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भौमकर राजवंश (आठवीं- दसवीं शताब्दी) एवं सोमवंशी (दसवीं शताब्दी) प्राचीन उड़ीसा के सर्वाधिक प्रभावशाली राजवंशों में से थे। शासन का सूत्रपात भौमकरों द्वारा किया गया, जो मूलतः बौद्ध धर्मावलंबी थे, किंतु कालांतर में उनका झुकाव शैव मत की ओर हो गया। भौमकरों ने उस पृष्ठभूमि का निर्माण किया जिस पर सोमवंशियों का अभ्युदय हुआ। दक्षिण कोसल से उद्भव करने वाले सोमवंशियों, जिन्होंने अंततः संपूर्ण उड़ीसा का एकीकरण किया, को विशेष रूप से भव्य मंदिर स्थापत्य एवं सांस्कृतिक पुनर्जागरण के लिए जाना जाता है। शिवकरदेव प्रथम (भौमकर) एवं ययाति केसरी (सोमवंशी) प्रतापी शासक थे। भौमकरों के पश्चात सोमवंशियों का सत्तासीन होना, जो प्रायः सैन्य संघर्षों अथवा वैवाहिक संधियों के माध्यम से संपन्न हुआ, उड़ीसा में राजनीतिक वर्चस्व एवं सांस्कृतिक परिदृश्य में एक महत्वपूर्ण संक्रमण का प्रतीक था।

भौमकर वंश (लगभग आठवीं–दसवीं शताब्दी)

उत्पत्ति एवं धर्म: माना जाता है कि इस वंश का उद्भव असम से हुआ था। इनके प्रारंभिक शासक बौद्ध धर्मावलंबी थे, किंतु कालांतर में इन्होंने शैव मत को अपना लिया। इन्होंने जाजपुर (विराज) को केंद्र बनाकर तटीय उड़ीसा पर शासन किया।

प्रमुख शासक: क्षेमकरदेव (संस्थापक), शिवकरदेव प्रथम (राज्य विस्तारक), शुभाकरदेव प्रथम, और त्रिभुवन महादेवी प्रथम जैसी उल्लेखनीय महिला शासिकाएं।

सांस्कृतिक प्रभाव: भौमकरों ने बौद्ध धर्म को संरक्षण प्रदान किया, किंतु साथ ही ब्राह्मणवादी वर्ण-व्यवस्था का भी समर्थन किया; इन्होंने शिक्षा एवं ज्ञान को प्रोत्साहित किया तथा चीन के साथ सांस्कृतिक संबंध भी स्थापित किए।

पतन: आंतरिक संघर्षों तथा बाह्य दबावों के कारण भौमकर वंश कमजोर पड़ गया और अंततः उसका स्थान भंजों तथा सोमवंशियों ने ले लिया।

सोमवंशी वंश (लगभग दसवीं शताब्दी के पश्चात)

उत्पत्ति एवं राजधानी: इस राजवंश का उद्भव दक्षिण कोसल क्षेत्र (आधुनिक छत्तीसगढ़–ओडिशा सीमा क्षेत्र) से माना जाता है। उनकी प्रारंभिक राजधानियां सिरपुर तथा सुवर्णपुर (वर्तमान सोनपुर) थीं।

सत्ता का अभ्युदय: सोमवंशियों ने उड़ीसा तक अपने साम्राज्य का विस्तार किया। यह विस्तार संभवतः भौमकर राजवंश के साथ सैन्य संघर्ष अथवा वैवाहिक संबंधों (जैसे जनमेजय प्रथम की पुत्री का विवाह एक भौम राजा से होना) के माध्यम से संपन्न हुआ।

प्रमुख शासक: जनमेजय प्रथम तथा ययाति केसरी (जिन्हें ब्राह्मणों को आमंत्रित करने और जाजपुर में दशाश्वमेध घाट के निर्माण का श्रेय दिया जाता है) थे।

सांस्कृतिक महत्व: सोमवंशी प्रमुख मंदिर निर्माता थे (उदाहरण: लिंगराज मंदिर)। उन्होंने उड़ीसा के सांस्कृतिक विकास में महत्वपूर्ण योगदान देते हुए ब्राह्मणों को संरक्षण प्रदान किया।

संक्रमण: इनका शासन एक सशक्त शैव साम्राज्य की ओर संक्रमण का प्रतीक था, जो अंततः गंग राजवंश के उदय से पूर्व अपने चरमोत्कर्ष पर पहुंच गया।

संबंध एवं सत्ता परिवर्तन

सोमवंशियों ने प्रारंभ में भौमकर क्षेत्रों में अपना विस्तार करते हुए अंततः भौमकरों का स्थान ले लिया।

इन दोनों राजवंशों के शासनकाल में बौद्ध प्रभाव (भौमकर) से प्रबल शैववाद तथा ब्राह्मणवादी संस्कृति (सोमवंशी) की ओर स्पष्ट परिवर्तन परिलक्षित होता है।

 

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