बोधिसत्व: यद्यपि बोधिसत्व की संकल्पना प्रारंभिक बौद्ध धर्म (थेरवाद या स्थविरवाद) से संबंधित है, तथापि इसे महायान संप्रदाय द्वारा अत्यधिक महत्व प्रदान किया गया। बोधिसत्व संस्कृत भाषा से संबद्ध शब्द है जिसका प्रयोग मूलतः ऐसे व्यक्ति के लिए किया जाता था जिसके भाग्य में भविष्य में बुद्ध बनना ही लिखा हो। हालांकि, स्थविरवादी परंपरा में इस शब्द का प्रयोग बुद्ध के पूर्वजन्मों के लिए किया जाता था, लेकिन महायान परंपरा में, बोधिसत्व को किसी ऐसे व्यक्ति के रूप में देखा जाने लगा, जो बुद्ध होने के लिए आत्मज्ञान (निर्वाण) की महत्वाकांक्षा रखता है। बुद्ध, जिन्होंने निर्वाण प्राप्त किया और फिर सांसारिकता से मुक्त हो गए, के विपरीत बोधिसत्वों ने अन्य लोगों को निर्वाण प्राप्त करने में सहायता करने हेतु अपने प्रबोधन या निर्वाण को स्थगित कर दिया और इसी संसार में रह गए। महायान परंपरा में अनेक बोधिसत्वों के अस्तित्वों को स्वीकार किया गया हैं, जिनमें से अवलोकितेश्वर या पद्मपाणि, मंजुश्री, वज्रपाणि, मैत्रेय, क्षितिगृह तथा अमिताभ प्रमुख हैं।
तीर्थंकर: जैन धर्म में ‘तीर्थंकर’ शब्द का प्रयोग धर्म के उन प्रतिपादकों के लिए किया जाता है, जो मनुष्य को मुक्ति का मार्ग दिखाने के लिए समय-समय पर धरती पर अवतरित होते रहे हैं। जैन परंपरा के अनुसार तीर्थंकर मानव जाति के कल्याण हेतु विभिन्न ब्रह्मांडीय कालावधियों, जिनमें पहला युग उत्सर्पिणी (विकास का युग) तथा दूसरा युग अवसर्पिणी (विनाश का युग) होता है, में जन्म लेते हैं और मनुष्यों को परम सत्य का ज्ञान कराते हैं। जैन धर्म में अब तक 24 तीर्थंकर—ऋषभदेव, अजितनाथ, संभवनाथ, अभिनंदननाथ, सुमतिनाथ, पद्मप्रभु, सुपार्श्वनाथ, चंद्रप्रभु, पुष्पदंत, शीतलनाथ, श्रेयांसनाथ, वासुपूज्यनाथ, विमलनाथ, अनंतनाथ, धर्मनाथ, शांतिनाथ, कुंथुनाथ, अरनाथ, मल्लिनाथ (स्त्री), मुनिसुव्रतनाथ, नमिनाथ, नेमिनाथ, पार्श्वनाथ तथा वर्द्धमान महावीर—हुए हैं।



