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‘महापाषाण’ (Megalith) शब्द की व्युत्पत्ति ग्रीक भाषा के ‘मेगा’ (विशाल) एवं ‘लिथोस’ (पत्थर) से हुई है, जो किसी गारे या जोड़ने वाले पदार्थ के प्रयोग के बिना विशाल पत्थरों द्वारा निर्मित स्मारकीय संरचनाओं को इंगित करता है। भारत के ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में, ये संरचनाएं मुख्य रूप से दक्षिण भारत में उत्तर-नवपाषाण काल से लेकर लौह युग (लगभग 1200 ईसा पूर्व से 300 ईसा पूर्व) के मध्य विकसित हुईं (हालांकि, दक्षिण भारत में महापाषाणकालीन संस्कृति के कालक्रम को लेकर इतिहासकारों में मतैक्य नहीं है, जैसा कि व्हीलर ने महापाषाण काल की तिथि तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व से पहली शताब्दी निर्धारित की है जबकि कुछ विद्वान इसकी अवधि 1000 ईसा पूर्व से 500 शताब्दी मानते हैं)। ये स्मारक प्रधानतः शवाधान एवं कर्मकांडीय उद्देश्यों हेतु निर्मित किए गए थे, जो डोलमेन, प्रस्तर वृत्त, मेनहिर, पत्थर के ताबूत, संगोरा और कलश शवाधान के रूप में देखे जा सकते हैं। ये संरचनाएं प्राचीन समुदायों की जटिल शवाधान पद्धतियों, मृत्योपरांत जीवन के प्रति उनके धार्मिक विश्वासों और उनके जटिल सामाजिक स्तरीकरण को प्रतिबिंबित करती हैं। इन स्थलों से प्राप्त लौह उपकरण, विशिष्ट मृदभांड और अन्य पुरावशेष न केवल तत्कालीन धातुकर्म कौशल को प्रदर्शित करते हैं, बल्कि लौह युगीन सामाजिक-आर्थिक जीवन के पुनर्निर्माण के संबंध में भी महत्वपूर्ण रूप से स्पष्ट समझ प्रदान करते हैं।

दक्षिण भारत में पाए गए महापाषाणकालीन प्रमुख स्थल हैं:

हिरेबेंकल (कर्नाटक): यह भारत के विशालतम एवं सर्वाधिक जटिल महापाषाणकालीन स्थलों में से एक है, जो, अपनी संरचनात्मक विविधता जैसे डोलमेन, संदूकनुमा ताबूत, प्रस्तर वृत्त और शैलाश्रय हेतु प्रसिद्ध है। लगभग 800 ईसा पूर्व से 200 ईसा पूर्व के कालखंड का यह महाकब्रिस्तान (नेक्रोपोलिस) नवपाषाण काल से लेकर लौह युग के मध्य हुए सांस्कृतिक संक्रमण का जीवंत प्रमाण प्रस्तुत करता है। अपनी अद्वितीय पुरातात्विक महत्ता और ऐतिहासिक विस्तार के कारण ही इस स्थल को यूनेस्को की विश्व धरोहरों की अस्थायी सूची में स्थान दिया गया है।

अदिचनल्लूर (तमिलनाडु): यह दक्षिण तमिलनाडु में स्थित एक प्रमुख शवाधान स्थल है, जो अपने कलश शवाधान, मृदभांडों एवं कांस्य वस्तुओं की खोज के लिए जाना जाता है। उत्खनन में यहां प्राचीन शवाधान प्रथाओं से जुड़े लोहे के उपकरण और पुरावशेष प्राप्त हुए हैं।

चेरमनंगड़ (केरल): यह स्थल केरल के त्रिशूर जिले में स्थित है, जहां 69 महापाषाणकालीन स्मारक पाए गए, जिनमें टोपिकल, कुडकल्लू (छतरीनुमा पाषाण) और प्रस्तर वृत्त शामिल हैं। इस स्थल को भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) द्वारा संरक्षित किया गया है।

अन्य उल्लेखनीय महापाषाणकालीन स्थल: भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) द्वारा तमिलनाडु के तिरुवल्लूर, कांचीपुरम और विल्लुपुरम जैसे जिलों में कई स्थानीय महापाषाणकालीन सिस्ट (cists), प्रस्तर वृत्त और कलश शवाधानों का दस्तावेजीकरण किया गया है।

मेगालिथिक संरचनाओं के प्रकार

डोलमेन: डोलमेन महापाषाणकालीन स्थापत्य के एक विशिष्ट प्रकार के शवाधान कक्ष हैं, जिनका निर्माण विशाल एवं समतल शिलाखंडों से किया जाता था। इस संरचना में सामान्यतः दो या दो से अधिक ऊर्ध्वाधर पाषाण स्तंभों के ऊपर क्षैतिज रूप से एक विशाल पाषाण (Capstone) को छत की भांति टिकाया जाता था, जिससे एक कक्षनुमा स्वरूप निर्मित होता था। ऐतिहासिक एवं पुरातात्विक दृष्टि से ये संरचनाएं दक्षिण भारतीय राज्यों, विशेष रूप से केरल, कर्नाटक और तमिलनाडु में व्यापक रूप से पाई गई हैं। ये स्मारक तत्कालीन समाज की उन्नत अभियांत्रिकी क्षमताओं को प्रदर्शित करते हैं।

संगोराः ये महापाषाणकालीन संस्कृति के अंतर्गत कब्रों के ऊपर शिलाखंडों अथवा पत्थरों के संचय से निर्मित स्मारकीय संरचनाएं हैं। इन संरचनाओं का निर्माण मुख्य रूप से अंत्येष्टि स्थल को चिह्नित करने और उसे सुरक्षा प्रदान करने हेतु किया जाता था। इसी श्रेणी में संगोरा वृत्त भी अत्यंत महत्वपूर्ण हैं, जिनमें शवाधान स्थल के चारों ओर पत्थरों को एक व्यवस्थित गोलाकार विन्यास में स्थापित किया जाता है। ये स्मारक विशेष रूप से दक्षिण भारत के लौह युगीन पुरातात्विक स्थलों में दृष्टिगोचर होते हैं।

मेनहिर: ये विशाल और ऊर्ध्वाधर खड़े पत्थरों के रूप में होते हैं, जिनका उपयोग संभवतः कब्रों के संकेतकों या आनुष्ठानिक स्मारकों के रूप में किया जाता था। ये मुख्य रूप से आंध्र प्रदेश और महाराष्ट्र के कुछ हिस्सों में पाए जाते हैं।

प्रस्तर वृत्त: यह पत्थरों की एक गोलाकार व्यवस्था है, जो सामान्यतः शवाधान (समाधि) या धार्मिक अनुष्ठानों से संबद्ध है। ये स्मारक महाराष्ट्र और कर्नाटक सहित दक्कन के पठार के विभिन्न हिस्सों में पाए जाते हैं।

सिस्ट: ये पाषाणनिर्मित लघु संदूकनुमा संरचनाएं हैं, जिनका प्रयोग लौहयुगीन अंत्येष्टि पद्धतियों में शवाधान कक्ष के रूप में किया जाता था। ये संरचनाएं प्रायः स्वतंत्र रूप से नहीं बनाई जाती थीं, बल्कि अन्य महापाषाणकालीन स्मारकों, जैसे डोलमेन और संगोरा वृत्त के साथ पाई जाती हैं, जो शवाधान की तत्कालीन जटिल वास्तुकला को दर्शाती हैं।

सारकोफेगी: ये शवाधान प्रथाओं में प्रयुक्त पत्थर के ताबूत हैं, जो तत्कालीन समाज की उन्नत शवाधान पद्धतियों को रेखांकित करते हैं। पुरातात्विक साक्ष्यों के रूप में ये स्मारक मुख्य रूप से आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु में पाए जाते हैं।

 

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