प्राचीन काल से पूर्व मध्यकाल तक, भारत में अग्रहारों, मठों एवं महाविहारों जैसे धार्मिक तथा आवासीय संस्थानों के तंत्र द्वारा शिक्षा को जारी रखना सुनिश्चित किया गया। अग्रहार—जो कि विद्वान ब्राह्मणों को प्रदत्त कर-मुक्त भूमि अनुदान थे—ग्रामीण स्तर पर, शिक्षा को कृषि एवं सामाजिक जीवन के साथ समन्वित कर वेदों, वेदांगों, विधि (कानून), व्याकरण, चिकित्सा और दर्शन जैसे विषयों के अध्ययन हेतु शिक्षा के प्रमुख केंद्रों के रूप में कार्य करते थे।
प्राचीन आश्रमों एवं तपोवनों की परंपरा से उद्भूत मठ, कालांतर में विभिन्न दार्शनिक संप्रदायों का प्रतिनिधित्व करने वाले सुसंगठित मठवासी संस्थानों के रूप में परिवर्तित हो गए। इन संस्थानों में तत्वमीमांसा के साथ-साथ जनप्रिय धार्मिक साहित्य का गहन प्रशिक्षण दिया जाता था, जो स्नातकों को विद्वान वर्ग एवं सामान्य जनमानस दोनों के साथ संवाद स्थापित करने में कुशल बनाता था। अनेक आचार्य परिव्राजक (भ्रमणशील गुरु) थे, जो सुदूर क्षेत्रों तक ज्ञान का प्रसार सुनिश्चित करते थे।
महाविहार, नालंदा और पाल राजवंश द्वारा स्थापित विक्रमशिला, ओदंतपुरी सोमपुरा जैसे प्रमुख बौद्ध मठ, आवासीय विश्वविद्यालयों के रूप में विकसित हुए। इन संस्थानों ने पारस्परिक रूप से संबद्ध एक शैक्षणिक तंत्र स्थापित किया, जिसने तर्कशास्त्र, दर्शन, आयुर्विज्ञान (चिकित्सा) और प्रशासनिक सिद्धांतों जैसे विभिन्न विषयों पर ज्ञानार्जन के लिए विदेशी विद्वानों तथा विद्यार्थियों को आकर्षित किया।



