प्राचीन काल से ही ग्रामीण अर्थव्यवस्था भारतीय समाज के आधारभूत स्तंभ के रूप में विद्यमान रही है। सदियों तक भारतीय ग्राम अपेक्षाकृत स्वायत्त एवं आत्मनिर्भर आर्थिक इकाइयों के रूप में क्रियाशील रहे, जहां कृषि, शिल्प, सेवाओं एवं स्थानीय विनिमय का एक सुदृढ़ समन्वय था। कृषि उत्पादन इस व्यवस्था के केंद्र में था, जबकि भू-संबंधों, राजस्व की मांगों एवं साख प्रणालियों ने कृषकों को सामाजिक-आर्थिक रूप से प्रभावित किया। कृषि ऋणों के औपचारिक एवं अनौपचारिक स्रोतों ने एक ओर कृषि के विस्तार में सहायक की भूमिका निभाई, तो वहीं दूसरी ओर ये ऋण कृषक ऋणग्रस्तता के एक प्रमुख कारक के रूप में भी उभरे। यह प्रवृत्ति विशेष रूप से मध्यकाल में और अधिक गहन हो गई, जिससे ग्रामीण समाज में आर्थिक विषमता एवं शोषण के नए आयाम स्थापित हुए।
सल्तनत काल में ग्रामीण अर्थव्यवस्था एक केंद्रीकृत राजस्व तंत्र के साथ घनिष्ठ रूप से एकीकृत हुई। राज्य द्वारा भू-राजस्व की मांग नकद अथवा वस्तु के रूप में किए जाने से ग्रामीण अर्थव्यवस्था का मुद्रीकरण हुआ, जिसने कृषकों को अनिवार्य रूप से बाजार की शक्तियों के साथ संलग्न होने हेतु विवश किया। इक्ता प्रणाली एवं परवर्ती राजस्व सुधारों ने उत्पादकों के वित्तीय भार में वृद्धि की। राजस्व की देयता, कृषि निवेश (बीज आदि) एवं अकाल जैसी आपदाओं से निपटने हेतु कृषक प्रायः ऋण पर निर्भर हो गए। इसके परिणामस्वरूप ग्रामीण क्षेत्रों में महाजनों या साहूकारों का वर्चस्व स्थापित हो गया, जो भविष्य में पैदा होने वाली उपज की सुरक्षा पर ऋण प्रदान करते थे। कालांतर में, दीर्घकालिक ऋणग्रस्तता ग्रामीण जीवन की एक स्थायी संरचनात्मक विकृति बन गई। जियाउद्दीन बरनी एवं इब्न बतूता जैसे समकालीन इतिहासकारों के वृत्तांत अत्यधिक कराधान एवं ऋणों के कारण उत्पन्न हुई कृषक दुर्दशा का सजीव चित्रण प्रस्तुत करते हैं।
मुगल काल ग्रामीण अर्थव्यवस्था एवं कृषि साख के क्षेत्र में निरंतरता एवं सघनता के युग का प्रतिनिधित्व करता है। ग्राम अभी भी कृषि संगठन की आधारभूत इकाई थे, जिनकी संरचना में कृषक, शिल्पकार, सेवा प्रदाता तथा मुकद्दम एवं पटवारी जैसे मध्यवर्ती अधिकारी सम्मिलित थे। इस युग में कृषि के वाणिज्यीकरण की प्रवृत्ति प्रबल हुई, जिसके परिणामस्वरूप कपास, नील, गन्ना एवं तंबाकू जैसी नकदी फसलों के उत्पादन में वृद्धि हुई। मुगल भू-राजस्व प्रणाली, विशेषकर अकबर की 'जब्त' एवं 'दहसाला' व्यवस्थाओं के अंतर्गत, राजस्व की नकद अदायगी पर बल दिया गया। इस मुद्रीकरण ने कृषकों की साहूकारों एवं बनियों पर निर्भरता को अनिवार्य बना दिया। कृषि निवेश (जैसे बीज, पशु एवं उपकरण) तथा राजस्व देयता की पूर्ति हेतु कृषि ऋण अपरिहार्य सिद्ध हुए। यद्यपि साख व्यवस्था ने उत्पादन प्रक्रिया को गति प्रदान की, तथापि अत्यधिक ब्याज दरों एवं फसल की विफलता के कारण कृषक ऋण चक्र में फंसते चले गए। इसके परिणामस्वरूप, भूमि का बड़े पैमाने पर हस्तांतरण हुआ, जिससे स्वतंत्र कृषक मात्र बटाईदार अथवा कृषि श्रमिकों की स्थिति में आ गए। अंततः, यद्यपि ग्रामीण सामुदायिक एकजुटता के विद्यमान ढांचे के उपरांत भी ग्रामीण समाज के भीतर आर्थिक विभेदीकरण एवं स्तरीकरण और अधिक तीव्र हुआ, तथापि स्थानीय हाटों (बाजारों) तथ लघु उद्योगों, यथा बुनाई, कुंभकारी तथा हस्तशिल्प के साथ कृषि के समन्वयन के कारण इन दोनों कालों में ग्रामीण अर्थव्यवस्था में लचीलापन व्याप्त था।



