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हुंडियां भारतीय उपमहाद्वीप में उद्भूत वे महत्वपूर्ण वित्तीय लिखत (Financial Instruments) थीं, जिन्हें पूर्व-आधुनिक एवं प्रारंभिक आधुनिक अर्थव्यवस्थाओं में व्यापार एवं साख की प्रक्रियाओं को सुगम बनाने के उद्देश्य से शुरू किया गया था। ये स्वदेशी बैंकिंग तथा व्यापारिक तंत्र का अभिन्न अंग बन गईं, जिनका उपयोग व्यापारियों, साहूकारों एवं बैंकरों द्वारा व्यापक स्तर पर किया जाता था। हुंडियां धन के सुरक्षित अंतरण हेतु प्रेषण लिखतों (Remittance Instruments) तथा ऋण की स्वीकृति अथवा साख लिखतों के रूप में, और वाणिज्यिक लेन-देन में विनिमय पत्र (Bills of Exchange) के रूप में बहु-आयामी उद्देश्यों की पूर्ति करती थीं।

तकनीकी रूप से, हुंडी किसी व्यक्ति द्वारा किसी अन्य व्यक्ति को संबोधित एक शर्त-रहित लिखित आज्ञप्ति थी, जिसमें निर्दिष्ट व्यक्ति अथवा धारक को एक निश्चित धनराशि के भुगतान का निर्देश निहित होता था। यद्यपि इनकी तुलना विनिमय पत्रों से की जाती है, तथापि कार्यात्मक रूप से ये स्वदेशी बैंकरों द्वारा जारी किए गए चेक की तरह कार्य करती थीं। हालांकि एक अनौपचारिक वित्तीय तंत्र का घटक होने के कारण हुंडियों को कोई वैधानिक मान्यता प्राप्त नहीं थी; लेकिन इसके बावजूद, अपनी अत्यधिक विश्वसनीयता के कारण इन हुंड़ियों ने सुदूर व्यापारिक संबंधों एवं भारत के वाणिज्यिक तंत्र को सुदृढ़ करने में निर्णायक भूमिका निभाई।

 

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