मौर्य सम्राट अशोक के राजकीय अभिलेख अशोक द्वारा प्रजा हित में जारी किए गए लेखों, जिनमें शिलालेख (लघु एवं वृहद्) स्तंभलेख (वृहद् एवं लघु) तथा गुहालेख शामिल हैं, को संदर्भित करते हैं। अब तक अशोक के लगभग 40 अभिलेख खोजे गए हैं, जिनमें भाब्रू, मानसहेरा, धौली, जौगढ़, सारनाथ, मास्की आदि में पाए गए अभिलेख उल्लेखनीय हैं। ये ऐतिहासिक साक्ष्य संपूर्ण भारतीय उपमहाद्वीप, जिसमें वर्तमान भारत, पाकिस्तान और नेपाल के भौगोलिक क्षेत्र समाहित हैं, में अवस्थित हैं। ये अभिलेख न केवल अशोक के धम्म के सिद्धांतों को स्पष्ट करते हैं, बल्कि मौर्यकालीन प्रशासनिक और राजनीतिक विस्तार के प्राथमिक स्रोत भी माने जाते हैं।
अशोक द्वारा अपने साम्राज्य की भाषाई विविधता के दृष्टिगत अपने संदेशों का व्यापक प्रसार करने हेतु शिलालेखों में एकाधिक भाषाओं और लिपियों का प्रयोग किया गया। परंतु उसके अधिकांश अभिलेख मागधी (पूर्वी प्राकृत) भाषा में उत्कीर्ण हैं जिनकी लिपि ब्राह्मी है। गंगा-यमुना बेसिन से लेकर धौली तक यही स्वरूप प्रमुख है। यद्यपि गिरनार के शिलालेखों में पश्चिमी प्राकृत, जो पालि के सदृश प्रतीत होती है, का प्रभाव है, इसके विपरीत मानसेहरा एवं शाहबाजगढ़ी में पाए गए अभिलेखों में खरोष्ठी लिपि, तक्षशिला एवं लघमान के अभिलेखों में अरामाइक, और कंधार में खोजे गए अभिलेखों में ग्रीक और अरामाइक लिपियों का प्रयोग देखने को मिलता है। इसके विपरीत, मास्की, सिद्धपुर और येर्रागुडी जैसे दक्षिण भारतीय स्थलों के साथ-साथ रूपनाथ एवं सांची के अभिलेखों में भाषाई संरचना मागधी के अनुरूप ही है।



