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जनाना प्रथा, महिलाओं को घर के एक निर्दिष्ट आंतरिक दायरे में पृथक अथवा सामाजिक अलगाव में रखने को संदर्भित करता है। यह प्रथा परिवार के सम्मान, शालीनता और लैंगिक पृथक्करण की अवधारणाओं पर आधारित थी। जनाना  शब्द की उत्पत्ति फारसी भाषा के नान  शब्द से हुई है, जिसका शाब्दिक अर्थ है— स्त्रियों से संबंधित। यह पर्दा प्रथा से विकसित हुई और तेरहवीं शताब्दी के बाद भारत में व्यापक रूप से इसका प्रसार हुआ, जिससे मुस्लिम एवं हिंदू—दोनों ही समुदायों की सामाजिक संरचना प्रभावित हुई। यद्यपि इस प्रथा ने महिलाओं की स्वतंत्रता को प्रतिबंधित किया, तथापि यह शिक्षा, सांस्कृतिक आदान-प्रदान और आपसी एकजुटता का एक केंद्र भी बना। उन्नीसवीं शताब्दी में, अलेक्जेंडर डफ जैसे समाज सुधारकों ने जनाना शिक्षा को प्रोत्साहित किया, जिससे महिलाओं को सामाजिक अलगाव की स्थिति में भी शिक्षा प्राप्त करने का अवसर प्राप्त हुआ।

देवदासी प्रथा पूर्व-मध्यकालीन भारत, विशेषकर नौवीं शताब्दी के बाद, की एक महत्वपूर्ण धार्मिक व्यवस्था थी। देवदासियां वे स्त्रियां थीं जो मंदिर के आराध्य देवताओं को समर्पित होती थीं और धार्मिक क्रियाओं, नृत्य एवं संगीत के माध्यम से अपनी सेवाएं प्रदान करती थीं। उन्हें ‘ईश्वर की सेविका’ के रूप में जाना जाता था। ये स्त्रियां प्रमुख ब्राह्मणवादी मंदिरों से संबद्ध थीं और पूजा-अर्चना एवं धार्मिक शोभायात्राओं में इनकी महत्वपूर्ण भूमिका होती थी। जहां प्रारंभिक काल में देवदासियों को समाज में प्रतिष्ठा प्राप्त थी और उन्होंने भरतनाट्यम एवं ओडिसी जैसी शास्त्रीय कलाओं के संरक्षण में अमूल्य योगदान दिया, वहीं कालांतर में इस व्यवस्था के संस्थागत ढांचे में गिरावट आने लगी। समय के साथ, धार्मिक प्रतिबंधों की आड़ में इनका शोषण किया जाने लगा और कई देवदासियों को उनके मौलिक अधिकारों से भी वंचित कर दिया गया। इस प्रकार, इतिहासकारों का एक वर्ग जहां देवदासियों को 'सांस्कृतिक एवं आनुष्ठानिक विशेषज्ञ' के रूप में देखता है, वहीं दूसरा वर्ग इस तथ्य पर बल देता है कि कैसे धार्मिक प्रतिबंधों ने क्रमिक रूप से व्यवस्था के मूल आध्यात्मिक उद्देश्य परिवर्तित करके इसमें अनाचार को बढ़ावा दिया।

 

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