1699 ईसवी में बैसाखी के अवसर पर गुरु गोबिंद सिंह द्वारा आनंदपुर साहिब में खालसा की स्थापना की गई थी। अरबी शब्द खालिस (अर्थात 'शुद्ध') से व्युत्पन्न 'खालसा' शब्द अमृत संस्कार (अमृत संचार) के माध्यम से दीक्षित, प्रतिबद्ध और अनुशासित सिखों के समुदाय का प्रतिनिधित्व करता है। खालसा का गठन सिख इतिहास में एक अत्यंत निर्णायक मोड़ सिद्ध हुआ, जिसने धार्मिक अधिकारों, सामुदायिक पहचान तथा नैतिक मूल्यों के मापदंडों को पुनः परिभाषित किया।
सिख परंपरा के अनुसार, गुरु गोबिंद सिंह ने स्वयंसेवकों से 'वाहेगुरु' के प्रति आत्म-बलिदान हेतु तत्पर रहने का आह्वान किया। इस आह्वान के उत्तर में पांच व्यक्ति सामने आए, जो सर्वोच्च निष्ठा एवं निस्वार्थ सेवा के प्रतिमान बने। इन्हें पंज प्यारे (पांच प्रिय) की संज्ञा दी गई। उन्हें अमृत, जिसे जल एवं शर्करा के मिश्रण को खंड या खंडा (द्वि-धारी तलवार)—साहस, समरसता एवं आध्यात्मिक शक्ति का प्रतीक—से मथकर तैयार किया गया था, से दीक्षित किया गया। स्वयं गुरु गोबिंद सिंह एवं उनकी पत्नी ने भी यह दीक्षा ग्रहण की थी, जो गुरु तथा संगत (समुदाय) के मध्य समानता के सिद्धांत का संदेश देता है।
गुरु गोबिंद सिंह ने यह आदेश दिया कि समस्त दीक्षित पुरुष सिंह (शेर) एवं महिलाएं कौर (राजकुमारी) की उपाधि धारण करेंगे, जिसका उद्देश्य जातिगत विभेद एवं सामाजिक पदानुक्रम का उन्मूलन करना था। खालसा की सदस्यता हेतु एक कठोर आचार संहिता का अनुपालन अनिवार्य था, जिसमें 'पंच ककार'—केश, कड़ा, कंघा, कछैरा (कच्छा) एवं कृपाण—धारण करना शामिल था। ये पांचों प्रतीक अनुशासन, अटूट श्रद्धा और नैतिक उत्तरदायित्व के प्रतीक थे। इस प्रकार, खालसा न केवल एक आध्यात्मिक भ्रातृत्व का प्रतीक था, बल्कि न्याय एवं धर्मपरायणता के प्रति समर्पित एक सामूहिक शक्ति भी था।



