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प्रारंभिक मध्यकालीन भारतीय उपमहाद्वीप में राज्य निर्माण की रीति इतिहासकारों के मध्य गहन विमर्श का विषय रही है। लगभग 600 से 1200 ईसवी के मध्य राजनीतिक प्रभुत्व की संगठित/सुनियोजित व्यवस्था को स्पष्ट करने हेतु विद्वानों ने विभिन्न उपागम प्रस्तावित किए हैं। इस परिचर्चा में तीन प्रमुख निर्वचनात्मक मॉडल प्रभावी हैं: सामंती मॉडल (Feudal Model), खंडीय मॉडल (Segmentary Model), और समन्वयी मॉडल (Integrative Model)। ये मॉडल शक्ति संरचना, क्षेत्रीय गतिशीलता और सामाजिक संबंधों की भिन्न-भिन्न व्याख्याएं प्रस्तुत करते हैं।

(i) सामंती मॉडल: रामशरण शर्मा द्वारा प्रमुखता से प्रतिपादित सामंती मॉडल, प्रारंभिक मध्यकालीन राजव्यवस्था को 'भारतीय सामंतवाद' की संकल्पना के माध्यम से विश्लेषित करता है। इस विचार के अनुसार, ब्राह्मणों एवं अधिकारियों को दिए गए व्यापक भूमि-अनुदानों ने राजनीतिक विकेंद्रीकरण को बढ़ावा दिया। इसके परिणामस्वरूप स्वामियों एवं कृषकों के मध्य स्पष्ट द्विध्रुवीय संबंधों पर आधारित एक पदानुक्रमिक व्यवस्था का निर्माण हुआ जिससे सामंतों जैसे शक्तिशाली मध्यस्थों या बिचौलियों का उदय हुआ। यह मॉडल व्यापार के ह्रास, आत्मनिर्भर ग्रामीण अर्थव्यवस्थाओं के विकास और केंद्रीय सत्ता के विखंडन पर बल देता है। मार्क्सवादी इतिहास लेखन से प्रभावित यह दृष्टिकोण आर्थिक संबंधों को राजनीतिक संरचना के मूलाधार के रूप में रेखांकित करता है।

(ii) खंडीय मॉडल: खंडीय मॉडल (Segmentary Model), बर्टन स्टीन द्वारा विकसित, विशेष रूप से दक्षिण भारत एवं चोल साम्राज्य के संदर्भ में, प्रशासन के केंद्रीकरण की अवधारणा को चुनौती देता है। इस मॉडल के अनुसार, राजा की संप्रभुता केवल औपचारिक थी, जबकि वास्तविक राजनीतिक शक्ति नाडुओं, स्थानीय सरदारों और ग्राम सभाओं जैसी स्वायत्त इकाइयों के मध्य विभाजित थी। शासन का संचालन कठोर क्षेत्रीय नियंत्रण के बजाय समान इकाइयों की एक पिरामिडीय आवृत्ति के माध्यम से होता था।

(iii) समन्वयी मॉडल: बी.डी. चट्टोपाध्याय द्वारा प्रतिपादित समन्वयी मॉडल (Integrative Model) राजनीतिक विखंडन के विचार की आलोचना करता है। यह उन दीर्घकालिक प्रक्रियाओं पर बल देता है जिनके माध्यम से स्थानीय सरकारों, सामाजिक समूहों एवं सांस्कृतिक परंपराओं के समन्वय द्वारा राज्यों का विस्तार हुआ। क्षेत्रीय गतिशीलता तथा सांस्कृतिक एकीकरण को केंद्र में रखते हुए, यह मॉडल प्रारंभिक मध्यकालीन राज्य निर्माण को 'पतन' के स्थान पर एक सतत विकासशील एवं अनुकूलनशील प्रक्रिया के रूप में प्रस्तुत करता है।

 

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