‘सराय’ शब्द का तात्पर्य एक ऐसे विश्राम स्थल से है जहां यात्री विश्राम करने के लिए कुछ समय व्यतीत कर सकते हैं। मध्यकालीन भारत में शेरशाह सूरी द्वारा अपने शासनकाल (1540-45) में लोक कल्याण के उद्देश्य से सराय निर्माण का कार्य शुरू करवाया गया था, जिसके तहत प्रमुख सड़कों पर प्रत्येक चार मील के अंतराल पर एक सराय का निर्माण किया गया। ये सरायें साम्राज्य से गुजरने वाले यात्रियों, तीर्थयात्रियों और व्यापारियों को आश्रय, सुरक्षा और बुनियादी सुविधाएं प्रदान करती थीं। ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार, शेरशाह सूरी ने लगभग 1700 सरायों का निर्माण करवाया था, जिन्हें सुरक्षित और किलेबंद विश्रामगृह के रूप में वर्णित किया जा सकता है।
प्रत्येक सराय में एक मस्जिद और एक कुआं होता था तथा सराय की देखभाल की जिम्मेदारी स्थानीय शिकदार की होती थी, जिसका खर्च सराय को इस काम के लिए दी गई भूमि से पूरा किया जाता था। इसके अलावा, इन सरायों में हिंदुओं और मुसलमानों के लिए अलग-अलग व्यवस्था की गई थी। ये सरायें न केवल यात्रियों को विश्राम की सुविधा प्रदान करती थीं, अपितु सामाजिक एवं सांस्कृतिक विनिमय के केंद्र की भूमिका भी निभाती थीं, जहां यदा-कदा शैक्षणिक और धार्मिक सभाओं का आयोजन भी किया जाता था।
शेरशाह सूरी द्वारा स्थापित सरायें डाक-चौकियों के रूप में भी कार्य करती थीं। संदेशवाहकों की निरंतरता और तीव्र गति सुनिश्चित करने के उद्देश्य से प्रत्येक सराय में दो अश्वों की व्यवस्था की गई थी, जिससे सूचना के निर्बाध प्रवाह में सहायता प्राप्त होती थी। संपूर्ण पत्राचार एवं सूचना तंत्र का पर्यवेक्षण दरोगा-ए-डाक-चौकी द्वारा किया जाता था, जिसके अधीन बड़ी संख्या में संदेश लेखक और संदेशवाहक कार्य करते थे।



