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आरक्षण कोटे के लिए अनुसूचित जातियों का उप-वर्गीकरण-1

एक युगांतकारी निर्णय में, जिसके दूरगामी प्रभाव हो सकते हैं, भारत के उच्चतम न्यायालय ने 1 अगस्त, 2024 को अनुसूचित जातियों (एससी) के भीतर उप-वर्गीकरण के मुद्दे पर 6:1 के बहुमत से ऐतिहासिक निर्णय दिया। भारत के मुख्य न्यायाधीश डी.वाई. चंद्रचूड़ की अध्यक्षता में सात न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने घोषणा की कि अनुसूचित जाति सामाजिक रूप से एक सजातीय वर्ग नहीं है और राज्यों द्वारा उनमें से कम विशेषाधिकार प्राप्त लोगों को बेहतर लक्षित आरक्षण प्रदान करने हेतु उन्हें उप-वर्गीकृत किया जा सकता है। इस निर्णय ने ई.वी. चिन्नैया बनाम आंध प्रदेश राज्य और अन्य, (2004) मामले में 2004 में दिए गए पूर्व निर्णय को पलट दिया, जिसमें अनुसूचित जातियों को एक समूह माना गया था जिसमें और अधिक उप-वर्गीकरण नहीं किया जा सकता था। न्यायालय ने इस बात पर बल दिया कि किसी भी उप-वर्गीकरण को तर्कसंगत सिद्धांतों और सामाजिक पिछड़ेपन के विभिन्न स्तरों को प्रदर्शित करने वाले आंकड़ों पर आधारित होना चाहिए। इसके अलावा, बहुमत पक्ष वाले मत ने सुझाव दिया कि अनुसूचित जातियों एवं अनुसूचित जनजातियों (एसटी) से “क्रीमी लेयर” को बाहर करने से सकारात्मक कार्रवाई की प्रभावशीलता में वृद्धि हो सकती है। न्यायमूर्ति बेला एम. त्रिवेदी, एकमात्र भिन्न मतधारी, ने अनुसूचित जाति को एक सजातीय वर्ग माना और इस वर्गीकरण को बदलने के किसी भी प्रयास का विरोध किया। यह महत्वपूर्ण निर्णय भारत में सकारात्मक कार्रवाई के भविष्य के बारे में महत्वपूर्व प्रश्न उठाते हुए आरक्षण नीतियों के अनुप्रयोग में एक नया दृष्टांत प्रस्तुत करता है।

मुद्दे के संदर्भ के कारण

1975 में, मुख्यमंत्री ज्ञानी जैल सिंह के अधीन, पंजाब सरकार ने एक परिपत्र जारी किया जिसमें अधिदेशित था कि अनुसूचित जातियों के लिए आरक्षित 25 प्रतिशत कोटे में से 50 प्रतिशत नौकरियां विशेष रूप से वाल्मीकि एवं मजहबी सिख समुदायों के सदस्यों को आबंटित की जाएंगी। इस कार्रवाई का उद्देश्य कथित असमानताओं को दूर करना और यह सुनिश्चित करना था कि आरंभ से ही हाशिए पर पड़े इन समूहों को आरक्षण लाभों में उचित हिस्सेदारी मिले।

इस परिपत्र द्वारा सुस्थापित आरक्षण प्रणाली जुलाई 2006 तक जारी रही, जब पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय ने डॉ. किशन पाल और अन्य बनाम पंजाब राज्य और अन्य (2006) मामले में इसे रद्द कर दिया। न्यायालय का निर्णय ई.वी. चिन्नैया बनाम आंध्र प्रदेश राज्य और अन्य (2004) में उच्चतम न्यायालय के उस पूर्ववर्ती निर्णय, जिसमें विनिर्दिष्ट कोटे के साथ एससी समुदायों की एक विस्तृत सूची पेश कर समानता के अधिकार का उल्लंघन करने के लिए आंध्र प्रदेश शेड्यूल कास्ट (रैशनेलाइजेशन ऑफ रिजर्वेशन) ऐक्ट, 2000 को निरस्त कर दिया था, से प्रभावित था।


ई.वी. चिन्नैया बनाम आंध्र प्रदेश राज्य और अन्य (2004)

ई.वी. चिन्नैया मामले में, उच्चतम न्यायालय के पांच न्यायाधीशों—एन. संतोष हेगड़े, एस.एन. वरियावा, बी.पी. सिंह, एच.के. सेमा और एस.बी. सिन्हा की पीठ ने निर्णय सुनाया कि, संविधान के अनुच्छेद 341(1) के अधीन राष्ट्रपति के आदेश के अंतर्गत सूचीबद्ध सभी जातियां एकल सजातीय समूह हैं। उच्चतम न्यायालय ने आंध्र प्रदेश शेड्यूल कास्ट (रैशनेलाइजेशन ऑफ रिजर्वेशन) ऐक्ट, 2000 को निरस्त कर दिया। अधिनियम में शामिल  अनुसूचित जाति के समुदायों की विस्तृत सूची और उनके लिए विनिर्दिष्ट कोटे को समस्या- मूलक माना गया, जैसा कि न्यायालय ने विनिश्चय किया कि अनुसूचित जातियों के भीतर और अधिक उप-वर्गीकरण अस्वीकार्य था। अनुच्छेद 341(1) भारत के राष्ट्रपति को राज्यपाल के परामर्श से कुछ जातियों को अनुसूचित जातियों के रूप में नामनिर्दिष्ट करने की अनुमति देता है, और इन विनिर्दिष्ट अनुसूचित जातियों को और अधिक उप-वर्गीकृत करने का कोई भी प्रयास संविधान के अनुच्छेद 14, जो विधि के समक्ष समता की गारंटी देता है, का उल्लंघन हो सकता था।


वाल्मीकि और मजहबी सिख समुदायों की मांगों और शिकायतों के प्रत्युत्तर में, मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह के नेतृत्व वाली पंजाब सरकार ने सितंबर 2006 में पंजाब अनुसूचित जाति और पिछड़ा वर्ग (सेवाओं में आरक्षण) अधिनियम, 2006 पेश किया और इसने 5 अक्टूबर 2006 को राज्यपाल की स्वीकृति प्राप्त की। इस अधिनियम का उद्देश्य पंजाब की आरक्षण नीतियों में वाल्मीकि और मजहबी सिख समुदायों के लिए आरक्षण लाभों को संरक्षित करना तथा उन्हें संस्थागत बनाना था।

हालांकि, 2010 में पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय ने उच्चतम न्यायालय द्वारा ई. वी. चिन्नैया मामले में दिए गए निर्णय, जिसमें अनुसूचित जातियों के भीतर उप-वर्गीकरण करने की अनुमति नहीं दी गई थी, का अनुसरण करते हुए पंजाब की आरक्षण नीति को फिर से निरस्त कर दिया। 2014 में, पंजाब सरकार ने उच्च न्यायालय के निर्णय को चुनौती देते हुए उच्चतम न्यायालय में अपील की। उसने तर्क दिया कि उच्चतम न्यायालय का 2004 का निर्णय, जिसमें अनुसूचित जातियों के उप-वर्गीकरण को अस्वीकार्य माना गया था, गलत था।

2020 में पंजाब राज्य और अन्य बनाम दविंदर सिंह और अन्य मामले पर पुनः विचार किया गया। पांच न्यायाधीशों की एक पीठ ने ई.वी. चिन्नैया मामले के निर्णय पर पुनर्विचार किया, और पाया कि इसने इंदिरा साहनी बनाम भारत संघ (1992) मामले में सुस्थापित पूर्वनिर्णय को गलत तरीके से लागू किया था। पीठ ने पंजाब अनुसूचित जाति और पिछड़ा वर्ग (सेवाओं में आरक्षण) अधिनियम, 2006 की धारा 4(5) की वैधता की जांच की, जो पंजाब में आरक्षण नीतियों के भविष्य को संभावित रूप से प्रभावित कर रही थी ।

कोटा हेतु अनुसूचित जातियों के उप-वर्गीकरण पर उच्चतम न्यायालय (2024)

भारत के मुख्य न्यायाधीश डी.वाई. चंद्रचूड़, न्यायमूर्ति बी.आर. गवई, विक्रम नाथ, बेला एम. त्रिवेदी, पंकज मिथल, मनोज मिश्रा और सतीश चंद्र शर्मा की उच्चतम न्यायालय की सात न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने 6:1 के बहुमत से माना कि अनुसूचित जातियों का उप-वर्गीकरण उचित है। उच्चतम न्यायालय ने निर्धारित किया कि अनुच्छेद 341 “एकीकृत सजातीय वर्ग” को प्रमाणित नहीं करता और सकारात्मक कार्रवाई एवं आरक्षण जैसे उद्देश्यों के लिए अनुसूचित जातियों के भीतर उप-वर्गीकरण, सूची में जातियों के समावेशन या अपवर्जन की स्थिति को नहीं बदलता। ऐसे परिवर्तन केवल संसद द्वारा किए जा सकते हैं। फलस्वरूप, अनुच्छेद 341 एक ऐसे अपरिवर्ती वर्ग का निर्माण नहीं करता जिसे और अधिक उप-वर्गीकृत नहीं किया जा सकता। न्यायालय ने यह भी कहा कि ऐतिहासिक एवं अनुभवजन्य साक्ष्य संकेत देते हैं कि अनुसूचित जातियां विषमजातीय हैं, तथा इंदिरा साहनी मामले में दिया गया निर्णय केवल पिछड़े वर्गों तक ही उप-वर्गीकरण को सीमित नहीं करता।

इसका अर्थ यह है कि राज्य एससी श्रेणियों के भीतर अधिक पिछड़े समूहों की पहचान कर सकते हैं और उनके लिए पृथक कोटा आबंटित कर सकते हैं। इस निर्णय ने ई.वी. चिन्नैया बनाम आंध्र प्रदेश राज्य और अन्य मामले में 2004 के पूर्ववर्ती निर्णय को खारिज कर दिया, जिसने इस प्रकार के उप-वर्गीकरण को निषिद्ध कर दिया था। इस आदेश में अनुसूचित जाति के समृद्ध सदस्यों को क्रीमी लेयर के मानदंड के आधार पर आरक्षण लाभ से बाहर रखने की आवश्यकता को भी स्पष्ट किया गया है। वर्तमान में, क्रीमी लेयर के मानदंड केवल ओबीसी आरक्षण में लागू होते हैं।

न्यायालय ने इस बात पर बल दिया कि यद्यपि उप-वर्गीकरण की अनुमति दी जा सकती है, तथापि राज्यों को कुछ शर्तों का पालन करना होगाः

अनुभवजन्य प्रामाणिकता: राज्यों को उप-वर्गीकरण की आवश्यकता को उचित ठहराने के लिए मात्रात्मक डेटा प्रदान करना होगा। इस डेटा से यह प्रदर्शित होना चाहिए कि संबद्ध उप-वर्ग का प्रतिनिधित्व अपर्याप्त है या अनुसूचित जातियों के अन्य समूहों की तुलना में उसे अधिक चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है।

कोटे की सीमाः राज्य किसी उप-वर्ग के लिए 100 प्रतिशत आरक्षण निर्धारित नहीं कर सकते। अनुसूचित जातियों के लिए कुल कोटा विधि द्वारा विर्निदिष्ट आरक्षित सीमाओं के भीतर ही रहना चाहिए।

निर्णय और न्यायिक राय

मुख्य न्यायाधीश डी.वाई. चंद्रचूड़ः सीजेआई ने अपने और न्यायमूर्ति मिश्रा की ओर से संयुक्त रूप से निर्णय लिखते हुए उल्लेख किया कि, उप-वर्गीकरण संविधान के अनुच्छेद 14 (विधि के समक्ष समता का अधिकार) या 341 (अनुसूचित जातियां) का उल्लंघन नहीं करता है। उन्होंने ऐतिहासिक साक्ष्यों का हवाला दिया जो सूचित करते हैं कि अनुसूचित जातियां एक सजातीय वर्ग नहीं हैं। अनुच्छेद 15 एवं 16 में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है जो राज्य को किसी जाति समूह के भीतर उप-वर्गीकरण लागू करने से रोकता हो।

उप-वर्गीकरण को मात्रात्मक और प्रदर्शन योग्य डेटा पर आधारित होना चाहिए जो यह दर्शाता हो कि अनुसूचित जातियों के भीतर कुछ समूहों का प्रतिनिधित्व अपर्याप्त है। राज्य मनमाने निर्णयों या राजनीतिक अभिप्रेरणाओं के आधार पर उप-वर्गीकरण लागू नहीं कर सकते। इसके बजाय, ऐसा कोई भी निर्णय यह सुनिश्चित करने के लिए न्यायिक पुर्नविलोकन के अधीन होगा कि वह उचित और संवैधानिक सिद्धांतों के अनुरूप है।

न्यायमूर्ति बी.आर. गवईः न्यायमूर्ति गवई ने अपने सहमतिपूर्ण निर्णय में अनुसूचित जातियों (एससी) और अनुसूचित जनजातियों (एसटी) के भीतर अधिक पिछड़े समुदायों को अतिरिक्त प्राथमिकता देने के राज्य के उत्तरदायित्व पर बल दिया। उन्होंने कहा कि इन श्रेणियों के भीतर केवल कुछ ही व्यक्तियों को आरक्षण का लाभ मिलता है, जबकि कुछ समूहों ने आरंभ से ही अत्यधिक उत्पीड़न झेला है।

ई.वी. चिन्नैया मामले के निर्णय की आलोचनाः न्यायमूर्ति गवई ने ई.वी. चिन्नैया मामले के निर्णय में एक मूलभूत त्रुटि को चिह्नित किया, जिसमें कहा गया था कि अनुसूचित जातियों का उप-वर्गीकरण अस्वीकार्य है। उन्होंने तर्क दिया कि यह निर्णय, त्रुटिपूर्ण रूप से इस विचार पर निर्भर था कि संविधान का अनुच्छेद 341 आरक्षण का आधार है। न्यायमूर्ति गवई के अनुसार, अनुच्छेद 341 मुख्य रूप से आरक्षण के प्रयोजन हेतु जातियों की पहचान करने से संबंधित है, लेकिन उन जातियों के भीतर उप-वर्गीकरण की आवश्यकता से इनकार नहीं करता।

उप-वर्गीकरण का आधार: न्यायमूर्ति गवई ने इस विचार का समर्थन किया कि जब किसी बड़ी श्रेणी के भीतर कुछ समूहों को अधिक भेदभाव का सामना करना पड़ता है तो उप-वर्गीकरण आवश्यक होता है। यह दृष्टिकोण यह मानता है कि एससी/एसटी की व्यापक श्रेणियों के भीतर कुछ समूह अधिक वंचित हैं और इसलिए उनके लिए अधिक लक्षित सकारात्मक कार्रवाई करने की आवश्यकता है।

क्रीमी लेयर का सिद्धांत: न्यायमूर्ति गवई ने एससी और एसटी वर्ग के लिए भी क्रीमी लेयर के सिद्धांत को लागू करने की वकालत की जो अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी), लेकिन अलग-अलग मानदंडों के साथ, के लिए लागू किए गए सिद्धांत के समान है। उन्होंने प्रस्तावित किया कि राज्यों को इन श्रेणियों के भीतर अधिक विशेषाधिकार प्राप्त व्यक्तियों की पहचान करने और उन्हें सकारात्मक कार्रवाई के लाभों से बाहर करने के लिए नीतियां बनानी चाहिए। इससे यह सुनिश्चित करने में मदद मिलेगी कि संसाधन उन लोगों को मिल रहे हैं जिन्हें इनकी सबसे अधिक जरूरत है, इससे वास्तविक समानता को बढ़ावा मिलेगा।


क्रीमी लेयर उप-वर्गीकरण या उप-श्रेणीकरण के समान नहीं है: उप-वर्गीकरण या उप-श्रेणीकरण से तात्पर्य विभिन्न सामाजिक-आर्थिक स्थितियों या अन्य मानदंडों के आधार पर आरक्षित श्रेणी, जैसे कि एससी, के समुदाय या जातिवार वर्गीकरण से है। दूसरी ओर, क्रीमी लेयर एक विशिष्ट जाति या समुदाय के भीतर एक समूह को संदर्भित करता है जिसे कुछ मानदंडों के आधार पर दूसरों से श्रेष्ठ माना जाता है।

‘क्रीमी लेयर’ की अवधारणा का उद्भव 1992 के इंदिरा साहनी मामले से हुआ। मंडल आयोग की सिफारिशों के बाद, वी.पी. सिंह सरकार ने 13 अगस्त, 1990 को सिविल पदों और सेवाओं में ओबीसी वर्ग हेतु 27 प्रतिशत आरक्षण की अधिसूचना जारी की। हालांकि, इस निर्णय को इंदिरा साहनी और अन्य द्वारा उच्चतम न्यायालय में चुनौती दी गई। 16 नवंबर, 1992 को न्यायाधीश बी.पी. जीवन रेड्डी की अध्यक्षता में नौ न्यायाधीशों की पीठ ने ओबीसी वर्ग में क्रीमी लेयर या सामाजिक, आर्थिक और शैक्षणिक रूप से अधिक समृद्ध लोगों को बाहर रखने के संबंध में 27 प्रतिशत ओबीसी आरक्षण को बरकरार रखा। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना था कि आरक्षण का लाभ उन लोगों को मिले जिन्हें इसकी सबसे अधिक आवश्यकता है।

क्रीमी लेयर में व्यापक रूप से दो श्रेणियां शामिल हैं (संवैधानिक पद धारण करने वाले व्यक्तियों के अलावा)—(i) वे लोग जिनके माता-पिता सरकारी सेवा में हैं, और (ii) वे लोग जिनके माता-पिता निजी क्षेत्र में कार्य करते हैं। पहली स्थिति में, क्रीमी लेयर का निर्धारण रैंक के आधार पर होता है, जबकि दूसरी स्थिति में, निर्धारण उनके माता-पिता की आय (वर्ष 2017 से अब तक यह सीमा 8 लाख रुपये है) के आधार पर होता है।


न्यायमूर्ति विक्रम नाथ: न्यायमूर्ति नाथ ने अनुसूचित जातियों के लिए क्रीमी लेयर के सिद्धांत को लागू करने के मामले में न्यायाधीश गवई से सहमति व्यक्त की।

न्यायमूर्ति पंकज मिथल: न्यायमूर्ति मिथल द्वारा इस विचार का समर्थन किया गया कि आरक्षण एक पीढ़ी तक सीमित होना चाहिए। उन्होंने सुझाव दिया कि एक बार जब कोई पीढ़ी आरक्षण से लाभान्वित हो जाती है और उन्नति कर लेती है, तो अगली पीढ़ियों को ये लाभ नहीं मिलने चाहिए।

न्यायमूर्ति सतीश चंद्र शर्मा: न्यायमूर्ति सतीश चंद्र शर्मा ने भी न्यायमूर्ति गवई द्वारा व्यक्त विचारों और क्रीमी लेयर के सिद्धांत के अनुप्रयोग का समर्थन किया।

न्यायमूर्ति बेला त्रिवेदी: उन्होंने अपनी असहमतिपूर्ण राय में तर्क दिया कि अनुसूचित जातियों (एससी) की राष्ट्रपति सूची में, जैसा कि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 341 में अधिसूचित है, राज्यों द्वारा कोई परिवर्तन नहीं किया जा सकता। उन्होंने तर्क दिया कि सूची में परिवर्तन, जिसमें अनुसूचित जातियों का उप-वर्गीकरण भी शामिल है, केवल संसद द्वारा पारित कानून के माध्यम से ही किया जा सकता है। न्यायमूर्ति त्रिवेदी ने उप-वर्गीकरण को राष्ट्रपति सूची में अनधिकृत परिवर्तन के रूप में देखा, जिसका उद्देश्य अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों की उपाधियों के भीतर राजनीतिक जोड़-तोड़ से किए जाने वाले परिवर्तन को रोकना था।

न्यायमूर्ति त्रिवेदी ने अनुच्छेद 341 की स्पष्ट और शाब्दिक व्याख्या की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने तर्क दिया कि राष्ट्रपति सूची में विनिर्दिष्ट उप-वर्गों को किसी भी प्रकार की
प्राथमिकता दिए जाने के परिणामस्वरूप उसी श्रेणी की अन्य अनुसूचित जाति के लोग लाभ से वंचित हो सकते हैं। उनके अनुसार, राज्यों के पास ऐसे उप-वर्गीकरण करने और लाभ आबंटित करने के लिए कार्यकारी या विधायी अधिकार नहीं हैं, क्योंकि ऐसा करना सत्ता का दुरुपयोग होगा।

उप-वर्गीकरण की आवश्यकता

आंतरिक विषमताओं को संबोधित करनाः अनुसूचित जातियों में, विभिन्न समुदायों के बीच सामाजिक एवं आर्थिक स्थितियों में पर्याप्त अंतर है। इन श्रेणियों के भीतर कुछ उप-समूह दूसरों की तुलना में अधिक गंभीर प्रतिकूल परिस्थितियों का सामना करते हैं। उदाहरण के लिए, कुछ अनुसूचित जातियों को दूसरों की तुलना में शैक्षिक एवं आर्थिक वंचन का अधिक सामना करना पड़ सकता है। उप-वर्गीकरण यह सुनिश्चित करते हुए इन आंतरिक असमानताओं की पहचान करने और विशिष्ट आवश्यकताओं को लक्षित करने का प्रयास करता है, कि नीतियां बहुसंख्यक अनुसूचित जातियों की श्रेणियों के भीतर विभिन्न उप-समूहों द्वारा सामना की जाने वाली विशिष्ट चुनौतियों पर ध्यान देती हैं।

लक्षित सहायता में सुधार: उप-वर्गीकरण नीति निर्माताओं को लक्षित मध्यवर्ती उपायों को तैयार करने और लागू करने की सुविधा देता है जो अनुसूचित जातियों के विभिन्न उप-समूहों की विशिष्ट आवश्यकताओं को पूरा करते हैं। यह लक्षित उपागम यह सुनिश्चित कर सकारात्मक कार्रवाई के कार्यक्रमों की प्रभावशीलता को बढ़ाता है ताकि सहायता एवं संसाधन वहीं आबंटित किए जाएं जहां उनकी सबसे अधिक आवश्यकता है। उदाहरण के लिए, यदि किसी विशेष एससी समुदाय में गरीबी या शैक्षिक वंचना की दर अधिक है, तो इन मुद्दों को अधिक प्रभावी ढंग से संबोधित करने के लिए लक्षित नीतियां विकसित की जा सकती हैं।

परिवर्तित आवश्यकताओं पर प्रतिक्रियाः एससी समुदायों की सामाजिक-आर्थिक स्थितियां और आवश्यकताएं स्थायी नहीं हैं, वे समय के साथ परिवर्तित होती हैं। उप-वर्गीकरण इन परिवर्तित परिस्थितियों पर प्रतिक्रिया देने के लिए एक लचीला ढांचा प्रदान करता है। उपश्रेणियां बनाकर, नीति निर्माता समकालीन मुद्दों, जैसे कि भेदभाव के नए रूपों या उभरती सामाजिक-आर्थिक चुनौतियों, का समाधान करने हेतु आरक्षण नीतियों को प्रासंगिक और प्रभावी बनाए रखने के लिए अनुकूलित कर सकते हैं।

प्रतिनिधित्व में वृद्धि करनाः उप-वर्गीकरण एससी समुदायों के बीच प्रतिनिधित्व में कथित असंतुलन से संबंधित शिकायतों को संबोधित कर सकता है। उदाहरण के लिए, यदि किसी एससी समूह को अनुभव होता है कि उसके हितों को दूसरे समूह द्वारा दबाया जा रहा है, तो उप-वर्गीकरण निष्पक्ष प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने और ऐसी चिंताओं को दूर करने के लिए एक तंत्र प्रदान करता है। यह उपागम विभिन्न उप-समूहों के प्रतिनिधित्व को संतुलित करने में मदद करता है और यह सुनिश्चित करता है कि उनकी विशिष्ट आवश्यकताओं और शिकायतों को मान्यता दी जाए।

विधिक और नीतिगत समायोजनः एससी समुदायों के बीच उप-वर्गीकरण की प्रक्रिया न्यायिक निर्णयों, विधायी परिवर्तनों और राजनीतिक विचारों से प्रभावित होती है। उदाहरण के लिए, इंदिरा साहनी मामले जैसे पूर्व निर्णयों की व्याख्या उप-वर्गीकरण के दृष्टिकोण को प्रभावित कर सकती है। उप-वर्गीकरण बदलती हुई विधिक एवं नीतिगत आवश्यकताओं में अनुरूपता की सुविधा देता है, और यह सुनिश्चित करता है कि आरक्षण नीतियां वर्तमान व्याख्याओं और विधायी विकास को प्रतिबिंबित करती हैं।

क्षेत्रीय विभिन्नताओं को संबोधित करनाः विभिन्न राज्यों में एससी समुदायों के बीच सामाजिक-आर्थिक विकास के स्तरों में भिन्नता देखी जा सकती है। उप-वर्गीकरण, क्षेत्रीय विभिन्नताओं से संबद्ध हस्तक्षेपों का अनुकूलन कर नीति कार्यान्वयन के लिए अधिक सूक्ष्म उपागम को सक्षम बनाता है। यह सुनिश्चित करता है कि नीतियां देश के विभिन्न हिस्सों में एससी समुदायों के सम्मुख उत्पन्न उनकी निश्चित आवश्यकताओं एवं चुनौतियों के प्रति उत्तरदायी हों।

समावेशी विकास को प्रोत्साहित करनाः उप-वर्गीकरण का उद्देश्य यह सुनिश्चित कर समावेशी विकास को बढ़ावा देना है कि अनुसूचित जातियों की श्रेणियों के सभी वर्गों को सकारात्मक कार्रवाई की नीतियों से लाभ मिले। उप-वर्गीकरण का उद्देश्य छोटे या कम सुविधा प्राप्त उप-समूहों की आवश्यकताओं की पहचान और उनका समाधान कर, इन समूहों को हाशिए पर जाने से रोकना तथा यह सुनिश्चित करना है कि आरक्षण नीतियों का लाभ अधिक समान रूप से वितरित किया जाए।

इंदिरा साहनी निर्णय की भ्रांत व्याख्याः इंदिरा साहनी मामले में दिया गया निर्णय मुख्य रूप से अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) के भीतर ‘क्रीमी लेयर’ के सिद्धांत पर केंद्रित था और उसने एससी या एसटी के लिए उप-वर्गीकरण को स्पष्ट रूप से संबोधित नहीं किया। ई.वी. चिन्नैया मामले के निर्णय, जिसने इस निर्णय के आधार पर आंध्र प्रदेश के उप-वर्गीकरण के तर्क को खारिज कर दिया था, की इंदिरा साहनी मामले में की गईं न्यायिक टिप्पणियों की भ्रांत व्याख्या करने के लिए आलोचना की गई। याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया कि इंदिरा साहनी मामले के निर्णय ने एससी और एसटी के लिए उप-वर्गीकरण को बाहर नहीं रखा और निर्णय क्रीमी लेयर की अवधारणा पर अधिक केंद्रित था।

विविधतापूर्ण और कुशल शासन की आवश्यकताः उप-वर्गीकरण को अधिक कुशल शासन प्राप्त करने के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है। यह अनुसूचित जाति के विभिन्न उप-समूहों की विशिष्ट आवश्यकताओं और अनुभवों को संबोधित कर नीति निर्माण एवं प्रशासन में विविधतापूर्ण और प्रतिनिधिक भागीदारी की सुविधा देता है। इस उपागम से अलग-अलग उप-समूहों की विभिन्न आवश्यकताओं को समायोजित करते हुए अधिक लक्षित और कुशल शासन की ओर अग्रसर होना अपेक्षित है।

अनुसूचित जातियों में विजातीयताः विभिन्न एससी समूहों के बीच महत्वपूर्ण विविधता एवं भेदभाव के अलग-अलग स्तर, उप-वर्गीकरण की आवश्यकता पर बल देते हैं। व्यावसायिक एवं सामाजिक अंतरालों ने एससी श्रेणी के भीतर अलग-अलग उप-वर्गों का गठन किया है। आरक्षण नीतियों में इन अंतरों को पहचानने से यह सुनिश्चित करने में मदद मिलेगी कि प्रत्येक उप-वर्ग की विशिष्ट आवश्यकताओं को किस प्रकार पूरा किया जाए।

अनुच्छेद 341 और युक्तियुक्त वर्गीकरणः अनुच्छेद 341 राष्ट्रपति को कुछ समुदायों को अनुसूचित जातियों के रूप में नामनिर्दिष्ट करने का अधिकार देता है, लेकिन उप-वर्गीकरण राज्यों की विधायी क्षमता के अंतर्गत आता है, बशर्ते कि यह युक्तियुक्त मानदंडों को पूरा करता हो। याचिकाकर्ताओं ने ई.वी. चिन्नैया मामले के निर्णय की आलोचना की, क्योंकि इसमें युक्तियुक्त वर्गीकरण के दोहरे परीक्षण को लागू नहीं किया गया और उप-वर्गीकरण का समर्थन करने वाले अनुभवजन्य डेटा, जैसे कि न्यायमूर्ति रामचंद्र राजू की जांच रिपोर्ट, को नजरअंदाज कर दिया गया। विधि विशेषज्ञों सहित उप-वर्गीकरण के पक्षधर तर्क देते हैं कि अनुसूचित जातियों के उप-समूहों की भिन्न प्रकार की जरूरतों को पूरा करने के लिए अधिक सुधारित उपागम की आवश्यकता है।

शेष भाग —  आरक्षण कोटे के लिए अनुसूचित जातियों का उप-वर्गीकरण-2

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