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मौर्योत्तर काल (200 ईसा पूर्व-300 ईसवी) के दौरान उत्तर भारत पर विभिन्न स्वदेशी एवं विदेशी राजवंशों ने शासन किया, जिनके द्वारा कला के विभिन्न रूपों के साथ ही वास्तुकला को भी प्रोत्साहन प्रदान किया गया। यद्यपि इस काल की वास्तुकला मूलतः धार्मिक प्रवृत्तियों से प्रेरित थी, जिसके अंतर्गत विशेष रूप से स्तूप निर्माण तथा शैलकृत गुहा निर्माण का उद्भव हुआ।

स्तूप निर्माण कला

मौर्योत्तरकालीन स्तूप, विशेषतः बौद्ध धर्म से संबंधित, पूर्ववर्ती कालों की तुलना में अधिक विस्तृत एवं अलंकृत थे। जैसा कि इस काल में ये केवल धार्मिक स्मारक न रहकर कलात्मक उत्कृष्टता तथा सांस्कृतिक संपर्कों के प्रतीक भी बन गए थे। इस काल में निर्मित उल्लेखनीय स्तूपों में शामिल हैं:

सांची का स्तूपः वर्तमान मध्य प्रदेश के सांची में अवस्थित इस स्तूप का निर्माण यद्यपि मौर्य शासक अशोक द्वारा करवाया गया था, तथपि मौर्योत्तरकाल में शुंग वंश के शासनाधीन इसका जीर्णोद्धार करवाया गया, जिसके अंतर्गत ईंट से निर्मित इस स्तूप तथा काष्ठ से बनी इसकी चहारदीवारी को पत्थरों से ढका गया। इसके साथ ही, इसमें भूमि से 16 फीट ऊपर एक प्रदक्षिणा पथ, वेदिका तथा हर्मिका आदि से अलंकृत करने के अलावा दीवार के चारों ओर भव्य तोरणों का निर्माण भी करवाया गया।

भरहुत का स्तूपः मध्य प्रदेश के सतना जिले में अवस्थित भरहुत का निर्माण द्वितीय शताब्दी ईसा पूर्व में शुंग वंश के शासकों द्वारा करवाया गया था। पक्की ईंट से निर्मित इस स्तूप की वेदिका पाषाणनिर्मित थी, जिसमें कुल 80 स्तंभ थे। इसके साथ ही इसमें चार भव्य तोरण द्वार भी बनवाए गए थे। यद्यपि यह स्तूप नष्ट हो चुका है, तथापि यहां किए गए उत्खननों में इसके अनेक पुरावशेष, जिनमें 47 स्तंभ, एक लगभग 3 मीटर लंबा और 1.80 मीटर चौड़ा भाग—जिसमें दीये रखने के आले बने है—तथा एक तोरणद्वार शामिल हैं, प्राप्त हुए हैं।

अमरावती का स्तूपः वर्तमान आंध्र प्रदेश के गुंटूर जिले में अवस्थित अमरावती का स्तूप एक प्राचीन बौद्ध स्मारक है। आरंभ में इसका निर्माण अशोक द्वारा ईंटों से करवाया गया था, लेकिन बाद में सातवाहन वंश के शासकों ने संगमरमर से इसका पुनर्निर्माण करवाया। इस विशाल स्तूप के दोनों ओर नक्काशीदार पट्टिकाएं लगी हैं जिन पर गौतम बुद्ध के जीवन की घटनाएं तथा जातक कथाओं के दृश्य उत्कीर्ण हैं।

शैलकृत गुहा निर्माणकला

मौर्योत्तर काल में वास्तुकला के क्षेत्र में स्तूप निर्माण के अतिरिक्त चट्टानों को काटकर गुहाओं के निर्माण में भी उल्लेखनीय विकास हुआ।

इन गुहाओं का निर्माण मुख्यतः बौद्ध एवं जैन भिक्षुओं के लिए किया गया था। मौर्योत्तरकालीन शैलकृत वास्तुकला के श्रेष्ठ उदाहरणों में निम्नलिखित गुहाएं सम्मिलित हैं:

उदयगिरि और खंडगिरि की गुहाएं: भुवनेश्वर के पश्चिम में, मात्र 5 किमी. की दूरी पर उदयगिरि एवं खंडगिरि की दोहरी पहाड़ियां स्थित हैं। इन पहाड़ियों में अशोक ने जैन भिक्षुओं के लिए बहुमंजिली गुफाओं का निर्माण किया गया था। ये गुफाएं कलिंगराज खारवेल द्वारा प्रथम सदी ईसा पूर्व में निर्मित मानी जाती है।

उदयगिरि और खंडगिरि में कुल 35 गुफाएं हैं, जिनमें से कुछ प्रमुख गुफाएं रानीगुम्फा, स्वर्गपुरी, बैकुंठपुर, हाथीगुम्फा, नवमुनि गुम्फा, आकाश गंगा तथा अनन्त गुम्फा हैं। उल्लेखनीय है कि इन गुफाओं के भीतर कोई चैत्यगृह का पूजास्थल नहीं, अपितु सुंदर आकृतियों एवं अलंकरणयुक्त स्तंभों पर खड़ी सामने की ओर निकली हुई छतें हैं और इनके पीछे शालाएं है जहां संभवतः जैन श्रमणों एवं श्रावकों द्वारा धार्मिक नाटकों का आयोजन किया जाता था। जैसा कि इन गुफाओं के भित्तिचित्रों में उदयन-वासवदत्ता, तथा दुष्यंत-शकुंतला की कथाओं के दृश्य दृष्टव्य हैं।

अजंता की गुफाएं: ये गुफाएं (यूनेस्को के विश्व धरोहर स्थलों में सूचीबद्ध) औरंगाबाद जिले में महाराष्ट्र के पठार के उत्तरी सीमांत पर स्थित हैं। ये गुफाएं महिष्मति तथा उज्जैन के रास्ते पश्चिमी भारत तथा उत्तरी भारत को जोड़ने वाले महत्वपूर्ण व्यापारिक मार्गों पर स्थित हैं। 550 मी. से भी अधिक क्षेत्र में विस्तृत ये गुफाएं घोड़े की नाल के आकार में बनी हैं। अजंता की गुफाओं का निर्माण ईसा पूर्व दूसरी शताब्दी से सातवीं शताब्दी के मध्य हुआ। यहां 29 गुफाएं हैं। इनमें से कई गुफाएं 100 फीट तक गहरी हैं। इन गुफाओं की मुख्य विशेषता है—इनकी सुंदर चित्रकला एवं उत्कृष्ट मूर्तिकला । इन गुफाओं में चार चैत्य गृह और शेष विहार हैं। चट्टानों को काटकर स्तूप भी बनाए गए हैं। स्तूपों के शीर्ष पर हर्मिका तथा छत्र स्थित हैं।

भाजा की गुफाएं: भाजा, पूना के निकट स्थित है तथा बौद्ध चैत्य गृहों एवं गुहा विहारों के लिए प्रसिद्ध है। सातवाहन काल में निर्मित ये 18 गुफाएं, बौद्ध धर्म की हीनयान शाखा से संबंधित हैं। इन चैत्य एवं विहारों का निर्माण गुफाओं को काटकर करवाया गया। इस काल में स्वतंत्र रूप से ईंटों एवं पत्थरों की सहायता से भी चैत्यों का निर्माण हुआ। चैत्य गृहों की रचना हिंदू मंदिरों से मिलती-जुलती है। इनके अंतिम छोर पर ढोलाकर पूजा स्थल होते थे। यहीं पर चैत्य होता था जहां पूजा की जाती थी। चैत्य गृह में मंडप और प्रदक्षिणा पथ भी होते थे। इन गुफाओं की विशेषता यह है कि सूर्य की किरणें इन गुफाओं के अंदर प्रवेश करती हैं। गुफाओं के दक्षिणी हिस्से में देवी-देवताओं की आकृतियां उकेरी गई हैं।

 

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