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भारतीय उपमहाद्वीप में नवपाषाण काल की अवधि लगभग 7000–3000 ईसा पूर्व मानी जाती है। इस काल में मुख्यतः कुल्हाड़ी, बसूले, छेनी और चक्की जैसे घिसे और पॉलिश किए गए पत्थरों के औजारों/उपकरणों का प्रयोग किया जाता था। इसके अलावा, हाथ से या चाक पर बनाए गए मृदभांडों का प्रयोग भी बहुतायत में होता था। इस काल तक आते-आते लोगों ने पशुपालन और कृषि कार्य शुरू कर दिया था, जैसा कि बुर्जहोम (कश्मीर), चिरांद (बिहार) तथा दाओजली हडिंग (असम) जैसे नवपाषाणकालीन स्थलों से प्राप्त पॉलिशयुक्त कुल्हाड़ियां, मूसल और दरांती जैसे साक्ष्य, शिकार-संग्रहण आधारित अर्थव्यवस्था से ‘स्थायी कृषि’ एवं ‘खाद्य-उत्पादन’ की ओर हुए संक्रमण के प्रत्यक्ष प्रमाण हैं। ऐसे परिवर्तनों के फलस्वरूप धीरे-धीरे ग्राम व्यवस्था स्थापित होने लगी।

स्थायी बस्तियों के उद्भव एवं कृषि के विस्तार के फलस्वरूप लोग प्राप्त अधिशेष उत्पादन, पत्थर के उपकरणों, मृदभांडों, कृषि उत्पादों एवं आभूषणों आदि का आदान-प्रदान करने लगे और इस प्रकार इस काल में वस्तु-विनिमय (Barter System) प्रणाली का आरंभ हुआ।

नवपाषाण काल के पश्चात, ताम्रपाषाण काल (लगभग 3000-1000 ईसा पूर्व) में प्रस्तर उपकरणों के साथ-साथ तांबे के औजारों का प्रयोग भी शुरू हो गया, जिनमें कुल्हाड़ी, बाणाग्र, मछली पकड़ने के कांटे एवं छेनी शमिल थे। इसके अलावा, दैनंदिन प्रयोग में साधारणतया पत्थर के ब्लेड तथा सूक्ष्मपाषाणीय औजारों का इस्तेमाल किया जाता था। इस काल तक आते-आते चूंकि दक्कन, मालवा और राजस्थान जैसे क्षेत्रों में तांबा, अर्ध-कीमती पत्थरों (कार्नेलियन, एगेट आदि) तथा विशेष प्रकार के मृदभांडों, जैसे लाल-काले मृदभांड, का उत्पादन होने लगा था, इसलिए वस्तु-विनिमय प्रणाली ने व्यापार का रूप ले लिया, जिसने न केवल सामाजिक-आर्थिक संरचनाओं को सुदृढ़ किया, बल्कि आगामी नगरीय सभ्यताओं के व्यापक व्यापार एवं वाणिज्य हेतु एक सुदृढ़ आधारशिला भी रखी, और सांस्कृतिक प्रथाओं/परंपराओं का प्रसार किया। वास्तव में, यही तकनीकी एवं आर्थिक निरंतरता भारतीय उपमहाद्वीप में जटिल नगरीकरण के प्रादुर्भाव का मुख्य कारक बनी।

 

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