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हिंदू दर्शन में ‘ऋण’ शब्द की व्याख्या उन बाध्यताओं या दायित्वों के रूप में की गई है जिनकी पूर्ति मनुष्य द्वारा आजीवन की जानी होती है। ये वे कर्तव्य तथा उत्तरदायित्व हैं जिन्हें मोक्ष प्राप्त करने के लिए पूरा किया जाना चाहिए। यह लोगों की अपने समुदाय/समाज, पूर्वजों, गुरुओं और ईश्वर/दैव से अंतःसंबद्धता को सूचित करता है। हिंदू दर्शन में ऋण के पांच प्रकार हैं:

(i) देव ऋणः यह ईश्वर के प्रति मनुष्य के आभार को संदर्भित करता है। यह आराधना या प्रार्थना, प्रथाओं, तथा नैतिक आचरण के माध्यम से जुड़े रहने का दायित्व है। ऐसा करके मनुष्य उन दैवीय/ईश्वरीय शक्तियों के प्रति अपना आभार एवं अपनी श्रद्धा प्रकट करता है जो ब्रह्मांड को संचालित करती हैं।

(ii) पितृ ऋणः यह किसी व्यक्ति का अपने पूर्वजों के प्रति दायित्व है। इसे श्राद्ध, अपने मृत पूर्वजों के सम्मान में किया जाने वाला एक अनुष्ठान, का पालन कर तथा विवाह एवं वंश वृद्धि (संतानोत्पत्ति) के माध्यम से अपनी वंशावली को आगे बढ़ाकर पूरा किया जाता है।

(iii) ऋषि ऋणः यह किसी व्यक्ति द्वारा अपने गुरुओं या, साधु-संतों, जो ज्ञान और प्रज्ञान प्रदान करते हैं, के प्रति निभाया जाने वाला कर्तव्य है। यह उन लोगों के प्रति सम्मान एवं आदर व्यक्त करने से संबद्ध है जो हमारा मार्गनिर्देशन करने के साथ ही हमें शिक्षा भी देते हैं।

(iv) मानव ऋणः यह अपने सहचरों के प्रति आभार प्रकट करने का कर्तव्य है। यह सामाजिक उत्तरदायित्वों एवं दान के महत्व पर बल देता है।

(v) भूत ऋणः यह प्रकृति, जिसमें पेड़-पौधे, पशु-पक्षी, और पर्यावरण शामिल हैं, के प्रति व्यक्त किया जाने वाला आभार है। हमारा अस्तित्व और उत्तरजीविता गहन रूप से प्राकृतिक जगत पर निर्भर हैं। हम यह ऋण संरक्षण तथा सतत जीवन निर्वाह के कार्यों के माध्यम से चुका सकते हैं।

 

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