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मध्यकालीन भारतीय इतिहास का पुनर्निर्माण साहित्यिक कृतियों, दस्तावेजी एवं पुरालेखी (Archival) स्रोतों के एक व्यापक एवं वैविध्यपूर्ण विषय पर आधारित है। प्राचीन भारत के विपरीत, जहां पुरातत्व एवं पुरालेखशास्त्र (Epigraphy) की प्रधानता है, मध्यकालीन युग राजकीय, धार्मिक तथा प्रशासनिक संरक्षण के अंतर्गत रचित प्रचुर पाठ्य-सामग्रियों से समृद्ध है। ये स्रोत न केवल तत्कालीन राजनीतिक घटनाक्रमों, अपितु सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक एवं बौद्धिक जीवन के बहुआयामी परिदृश्यों को भी प्रतिबिंबित करते हैं।

इन स्रोतों में संस्कृत एवं क्षेत्रीय भाषाओं के ग्रंथों के अतिरिक्त, दफ़्तरखानों में संरक्षित राजकीय अभिलेख, 'फ़रमान' (शाही आदेश) तथा 'बहियों', 'पोथियों' एवं 'अखबारात' जैसे प्रशासनिक-सह-व्यावसायिक दस्तावेजों की महत्वपूर्ण भूमिका है। सामूहिक रूप से, ये साक्ष्य इतिहासकारों को केवल 'वंशवादी आख्यानों' (Dynastic Narratives) के सीमित दायरे से बाहर निकलकर, मध्यकालीन भारतीय राज्य एवं समाज की जटिल कार्यप्रणाली का सूक्ष्म एवं आलोचनात्मक विश्लेषण करने में सक्षम बनाते हैं।

साहित्यिक स्रोत—संस्कृत और क्षेत्रीय भाषाएं: सल्तनत एवं मुगल काल में फारसी भाषा की प्रधानता के बावजूद, मध्यकालीन भारत में संस्कृत एवं क्षेत्रीय भाषाएं बौद्धिक विमर्श के जीवंत माध्यम के रूप में अक्षुण्ण रहीं। इस युग में रचित संस्कृत कृतियों के अंतर्गत शासकों के जीवन चरित, वंशावलियां, काव्य, प्रशस्ति एवं धार्मिक साहित्य सम्मिलित हैं, जो प्रचुर ऐतिहासिक साक्ष्यों को समाहित किए हुए हैं। ऐतिहासिक चेतना के दृष्टिकोण से कल्हण की राजतरंगिणी  एक विशिष्ट कृति है, जो कालक्रम, कार्य-कारण संबंध तथा पूर्ववर्ती स्रोतों के आलोचनात्मक विश्लेषण का उत्कृष्ट समन्वय प्रस्तुत करती है। इसी परंपरा को आगे बढ़ाते हुए जोनराज, श्रीवर एवं शुक के क्रमिक विवरण पंद्रहवीं शताब्दी तक कश्मीर के राजनीतिक इतिहास की निरंतरता प्रदान करते हैं। इसके अतिरिक्त, गंगादेवी की मधुराविजयम  एवं विश्वनाथ नयनी (या सियनपति) की रायावाचकमु  जैसी कृतियां न केवल राजनीतिक घटनाक्रमों, अपितु तत्कालीन दरबारी संस्कृति एवं सामाजिक-धार्मिक जीवन के विषय में महत्वपूर्ण जानकारी प्रदान करती हैं।

मध्यकाल के विभिन्न क्षेत्रों में संस्कृत के दरबारी काव्य राजाओं एवं राजवंशों के महिमामंडन के प्रमुख साधन बने, जिसका स्पष्ट उदाहरण जयानक की पृथ्वीराज विजय एवं बिल्हण की विक्रमांकदेवचरित  जैसी कृतियों में मिलता है। यद्यपि ये रचनाएं अतिशयोक्तिपूर्ण वर्णन एवं साहित्यिक रूढ़ियों से ओत-प्रोत हैं, तथापि एक तर्कसंगत आलोचनात्मक विश्लेषण के माध्यम से इतिहासकार इनसे समकालीन राजनीतिक घटनाक्रमों, प्रशासनिक ढांचे तथा 'राजत्व के वैचारिक आधार' का प्रभावी निष्कर्ष निकालने में सफल हुए हैं। इसके अतिरिक्त, इस काल के धर्मशास्त्रीय एवं स्मृतिपरक ग्रंथ न केवल परिवर्तित होते सामाजिक प्रतिमानों एवं जातिगत समीकरणों को रेखांकित करते हैं, अपितु भूमि अनुदान की जटिलताओं एवं तत्कालीन धार्मिक आचार-संहिता को समझने हेतु प्रमाणिक स्रोत के रूप में कार्य करते हैं।

मध्यकालीन भारत में संस्कृत के समानांतर क्षेत्रीय भाषाओं का प्रादुर्भाव ऐतिहासिक स्मृति के संवर्धन में एक युगांतरकारी घटना थी। यह प्रक्रिया अनिवार्यतः क्षेत्रीय राजनीतिक शक्तियों के सुदृढ़ीकरण एवं भक्ति आंदोलन की व्यापकता के साथ अंतर्संबंधित थी। यद्यपि दिल्ली सल्तनत एवं मुगल काल में फारसी को 'राजकीय भाषा' का दर्जा प्राप्त था, तथापि तमिल, तेलुगु, कन्नड़, मराठी, बांग्ला, ब्रज, अवधी एवं राजस्थानी जैसी भाषाओं ने सांस्कृतिक अभिव्यक्ति के सशक्त माध्यम के रूप में अपनी उपस्थिति दर्ज की। तमिल का कोयिल ओलुगु  (मंदिर वृत्तांत), मराठी बखर, राजस्थानी ख्यात  एवं बांग्ला मंगल-काव्य  जैसे साहित्य न केवल स्थानीय सत्ता संघर्षों का विवरण प्रदान करते हैं, अपितु ग्रामीण अर्थव्यवस्था, सामाजिक स्तरीकरण एवं समकालीन लोक-संस्कृति के विश्लेषण हेतु सूक्ष्म ऐतिहासिक आधार प्रस्तुत करते हैं।

यह साहित्य न केवल जन-संस्कृति एवं भक्ति आंदोलनों के विश्लेषण हेतु अपरिहार्य हैं, अपितु उन सामाजिक-राजनीतिक सूक्ष्मांतरों को भी उद्घाटित करता है, जिनकी प्रायः आधिकारिक फारसी दरबारी इतिहासों में उपेक्षा की गई है। कबीर, मीराबाई, चैतन्य, तुलसीदास एवं नामदेव जैसे संतों के भक्ति साहित्य ने न केवल परिवर्तित होती धार्मिक चेतना को स्वर दिया, बल्कि जातिगत समीकरणों एवं सामाजिक विसंगतियों पर तीक्ष्ण आलोचनात्मक प्रहार भी किया। इसके अतिरिक्त, क्षेत्रीय राजवंशीय इतिहास, मंदिर अभिलेख एवं लोक-गाथाएं भूमि हस्तांतरण की प्रकृति, सामरिक कौशल, वंशावली परंपराओं तथा स्थानीय प्रशासनिक प्रणालियों के संरक्षण एवं पुनर्निर्माण में सहायक सिद्ध होते हैं।

दफ्तरखाना: दफ्तरखाने मध्यकालीन भारतीय राज्यों, विशेष रूप से मुगलों और उत्तरवर्ती क्षेत्रीय राज्यों जैसे कि दक्कन के साम्राज्यों और मराठों द्वारा राजकीय अभिलेखों के लिए बनाए गए आधिकारिक अभिलेखागार थे। इन अभिलेखागारों में राजस्व प्रशासन, सैन्य संगठन, न्यायिक कार्यवाही, राजनयिक पत्राचार और राजकीय आदेशों से संबंधित महत्वपूर्ण दस्तावेजों को संरक्षित किया जाता था।

मुगल प्रशासन के अधीन, विशेष रूप से अकबर के शासनकाल के दौरान, विकसित अत्यधिक केंद्रीकृत नौकरशाही के कारण अभिलेखों की देखरेख की प्रक्रिया अत्यंत व्यवस्थित एवं संस्थागत हो गई। जहां दीवान का विभाग राजस्व संबंधी अभिलेखों का प्रबंधन करता था, वहीं अन्य विभागों द्वारा जागीरों, मनसबों एवं राजकीय व्यय से संबंधित दस्तावेजों को संरक्षित किया जाता था। कालक्रम में, इनमें से अनेक अभिलेख महत्वपूर्ण संस्थागत अभिलेखागारों जैसे कि भारतीय राष्ट्रीय अभिलेखागार (नई दिल्ली), राजस्थान राज्य अभिलेखागार (बीकानेर) एवं महाराष्ट्र राज्य अभिलेखागार का आधारभूत हिस्सा बने।

दफ्तरखाने में संरक्षित अभिलेख मध्यकालीन राज्य की वास्तविक कार्यप्रणाली को समझने के लिए अमूल्य हैं, क्योंकि वे वर्णनात्मक विवरणों के स्थान पर मात्रात्मक एवं प्रशासनिक डेटा प्रदान करते हैं। यद्यपि युद्धों, देख-रेख न होने और औपनिवेशिक व्यवधानों के कारण वर्तमान में सभी अभिलेख मौजूद नहीं हैं, और यहां तक कि अभी भी कई दस्तावेज अप्रकाशित हैं।

फरमान: 'फरमान' मध्यकालीन भारतीय इतिहास के सर्वाधिक प्रामाणिक प्राथमिक स्रोतों में से हैं, क्योंकि वे प्रत्यक्ष रूप से राजकीय नीति और शासकों के उद्देश्यों के बारे में बतलाते हैं, जो सुल्तानों या मुगल बादशाहों द्वारा जारी किए गए शाही आदेशों में निहित होते थे, जिनमें नियुक्तियां, राजस्व अनुदान, करों में छूट, भूमि अधिकारों की पुष्टि, धार्मिक बंदोबस्त (मदद-ए-माश) और राजनयिक निर्देश शामिल थे। उदाहरणस्वरूप, धार्मिक अनुदानों पर अकबर के फरमान उसकी सहिष्णुता की नीति को स्पष्ट करते हैं, जबकि औरंगजेब के फरमान मुगल शासन प्रणाली में निरंतरता एवं परिवर्तनों, दोनों को उजागर करते हैं। मराठों सहित क्षेत्रीय शासकों ने भी, विशेष रूप से राजस्व एवं प्रशासन के विषयों में, फरमान (जिन्हें अकसर 'राजपत्र' या 'सनद' कहा जाता था) जारी किए। यूरोपीय व्यापारिक कंपनियों को जारी किए गए फरमान, भारत में यूरोपीय वाणिज्यिक गतिविधि के प्रारंभिक इतिहास के पुनर्निर्माण के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।

बहियां, पोथियां और अखबारात: बहियां एवं पोथियां मध्यकालीन भारत में व्यापारियों, धार्मिक संस्थाओं, महाजनों एवं स्थानीय अधिकारियों द्वारा अनुरक्षित सांस्थानिक अभिलेख एवं पांडुलिपियां थीं। विशेष रूप से उत्तर एवं पश्चिमी भारत (जैसे राजस्थान एवं गुजरात) में प्रचलित बहियों में वाणिज्यिक लेन-देन, ऋण-पत्रों, भूमि हस्तांतरण, राजस्व संवितरण एवं वंशावलियों का विस्तृत विवरण अंकित होता था। ये स्रोत मध्यकालीन भारत के आर्थिक एवं सामाजिक पुनर्निर्माण हेतु अपरिहार्य हैं, क्योंकि ये न केवल बाजारों की वास्तविक कार्यप्रणाली और साख प्रणालियों को स्पष्ट करते हैं, अपितु तत्कालीन व्यापारिक संघों एवं सामाजिक गतिशीलता के सूक्ष्म-इतिहास (स्थानीय इतिहास, जैसा कि इसका विषय प्रायः एक ही क्षेत्र तक सीमित होता है।) को भी उजागर करते हैं।

पोथियां, जो मूलतः धार्मिक अथवा अर्ध-ऐतिहासिक पांडुलिपियां होती थीं, वंशावलियों, स्थानीय परंपराओं तथा शासकों एवं संतों के वृत्तांतों के संरक्षण का प्रमुख माध्यम रही हैं। यद्यपि इनमें निहित विवरणों की प्रकृति प्रायः मिथकीय अथवा आख्यानात्मक होती है, तथापि एक तर्कसंगत आलोचनात्मक विश्लेषण के माध्यम से ये मध्यकालीन भारत के क्षेत्रीय परिदृश्य एवं स्थानीय सांस्कृतिक अस्मिता को समझने हेतु अमूल्य ऐतिहासिक साक्ष्य प्रस्तुत करती हैं।

अखबारात दैनिक अथवा सामयिक सूचना-प्रतिवेदन थे, जिन्हें वाकिया नवीस  जैसे स्थानीय अधिकारियों द्वारा, विशेष रूप से मुगल प्रशासनिक व्यवस्था के अंतर्गत, शाही दरबार में प्रेषित किया जाता था। ये प्रतिवेदन दरबारी गतिविधियों, प्रांतीय प्रशासन, सैन्य अभियानों, बाजार भावों, प्राकृतिक आपदाओं एवं लोक-प्रतिक्रियाओं का विस्तृत संकलन प्रस्तुत करते थे। वस्तुतः, अखबारात प्रणाली एक अत्यंत उन्नत 'आसूचना एवं सूचना तंत्र' के रूप में सक्रिय थी, जो बादशाह को साम्राज्य के सुदूर क्षेत्रों पर प्रभावी नियंत्रण रखने में सक्षम बनाती थी। आधुनिक इतिहासकारों हेतु अखबारात की उपयोगिता इनके 'निकट-समकालीन' स्वरूप में निहित है, जो अबुल फजल या बदायूंनी जैसे उत्तरवर्ती दरबारी इतिहासकारों के आधिकारिक वृत्तांतों के आलोचनात्मक सत्यापन, पूरक एवं संशोधन हेतु विश्वसनीय प्राथमिक साक्ष्य प्रदान करते हैं।

 

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