भूमि-छिद्र-विधान-न्याय प्राचीन भारत के नियमों/कानूनों का एक सिद्धांत है जो भूमि के स्वामित्व एवं अधिग्रहण से संबंधित है। इसका तात्पर्य है कि भूमि पर सबसे पहले जोतने वाले या उस पर काम करने वाले व्यक्ति का अधिकार होता था, चाहे उसका वास्तविक स्वामी कोई अन्य व्यक्ति ही क्यों न हो। यह सिद्धांत भूमि के उत्पादक उपयोग पर बल देता है, और उस व्यक्ति को प्राथमिकता/वरीयता प्रदान करता है जिसने उस ‘खाली’ या ‘अनुपयोगी’ भूमि को ‘उपयोगी’ बनाया है। परंतु यदि कोई व्यक्ति केवल अपने किसी मित्र या संबंधी के प्रतिनिधि के रूप में भूमि का अधिग्रहण करता था, तो यह सिद्धांत लागू नहीं होता और भूमि पर वास्तविक स्वामी का अधिकार बना रहता था।

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