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सामाजिक वर्गीकरण में पारंपरिक जाति समूहों (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य एवं शूद्र) के साथ, शासक वर्ग (यथा राजपूत, कुलीन वर्ग एवं जमींदार), धार्मिक अभिजात वर्ग (जैसे उलेमा) तथा उन्नतिशील वाणिज्यिक एवं व्यावसायिक वर्ग (व्यापारी, साहूकार एवं शिल्पकार) सम्मिलित थे। संयुक्त रूप से इन समूहों ने एक ऐसी जटिल सामाजिक संरचना का निर्माण किया जहां पुरातन वर्ण व्यवस्था के निरंतर जारी रहने के बावजूद, धार्मिक, सैन्य एवं आर्थिक शक्तियां परस्पर संबद्ध थीं।

शासक वर्ग: राजपूतों, जो कि स्वयं को क्षत्रिय मानते थे, ने मध्यकालीन भारत में योद्धाओं के उच्च वर्ग के रूप में अपना प्रभुत्व स्थापित किया। वे पश्चिमी भारत (मुख्यतः राजस्थान) और समीपवर्ती क्षेत्रों में विभिन्न रियासतों के शासक थे, जो अपने अदम्य पराक्रम, निष्ठा तथा जटिल जाति व्यवस्थाओं—यथा सूर्यवंशी, चंद्रवंशी एवं अग्निवंशी—के लिए प्रसिद्ध थे।

उलेमा: ये इस्लामिक धर्मशास्त्री एवं न्यायविद थे, जो न केवल धार्मिक मार्गदर्शन प्रदान करते थे, अपितु इस्लामी कानून (शरिया) की व्याख्या भी करते थे। प्रशासनिक पदों पर कार्य करते हुए इन्होंने शासकों तथा जन-सामान्य को वैचारिक रूप से अत्यधिक प्रभावित किया।

व्यापारी और पेशेवर वर्ग: इन व्यापारिक और पेशेवर वर्गों ने सुव्यवस्थित व्यापारिक तंत्रों (आंतरिक और बाह्य) के साथ काम करते हुए अर्थव्यवस्था को गतिशीलता प्रदान की। इन्होंने विभिन्न उद्योगों के संवर्धन में महत्वपूर्ण योगदान दिया। भारतीय व्यापारियों ने अपने नेतृत्व, सामूहिक विरोध (हड़तालों) तथा व्यापारिक तंत्रों के माध्यम से आर्थिक एवं स्थानीय राजनीति पर गहरा प्रभाव डाला। विरजी वोहरा, अब्दुल गफूर बोहरा, मलय चेट्टी एवं काशी विरन्ना जैसे कतिपय व्यापारी अत्यधिक समृद्ध थे, जो यूरोपीय व्यापारियों के समान सक्षम तथा सुदूरवर्ती क्षेत्रों एवं विदेशों तक सक्रिय थे। इन विविध समुदायों द्वारा निर्मित जटिल वाणिज्यिक संरचनाओं ने न केवल अंतर-क्षेत्रीय व्यापार की प्रभावकता या उपयोगिता सुनिश्चित की, बल्कि बदलती परिस्थितियों के प्रति बाजार के त्वरित प्रतिक्रिया तंत्र को भी सुदृढ़ किया।

 

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