जंगम शब्द भगवान शिव के अनुयायियों, शैव मत के एक विशेष संप्रदाय के संन्यासियों तथा पुजारियों, को संदर्भित करता है। ‘जंगम’ का तात्पर्य ‘गतिशील लिंग’ है और यह उन लोगों का प्रतीक है जो एक स्थान से अन्य स्थान पर भ्रमण करते और लोगों को धार्मिक उपदेश/शिक्षा देते हैं। ये हिंदुओं की पारंपरिक जाति व्यवस्था का हिस्सा नहीं हैं, लेकिन इन्हें वीरशैव संप्रदाय में उच्च कोटि का ब्राह्मण माना जाता है। मूल रूप से ये वैदिककालीन शैव ब्राह्मण थे तथा बारहवीं शताब्दी में लिंगायत मत के पुजारी बन गए। उनका दावा है कि इनकी उत्पत्ति धार्मिक उपदेशों का प्रचार तथा धार्मिक संस्कार संबंधी अनुष्ठान करने हेतु शिव के शरीर से हुई है। शासकों के पुजारी एवं सलाहकारों के रूप में कार्य करने और अकबर, जहांगीर तथा औरंगजेब जैसे शासकों से भू-अनुदान प्राप्त करने के कारण भारत के इतिहास में जंगमों का अत्यधिक प्रभाव रहा है।
जंगम अपने गले में एक इष्टलिंग (शिव के प्रतीकस्वरूप चांदी के संपुट में रखा शिवलिंग) धारण करते और प्रतिदिन उसकी पूजा करते हैं। वे शुद्ध शाकाहारी भोजन ग्रहण करते तथा विवाह एवं अंतिम संस्कार जैसे अनुष्ठान संपन्न करते हैं। वे जंगम ध्यान (अपनी बाहरी अस्तित्व पर ध्यान केंद्रित करने की एक तकनीक) का अभ्यास करते हैं। उन्हें उनके धार्मिक नृत्यों—जैसे कि जंगम नृत्य, वीरगासे नृत्य, और बुर्रा कथा, जिनमें शिव-पार्वती की कथाओं का वर्णन किया जाता है—एवं संगीत के लिए जाना जाता है। वे शिवरात्रि, दीपावली और उगादी/उगाड़ी जैसे त्योहार मनाते हैं।
यद्यपि जंगम समुदाय संपूर्ण भारत में बसा हुआ है, तथापि इनकी अधिकांश आबादी कर्नाटक, महाराष्ट्र, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश तथा तमिलनाडु में निवास करती है। वे नेपाल में भी रहते हैं। इनके द्वारा उत्तर प्रदेश तथा नेपाल जैसे स्थानों पर मठ स्थापित किए गए। भारत के विभिन्न प्रदेशों में इन्हें अलग-अलग नामों से जाना जाता है; जैसे—मध्य प्रदेश में जंगम अय्या, हरियाणा में जंगम जोगी, और तमिलनाडु तथा केरल में जंगम वीरशैव पंडारम।



