शाब्दिक रूप से स्त्रीधन शब्द का अर्थ ‘स्त्री की संपत्ति’ है। परंतु अधिक विस्तृत रूप से यह ‘किसी विवाहित स्त्री की पृथक संपत्ति’ को संदर्भित करता है। इस संपत्ति में उसे विवाह से पूर्व, विवाह के समय या विवाह के पश्चात परिवार अथवा अपरिचित संबंधियों से प्राप्त हुए उपहार, और वह संपत्ति शामिल होती है जो उसने अपने उपार्जन या कौशल से अर्जित की हो और जिस पर उसका पूर्ण (अप्रतिबंधित) अधिकार एवं स्वामित्व हो। यह संपत्ति चल या अचल (आभूषण, नकदी भूमि आदि) हो सकती है।
यह नियम प्राचीन हिंदू कानून के अधीन था। लेकिन हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 की धारा 14 द्वारा स्त्रीधन की अवधारणा में एक मूलभूत परिवर्तन किया गया। यह परिवर्तन पूर्ण स्वामित्व के अधिकार के संबंध में है, अर्थात कोई महिला परिसीमित ‘स्त्री की संपत्ति’ या ‘स्त्रीधन’ के विपरीत मुक्त रूप से अपनी स्वाधीन संपत्ति का उपभोग, प्रबंधन, विक्रय कर सकती है या उसे किसी को उपहारस्वरूप भी दे सकती है।



