर करने, पीड़ितों को स्वीकार करने और सुलह को बढ़ावा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। ये अकसर व्यापक रिपोर्ट प्रकाशित करते हैं जो ऐतिहासिक रिकॉर्ड के रूप में काम करती हैं, जिसका उद्देश्य अतीत की गलतियों की पुनरावृत्ति को रोकना, तथा सामाजिक सुधार और एकता को बढ़ावा देना है।

टीआरसी वाले देश

रंगभेद (apartheid) की समाप्ति के बाद 1995 में दक्षिण अफ्रीका में स्थापित टीआरसी सबसे प्रसिद्ध टीआरसी में से एक है, जिसका उद्देश्य रंगभेद युग के दौरान मानव अधिकारों के उल्लंघन को संबोधित करना था।

कनाडा में स्थापित टीआरसी, जो जबरन बदलाव से प्रभावित बच्चों के बारे में अपने अनुभव साझा करने हेतु स्वदेशी लोगों के लिए एक मंच प्रदान करता है, ने भारतीय आवासीय विद्यालय प्रणाली की विरासत पर ध्यान केंद्रित किया।

ऑस्ट्रेलिया में स्वदेशी बच्चों, विशेषकर ‘चुराई गई पीढ़ियों’, जिन्हें जबरन उनके परिवारों से अलग कर दिया गया था, के साथ दुर्व्यवहार को संबोधित करने के लिए टीआरसी  स्थापित किया गया।

श्रीलंका और नेपाल ने पिछले संघर्षों और मानवाधिकारों के उल्लंघन को संबोधित करने के लिए टीआरसी की स्थापना की।


निष्कर्ष

उच्चतम न्यायालय के निर्णय ने संघीय सिद्धांतों, सांविधानिक प्रकृति और राष्ट्रीय एकता की अनिवार्यताओं के बीच परस्पर क्रिया पर एक बहस छेड़ दी है। यद्यपि उच्चतम न्यायालय का निर्णय सरकार के कार्यों के अनुरूप है और क्षेत्र को संघ के साथ एकीकृत करने के ऐतिहासिक प्रयासों को रेखांकित करता है, तथापि यह भारत में संघवाद और लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं की संतता के बारे में प्रासंगिक चिंताओं को भी उठाता है। राष्ट्रपति की शक्तियों की व्यापक व्याख्या का समर्थन, विशेष रूप से राष्ट्रपति शासन के दौरान, संभावित रूप से एक मिसाल कायम करता है जो राज्यों के अधिकारों और स्वायत्तता का उल्लंघन कर सकता है। इसके अलावा, जम्मू और कश्मीर को संघ राज्यक्षेत्रों में पुनर्गठित करने से संबंधित महत्वपूर्ण पहलुओं को न्यायालय द्वारा संबोधित न किए जाने के कारण कुछ संवैधानिक प्रश्न अनुत्तरित रह गए हैं। तथापि, उच्चतम न्यायालय का अधिमत अनुच्छेद 370 की “अस्थायी उपबंध” प्रकृति की पुष्टि करता है, जो आंतरिक संघर्ष और संक्रमण के समय इसकी उत्पत्ति पर जोर देता है। यह स्पष्ट करता है कि जम्मू और कश्मीर की विशेष स्थिति आंतरिक संप्रभुता के विचार के बजाय असममित संघवाद का एक पहलू थी। जैसा कि भारत इस निर्णायक मोड़ पर है, निर्णय एक संतुलित दृष्टिकोण की मांग करता है जो सांविधानिक मूल्यों को कायम रखता है, लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं को प्रत्यावर्तित करता है और इस क्षेत्र में सुलह के प्रयासों को बढ़ावा देता है।

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